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सूरजमुखी के रोग व कीट एवं नियंत्रण – Kisan Suvidha
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सूरजमुखी के रोग व कीट एवं नियंत्रण

सूरजमुखी के रोग

सूरजमुखी के रोग व कीट एवं नियंत्रण

सूरजमुखी देश की प्रमुख तिलहनी फसल है इसमें 38-52 प्रतिशत तक तेल पाया जाता है। अपने विशेष गुणों के कारण यह काफी लोकप्रिय भी है। सूरजमुखी की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता नही होती तथा इसमें कई जल्दी पकने वाली किस्में भी है जिससे किसान भाई दो फसलें लेने के बाद भी खेत में सूरजमुखी लगाकर अधिक लाभ अर्जित कर सकते है। दिनों दिन देश में सूरजमुखी का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है और आजकल लगभग 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती हो रही है। सूरजमुखी की फसल पर कई रोगों व कीटों का आक्रमण होता है। जिनकी जानकारी किसान भाइयों को होना बहुत जरूरी है सूरजमुखी के विभिन्न रोग व कीट निम्नलिखित है।

 

(अ) सूरजमुखी के प्रमुख रोग (Sunflower diseases)

1.बीजसड़न

यह रोग कई फफूँदो के कारण होता हैं जैसे एस्परजीलस, पीथियम, फाइटोफ्थोरा, फ्यूजेरियम आदि, इन फफँदो से बीज या तो अंकुरण के पहले ही सड़ जाता है या अंकुरित होने के बाद नन्हे पौधों पर इन फफूँदों के आक्रमण के कारण भूरे कत्थई धब्बे बनते हैं और पौधे मर जाते हैं। बीज सड़न पैदा करने वाली फफूँदे अधिकांशतः भूमि में या कुछ हद तक बीज पर भी रहती हैं।

नियंत्रण

बीज सड़न रोग को रोकने के लिए स्वस्थ और प्रमाणित बीज का ही बोने के लिए प्रयोग करें। बीजों को बोने से पहले फफूँदनाशी जैसे केप्टान या डाइथेन एम. 45 की 3 ग्राम/किलो बीज या कार्बेन्डाजिम 1.5 ग्राम/किलो बीज के हिसाब से बीजोपचार करें एवं फसल चक्र अपनायें।

 

2. उकठा, तना सड़न और जड़ सड़न

सूरजमुखी का उकठा रोग अत्यंत व्यापक रोग है। यह रोग कई क्षेत्रीय फफूँदो के द्वारा होता है।

 

3. स्केलेरोशिया उकठा

यह उत्तरी क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसल पर नवम्बर-दिसम्बर तथा जनवरी के माह में उग्र रूप में दिखाई देता है। जहां नमी तथा पौधों के डंठल वगेरह अधिक रहते हैं और 25-30 डिग्री से. तापक्रम हो वहां रोग का प्रकोप अधिक होता है।

इस रोग से संक्रमित पौधों की पत्तियाँ पीली हो जाती हैं और पौधे सूखकर गिर जाते है। तने का निचले भाग जो भूमि में रहता है, पर सफेद जाले के समान फफूँद दिखाई देती है। इसमें 2-3 मि.मी. ठोस व कठोर काले रंग की संरचनायें स्केलेरोशिया भी दिखाई पड़ते है। कभी कभी तने में धारियाँ पड़ जाती हैं और तना सड़ जाता है। पौधे में फूल नही लगते । यह रोग स्केलेरोटिनिया स्केलेरोशियम फफूंद से होता है जिसके स्केलेरोसिया जमीन में कई साल तक जीवित रहते है और अनुकूल वातावरण में अंकुरित होकर फसल पर आक्रमण करते हैं।

