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सेम की खेती – Kisan Suvidha
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सेम की खेती

सेम की खेती

सेम की खेती

सेम ठंडी जलवायु कि फसल है | इसे 15 से २२ डिग्री तक तापमान की आवश्यकता होती है | यह फरवरी में लगायी जाती है तथा इसमें पाला सहनें की क्षमता अधिक होती है|

सेम की किस्में

बेलदार किस्में
  • पूसा सेम-2, पूसा सेम-3, एच.डी. 18, रजनी।
झाड़ीदार किस्में
  • अर्का जय व अर्का विजय।

 

बीज की मात्रा

10 कि.ग्रा./हेक्टेयर (बेलदार किस्म) , 30-40 कि.ग्रा./हेक्टेयर (झाड़ीदार किस्म)

 

बुवाई का समय

जून-जुलाई: खरीफ ऋतु
फरवरी: बसंत ऋतु

 

बुवाई की दूरी

बेलदार किस्म: 1-1.5 मीटर पंक्ति से पंक्ति, 90 सें.मी. पौधा से पौधा
झाड़ीदार किस्म: 60 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति की दूरी, 15-20 सें.मी. पौधा से पौधा|

 

सिंचाई

हल्की सिंचाई 10-12 दिनों के अन्तराल पर।

 

निराई

एक या दो बार निराई या रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए 3 लीटर स्टाॅम्प/हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

 

तुड़ाई

हरी फलियों की तुड़ाई नर्म अवस्था मे जब उनमें रेशे की मात्रा कम हो, तभी नियमित रूप से करते हैं।

 

उपज

इसकी हरी फली उपज 50-70 क्विंटल/हेक्टेयर होती है।

 

फ्रेंचबीन, लोबिया एवं सेम की तुड़ाई उपरांत प्रबंधन

● मुलायम फलियां तोड़ें।
● छंटाई करने के बाद फलियों की पैकिंग करें।
● पैक फलियों को 4-5 सें.ग्रे. तापमान व 80-90 प्रतिशत आर्द्रता पर शीतगृह में भण्डारित करें।

 

बीजोत्पादन

खेत का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि खेत में वही प्रजाति उगायें जो पिछले साल उगाई गई थी अन्यथा खेत को बदल देना चाहिए। प्रमाणित बीज के लिए पृथक्करण दूरी 5 मी. तथा आधार बीज के लिए 10 मी. रखें। अवांछनीय पौधों को 2-3 बार निकालना चाहिए। पहली बार बुवाई से 30-35 दिनों बाद दूसरी बाद फली भरने पर तथा तीसरी बार पकने से पहले अवांछित पौधों को निकाल दें। जब खेत में लगभग 90 प्रतिशत फलियां पककर भूरे रंग की हो जाएं तो फसल की कटाई या फलियों की तुड़ाई करके बीज अलग कर लें तथा बीज को सुखाकर भंडार में रखें।

 

बीज उपज

6-8 क्विंटल/हेक्टेयर।

 

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

1. चूर्णिल आसिता (एरीसाइफी पोलीगोनी)

लक्षण: पत्तियों, फलियों तथा पौधे के अन्य भागों पर सफेद चूर्ण से दाग उत्पन्न होते हैं। धीरे-धीरे संपूर्ण पत्ती सफेद चूर्ण से ढ़क जाती है। रोग की उग्रता में पत्तियां पीली होकर नीचे गिर जाती हैं।

नियंत्रण
1. रोगी पौधों के अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए।
2. खड़ी फसल पर गंधक के चूर्ण का 25-30 कि.ग्रा./हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। सल्फैक्स
2 कि.ग्रा., कैलिक्सीन 500 मि.ली. या कैराथेन 600 मि.ली. का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर, प्रति
हेक्टेयर की दर से छिड़काव हर 12-15 दिन के अन्दर दोहराना चाहिए।

 

2.किट्ट (यूरोमाइसीज फैजियोलाइटाइपिक)

लक्षण: पत्तियों, फलियों तथा मुलायम तनों, शाखाओं पर होता है, पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे, सफेद रंग के, थोड़े उभरे हुए धब्बे या स्फोट उत्पन्न होते हैं। धीरे-धीरे धब्बों का रंग गाढ़ा भूरा या काला हो जाता है।

नियंत्रण
1. रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए।
2. खड़ी फसल में मेंकोजब, या डैकोनिल का छिड़काव, 2-2.5 कि.ग्रा. 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए।

 

3.सर्कोस्पोरा पर्ण दाग (सर्कोस्पोरा क्रुएन्टा)

लक्षणः सेम की पुरानी पत्तियों पर कोणीय भूरे धब्बे के रूप में उत्पन्न होते हैं। धब्बे के बीच का भाग धूसर रंग का होता है तथा किनारे का भाग लाल-भूरा या गहरे रंग का होता है। रोगी स्थान सूखकर नीचे गिर जाता है तथा पत्तियों में गड्ढ़े बन जाते हैं।

