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सोयाबीन के विषाणु रोग एवं प्रबंधन – Kisan Suvidha
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सोयाबीन के विषाणु रोग एवं प्रबंधन

सोयाबीन के विषाणु रोग

सोयाबीन के विषाणु रोग एवं प्रबंधन

वैसे तो सोयाबीन में बहुत से विषाणु रोग पाए जाते हैं । यदि इन रोगों  को समय से पहचान लिया जाए तो इन्हें समय रहते  नियंत्रित कर अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है । सोयाबीन फसल में फफूँद, जीवाणु एवं विषाणु द्वारा रोग फैलाये जाते हैं । सोयाबीन फसल में प्रमुख  विषाणु रोग  सोयाबीन का पीला मोजेक, सोयाबीन मोजेक एवं लीफ क्रिंकल रोग हैं ।

१.सोयाबीन का पीला मोजेक रोग

सोयाबीन के रोगों में से यह एक अत्यधिक हानिकारक रोग है । यह रोग मूँगफली एलो मोजेक बाइजेमिनी विषाणु द्वारा उत्पन्न होता है । यह रोग अन्य दलहनी फसलों जैसे मूँग, उर्द, अरहर इत्यादि पर भी होता है । इन फसलों पर रोग का फैलाव बेमीसिया टबेसाई है । सर्वप्रथम पत्ती पर गहरे पीले रंग के कुछ विसरित्र चितकबरे धब्बे दिखाई देते हैं, जो आकार में बढ़कर आपस में मिल जाते हैं । इस प्रकार पूरी पत्ती पीली हो जाती है । इस रोग से पौधों में फूलों की संख्या कम हो जाती है और फल्लियाँ विकृत हो जाती हैं एवं इन फल्लियों में बने दाने सिकुड़े हुए होते हैं ।

रोग ग्रसित पौधे देर से परिपक्व होते हैं तथा इन पौधों में फूल और फल्ल्यिाँ स्वस्थ पौधों की अपेक्षा कम लगती हैं । जो पौधे प्रारम्भिक अवस्था में ही रोग ग्रसित हो जाते हैं वह बिना उपज दिए ही नष्ट हो जाते हैं ।

प्रबंधन

1 .श्रोग ग्रसित पौधों को प्रारंभ में ही पहचान कर उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए ।
2 .जून – जुलाई में बोई फसल का बोने के बाद आरम्भ से ही निरीक्षण करते रहना चाहिए ।
3 .जैसे ही कोई पौधा इस रोग से ग्रसित दिखाई दे तो तुरन्त कीटनाशियों का छिड़काव प्रारम्भ कर देना चाहिए ।
4. मेटासिस्टाक्स 1 लीटर 1000 लीटर पानी में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रत्येक 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए । यह क्रम तब तक चलता है जब तक कि फसल 75 दिन की न हो जाए ।

ग्रीष्म तथा बसन्त ऋतु में दलहनी फसल में खेती के चारों तरफ उगे खरपतवार को नष्ट कर देना चाहिए , जिससे वायरस खरपतवार से फसल में न आ सके । वर्तमान समय में ऐसी कोई व्यापारिक किस्में नहीं हैं जो कि इस रोग की प्रतिरोधी किस्म हो । पी.के. – 1042 एवं पी.के. 0564 किस्म के रोग का बहुत कम प्रभाव देखा गया है ।

२.सोयाबीन मोजेक

पत्तियाँ संकुचित, कम चैड़ी तथा साधारण पत्ती से अधिक गहरे रंग की हो जाती है । पत्ती की मुख्य शिरा के साथ-साथ पूरी पत्ती बुरी तरह से उत्कुंचित हो जाती है । पौधे के पर्ण एवं पर्णक्रंत छोटे रह जाते हैं, जिससे कि पौधा छोटा रह जाता है । कलियाँ छोटी, चपटी, विकृत तथा बीजयुक्त हो जाती हैं एवं बीज में कर्बुरंण चितकबरापन अधिक पाया जाता है । यह रोग सोयाबीन मोजेक विषाणु के द्वारा होता है । यह वायरस बीज के अन्दर रहता है तथा ऐसे सवंमित बीज बोने पर उनसे उत्पन्न पौधों में रोग के लक्षण दिखलाई पड़ने लगते हैं।

इस रोग की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए: रोग ग्रसित पौधों को बीज उगाने वाले खेत से उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए ।

एफिड के नियंत्रण के लिए फास्फोमिडान 350 मि.ली. या रोगर 30 ई.सी. प्रति हेक्टयर के हिसाब से फसल की वृद्धि उपरान्त छिड़काव करें । अधिकतम व्यवसायिक जातियाँ इस रोग से ग्राही हैं । सोयाबीन मोजेक प्रतिरोधक जाति के विकास के लिए सोयाबीन जीनोटाइप एवं प्रजातियाँ पहचान करना जरूरी है जिससे किसान इस रोग की प्रतिरोधी जातियाँ उगा सकें ।

 

३.सोयाबीन झुर्रीदार पत्ती रोग

रोग ग्रसित पौधों की पत्तियों का आकार सामान्य पत्तियों की अपेक्षा बढ़ा होता है । पत्तियों की सतह पर सिकुड़न (झुर्री) होना रोग का मुख्य लक्षण है । रोग ग्रसित पौधों में बहुत कम फलियाँ लगती हैं, जिससे उत्पादन में कमी आ सकती है । यह रोग श्उर्दबीन लीफ क्रिंकल विषाणुश् द्वारा होता है । रोग का संचरण पौधे के रस व बीज से होता है । इस रोग की रोकथाम के लिए रोगी पौधों को प्रारम्भ में उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए । रोग रहित स्वस्थ पौधों से प्राप्त बीज ही बुआई के लिए प्रयोग करना चाहिए । रोग प्रतिरोधी जातियों को उगाना चाहिए ।

 

स्रोत-

  • जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर

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