स्केलेरोशिया उकटा रोग ‘स्केलेरोशियम रोल्फसाई‘ नामक फफूंद से होता है। इस रोग का प्रकोप जुलाई, अगस्त और फरवरी की फसल में अधिक होता है। इस फफूंद के कारण पौधे सूख जाते हैं कभी कभी तो कतार की कतार सूख जाती है। रोगी पौधा दूर से ही पहचाना जा सकता है। इस रोग का प्रकोप 40-50 दिन पुरानी फसल पर अधिक होता है। पौधा अचानक सूख जाता है और फिर सूख कर मर जाता है। रोगी पौधे को यदि ध्यान से देखे तो तने के निचले भाग पर सफेद फफूंद और उसमें भूरे रंग के स्केलेरोशिया दिखाई देते हैं इसमें भी रोगी पौधे पर किसी प्रकार के फूल या बीज नही लगते ।

उकठा रोग ‘वरटीसिलियस‘ जाति की फफूंद के कारण भी होता है और कई अन्य फफूंद भी इसमें शामिल होती है। यह फफूंदें भूमि में जीवित रहती है।

 

4. तना सड़न और जड़ सड़न रोग

‘राइजोक्टोनिया बटाटीकोला‘ फफूंद के कारण होता है जो कि तने और जड़ पर आक्रमण करके उसे गला देते हैं तथा पौधा मर जाता है।

नियंत्रण

इन रोगों का नियंत्रण बहुत कठिन है क्योंकि जिन फफूंदों के कारण ये रोग होते है उनके बीजाणु प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रहते है। केप्टान या थाइरम 3 ग्रा. /किलो बीज के हिसाब से बीजोपचार करने से शुरू की अवस्था में पौधों का बचाव होता है लेकिन फसल की बाद की अवस्था में बचाव नही होता।

रोग की रोकथाम के लिये गर्मी में गहरी जुताई करें तथा खेत में नीम, सरसों या करंज की खली बुआई से पूर्व डालें।

 

5. झुलसा

इस रोग का संक्रमण फसल पर किसी भी मौसम में हो सकता है परन्तु खरीफ के मौसम में इस रोग से काफी हानि होती है। दो से तीन सप्ताह पुरानी फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देने लग जाते हैं। पत्तियों पर बादामी रंग के गोल धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में काले रंग के हो जाते हैं। अनुकूल मौसम में ये धब्बे आपस में मिल जाते हैं और पूरी पत्तियाँ झुलस जाती है। इस रोग से शीर्ष कली तथा तने पर भी धब्बे बनते हैं जिससे पौध सूखने लग जाता हैं। रोगी पौधों पर फूल छोटे लगते हैं और ऐसे फूलो पर दाने हल्के और संख्या में कम लगते हैं जिससे उपज में काफी कमी आ जाती है। यह रोग ‘अल्टरनेरिया हेलियेन्थाई‘ या ‘अल्टरनेरिया टेन्युइस‘ फफूंद के कारण होता है जो कि भूमि में जीवों पर जीवित रहती है।

नियंत्रण

बोने के लिये स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें। बीज को बोने से पूर्व किसी फफूंदनाशी दवा से उपचारित करके ही बोयें। रोग के लक्षण दिखते ही डायथेन एम 45 या डाइफोयेटान 0.3 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव करें। छिड़काव 10 दिनों के अन्तर से 3 या 4 बार करने से रोग बढ़ने नही पाता और उपज में वृद्धि होती हैं। फसल अवशेषों को जला कर नष्ट कर देना चाहिए।

 

6.रतुआ

यह रोग बीजपत्र की अवस्था से लेकर फल आने और बीज विकसित होने तक कभी भी लग सकता है। सामान्यतः खरीफ की फसल पर इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। इस रोग में पत्तियों की निचली सतह पर छोटे, गोल, लालिमा लिए भूरे फफोले पड़ जाते हैं, अनुकूल मौसम होने पर फफोल बड़े हो जाते हैं और आपस में मिल जाते हैं। इन फफोलों से भूरे रंग का चूर्ण निकलता है जो कि रोग जनक के बीजाणु होते है जो हवा द्वारा दूसरे स्वस्थ पौधों पर पहुंचकर उन्हे भी संक्रमित कर देते है। यह रोग नम मौसम में बहुत तेजी से फैलता हैं। फूलों में बीज सिकुड़े हुए और कम वनज वाल बनते हैं जिनमें तेल की मात्रा भी काफी कम रहती है।

