लीची ( Litchi ) को नाशीकीटों और रोगाों से बचाएँ

लीची को नाशीकीटों और रोगों से बचाएँ Prevention of Litchi from pests and diseases)

लीची ( litchi ) वृक्ष में विभिन्न प्रकार के कीटों एवं रोगों का प्रकोप होता है जिससे उत्पादन एवं गुणवत्ता प्रभावित होती है। अतः लीची के पौधों से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए नाशीकीटों एवं रोगों का समय पर प्र्रबंधन जरूरी है। समेकित नाशीजीव प्रबंधन को अपनाकर लीची उत्पादक अपनी फसल को इन सभी कीटों एवं रोगों से होने वाली आर्थिक हानि से बचा सकते हैं। लीची में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोग का विवरण एवं प्रबंधन नीचे दिया गया है।

प्रमुख कीट एवं उनका प्रबंधन(Insects and pests management in Litchi)

1. फल एवं बीज बेधक (फ्रूट एवं सीड बोरर): कोनोपोमोरफा क्रैमेरेला एवं एक्रोसरकोप्स क्रैमेरेला

लक्षण

ये लीची की सबसे अधिक हानिकारक कीट है जो व्यापक और बहुभक्षी है। एक साल में इस कीट की कई पीढ़ियाँ होती हंै परन्तु फलन के समय की दो पीढ़ी अत्यधिक महत्वपूर्ण होती हैं। पहली पीढ़ी में जब लीची के फल लौंग दाने के आकार के होते हैं (अप्रैल प्रथम सप्ताह) तब मादा कीट पुष्पव्रन्त के डंठलों पर अंडे देती है जिनसे दो-तीन दिन में पिल्लू (लार्वा) निकलकर विकसित हो रहे फलों में प्रवेश कर बीजों को खाते हंै, जिसके कारण फल बाद में गिर जाते है । अगर ऐसे फलों को गौर से देखा जाए तो फलों पर छिद्र दिखाई देते हैं।

दूसरी पीढ़ी फल परिपक्व होने के 15-20 दिन पहले (मई प्रथम सप्ताह) होती है जब इसके पिल्लू डंठल के पास से फलों में प्रवेश करते हैं एवं फल के बीज और छिलके को खाकर हानि पहुँचाते हैं। पिल्लू लीची के गूदे के रंग के होते हैं। ये अपनी विष्ठा फल के अंदर जमा करते हंै जो ग्रसित फलों में डंठल के पास छिलने से दिखाई पड़ते हैं।

प्रबंधन

●वैकल्पिक नियंत्राण जैसे-ट्राइकोग्रामा चिलोनिस परभक्षी / 50,000 अंडे प्रति हे. (बौर निकलने के बाद, मार्च प्रथम सप्ताह में) एवं फेरोमोन ट्रैप 15 प्रति हे. वृक्ष की मध्य उँचाई पर प्रयोग करें।

●मंजर निकलने एवं फूल खिलने से पहले-निम्बीसीडीन 0.5 या नीम तेल या निम्बिन 4 मि.ली./ली.पानी के घोल या वर्मीवाश 5 या कामधेनु कीट नियंत्राक 5ः के छिड़काव से कीटों की रोकथाम अवश्य करेें।

●पहला कीटनाशी छिड़काव-कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/ली. (0.1 पानी के घोल) का प्रयोग लीची फल जब मटर के दाने के आकार के हो जायें तब करें।

●जमीन पर गिरे सभी फलों को इकट्ठा कर जहाँ तक संभव हो नश्ट करंे या गहरे गड्ढे में दबा दें। ●दूसरा कीटनाशी छिड़काव फल पकने के 15-20 दिन पहले-साइपरमेथ्रिन 10 इ.सी. 2 मि.ली./ली.

