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मध्यप्रदेश की फसलें एवं जानकारियाँ - Kisan Suvidha
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मध्यप्रदेश की फसलें एवं जानकारियाँ

  • सरसों की खेती-मध्यप्रदेश

     भूमि का चयन एवं खेत की तैयारी सरसों के उत्पादन हेतु अच्छी जलधारण क्षमता वाली बलुई दोमट से दोमट भूमि होना चाहिए। सिंचित क्षेत्र में खरीफ फसलों की कटाई के तुरंत बाद 1 से 2 बार कल्टीवेटर द्वारा आड़ी खड़ी जमीन की जुताई करे। उसके...

    12.11.2017
  • सरसों , राई व तोरिया में पौध संरक्षण ( Plant Protection in Mustard )

    सरसों हमारे देश की रबी के मौसम की प्रमुख तिलहनी फसल है ! कम वर्षा वाले क्षेत्रो और जहाँ सिंचाई सुविधा नहीं है वहाँ पर भी इस फसल को आसानी से लगाया जा सकता है ! सरसों हर द्रष्टि से ऊपयोगी है ! इसके पत्तों...

    11.11.2017
  • मसूर की उन्नत खेती( Lentil cultivation in Madhya Pradesh )

    अधिक उत्पादन के लिये मसूर की उन्नत खेती(Lentil cultivation) रबी मौसम में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में मसूर का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके दानों में 24-26 प्रतिशत प्रोटीन, 1.3 प्रतिशत वसा, 3.2 प्रतिशत रेशा व 57 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा कैल्सि

    11.11.2017
  • गेहूँ उत्पादन तकनीक ( Wheat cultivation technology )-Madhya Pradesh

    परिचय(Introduction) भारत वर्ष में 1965 के बाद गेहूँ के उत्पादन में कई गुना वृद्धि होने से देश आयात से निर्यात की स्थिति में आ गया हैं। इस उत्पादन वृद्धि को हरित क्रान्ति की संज्ञा दी गई हैं। आज भारत 93.9 मिलियन टन गेहूँ पैदा कर...

    11.11.2017
  • चना (chickpea) का भरपूर उत्पादन हेतु वैज्ञानिक तकनीक-मध्यप्रदेश

    परिचय (Introduction) चना एक मुख्य रबी दलहनी फसल है म.प्र. में लगभग 25.6 लाख हेक्टेयर में चने की खेती की जाती है जिससे लगभग 17.30 लाख टन उत्पादन मिलता है म.प्र. में चने का 944 किग्रा/हे. औसत उत्पादन है जबकि उन्नत किस्मों की क्षमता 18-20...

    11.11.2017
  • चना के प्रमुख रोग व कीट ( Major diseases and pests of Chickpea )

    रबी की दलहनी फसलों में चना मध्यप्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों तथा कृषकों का सर्वाधिक ध्यानाकर्षण का केन्द्र है। यही कारण है कि चने का महत्व एक अच्छी आमदानी वाली फसल के रूप में उभरकर सामने आया हैं। भारत विश्व का सबसे अधिक चना (लगभग 75...

    11.11.2017
  • खरबूजा की वैज्ञानिक खेती

    खरबूजा की खेती मुख्यतः ग्रीष्म कालीन फलस के रूप में की जाती है । खरबूजे के बीजों की गिरी का उपयोग मिठाई को सजाने में किया जाता है । इसका सेवन मूत्राशय संबंधी रोगों में लाभकारी होता है । इसकी 80 प्रतिशत खेती नदियों के...

    31.8.2017
  • ईसबगोल की कृषि तकनीक

    हाल के वर्षों में औषधीय पादपों की मांग केवल देश के भीतर ही नहीं बढ़ी है बल्कि निर्यात के लिए भी उनकी मांग में भारी तेजी आई है । अधिकाधिक संख्या में किसान इस अति मांग वाले क्षेत्र में प्रवेश कर रहे है । राष्ट्रीय...

    28.8.2017
  • Onion Varieties

    Recommended onion varieties for different seasons and regions of the country are given below:- Varieties Colour Season Region Days to maturity Yield potential Bhima Super Red Kharif Chhattisgarh, Delhi, Gujarat, Haryana, Karnataka, Madhya Pradesh, Maharashtra, Odisha, Punjab, Rajasthan and Tamil Nadu   100-105 days 20-22...

