सुपारी की आर्गनिक तथा जैविक खेती / Betel nut farming / Arecanut cultivation

जलवायु

सुपारी की खेती भूमध्य रेखा के २८ डिग्री उत्तरी और २८ डिग्री दक्षिणी क्षेत्रों के मध्य की जाती है समुद्र तल से १००० मी० की ऊँचाई पर जहाँ का तापक्रम १५ से ३८डिग्री सेन्टीग्रेड होता है सुपारी की खेती सफलतापूर्वक की जाती है|

भूमि

सुपारी को कई प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है परन्तु सीगों भूमि जिसमें सिंचाई की सुविधा तथा जल निकास का अच्छा प्रबंध हो पैदावार अच्छी होती है|

सुपारी की प्रजातियाँ

इसकी कई नई किस्मों का चयन किया गया है जिनमें मंगला, सुमंगला, श्री मंगला और मोहित नगर आदि है काल-१७ एक स्थानीय किस्म अण्डमान द्वीप समूह में लगाने के लिए बहुत ही उपयुक्त पाई गई है

पौध रोपण

पौधे लगाने के लिए पहले खेत की जुताई करके सिंचाई तथा जल निकास की नालियां बना ली जाती है खेत का रेखांकन वर्गाकार विधि से जिसमें २.७ मी० पंक्ति से पंक्ति तथा २.७ मी० पौधों से पौधे की दूरी पर पौध लगाने के लिए किया जाता है रेखांकन के बाद ९० घन सेमी० के गड्ढे खोदे जाते हैं और उनमें १५ किग्रा० सङी कम्पोस्ट या गोबर की खाद और ऊपरी सतह की गड्ढे की खुदी मिट्टी को मिलाकर भर दिया जाता है पौधों का रोपण जून-जुलाई में करना चाहिए नर्सरी में तैयार १२ से १८ महीने पुराने पौधे जिनमें पत्तियां अधिक हो तथा ऊंचाई कम हो, लगाने के लिए अच्छे माने जाते हैं सुपारी के पौधों को मिश्रित फसल के रुप में केला, अनन्नास, कोको आदि फसलों के साथ भी लगाया जाता है|

पौध प्रसारण

 सुपारी के पौधे बीज से प्रसारित किये जाते है अच्छी किस्म के रोग रहित तथा फलत वाले पौधों से बीज नट जो पुर्णतय परिपक्व हो, छाँटे जाते है बीज नट बालू की क्यारियों में ५ से ६ सेमी० की दूरी पर बोया जाता है बीज नट को बोने के बाद बालू से ढक दिया जाता है सामान्यत: बीज बोने के बाद ४० दिन में उग आते है तीन महीने तक उगे हुए पौधों को नर्सरी में ही रहने दिया जाता है, इसके बाद उन्हें दूसरी नर्सरी तैयार करके ३० गुणे ३० सेमी० की दूरी पर बरसात में लगा दिया जाता है नर्सरी में पौधे १२ से १८ महीने में अंतिम खेत में लगाने के लिये तैयार हो जातें है|

 

आर्गनिक खाद 

सुपारी के लिए खाद एवं उर्वरक की मात्रा भूमि का प्रकार व खेती के तरीके पर निर्भर होता है १५ किग्रा० कम्पोस्ट या गोबर की खाद, और आर्गनिक खाद १ बैग भू-पावर वजन ५० किलो ग्राम , १ बैग माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट वजन ४० किलो ग्राम , १ बैग माइक्रो नीम वजन २० किलो ग्राम , १ बैग सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट वजन १० किलो ग्राम , १ बैग माइक्रो भू -पावर वजन १० किलो ग्राम इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर अच्छी तरह से  मिश्रण तैयार कर १-५ साल तक के पौधे को १-२ किलो , ६-१२ साल तक के पौधे को ३-५ किलो ग्राम , १२ से ज्यादा साल के पौधे को उम्र के हिसाब से आधा किलो ग्राम प्रति वर्ष के हिसाब से और  कम्पोस्ट की पूरी मात्रा तथा आर्गनिक मिश्रण खाद  की उपयुक्त मात्रा उम्र के हिसाब से  सितम्बर-अक्टूबर में तथा  फरवरी माह में थाला में देना चाहिए|

पौधों को ३ से ५ दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए और माइक्रो झाइम ५०० मि.ली. और सुपर गोल्ड मैग्नीशियम २ किलो ग्राम ५००- लीटर पानी में मिलाकर हर २५-३० दिन में तर-बतर कर छिड़काव करना चाहिए | 

सुपारी के कीट

1.सुपारी माइट कीट

सुपारी के पौधों का रस चूसकर काफी नुकसान पहुँचाता है|

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें | 

सुपारी की बीमारियाँ

१.पीली पत्ती रोग

 सुपारी का पीली-पत्ती रोग, माइको प्लाजमा, लाइक आरगनिज्म से संबंधित है इस रोग से पौधों की पत्तियां पीली पङ जाती है तथा कङी व छोटी हो जाती है पौधे का घेरा कम हो जाता है और बाढ रुक जाती है| 

रोकथाम

इसकी  रोकथाम के लिए निम्न उपाय करने चाहिए:-

.जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए विशेष रुप से वर्षा ऋतु में गर्मी में संतुलित नमी को बनाये रखना चाहिए|
.अच्छी सङी हुई गोबर की खाद व कम्पोस्ट को पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए|
.भूमि में नमी बनाये रखने के लिए पत्तियों को मल्च के रुप में बिछाना चाहिए|

२.कोलोरोग अथवा महाली रोग

यह फाइटोफ्थोरा अरेका के द्वारा फैलता है इस रोग के प्रकोप से नट गिरने लगते है, रोग जब तना में फैल जाता है तो पौधे नष्ट हो जाते है रोकथाम के लिए बोर्डो मिश्रण का छिङकाव करना चाहिए |

 

Source-

  • arganikbhagyoday
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