या साइपरमेथ्रिन 25 इ.सी. 3 मि.ली./10 ली. या डेल्टामेथ्रिन 2.5 इ.सी. 1 मि.ली./ली. या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 0.5 मि.ली./ली. या क्लोरपाइरीफाॅस 20 इ.सी. 1.5-2.0 मि.ली./ली. पानी के घोल का प्रयोग करें।

2. छाल खाने वाला पिल्लूः इन्डरबेला टेट्राओनीस/इ. क्वाड्रिनोटाटा

लक्षण

इनके पिल्लू वृक्षों के छाल खाकर जीवन निर्वाह करते हैं। यह वृक्ष के मोटे धड़ों एवं शाखाओं में छेदकर दिन में छिपे रहते हैं और रात्राी में बाहर निकलते हैं। ये अपने बचाव के लिए टहनियों के ऊपर विष्ठा एवं छाल के बुरादे की सहायता से जाला बनाते हैं। इनके प्रकोप से पोषक तत्त्वों की आवाजाही बाधित हो जाती है और टहनियाँ कमजोर हो जाती हैं। एक वर्ष में इस कीट की एक ही पीढ़ी होती हैं ।

प्रबंधन

●तने एवं टहनियों पर लगे जाले को साफ कर प्रत्येक छिद्र में लम्बा तार डालकर खुरचने से कीट के पिल्लू मर जाते हैं।

●नारियल झाडूँ से पहले जाला साफ करके प्रत्येक छिद्र के अंदर किरोसिन तेल/पेट्रोल/ फिनाइल/डी.डी.भी.पी. अथवा नुवान (5.0 मि.ली./ली. पानी के घोल) से भीगी रूई को ठूँसकर भर दें एवं छिद्रों के ऊपर गीली मिट्टी या गोबर का लेप लगा देें।

●बचाव के लिए बगीचे को हमेशा साफ-सुथरा और स्वस्थ रखें ।

3. पत्ती काटने वाला सूंडी (लीफ कटिंग वीविल):- माइलोसेरस अनडेटस

लक्षण

यह कीट बड़े आकार के चाँदी के रंग जैसा चमकदार होता है जो 2-3 महीने पुरानी पत्तियों के बाहरी किनारे को काट-काट कर खाते हैं, जिससे पत्तियाँ दोनों किनारे से कटी-फटी दिखती हैं। छोटे पौधों के लिए ये कीट घातक सिद्ध हो सकते हैं।

प्रबंधन

●नये बागों में वर्षा के बाद खेतों की अच्छी तरह से जुताई करें ताकि इनके नवजात एवं वयस्कों को जो घास-पात की जड़ों को खाकर अपना जीवन यापन करते हैं नष्ट किया जा सके।

●छोटे पौधों या टहिनयों को हिलाकर कीटों को नीचे गिरा दें और फिर गिरे कीटों को इकट्ठा कर के नष्ट कर दें।
●नीम आधारित रसायनों या नीम बीज अर्क का प्रयोग कर इनके नवजात या वयस्कों को पौधों पर आने से रोका जा सकता है।

●बहुतायत की स्थिति में कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली. पानी) या डायक्लोरोभाॅस (1.5 मि.ली./ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें।

4. टहनी छेदक (शूूट बोरर): क्लुमेसिया ट्राँसवरसा

लक्षण

इस कीट के पिल्लू वृक्ष के नई कोपलों की मुलायम टहनियों में प्रवेश कर उसके भीतरी भाग को खाते हैं। फलस्वरूप, प्रभावित टहनियाँ मुरझाकर सूख जाती हैं। साथ ही साथ पौधों की बढ़वार रूक जाती है। अगर ध्यान से देखा जाये तो नई टहनियों में कहीं कहीं छिद्र नजर आते हैं। ऐसी जगहों से अगर टहनी तोड़कर और चीड़कर देखें तो इसके सफेद रंग के पिल्लू एवं विष्ठा नजर आयेगें।

प्रबंधन

●प्रभावित टहीनियों को काटकर जला दें।

●कीटांे की तीव्रता की स्थिति में कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/ली. पानी के घोल का छिड़काव करें ।