    18.8.2017
  • बाबची की खेती

    परिचय बाबची एक औषधीय खरपतवारी है, जो सीधा बढ़ता है, इसकी डालियों पर धब्बे से रहते हैं । पत्ती गोल तथा इसके दोनों ओर काले धब्बे रहते हैं । फूल छोटा ( 10-30मि.मी.) नीला सफेद रंग का गुच्छे में पत्ती के सिरे पर रहते हैं...

    11.8.2017
  • कालमेघ की खेती

    परिचय कालमेघ खरीफ मौसम का खरपतवार है जो कि पड़ती जगहों पर, खेतों की मेढ़ों पर उगता है यह सीधा बढ़ने वाला शाकीय पौधा है । इसकी ऊँचाई 1-3 फुट तक होती है । विभिन्न भाषाओं में इसके अलग नाम हैं । इस कालमेघ, भूनिम्ब,...

    10.8.2017
  • कलौंजी की खेती

    परिचय कलौंजी के बीजों का औषधि के रूप में प्रयोग होता है । इसके बीजों को कृमिनाशक, उत्तेजक, प्रोटोजोवा रोधी के रूप में उपयोग किया जाता है । इसके बीजों के प्रयोग से पेशाब खुलकर आती है । इसके अतिरिक्त इसे कैंसर रोधी औषधि के...

    10.8.2017
  • सफेद मूसली की खेती

    परिचय सफेद मूसली लिलिएसी कुल का महतवपूर्ण औषधीय पौधा है जिसकी जड़ें आयुर्वेदिक दवाओं में बहुतायत से प्रयोग में लाई जाती है । इसकी वार्षिक उपलब्धता लगभग 5000 टन है जबकि इसकी मांग 35000 टन प्रति वर्ष आंकी गई है । यह पौधा संपूर्ण म.प्र....

    09.8.2017
  • मक्का की शीघ्र पकने वाली किस्में

    भारत में मक्का, खाद्यान्न एवं पशु आहार, दोनों रूप से महत्वपूर्ण फसलों में से एक है । लगभग 25% मक्का के दानों का उपयोग मानव – भोजन हेतु किया जाता है जबकि कुल उत्पादन के लगभग 60% का उपयोग मुर्गी पालन एवं सूअर पालन उद्योग में...

    09.8.2017
  • अजवाइन की उन्नत खेती

    परिचय अजवाइन ( थाईमा वलगेरिस लिना ) लैमिऐसी कुल का सदस्य है । यह एक महत्वपूर्ण सगंधीय जड़ी है जिसे पत्तियों और फूलों के लिए उगाया जाता है । इसका मुख्य उपयोग मछली और मांस वाले भोज्य पदार्थों में होता है ।  इसकी पत्तियों से...

    08.8.2017
  • तीखुर की खेती / Tikhur farming

    परिचय तीखुर या ईस्ट इण्डियन आरारोट को तिकोरा भी कहा जाता है, इसके राइजोम को औषधीय उपयोग में लाया जाता है । भारतीय वन्य भूमि पर यह प्राकृतिक रूप से पाया जाता है तथा इसकी खेती दक्षिण भारत, बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र प्रदेशों में काफी.

    08.8.2017
  • ब्राम्ही की खेती

    परिचय ब्राम्ही एक स्क्रोफुलेरिऐसी कुल का बहुवर्षीय भूस्तरी शाक है । इसकी शाखायें ऊपर की ओर बढ़ती हैं । जिसकी प्रत्येक ग्रंथी पर अनेक फूल – फल लगते हैं । इसकी शाखायें एवं पत्ते मुलायम तथा गूदेदार होते हैं । इसके पुष्प वृंतरहित तथ

    08.8.2017
  • काली हल्दी की खेती

    परिचय काली  हल्दी या नरकचूर एवं औषधीय महत्व का पौधा है । जो कि मुख्य रूप से बंगाल में बृहद स्तर पर उगाया जाता है । इसका उपयोग रोगनाशक व सौन्दर्य प्रसाधन दोनों रूपों में किया जाता है ।   वानस्पतिक वर्णन काली हल्दी वानस्पतिक...

    05.8.2017
  • फ्रासबीन उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक

    फ्रासबीन को और कई नामों से भी जाना जाता है । जैसे – ग्वार, कलस्टरबीन आदि । यह एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक बेमौसमी सब्जी है । यह सब्जी अन्य फसलों की तुलना में कम अवधि में अधिक पकने वाली तथा आय देने वाली फसल है ।...