यह रोग ‘पक्सीनिया हेलियेन्थाई‘ फफूंद के कारण होता है जो कि सूरजमुखी के पौधों पर जीवित रहती है।

नियंत्रण

रोगी पौधों को इकट्ठा करके जला दें। सूरजमुखी कुल के खरपतवार को नष्ट कर दें। रोग दिखते ही फफूंदनाशी दवाओं जैसे जिनेब या डाइथेन एम-45 के 0.3 प्रतिशत के सान्द्रता के घोल का छिड़काव करें। रतुआ रोधी किस्मों को लगायें जैसे- सी ओ-2, के.बी.एस. एच-1, एम.एस.एफ.एच.-8, एम.एस.एफ.एच.-17, एम.एस.एफ.एच.30।

 

7. मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्डयू)

यह रोग ‘प्लाजमोपेरा हेलस्टेडी‘ फफूंद के कारण होता है, जो बीजों के उपर या मिट्टी में जड़ों के टुकड़ों पर जीवित रहती है। इस रोग का प्रकोप सितम्बर से नवम्बर माह मे अधिक होता है। इस रोग में कई प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैं। सर्वप्रथम बीज के अंकुरण के तुरन्त बाद फफूंद का आक्रमण होता है और नन्हा पौधा मर जाता है, इस तरह के लक्षण उस खेत में दिखाई देते हैं जहां पानी इकट्ठा होता है। जब रोग का आक्रमण फूल लगने की अवस्था में होता है तब पत्तियाँ पीली एवं कुछ मोटी हो जाती है, जड़ एवं पौधे की बढवार रूक जाती है। नम मौसम में पत्तियों की निचली सतह पर भूरे रंग की फफूँद दिखाई देती है। फूल सूर्य की ओर न होकर सीधे उपर की ओर मुंह किये रहते हैं। इससे फसल को बहुत हानि होती है।

नियंत्रण

सूरजमुखी के खेत में पानी का निकास अच्छा होना चाहिए। स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज को ही बोने के लिये उपयोग करना चाहिए । बीजों को बोने से पूर्व रिडोमिल नामक दवा (3 ग्रा/किलो ग्राम बीज) से उपचारित करके बोना चाहिए । रोगरोधी किस्मों जैसे एल. एस. -11, ज्वालामुखी, पी.एच.ई.-47, पी.ओ.सी. -301, एम.एल.एस.एफ.एच.-45, एल. डी.एम.आर.एस.एच.-1, 3 को लगाना चाहिए। मूंगफली तथा ज्वार के साथ फसल चक्र अपनाना चाहिए।

 

8. चूर्णी फफूंद

इसे भभूतिया रोग भी कहते हैं। इस रोग में पत्तियों की उपरी सतह पर सफेद चूर्णी धब्बे बन जाते हैं रोग की उग्र अवस्था में ये धब्बे पत्तियों की निचली सतह, तने पर भी फैल जाते हैं और पौधे का अधिकांष भाग ढंक लेते हैं। संक्रमित पौधे की पत्तियाँ गिरने लगती हैं। यह आमतौर पर अपेक्षाकृत अधिक तापमान और शुष्क स्थितियों में होता है। यह रोग ‘एरिसाइफी सिकोरेसिएरम‘ नामक फफूंद के द्वारा होता है। रोगजनक के बीजाणु हवा में उड़कर एक पौधे से दूसरे पौधे पर पहुँचते है। यह फफूंद दूसरे कई पौधों पर भी रोग फैलाती हैं एवं उन पर जीवित रहती है।