5. लीची मकड़ी (माइट): एसेरिया लीची

लक्षण

लीची मकड़ी अत्यंत सूक्ष्म होती है जिनके शरीर बेलनाकार, सफेद और चमकीले रंग के होते हैं। ये अष्टपदी यानी चार जोड़ी पैर वाले जन्तु होते हैं। इनके नवजात और वयस्क दोनों कोमल पत्तियों की निचली सतह, टहनी एवं पुष्पवृंत से चिपक कर लगातार रस चूसते रहते हैं। ग्रसित पत्तियाँ उत्तेजित हो जाती हैं और मोटी एवं लेदरी होकर सिकुड़ जाती है। निचली सतह पर मखमली रूआंसा (इरिनियम) निकल आता है जो बाद में भूरे या गहरे भूरे-लाल रंग का हो जाता हैं। प्रभावित टहनियों में पुष्पन एवं फलन नहीं या कम होता है। मखमली इरिनियम उच्च ताप, वर्षा एवं आद्र्रता से वयस्क मकड़ी को सुरक्षा प्रदान करती है।

प्रबंधन

●जून में फलों की तुड़ाई के उपरान्त एवं दिसम्बर-जनवरी में प्रभावित टहनियों को कुछ स्वस्थ हिस्से के साथ साावधानीपूर्वक काट कर जला देें।

●सितम्बर-अक्टूबर एवं फरवरी में डायकोफाॅल या प्रोपारजाईट (3.0 मि.ली./ली. पानी) के घोल का एक छिड़काव करें ।

6. पत्ती लपेटक कीट (लीफ रोलर): प्लेटीपेप्लस एपरोबोला

लक्षण

इस कीट के पिल्लू (लार्वे) मुलायम पत्तियों को रेशमी धागों से लम्बवत् लपेटकर जाला बनाते हंै और अंदर ही अंदर पत्तियों को खाते रहते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियाँ समय से पूर्व ही सूखने लगती हैं जिससे बाग की उपज क्षमता कम हो जाती हैै।

प्रबंधन

●अगर प्रभावित पत्तियाँ कम हों और पेड़ छोटे हों तो हाथ से तोड़कर ऐसी पत्तियों को नष्ट कर दें। ●अगर 50 प्रतिशत कोपलों में आक्रमण हो तो कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली. पानी) या

फाॅस्फोमिडान 85 इ.सी. (0.5 मि.ली./ली. पानी) के घोल का एक से दो छिड़काव 7 से 10 दिनों के अंतराल पर करें।

7. पत्ती सुरंगक कीट (लीफ माइनर)ः एक्रोसरकोप्स हाइरोकोस्मा

लक्षण

इसका वयस्क कीट आकार में बहुत छोटा और लम्बा होता है। मादा कीट कोमल पत्तियों की निचली सतह पर उत्तकों के बीच अंडे देती है। लार्वा (पिल्लू) पत्तियों के निचली सतह के उत्तकों को खाकर आगे बढ़ते हुए पत्ती के मध्य सिरे में सुरंग बनाता है और उसे खाता है। प्रभावित पत्तियाँ सूखने लगती हैं और पौधा दूर से झुलसा हुआ दिखाई देता है। इस कीट का आक्रमण नई पत्तियों पर अधिक होता है। खासकर सितम्बर- अक्टूबर की कोपलों को इस कीट के प्रकोप से बचाना बहुत जरूरी है क्यांेकि इन्हीं कोपलों में आगे चलकर मंजर और फल लगते हैं।

प्रबंधन

●खेत की जुताई के साथ-साथ जल एवं पोषक तत्वों के प्रबंधन को समयानुसार करें ताकि नयी कोपलें (फ्लश) सितम्बर से पहले निकल जायें। ●नयी कोपलों के निकलने के समय नीम बीज से बने 4.0 प्रतिशत अर्क का 7 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करें। इसके अभाव में नीम आधारित रसायन जैसे निम्बीन, अचूक, वेनगाॅर्ड आदि 4.0 मि.ली./ली. पानी के घोल का 7 दिनों के अंतराल पर दो छिड़काव करें।
●बहुतायत की अवस्था में फाॅस्फोमिडाॅन 85 इ.सी. (0.5 मि.ली./ली. पानी) या कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें।