    04.8.2017
  • खरीफ फसलों में खरपतवारों की समस्या एवं उनका वैज्ञानिक प्रबंधन

    भारत की तेज गति से बढ़ती हुई जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए प्रति इकाई क्षेत्र समय एवं साधन से अधिक से अधिक उत्पादन करना नितांत आवश्यक है । इसके लिए सघन कृषि प्रणली अपनाने के साथ-साथ उत्तम किस्म का चुनाव, सही समय पर बुवाई, संतुलित...

    04.8.2017
  • नेपियर बाजरा घास उत्पादन

    नेपियर बाजरा घास पानी व पोषक की मांग कम होने के कारण खाली पड़े स्थान, पड़त भूमि, एकल फसली खेती के बाद खाली पड़े खेत सभी जगह उगाई जा सकती है । यह भूमि संरक्षण के लिए उपयुक्त व बहुवर्षीय चारा फसल है । करीब...

    03.8.2017
  • केले के रोग एवं प्रबंधन

    केले में लगने वाली प्रमुख बीमारियां एवं उनका नियंत्रण:- 1. सिगाटोका लीफ स्पाट लक्षण: यह केले में लगने वाली एक प्रमुख बीमारी है इसके प्रकोप से पत्ती के साथ साथ घेर के वजन एवं गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। शुरू में पत्ती के उपरी...

    03.8.2017
  • खेत में मृदा एवं जल संरक्षण कैसे करें

    खेती योग्य भूमि पर मृदा एवं जल संरक्षण उपाय मुख्य रूप से भूमि ढाल एवं वर्षा पर निर्भर रहता है । जिन क्षेत्रों में भूमि का ढाल 2 प्रतिशत से कम होता है ऐसे क्षेत्रों के लिए वानस्पतिक उपाय अनुशंसित किये जाते हैं । दूसरी...

    02.8.2017
  • रामतिल की उन्नत खेती / जगनी की खेती

    रामतिल या जगनी 32 से 40 प्रतिशत गुणयुक्त तेल एवं 18 से 25 प्रतिशत प्रोटीन वाली फसल है । इसमें 18 प्रतिशत शर्करा, 12 प्रतिशत रेशा एवं 5 प्रतिशत राख होती है । जगनी की फसल को लगभग सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा...

    02.8.2017
  • Varieties of Garlic

    The following varieties are recommended for various seasons and regions of the country. Varieties developed by ICAR-DOGR Bhima Omkar This variety has been recommended for cultivation in the states of Delhi, Gujarat, Haryana and Rajasthan. It matures in 120-135 days and average yield is 8-14...

    29.7.2017
  • पपीते की खेती

    पपीता एक स्वादिष्ट, औषधीय एवं पौष्टिक फल है। जिसमें विटामिन ए प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है जो कि आँखो की सेहत के लिये आवश्यक है साथ ही साथ पपीता रेषेदार फल हैं जो कि पेट को साफ रखने में एवं कब्ज को दूर करने में...

    29.7.2017
  • नींबू वर्गीय फलों के प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

    भारत में नींबू वर्गीय फलों की उत्पापकता लगभग 12 – 30 टन प्रति हेक्टर है, जो कि विश्व के कई देशों की उत्पादकता से कम है नींबू वर्गीय फलों के कम उत्पादकता का कारण अनेक जैविक और अजैविक बाधाएं हैं । जैविक बाधाओं में फफूंद,...

    29.7.2017
  • फल-फूल झड़ने की समस्या से बचाव

    कुछ पौधों की जातियों में वंशीय गुणों के कारण फूलों के मुख्य अंग आपस में मिलने में असमर्थ हो जाते हैं अथवा प्रसंकर पैदा हो जाते हैं, इसलिए भी बाग में फूल एवं फल झड़ने की समस्या देखी जाती है ।   कार्बोहाइड्रोजन का अनुपात...

