सोयाबीन की उन्नत खेती-मध्यप्रदेश

भूमि एवं तैयारी

अच्छी उपज के लिये काली, जलनिकास अच्छा हो उत्तम मानी गई है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य करनी चाहिऐ।

 

खाद एवं उर्वरक

5 टन सड़ी गोबर की खाद या 2 टन वर्मीकम्पोष्ट/हैक्टर खेत की तैयारी के समय प्रयोग की जानी चाहियें। नत्रजन, स्फुर, पोटाश, गंधक व जस्ता की 25:60:20:30:5 कि.ग्रा./हैक्टर मात्रा आधार खाद के रूप में भूमि में दी जावें।

 

सोयाबीन की प्रमुख किस्में

सोयाबीन की निम्न किस्मेें जिले के लिये अनुशंसित है।

किस्म

पकने की अवधि (दिन)

उपज (कि./है.)

विवरण

 

जे.एस. 95 60 82-88 18&20 पीलामौजेक प्रतिरोधी, शीघ्र पकने वाली, गिर्द क्षेत्र में

अनुकूल सघन कृषि हेतु उपयुक्त।

जे.एस. 93 05 90&95 20&25 बैंगनी फूल चार दाने वाली एवं सूखा सहनशील
जे.एस. 2034 87&88 22&25 सफेद फूल शीघ्र पकने वाली चारकोल रोड एवं गर्डन बीटल प्रतिरोधी
जे.एस. 2029 90&95 25&30 सफेद फूल पीला मोजाइक एवं चारकोल राट प्रतिरोधी
आर.वी.एस.2001-4 90&95 22&25 सफेद फूल गर्डन बीटल एवं सेमीलूपर कीट एवं रोगों के प्रति सहनशील

 

बोने का समय

मानसून आगमन के साथ सोयाबीन की बुवाई जून के अंतिम पखबाड़े से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक अवश्य कर देनी चाहिए।

 

बीज की मात्रा एवं बोने की तकनीक

बीज मात्रा 60-80 कि.ग्रा./हैक्टर प्रयोग करें। हल्की भूमि में 30 से.मी. व भारी मृदा में 45 से.मी. कतारों में अंतर रखे, बोनी रिज एवं फरो विधि के की जायें।

 

बीजोपचार

कार्बाेक्सिम$थाइरम से 2 ग्राम./कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। बीज को जैवउर्वरक राईजाबियम 5 ग्रा. व स्फुर धोलक जीवाणु (पी.एस.बी.) 5 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज के मान से उपचार कर शीघ्र बोनी करना चाहिए।

 

खरपतवार प्रबंधन

इमेजाथाॅपर 100 ग्रा./हैक्टर स. अ. का प्रयोग बोनी के 15-20 दिनों के बीच करने तथा एक निराई-गुड़ाई 30-35 दिनों की फसल अवस्था पर कोल्पा/व्हील हो से करने पर खरपतवारों के प्रभाव को रोका तथा उपज में वृद्धि 20 से 39 प्रतिशत तक पायी। एक ही खरपतवारनाशक का उपयोग बार-बार न करें।

 

सिंचाई

फलियों में दाने भरते समय अर्थात सितम्बर माह में नमी पर्याप्त न हो तो आवश्यकतानुसार एक हल्की सिंचाई करना सोयाबीन के विपुल उत्पादन लेने हेतु लाभदायक हैं।

 

कीट नियंत्रण

सोयाबीन में प्रमुख रूप से इस क्षेत्र में चक्रभृंग (गर्डल बीटल), व सेमीलूपर का प्रकोप होता है। इन कीटों के नियंत्रण के लिए ट्रायजोफाॅस 40 ई.सी. कीटनाशक 800 मि.ली./हैक्टर 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव के अच्छे परिणाम प्राप्त हुये हैं।

 

रोग नियंत्रण

सोयाबीन में कई तरह के धब्बे वाले फफूंद जनित रोगों के नियंत्रण के लिये कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. या थायोफिनेट मिथाईल 70 डब्ल्यू.पी. से 1.5 ग्रा. दवा/लीटर पानी के मान से घोल बनाकर छिड़काव करें। पहला छिड़काव 30-35 दिन की अवस्था पर करने की अनुशंसा की गयी है।

 

कटाई-गहाई व भण्डारण

फलियां सूखकर भूरी होने लगे और भले ही पत्ते हरे रहे फसल की कटाई प्रारंभ कर दें। खलियान में कटी फसल को 8-10 दिनों तक धूप में सुखाऐं तत्पष्चात् गहाई थ्रेसर से करने पर मषीन की कति 350 आर.पी..एम. रखे इससे बीज नहीं टूटेगा एवं अंकुरण क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडेगा। बीज की गहाई के पश्चात् धूप में 3-4 दिन सुखाकर 10 प्रतिषत से कम दाने में नमी रहने पर भंडारण करें।

 

 

स्रोत-

  • कृषि विज्ञान केन्द्र
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