8. दहिया कीट (मिली बग): ड्रोसीचा मैन्गीफेरी

लक्षण

मुख्यतः यह कीट आम के वृक्षों पर आक्रमण करता है पर कभी-कभी इस कीट का प्रकोप लीची पर भी देखा गया है। इसका प्रकोप दिसम्बर से मई माह तक पाया जाता है। ये कीट उजले रंग के होते हैं। वयस्क होते कीट अपनी ऊपरी सतह को उजले पाउडर जैसे आवरण से ढ़क लेते हैं। इसके वयस्क 0.8-1.5 से.मी. के होते हैं और नवजात के साथ पत्तियों, कोमल टहनियों से लगातार रस चूसकर हानि पहुँचाते हैं। यहाँ तक की ये धीरे-धीरे चलकर नवजात फलों से भी चिपककर रस चूसते हैं। रस चूसने के कारण पेड़ पीलापन लिए हुए और अस्वस्थ प्रतीत होते हैं तथा अपरिपक्व अवस्था में पत्तियाँ एवं फल गिरने लगते हैं।

प्रबंधन

●जून के महीने में फल तुड़ाई के बाद खेतों की जुताई करने से इस कीट के अंडे सूरज की गर्मी एवं प्राकृतिक दुश्मनों की चपेट में आकर नष्ट हो जाते हैं। ●दिसम्बर-जनवरी में पेड़ों के तने पर 25 से.मी. चैड़ी, 400 गेज वाली अल्काथीन षीट (मोटी प्लास्टिक) 2 फीट ऊँचाई पर बांधकर उस पर ग्रीस लगा दें जिससे जमीन से ऊपर चढ़ते समय कीट चिपककर नष्ट हो जायें।

●नवम्बर-दिसम्बर में पेड़ के तने के आस पास की मिट्टी की हल्की गुड़ाई करके उसमें क्लोरपाइरीफाॅस (1.5ः धूल) 250 ग्राम/पेड़ की दर से मिला देने से नवजात कीट नष्ट हो जाते हंै।

●बहुतायत की अवस्था में कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली.) या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. (0.5 मि.ली./ली.) या एसीफेट (2 ग्राम/ली.) पानी के घोल का छिड़काव करें।

9. लीची बगः टेसरैटोमा स्पिसिज

लक्षण

इस कीट का प्रकोप कुछ क्षेत्रों में व्यापक और कहीं-कहीं पर कम होता है। भूरे या लाल मटमैले रंग का यह कीट 10-12 मि.मी. लम्बा और 6-8 मि.मी. चैडा़ होता है जिसके नवजात और वयस्क दोनों ही पत्तियों से रस चूसकर उन्हें हानि पहुँचाते हंै। वयस्क कीट पत्तियों की निचली सतह पर झुण्ड में हल्के पीले रंग के अंडे देती हैं।

प्रबंधन

●नीम आधारित रसायनों या नीम बीज अर्क का प्रयोग कर इस कीट को पौधों पर आने से रोका जा सकता है। 14. लीची बग ●बहुतायत की स्थिति में कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली.) या डायक्लोरोभाॅस (1.5 मि.ली./ली.) पानी के घोल का छिड़काव करें।

 