    29.7.2017
  • संकर टमाटर उत्पादन की उन्नत तकनीकें-मध्यप्रदेश

    सब्जी फसलों में टमाटर का प्रमुख स्थान है मध्यप्रदेश में टमाटर की खेती अनुमानतः 26384 हेक्टर क्षेत्र में की जाती है जिससे 3.95 लाख टन उत्पादन मिलता है मध्यप्रदेश में इसकी उत्पादकता 150 क्विंटल प्रति हेक्टर है। टमाटर की संकर किस्मों के वि

    28.7.2017
  • तिल की उन्नत खेती-मध्यप्रदेश

    तिलहनी फसलों में तिल का प्रमुख स्थान है इसकी खेती खरीफ एवं रबी मौसम में की जाती है। तिल की उन्न्त किस्मे किस्म विमोचन वर्ष अवधि (दिन) उपज किलोग्राम हे. तेल की मात्रा (प्रतिशत) टी.के.जी.308 2008 80-85 600-700 48-50 जे.टी.11 2008 82-85 650-700 46-53 जे.टी.12...

    28.7.2017
  • सोयाबीन की उन्नत खेती-मध्यप्रदेश

    भूमि एवं तैयारी अच्छी उपज के लिये काली, जलनिकास अच्छा हो उत्तम मानी गई है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य करनी चाहिऐ।   खाद एवं उर्वरक 5 टन सड़ी गोबर की खाद या 2 टन वर्मीकम्पोष्ट/हैक्टर खेत की...

    27.7.2017
  • खरपतवारिक धान एक उभरति समस्या

    क्या है खरपतवारिक धान जीव विज्ञान के अनुसार खरपतवारिक धान बोये जाने वाली धान का समरूप है, लेकिन उसमें खरपतवार की विशेषतायें हैं । वनस्पतिक चरण में बोये जाने वाली और खरपतवारिक धान में अंतर कर पाना असंभव है और आम तौर पर इसे जंगली...

    27.7.2017
  • जैविक पद्धति द्वारा अनार की खेती

    भारत में इस समय 14.82 मिलियन हैक्टर क्षेत्रफल में बागवानी फसलें उगाई जाती हैं । जो देश के कुल क्षेत्रफल का 8.5 प्रतिशत है । राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में फलों की बागवानी 3.73 मिलियन हैक्टर में की जाती है.

    25.7.2017
  • मखाना की खेती

    मखाना निम्पिफयेसी परिवार का एक जलीय पौध है। इसे साधरणतया गोरगोन नट या पफाॅक्स नट कहते है। यह सालोभर रहने वाले स्थिर जल जैसे तालाब, गोखुर झील, कीचड़ तथा गड्ढ़े में उपजता है। मखाना को ‘काला हीरा’ भी कहा जाता है। यह उष्ण एवं उपोष्ण...

    24.7.2017
  • लहसुन की खेती-मध्यप्रदेश

    खेत की तैयारी गहरी जुताई पश्चात् क्रास कल्टीवेटर पाटा के साथ चलाकर खेत को भुरभुरा एवं समतल बना लिया जाता है। लहसुन की किस्में यमुना सफेद (जी-1), यमुना सफेद – 2 (जी-50), यमुना सफेद – 4 (जी-323), यमुना सफेद -3 (जी-282) बुवाई का समय लहसुन...

    22.7.2017
  • अरबी की खेती / घुइयाॅं की खेती -मध्यप्रदेश

    अरबी (घुइयाॅं) को मुख्यतः कंद के रूप में उपयोग हेतु लगाया जाता हैं ग्रीष्म कालीन अरबी का बाजार मूल्य खरीफ कालीन अरबी से अधिक मिलता हैं अरबी के पत्तियाॅं एवं कंदों में एक प्रकार उद्दीपनकारी पदार्थ (कैल्षियम आॅक्जीलेट) होता हैं, जिस

    21.7.2017
  • गन्ने की उन्नत किस्में-मध्यप्रदेश

    गन्ने की उन्नत किस्में शीघ्र पकने वाली जातियां किस्म शक्कर (प्रतिशत में अवधि (माह) उपज (टन/हे.) प्रमुख विशेषताए को.सी.-671 20-22 10-12 90-120 शक्कर के लिए उपयुक्त, जड़ी के लिए उपयुक्त, पपड़ी कीटरोधी। को.जे.एन. 86-141 22-24 10-12 90-110 जड़ी अच्छी, उत्तम गुड़, शक्कर अधिक,

    10.7.2017
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    परिचय(Introduction) भारत वर्ष में 1965 के बाद गेहूँ के उत्पादन में कई गुना वृद्धि होने से देश आयात से निर्यात की स्थिति में आ गया हैं। इस उत्पादन वृद्धि को हरित क्रान्ति की संज्ञा दी गई हैं। आज भारत 93.9 मिलियन टन गेहूँ पैदा कर...

