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सब्जी फसलों में सूत्रकृमि प्रबंधन – Kisan Suvidha
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सब्जी फसलों में सूत्रकृमि प्रबंधन

सूत्रकृमि प्रबंधन

सब्जी फसलों में सूत्रकृमि प्रबंधन

सूत्रकृमि प्रबंधन-टमाटर वर्गीय फसलें जैसे टमाटर, बैंगन, मिर्च, शिमला मिर्च में जड गांठ सूत्रकृमि मेलोइडोगाइन इनकागनिटा व मेलोइडोगाईन जैवेनिका हानि पहुंचाते हैं।

लक्षण

इनसे होने वाले रोग के लक्षणों में पत्तियों में पीलापन, पौधे बौने व पैबंदनुमा वृद्वि, जडों में छोटी और बडी गांठों का होना तथा फलों का आकार छोटा होना है।

प्रबंधन

नर्सरी में पौध उपचार – नर्सरी बेड को अच्छी तरह से तैयारी करते समय 0.3 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति वर्ग मीटर के लिए (3.3 ग्रा./मी2) कार्बोफ्युरान मिलायें। नर्सरी बेड को पाॅलीथीन शीट (100 μ मोटी) से 3 सप्ताह तक ढक कर रखें।

रोग प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें। टमाटर की पूसा नीमायुक्त, पी.एन.आर.-7 और बैंगन की विजय हाइब्रिड, ब्लैक ब्युटी, ब्लैक राउंड तथा जौनपुरी लम्बा नामक किस्मों का प्रयोग करें। मई-जून में गर्मियों के दिनों में 15 दिन के अंतराल पर खेत की दो गहरी जुताई करें। फसल चक्र का प्रयोग करें तथा फसलें जैसे जौ, सरसों, तोरी तथा अफ्रीका गेंदा का रबी फसल में और धान, बाजरा तथा ज्वार की खरीफ में
बुवाई करें। कार्बोसल्फान या ट्राईजोफाँस के 1000 पी.पी.एम. का घोल बनाकर पौधे कीे जडों को डुबोकर उपचारित करके रोपाई करें।

 

बेलवाली फसलों में सूत्रकृमि नियंत्रण

इन फसलों में जड गांठ सूत्रकृमि (मेलोडोगाईन इनकागनिटा) हानि पहुंचाता है।

लक्षण

पत्तियों में पीलापन आ जाता है।

नियंत्रण

कार्बोसल्फान (मार्शल 25 प्रतिशत एस.टी.) को 1-3 डब्ल्यू / डब्ल्यू (120 ग्राम/कि.ग्रा.) बीज की दर से उपचार करें। इसमें आवश्यकता अनुसार गोंद (स्टीकर) का प्रयोग करें।

 

दलहनी फसलों में सूत्रकृमि प्रबंधन

लोबिया व अन्य दलहनी फसलों में मेलोइडोगाइन जैवेनिका हानि करता है।

लक्षण

पौधे बौने तथा पौधे की वृद्वि पैबंदनुमा होती है। जडों के मध्य में (लोबिया) गांठें बन जाती हैं तथा दिन के समय पौधे मुरझाते हैं।

नियंत्रण

कार्बोसल्फान (मार्शल 25 प्रतिशत एसकटी) को 1-3: डब्ल्यू/डब्ल्यू (120 ग्राम/कि.ग्रा. बीज) की दर से बीज उपचार करें। उपचार के लिए स्टीकर का प्रयोग करें।

 

जड वाली फसलें

मुख्य फसलें मूली तथा गाजर हैं। सूत्रकृमि लक्षण तथा प्रबंधन दलहनी सब्जियों के समान है।

 

भिंडी

बीमारी जड गांठ सूत्रकृमि के कारण होती है।

लक्षण

फसल में जडें विच्छेदित हो जाती हैं।

नियंत्रण

फसल की बुवाई से 10-15 दिन पहले खेत में नीम के बीज के पाउडर को 20-30 कि.ग्रा. /हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। एक या दो महीने के लिए काॅटोलेरिया स्पेक्टोबिलस नामक टैप क्राप की बुवाई से सूत्रकृमि की रोकथाम करें।

 

पत्तीदार सब्जियां

जैसे पालक तथा पोई जड गांठ सूत्रकृमि मेलोइडोगाईन इनकागनिटा तथा मेलोइडोगाईन जैवेनिका द्वारा होती है।

लक्षण

पत्तियां पीली व पौधे बौने तथा वृद्वि पैबंदनुमा होती है। जडों में छोटी-छोटी गांठे हो जाती हैं। पौधों की पत्तियां छोटी हो जाती हैं।

नियंत्रण

फसलें जैसे गैंदा, गेहूँ तथा फलीदार सब्जियों की फसल चक्र में प्रयोग करें। गर्मी के मौसम में मई तथा जून के महीने में 15 दिन के अंतराल पर खेत की दो गहरी जुताई करें।

 

स्रोत-

  • शाकीय विज्ञान संभाग एवं कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केन्द्र, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली – 110 012

 

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