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शाकीय फसलों में सिंचाई एवं जल प्रबंधन – Kisan Suvidha
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शाकीय फसलों में सिंचाई एवं जल प्रबंधन

शाकीय फसल

शाकीय फसलों में सिंचाई एवं जल प्रबंधन

प्रस्तावना

परिनगरीय खेती में शाक-सब्जी की खेती बहुत ही महत्वपूर्ण शाकीय फसलों की श्रेष्ठतम उत्पाद कता फसल/पौधों को उसकी आवश्यकतानुसार पूरे जीवन-काल में समुचित मात्रा में जल उपलब्ध होने से संभव है। आज के संदर्भ में यह अवधारणा कि किसी विशेष फसल को रबी या खरीफ क्रमशः छह या सात सिंचाई अथवा दो या तीन सिंचाई देना प्रासंगिक नहीं रही। ऐसे सिद्धांत मौलिक रुप से गैर-वैज्ञानिक हैं।

किसी भी फसल के जीवन काल में सिंचाइ्र की अवधि या जल की मात्रा का निर्धारण विगत तीन दशको में विकसित विधियों एवं सिंचाई पद्धतियों द्वारा किया जाना चाहिए। इन विधियों में प्रतिदिन कोई पौधा अपनी आयु एवं भू-आच्छदन के अनुसार कितना (मि.मी.) पानी चाहेगा, का आकलन संभव है और उतना ही पानी दिया जाए ।

 

जल प्रबंधन के समय दें विशेष ध्यान

पानी लगाते समय या सिंचाई करते समय यह ध्यान रहे कि सिंचाई पौधे यापौध में की जा रही है न कि भूमि में । इसमें सिंचाई की विकसित सूक्ष्म सिंचाई विधियाँ उपयोग में लाई जा सकती हैं। लगभग तीन दशकों में सिंचाई की सूक्ष्म प्रणाली से फसलोत्पादन करने की प्रक्रिया में ऐसा पाया गया है कि औसतन अन्य पारंपरिक सिंचाई विधियों की तुलना में इसके द्वारा अपेक्षाकृत 50 से 60 प्रतिशत जल की मात्रा में बचत की जा सकती है।

आम जन एवं सभी कृषकों के लिए यह उल्लेख करना आवश्यक है कि यह होने वाली बचत इसलिए है कि इस विधि में भू-आच्छादित फसलों के आंशिक भाग को ही सींचा जाता है और ये भू-भाग अपनी सतह के नीचे सभी जड़ों को संजोये होते हैं। भू-सतह का आंशिक हिस्सा गीला होता है, इसलिए खेत में खरपतवार भी कम होते हैं। यहाँ पर यह आसानी रहती है कि ड्रिप सिंचाई में ऊँची-नीची एवं ढलान आदि वाले खेतों को बिना सममतल किये हुए ड्रिप प्रणाली से फल एवं सब्जी की खेती सममतल करने वाले अतिरिक्त खर्च के बिना सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है।

जिस प्रकार ड्रिपरों से बूंद-बूंद जल दिया जाता है उसी प्रकार रासायनिक उर्वरकों को भी सिंचाई जल में फर्टिलाइजर इंजेक्टर की मदद से विभिन्न प्रकार के उर्वरण या पोषक तत्वों को मिश्रित करके फसलों को दिा जा सकता है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के संदर्भ में इस प्रक्रिया को फर्टिगेशन का नाम दिया गया है। यह उर्वरण देने की अत्याधुनिक विधि है। ऐसी व्यवस्था के अन्तर्गत उर्वरकों को कम मात्रा में कम अन्तराल रख कर जल्दी-जल्दी पूर्व नियोजित सिंचाई के साथ दिया जा सकता है। इससे पौधों को आवश्यकतानुसार सभी पोषक तत्व सदैव उपलब्ध कराकर उत्पादन में भारी वृद्धि करते हुए मूल्यवान उर्वरकों के अपव्यय को रोका जा सकता है।

उपरोक्त उल्लेखों को ध्यान में रखें तो एक बात स्पष्ट होती है कि आधुनिकतम सिंचाई प्रणाली से जल एवं उर्वरण में जो बचत होती है उसे अन्यत्र उपयोग में लाकर और अधिक खेतों पर शाक-सब्जी उगायी जा सकती है और किसानो की आय में वृद्धि की जा सकती है।

 

शाकीय फसलों की जल मांग

किसी भी फसल की सिंचाई की मांग से पहले यह जानना आवश्यक है कि संबंधित फसल की जल की मांग क्या है। जल मांग फसल की अवधि एवं मौसम पर निर्भर करता है। यदि संयोग से उस अवधि में बारिश होती है और इसकी मात्रा प्रभावी रहती है जो मिट॒टी की नमी बढ़ाने में पर्याप्त रुप से सहायक है तो सिंचाई की मांग और भी कम हो जाती है। इसका आकलन मृदा जल के संतुलन से किया जाता है।