नियंत्रण

रोग नियंत्रण के लिये रोग दिखते ही गंधक युक्त फफूंदनाशी जैसे – वेटसल्फ, सल्टाफ या गंधक घोल का 0.3 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव करें तथा 10 दिन बाद पुनः छिड़काव करने पर रोग काफी हद तक नियंत्रित हो जाता है।

 

9.काला सड़न

इस रोग का आक्रमण ग्रीष्मकालीन फसल पर अधिक होता हैं। ग्रस्त पौधों की पत्तियां पीली हो जाती है। इन पौधों की जड़ काली पड़ जाती है। अनुकूल अवस्था मे नते का सबसे नीचे के भाग जो जमीन के सतह पर होता है वह भी काला पड़ जाता है। यदि रोगी पौधे के तने को अन्दर फाड़कर देखा जाये तो काले रंग के बहुत सारे छोटे छोटे दाने गूदे में दिखाई देते हैं। ये दाने फफूंद के स्केलेरोशिया होते है खरीफ के मौसम में जड़ व तने का निचला भाग सड़ जाने से पौधे गिर जाते हैं और पूरा पौधा मर जाता है।

पत्तियों पर इस फफूंद के संक्रमण से भूरे धब्बे बनते हैं जो बाद में काले पड़ जाते हैं। अनुकूल मौसम में यं धब्बे पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं और पत्तियाँ झड़ने लगती है। इस रोग से ग्रसित पौधों पर फूल अविकसित बनते हैं और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

यह रोग ‘मेक्रोफोमिना फैसियोलाई‘ फफूंद के कारण होता है जो जमीन में पाई जाती है इसके स्केलेरोशिया जमीन में कई वर्षो तक जीवित रहते हैं। रोग का प्रसार सेक्रमित बीज के द्वारा भी होता है। इस फफूंद के कई पोशिता है जैसे दलहन, तलहन और धान्य फसलें। इन फसलों की लगातार एक ही खेत में बोनी करने से रोगजनक बढ़ जाता है। अधिक नमी तथा 23-27 डिग्री से. तापक्रप रोग के लिये अनुकूल होते है।

नियंत्रण

बोने से पूर्व थायरम तथा बाविस्टीन (1.5 ग्राम दोनों दवा) के मिश्रण 3 ग्राम/किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बोयें। ग्रीष्माकाल में खेत की गहरी जुताई करें। खली (नीम, सरसों) की खाद का उपयोग करें।

 

10.शीर्षसड़न

यह सूरजमुखी का बहुत व्यापक एवं महत्वपूर्ण रोग है जो फसल को सबसे अधिक हानि पहुंचाता है यह कई प्रकार का होता है।

(क) फ्यूजेरियम शीर्ष सड़न – इसमें फूल की अंखुड़िया और पंखुड़ियां भूरी हो जाती हैं और झुलस जाती हैं। रष्मि और बिम्ब पुष्पक भी संक्रमित होकर भूरे हो जाते हैं और सिर सिकुड़कर हल्के या गहरे भूरे रंग का हो जाता है तथा सूख जाता हैं। यह रोग ‘यूजेरियम‘ नामक फफूंद से होता है।

(ख) एस्परजीलस नरम सड़न – इस रोग में सेक्रमित फूल पर विभिन्न आकार के जलसिक्त धब्बे बन जाते है, ये धब्बे आकार में बढकर आपस में मिल जाते है और पूरा पुष्पक्रम सड़ जाता है, उसके उपर भूरे हरे रंग की परत सी छा जाती है और फुल से दुर्गन्ध आने लगती है। यह रोग एस्परजीलस फफूंद के द्वारा होता है। शीर्ष सड़न रोग ‘ राइजोपस‘ या ‘क्लेडोस्पोरियम‘ फफूंद के कारण भी होता है।

