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सोयाबीन में पोषक तत्व एवं खरपतवार प्रबंधन – Kisan Suvidha
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सोयाबीन में पोषक तत्व एवं खरपतवार प्रबंधन

सोयाबीन खपतवार

सोयाबीन में पोषक तत्व एवं खरपतवार प्रबंधन

सोयाबीन में पोषक तत्व प्रबन्धन

फास्फोरस की आवश्यकता पौधे के वृद्धि, एवम् विकास तथा जीवाणुओं की कार्यक्षमता के लिए होती है। सोयाबीन का पौधा सम्पूर्ण जीवनकाल में समान रूप से फास्फोरस ग्रहण करता है, किन्तु फास्फोरस की सबसे अधिक आवश्यकता फलियाँ बनते समय तथा दानों के प्रौढ होते समय होती है।

अतएव फास्फोरस का प्रयोग मृदा-परीक्षण के आधार पर ही किया जाना विशेष लाभकारी होता है। 6.5 पी.एच. मान से कम कर फास्फोरस की उपलब्धता घटने लगती है।फास्फोरस देने वाली खादों के प्रयोग से जड़-ग्रंथियों की संख्या, आकार तथा जीवाणुओं की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है। इस प्रकार 80-100 किग्रा./हे. फास्फोरस प्रदान किया जाना चाहिए।
अन्य फसलों की अपेक्षा सोयाबीन की फसल के लिए अधिक मात्रा में पोटाश आवश्यक होता है। पौधे को पोटाश की सर्वाधिक आवश्यकता वानस्पतिक वृद्धि के समय होती है तथा फलियाँ बनने की अवस्था में कम होने लगती है। पोटाश के प्रयोग से फलियों का झड़ना रूकता है, दाने अच्छी प्रकार भरते हैं तथा दानों के गुणों में भी वृद्धि होती है। इस प्रकार मृदा-परीक्षण के आधार पर 40-60 किग्रा./हे. पोटाश का प्रयोग किया जाना चाहिए।

इसके पौधे तथा जड़ ग्रन्थियों के जीवाणुओं की वृद्धि के लिए कैल्शियम, लोहा, बोरान, मैंगनीज, जस्ता तथा ताँबे की भी आवश्यकता होती है, किन्तु इनका प्रयोग प्रायः सभी भूमियों में आवश्यक नहीं पाया गया है। सल्फर की कमी की भूमियों में 20 किग्रा./हे. सल्फर तथा अधिक वर्षा वाली एवम् क्षारीय भूमियों में 5 किग्रा./हे. जिंक का प्रयोग करना चाहिए।

सोयाबीन में खरपतवार प्रबन्धन

सोयाबीन का पौधा प्रारम्भ में बहुत मंद गति से बढ़ता है अतएव खेत में तीव्रगति से बढ़ने वाले खपतवारों से 25.70 प्रतिशत तक नुक्सान होता हैद्य इसलिए यह आवश्यक है कि बोने के 40-45 दिन बाद, जब तक पौधा भूमि में अच्छी प्रकार स्थापित होकर खरपतवारों को बढ़ने से रोकने योग्य न होए खेत में खपतवारों को बढ़ने ना दिया जाएद्यबिरली फसलों में घनी बोई गई फसलों की अपेक्षा अधिक संख्या में खरपतवार आते हैं।

अतः सोयाबीन की फसल में बोने के 20 दिन तथा 40 दिन बाद दो बार निराई-गुड़ाई करके खेत से खरपतवारों को निकालते रहना चाहिए। यह कार्य खुरपी, हैन्ड हो अथवा शक्तिचालित यंत्रों की सहायता से किया जा सकता है।

बड़े क्षेत्रफल पर फसल के खरपतवारों की रोकथाम हेतु बासालिन 1.65 – 2.2 लीटर प्रति हे. बुआई से पहले 800-1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें या लासो 3-4 लीटर प्रति हे. अथवा पेन्डीमेथलीन 3.3 ली प्रति हे. बुआई के बाद जमाव से पहले 800-1000 लीटर पानी के साथ मिलाकर छिडकाव करना चाहिए|

पोषक तत्व एवं खरपतवार प्रबंधन हेतु सुझाव

1. मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करें। पिछली फसल में दिये गये पोषक तत्वों की मात्रा के आधार पर वर्तमान फसल की उर्वरक मात्रा का निर्धारण करना चाहिए।
2. दलहनी फसलों में सम्बन्धित राइजोबियम कल्चर का उपयोग भूमि शोधन एवं बीज शोधन में करना चाहिए।
3. तिलहनी एवं धान्य फसलों में पी.एस.बी. एवं ऐजोटोबैक्टर कल्चर का प्रयोग बीज शोधन एवं भूमि शोधन में करना चाहिए।
4. धान, गेहूँ जैसे फसल चक्र में ढेंचा या सनई जैसी हरी खाद का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। फसल चक्र के सिद्धान्त के अनुसार फसल चक्र में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करते रहना चाहिए।
5. उपलब्धता के आधार पर गोबर, फसल अवशेषों तथा अन्य कम्पोस्ट खादों का अधिकाधिक प्रयोग करना आवश्यक होता है।
6. खेत में फसल अवशिष्ट जैविक पदार्थों को मिट्टी में निरंतर मिलाते रहना चाहिए।
7. मृदा स्वास्थ्य बढाने के लिए टिकाऊ खेती हेतु जैविक खेती अपनाने पर प्रयासरत रहना चाहिए।
8. आवश्यकतानुसार सल्फर, जिंक, कैल्शियम के अतिरिक्त अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।
9. प्रयोग किये जाने वाले पोषक तत्वों को फसल के अतिरिक्त अधिकांश मात्रा में खरपतवार ही अवशोषित करके नष्ट करते हैं। इसलिए खरपतवारों का समय पर उचित विधि से प्रबन्ध फसल के स्वास्थ्य एवं भूमि स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक होता है।
10. खरपतवारों का नियंत्रण निकाई एवं गुड़ाई विधि से करना ज्यादा लाभकारी रहता है क्योंकि इससे फसल में वायु संचार बढ़ता है तथा खरपतवारों का लाभ दायक उपयोग भी हो जाता है।
11. रासायनिक खरपतवार नाशियों की निर्धारित मात्रा का प्रयोग उचित समय पर करना आवश्यक होता है अन्यथा लाभ के बजाय हानि होने की सम्भावना रहती है।
12. खरपतवार नाशी रसायनों के प्रयोग हेतु हमेशा स्वच्छ जल का उपयोग करना चाहिए तथा फ्लैट फैन नाजिल वाले यंत्र का प्रयोग करना चाहिए।

 

Source-

  • Krishi Vibhag,Uttar Pradesh

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