इस विषय को आगे स्पष्ट करने के लिए पूसा संस्थान में प्याज एवं लहसुन की खेती पर कियं गयं विगत 4-5 वर्षों के प्रयोग से निकले परिणामों का सहारा लिया गया है। दिल्ली में लहसुन की खेती अक्तूबर-नवम्बर से मार्च-अप्रैल तक लगभग छः माह के लिए की जाती है। ऐसा पाया गया कि इस अवधि में 340-350 मि.मी. पानी की जरुरत पडेग़ी। यदि ड्रिप सिंचाई का सहारा लें तो यह पानी की मांग लहसुन उगाने के लिए पर्याप्त है। यदि पारंपरिक सिंचाई विधि का प्रयोग करें तो सिंचाई की मांग 500-550 मि.मी. तक जा पहुँचती है।

प्रयोग से प्राप्त आंकडे़ यह बताते हें कि ड्रिपर का उत्सर्जन 3 से 4 लिटर/घंटा हो तो फसल के विभिन्न स्तर पर सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली को 20-45 मिनट तक चला कर लहसुन के खेत में 340 मि.मी. पानी की मात्रा तीन से चार दिन के अंतराल पर 25-30 बार सिंचाई करके किया जा सकता है।

प्रयोग के आंकडे़ यह बताते हैं कि 15 ग 10 सें.मी. की सधन लहसुन की बुवाई में औसतन 7.5 -8.0 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन हो सकता है। ऐसा ही एक और प्रयोग प्याज की खेती नवंबर-दिसम्बर से मार्च-अप्रैल तक की जाए तो 400-420 मि.मी. पानी से काम चल सकता है और उत्पादन 30-35 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त किया गया है। इसमें भी सिंचाई की तिथि एवं मात्रा जलवायु प्रेरित फसल की मांग एवं वास्तविक मृदा जल की वर्तमान स्थिति के अनुसार किसान अपनी सुविधानुसार तय कर सकता है। फसल उगाने के दौरान यदि कोई बारिश हो तो उसको समायोजित करके संशोधित सिंचाई की मात्रा दी जानी चाहिए।

ऐसा करने से जल की बचत एवं फसल की गुणवत्ता बहुत अच्छी होगी। बचे हुए जल से और सूखे पडे़ हुए खेतों में शाक सब्जी उगायी जा सकती है। बेहतर गुकवत्ता होने से बाजार में अच्छी कीमत किसान को मिल सकती है।

निष्कर्ष के तौर पर यह समझा जा सकता है कि लहसुन के लिए पूरे समय में 34 से 35 लाख लिटर एवं प्याज के लिए 40 से 42 लाख लिटर पानी एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त है। सामान्य तौर पर विभिन्न प्रकार की शाक-सब्जियों को यदि सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली, ड्रिप, स्प्रिंकलर या माइक्रो स्प्रिंकलर से सिंचाई की जाए तो 150 मि.मी. से 450 मि.मी. के दायरे में अच्छी सिंचाई कर अधिकतम उत्पादन किया जा सकता है।

 

परम्परागत जल सिंचाई की विधियां

देश के किसान सिंचित खेती में परम्परागत तरीकों जैसे सतही विधियों, चौकोर क्यारियों, कुंड़ों या गुलों में करते रहे हैं। आज के समय की मांग है कि इस विधि को त्यागें और सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली अपना कर अपने सब्जी उत्पादन को बढ़ाएँ और पूरे साल भर फसल लेते रहें।

आज के संदर्भ में सिंचाई विज्ञान एवं अभियांत्रिकी एक विशिष्ट ज्ञान का विषय है । अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि शाकीय फसलोत्पादन की जो भी प्रौद्योगिकी विकसित करने की परिकल्पना की जाए उसमें जल प्रबंधन से संबंधित विशेषज्ञों को शामिल  कर उनके अनुभवों पर आधारित ज्ञान का पूरा लाभ उठाना वांछित है। इससे विकसित प्रौद्योगिकी कृषकों में लोकप्रिय होगी और उसे मूल्य मिलेगा। फलस्वरुप सिंचाई की दक्षता बढे़ेगी, किसान पूरे वर्ष अपने खेत पर हरियरली देख सकेंगे। अंतिम परिणाम यह होगा कि उनकी आमदनी में उत्तरोत्तर बढ़ोत्तरी होगी।

 

Source-

  • vikaspedia.in

 

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