इन फफुंदों के कारण भी फूल सड़ जाते हैं और उनमें बीज नही बनते। फूल लगने के बाद वर्षा होने या नमी अधिक होने पर शीर्ष सड़न रोग का प्रकोप अधिक होता है।

नियंत्रण

बीजो को केप्टान या थाइरम से बीजोपचार करके बोयें। फूल लगने के बाद डायथेन जेड-78 का 0.3 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें, आवश्यकतानुसार छिड़काव दोहरायें।

 

11. फाइलोडी

पौधों में इस रोग के कारण अतिवृद्धि हो जाती है, तना चपटा और मांसल हो जाता है पत्तियां मोटी और आकार में बड़ी हो जाती है। पुष्प नही लगते, पुष्पीय भाग पत्तीनुमा संरचना में बदल जाते हैं इससे उपज में काफी हानि होती है। यह रोग एम.एल.ओ. द्वारा होता है।

नियंत्रण 

रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए।

 

(ब) सूरजमुखी के प्रमुख कीट (Sunflower pests)

इस फसल को मुख्यतः सफेद भृंग, कटुआ इल्ली, तम्बाखू की इल्ली, चने की इल्ली, माहो एवं फुदका (जैसिड) कीट से हानि पहुँचाती है।

१.सफेद भृंग

इस कीट का प्रकोप विगत कुछ वर्षो से काफी बढ गया है। इस कीट की इल्ली (ग्रव) काजु के समान मुड़ी हुई सफेद रंग की एवं सिर बड़ा भूरे काले रंग का होता हैं। ये जमीन के अन्दर ही रहती है एवं पौधों की जड़ो को खाकर काफी नुकसान पहुंचाती है। इसके फलस्वरूप् पौधे की बाढ एवं फूल का आकार छोटा रह जाता है। अत्याधिक प्रकोप होने पर पूरा पौधा ही सूख जाता है।

इस प्रकार कीट के नियंत्रण हेतु प्रभावित क्षेत्रो में 10 प्रतिशत दानेदार फोरेट 12 किलो प्रति हेक्टेयर अथवा 1.3 प्रतिशत लिंडेन चूर्ण का 30 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से बोनी के समय मिट्टी में मिलाकर बोनी करना चाहिए।

 

२.कटुआ इल्ली

इसका प्रकोप बोनी से लेकर 35-40 दिनों तक अत्यधिक होता हैं। रात्रि के समय इल्ली जमीन से निकलकर छोटे पौधों को भूमि की सतह से काटकर गिरा देती हैं। इल्ली भूरे मटमैले रंग की एवं चिकनी होती हैं। दिन के समय इल्ली भूमि के अंदर छिपी रहती हैं। इसके प्रकोप से खेत में पौध संख्या कम हो जाती हैं। फलस्वरूप उपज में कमी आ जाती हैं।

इस कीट के नियंत्रण के लिये षाम को खेतो मे 2-2 मीटर की दूरी पर घास के ढेर लगावें एवं सुबह इन ढेरों के नीचे छिपी इल्लियो को नष्ट करें। इन्डोसल्फान 4 प्रतिशत चूर्ण या पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का 25 किलो प्र्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करने से इल्लियों का प्रभावी ढंग से नियंत्रण किया जा सकता हैं। भुरकाव षाम के वक्त करना चाहिए।

 

३.रस चूसक कीट
माहू

इस कीट के शिशु एवं वयस्क दोनों कोमल पत्तियों की निचली सतह एवं तनों से लगातार रस चूसते रहते हैं जिसके फलस्वरूप् पौधे कमजोर हो जाते हैं अधिक प्रकोप होने पर एक ही पौधे पर हजारों की संख्या में देखे जाते हैं ये हल्के हरे पीले रंग के कोमल षरीर वाले छोटे कीट होते हैं। अत्याधिक प्रकोप पर पौधे सूख जाते हैं।