    11.11.2017
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  • गन्ने की उन्नत किस्में-मध्यप्रदेश

    गन्ने की उन्नत किस्में शीघ्र पकने वाली जातियां किस्म शक्कर (प्रतिशत में अवधि (माह) उपज (टन/हे.) प्रमुख विशेषताए को.सी.-671 20-22 10-12 90-120 शक्कर के लिए उपयुक्त, जड़ी के लिए उपयुक्त, पपड़ी कीटरोधी। को.जे.एन. 86-141 22-24 10-12 90-110 जड़ी अच्छी, उत्तम गुड़, शक्कर अधिक,

    10.7.2017
  • गन्ना फसल के कीट रोग एवं नियंत्रण

    गन्ना फसल के कीट रोग एवं नियंत्रण भारत वर्ष गन्ने की मातृभूमि हैं। वर्तमान में हमारे देश में इसकी पहचान एक औद्योगिक नगद फसल के रूप् में हैं। विश्व के अन्य देशो की तुलना में हमारे देश में इसकी प्रति हेक्टेयर उपज काफी कम हैं।...

    02.5.2017
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  • चना (chickpea) का भरपूर उत्पादन हेतु वैज्ञानिक तकनीक-मध्यप्रदेश

    परिचय (Introduction) चना एक मुख्य रबी दलहनी फसल है म.प्र. में लगभग 25.6 लाख हेक्टेयर में चने की खेती की जाती है जिससे लगभग 17.30 लाख टन उत्पादन मिलता है म.प्र. में चने का 944 किग्रा/हे. औसत उत्पादन है जबकि उन्नत किस्मों की क्षमता 18-20...

    11.11.2017
  • चना के प्रमुख रोग व कीट ( Major diseases and pests of Chickpea )

    रबी की दलहनी फसलों में चना मध्यप्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों तथा कृषकों का सर्वाधिक ध्यानाकर्षण का केन्द्र है। यही कारण है कि चने का महत्व एक अच्छी आमदानी वाली फसल के रूप में उभरकर सामने आया हैं। भारत विश्व का सबसे अधिक चना (लगभग 75...

    11.11.2017
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  • मक्का की शीघ्र पकने वाली किस्में

    भारत में मक्का, खाद्यान्न एवं पशु आहार, दोनों रूप से महत्वपूर्ण फसलों में से एक है । लगभग 25% मक्का के दानों का उपयोग मानव – भोजन हेतु किया जाता है जबकि कुल उत्पादन के लगभग 60% का उपयोग मुर्गी पालन एवं सूअर पालन उद्योग में...

    09.8.2017
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  • सोयाबीन की उन्नत खेती-मध्यप्रदेश

    भूमि एवं तैयारी अच्छी उपज के लिये काली, जलनिकास अच्छा हो उत्तम मानी गई है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य करनी चाहिऐ।   खाद एवं उर्वरक 5 टन सड़ी गोबर की खाद या 2 टन वर्मीकम्पोष्ट/हैक्टर खेत की...

    27.7.2017
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  • Sunflower farming in Madhya Pradesh – सूर्यमुखी की खेती

    परिचय(Introduction) मध्यप्रदेश में सूर्यमुखी की खेती तीनों मौसम में की जा सकती है। खरीफ में मध्यप्रदेश के उन क्षेत्रों में इसकी खेती की जा सकती है जहाँ वर्षा 750 मि.मी. तक होती हैं। सूर्यमुखी फसल की खेती सिंचित क्षेत्रों में रबी, पिछेती रबी ए

    03.5.2017
  • कुसुम की खेती ( Safflower cultivation practices Madhya Pradesh)

    परिचय (Introduction) कुसुम/करडी रबी मौसम में उगायी जाने वाली बहुउपयोगी तिलहनी फसल हैं। इसके दानों में 29 से 33 प्रतिशत तेल, 15 प्रतिशत प्रोटीन, 15 प्रतिशत शक्कर, 33 प्रतिशत रेशा एवं 6 प्रतिशत राख पायी जाती हैं। प्रदेश में इसकी खेती 400 हेक्टेयर क्षेत

    03.5.2017
  • गुलदाउदी की उन्नत खेती / सेवन्ती की खेती / Chrysanthemum

    परिचय गुलदाउदी को सर्दी के मौसम की रानी कहा जाता है क्योकि सर्दियों में उगाए जाने वाले फूलों में यह बहुत लोकप्रिय है इसको सेवन्ती व चंद्रमाल्लिका के नाम से भी जानते है | गुलदाउदी के फूलो की बनावट आकार प्रकार तथा रंग में इतनी...