नियंत्रण
1. फसल चक्र अपनाना चाहिए।
2. खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए।
3. उर्वरक उचित मात्रा में देना चाहिए।
4. बीज को बोते समय थायरम, कैप्टान या किसी भी पारायुक्त कवकनाशी से 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज दर से उपचारित कर लेना चाहिए।

 

कीट प्रकोप एवं प्रबंधन

1. मटर फली छेदक (पी पाॅड बोरर)

इस कीट की इल्लियां लोबिया व मटर की फलियों में छेदकर दानों को खा जाती हैं।

प्रबंधन

1. ग्रसित फलियों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें।
2. बी.टी. 1 ग्राम/लीटर या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू पी 2 ग्राम/लीटर या एमामेक्टिन बेंजोएट 5 एस.जी. 1 ग्राम/2 लीटर का छिड़काव करें।

 

2. यूबलेमा इल्ली

इस कीट की इल्लियां लोबिया के फूलों को जाला बनाकर लपेटती हैं तथा बाद में खा जाती हैं।

प्रबंधन

1. जाल में लपेटे हुए फूलों के गुच्छों को नष्ट कर दें।

2. इल्लियों को जाला बनाने से पहले नीम बीज अर्क (4 प्रतिशत) या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू पी. 2 ग्राम/लीटर या बी.टी. 1 ग्राम/लीटर के छिड़काव से नियंत्रित करें।

 

3. सेम फली छेदक (बीन पाॅडबोरर)

इस कीट की इल्ली सेम की फल्लियों में छेदकर दानों को खा जाती हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.ली./4 लीटर या एमाएमेक्टिम बेन्जोएट 5 एस.जी. 1 ग्राम/2 लीटर का इस्तेमाल करें।

 

4. फली छेदक बग (पाॅड बग)

इस बग के शिशु व वयस्क दोनों ही लोबिया व सेम की फसल की फलियों व कोमल प्ररोहों से रस चूसते हैं।इसके नियंत्रण के लिए डाइमेथोएट 30 ई.सी. 2 मि.ली./लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.ली./4 लीटर या इन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.ली./ली. का छिड़काव करें।

 

5. चेंपा (एफिड)

काले रंग के चेपा के शिशु व व्यस्क लोबिया, सेम, मटर व फ्रेंचबीन की पत्तियों व अन्य कोमल भागों से
रस चूसकर पौधों को हानि पहुंचाते हैं।

प्रबंधन

1. लेडी बर्ड भृंग का संरक्षण करें।
2. नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या क्विनलफोस 25 ई.सी. 2 मि.लि/लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस. एल. 1 मि.ली./4 लीटर का छिड़काव करें।

 

6. तना मक्खी (स्टेम फ्लाई)

इस मक्खी के शिशु मटर व लोबिया की पत्ती की षिरा में सुरंग बनाते हुए पौधों की शाखा व मुख्य तनेतक घुसकर फसल को हानि पहुंचाते हैं।

प्रबंधन

फल लगने से पहले कार्बोफ्यूराॅन 3 जी. 25 कि.ग्रा./ हेक्टेयर या फिप्रोनिल 0.3 जी 18 कि.ग्रा./ हेक्टेयर का प्रयोग करें।

 

7. पत्ती सुरंगक/(लीफ माइनर)

इस कीट के शिशु मटर की पत्तियों के हरे पदार्थ को खाकर सफेद रंग की टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बनाते हैं।

प्रबंधन

1. ग्रसित पत्तियों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें।

2. डाइमेथोएट 30 ई.सी. 2 मि.ली./लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.ली./3 लीटर का छिड़काव करें।

 

8. बीन का भृंग (बीन बीटल)

इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों ही फ्रेंचबीन के लगभग सभी भागों को हानि पहुंचाते हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए कार्बेरिल 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.ली. /4 लीटर या नीम बीज अर्क (4 प्रतिशत) या एमाएमेक्टिम बेन्जोएट 5 एस.जी. 1 ग्राम/2 लीटर का इस्तेमाल करें।

 

9. फ्रेंचबीन थ्रिप्स

थ्रिप्स पत्तों से रस चूसकर पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। ग्रसित पत्ते पीले पड़ जाते हैं एवं फलियों का रंग चांदी जैसा सफेद हो जाता है।

प्रबंधन

डाइनमेथोएट 35 ई.सी. 2 मि.ली./लीटर का छिड़काव करें।

 

10. बीज का मैगट (बीन मैगट)

यह कीट भूमि के अंदर जाकर फ्रेंचबीन के बीज व उगते हुए पौधों को खा जाता है।

प्रबंधन

1. क्लोरोपायरीफाॅस 20 ई.सी. 10 मि.ली./कि.ग्रा. बीज की दर से बीज उपचार करें।
2. यदि खेत में जैविक खाद अच्छी तरह गल सड़ न जाए तो बीज न बोएं।

 

स्रोत-

  • शाकीय विज्ञान संभाग एवं कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केन्द्र, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली – 110 012

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