फुदका

ये हरे रंग के छोटे भुनगे होते हैं। इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों पौधों के कोमल अंगो से रस चूसकर क्षति पहुँचाते हैं। प्रभावित पत्तियाँ पहले हल्के पीले रंग की हो जाती हैं। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियाँ कटोरे के आकार की मुड़ जाती है एवं किनारे हल्के गुलाबी रंग के हो जाते हैं। पौधों को हिलाने पर ये तिरछे उड़ते हैं। इनके प्रकोप से काफी क्षति होती हैं।

महू एवं फुदका दोनों ही रस चूसते हैं अतः दैहिक कीट विष का छिड़काव करना चाहिये । इसके लिये डायमिथियेट 30 ई. सी. या मिथाइल डेमेटान 25 ई. सी. का 650 मि.ली. प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी में घोलकर अच्छी तरह से छिड़काव करना चाहिये आक्रमण पुनः होने पर 15-20 दिन बाद इस कीट विष का पुनः उपयोग करें।

 

४.पत्ती एवं फूल को खाने वाले कीट

तम्बाखू इल्ली के प्रौढ मादा पंखी पत्तियों मे समूह में 1000 से 1500 की संख्या में अंडे देती हैं। अंडो में 5-6 दिनों में छोटी इल्ल्यिाँ दिखाई देती हैं। ऐसे ग्रसित पत्तियों को ध्यान से देखने पर सैकड़ो की संख्या में स्लेटी रंग की इल्लियाँ दिखाई देती हैं। ये इल्लियाँ 6-7 दिनों तक समूह में एक ही पत्ती पर रहने के बाद परे खेत में फैलकर पत्तियाँ खाकर क्षति पहुँचाती हैं। ये फूल आने के बाद फूलों एवं दानो को भी खाकर क्षति पहुँचाती हैं।

 

५.रोमिलइल्ली

ये भी पत्तियाँ खाती हैं तथा अत्याधिक प्रकोप होने पर फूल एवं बीज को भी क्षति पहुँचाती हैं।

 

६.चने की इल्ली

इस कीट का आक्रमण इस फसल में काफी होता हैं। ये कीट चना एवं अरहर को अत्याधिक क्षति पहुँचाती है अतः अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है ताकि लगातार भोजन उपलब्ध होते रहने से यह कीट महामारी का रूप लेकर भयंकर क्षति न पहुँचाये । इल्लियाँ बढते दानो को बड़े चाव से खाती हैं। ये मुण्डक में भी छेद कर देती हैं। जिसके फलस्वरूप पूरा मुंडक ही सड़ जाता हैं।

इन इल्लियों के नियंत्रण हेतु बहुत सावधानी से कीट नाशकों का चयन करना चाहिये जो कि मधुमक्खिों के लिये घातक न हो, कयोंकि भरपूर उपज प्राप्त करने हेतु फसल में मधुमक्खियों द्वारा परागण होना अति आवश्यक हैं। अतः अतिआवश्यक न होने पर फूल आने के बाद जहरीले रसायनों का उपयोग न करें। आवश्यकता होने पर 4 प्रतिशत फोसेलान चूर्ण या एण्डोसल्फान 4 प्रतिशत चूर्ण 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें अथवा फोसेलान 35 ई.सी. या एण्डोसल्फान 35 ई.सी. का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें । (उपचार सांयकाल में करना चाहिये क्योंकि मधुमक्खियों का आवागमन कम रहता है।) यदि उस क्षेत्र में मधुमक्खी पालन कार्य चल रहा हो तो, दवा के उपयोग के पहले मधुमक्खी पालक को इसकी जानकारी दे दें ताकि उनका उचित प्रबंध किया जा सकें।

 

अन्य जानकारियां-

 सूरजमुखी की खेती- मध्यप्रदेश

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Source-

  • Jawaharlal Nehru Krishi VishwaVidyalaya, Jabalpur (M.P.)

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