    10.6.2017
  • गैलार्डिया (नवरंगा) की व्यावसायिक खेती-मध्यप्रदेश

    परिचय गैलार्डिया पुष्प को नवरंगा के नाम से भी जाना जाता है |  इसके पुष्प पीले, नारंगी, लाल तंबिया मिश्रित गहरे तंबिया आदि विभिन्न आकर्षक रंगों में आते है| जो बहुत ही लुभावने होते है इसलिये इसकी मांग  बाज़ार में  अच्छी रहती है | खासतोर..

    10.6.2017
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  • ईसबगोल की कृषि तकनीक

    हाल के वर्षों में औषधीय पादपों की मांग केवल देश के भीतर ही नहीं बढ़ी है बल्कि निर्यात के लिए भी उनकी मांग में भारी तेजी आई है । अधिकाधिक संख्या में किसान इस अति मांग वाले क्षेत्र में प्रवेश कर रहे है । राष्ट्रीय...

    28.8.2017
  • बाबची की खेती

    परिचय बाबची एक औषधीय खरपतवारी है, जो सीधा बढ़ता है, इसकी डालियों पर धब्बे से रहते हैं । पत्ती गोल तथा इसके दोनों ओर काले धब्बे रहते हैं । फूल छोटा ( 10-30मि.मी.) नीला सफेद रंग का गुच्छे में पत्ती के सिरे पर रहते हैं...

    11.8.2017
  • कालमेघ की खेती

    परिचय कालमेघ खरीफ मौसम का खरपतवार है जो कि पड़ती जगहों पर, खेतों की मेढ़ों पर उगता है यह सीधा बढ़ने वाला शाकीय पौधा है । इसकी ऊँचाई 1-3 फुट तक होती है । विभिन्न भाषाओं में इसके अलग नाम हैं । इस कालमेघ, भूनिम्ब,...

    10.8.2017
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    परिचय कलौंजी के बीजों का औषधि के रूप में प्रयोग होता है । इसके बीजों को कृमिनाशक, उत्तेजक, प्रोटोजोवा रोधी के रूप में उपयोग किया जाता है । इसके बीजों के प्रयोग से पेशाब खुलकर आती है । इसके अतिरिक्त इसे कैंसर रोधी औषधि के...

    10.8.2017
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    08.8.2017
  • ब्राम्ही की खेती

    परिचय ब्राम्ही एक स्क्रोफुलेरिऐसी कुल का बहुवर्षीय भूस्तरी शाक है । इसकी शाखायें ऊपर की ओर बढ़ती हैं । जिसकी प्रत्येक ग्रंथी पर अनेक फूल – फल लगते हैं । इसकी शाखायें एवं पत्ते मुलायम तथा गूदेदार होते हैं । इसके पुष्प वृंतरहित तथ

    08.8.2017
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    परिचय काली  हल्दी या नरकचूर एवं औषधीय महत्व का पौधा है । जो कि मुख्य रूप से बंगाल में बृहद स्तर पर उगाया जाता है । इसका उपयोग रोगनाशक व सौन्दर्य प्रसाधन दोनों रूपों में किया जाता है ।   वानस्पतिक वर्णन काली हल्दी वानस्पतिक...

    05.8.2017
  • अश्वगंधा की खेती / Ashwagandha farming

    परिचय अश्वगंधा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में प्रयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है। इसके साथ-साथ इसे नकदी फसल के रूप में भी उगाया जाता है। भारत में इसकी खेती 1500 मीटर की ऊँचाई तक के सभी क्षेत्रों में की जा रही है। भारत के...

    13.6.2017
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  • तिल की उन्नत खेती-मध्यप्रदेश

    तिलहनी फसलों में तिल का प्रमुख स्थान है इसकी खेती खरीफ एवं रबी मौसम में की जाती है। तिल की उन्न्त किस्मे किस्म विमोचन वर्ष अवधि (दिन) उपज किलोग्राम हे. तेल की मात्रा (प्रतिशत) टी.के.जी.308 2008 80-85 600-700 48-50 जे.टी.11 2008 82-85 650-700 46-53 जे.टी.12...

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    08.8.2017
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