लीची में उभरती कीट समस्याएँ-

1. लाल सूंडी (रेड विभील): ऐपोडेरस ब्लांडस

लक्षण

यह एक नई कीट प्रजाति (ऐपोडेरस ब्लांडस) है जिसका प्रकोप पिछले दो-तीन सालों से लीची के पौधों पर देखा गया है। वयस्क कीट (विभिल) चमकीले भूरे लाल रंग के, 0.5-0.7 से.मी. लम्बे आकार के होते हैं और इनका लम्बा सूंढ़ (स्नाउट) बैठने की स्थिति में हमेषा ऊपर उठा होता है। यह कीट बिलकुल नई पत्तियों की सतह पर हरित भाग (क्लोरोफिल) को खाता है जिससे भूरे लाल रंग के खाये हुए चित्ती पत्तियों पर जहाँ-तहाँ बिखरे नजर आते हैं। प्रकोप कीे तीव्रता की स्थिति में पत्तियाँ सूखी, अनुप्रस्थ सिकुड़न लिए और सूर्यप्रकाश से जली प्रतीत होती है। इस कीट के प्रकोप से पँाच वर्ष से छोटे पौधों को अत्यधिक नुकसान होता है।

प्रबंधन

●नीम आधारित रसायनों या नीम बीज अर्क का प्रयोग कर इस कीट को पौधों पर आने से रोका जा सकता है।

●बहुतायत की स्थिति में कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली.) या नुवान (1.5 मि.ली./ली.) पानी के घोल का छिड़काव करें।

2. लीची सेमीलूपर: एकिया जनाटा

लक्षण

इनके पिल्लू (लार्वा) नई पत्तियों को बहुत तेजी से खाकर उन्हें खत्म कर देते हैं। इसके प्रकोप से अक्सर वृक्ष के छत्रक (कैनोपी) पर प्ररोहों के ठँूठ दिखाई देते हैं जिस पर पत्तियों के सिर्फ मध्य शिरे बचे होते हंै। नजदीक जाने पर हजारों की संख्या में सेमीलूपर पिल्लू प्ररोहों पर लटके नजर आते हैं। इसके पूर्ण विकसित लार्वा 1.7-2.2 से.मी. तक लम्बा और 2 मि.मी. चैड़ा होता है जो धुंधला होने के साथ-साथ शरीर पर काले धब्बे लिए हुए होते हैं। इस कीट का प्रकोप सितम्बर-नबम्वर महीनों के बीच होता है। चँूकि इन्हीं कोपलों में अगले वर्ष फूल (मंजर) आते है और फल लगते हैं इसलिए इस कीट से बचाव नहीं करने पर उत्पादन में काफी ह्रास हो सकता है।

प्रबंधन

●बचाव के लिए नीम आधारित रसायनों या नीम बीज अर्क का छिड़काव करें।

●बहुतायत की स्थिति में कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. (2.0 ग्राम/ली.) या डेल्टामेथ्रिन 2.5 इ.सी. (1.0 मि.ली./ली.) या क्लोरपाइरीफाॅस (1.5 मि.ली./ली.) पानी के घोल का छिड़काव करें।

●वैकल्पिक तौर पर, जैविक जीवनाशी जैसे बी.टी. आधारित बायोपेस्टीसाइड (हाल्ट) 1 ग्राम/ली. पानी के घोल का छिड़काव अपराहन में किया जा सकता है।

3. कवचवाला पिल्लू (बैगवर्म): यूमेटा क्रामेरी

लक्षण

इस कीट का प्रकोप जहाँ-तहाँ कुछ वृक्षों पर देखा गया है पर जिस वृक्ष पर ये एक बार आ जाते हैं उनकी पत्तियों को धीरे-धीरे चट कर जाते हैं। इस कीट के पिल्लू (लार्वा) के ऊपर कीप के आकार का कवच होता है जो हमेषा ऊपर उठा रहता है। इनके पिल्लू घोंघे की तरह बहुत ही धीरे चलते हैं और जब पत्ती की ऊपरी सतह पर एक जगह के सारे हरित भाग (उत्तक) को खत्म कर लेते हैंै तब थोड़ा आगे बढ़कर नई जगह के हरित भाग को खाना प्रारम्भ करते हैं। ये खुरचकर पत्तियोें के हरित भाग को खाते हैं जिससे शुरूआत में पत्ती पर लाल चित्ती नजर आती है। दूर से पौधों की पत्तियाँ जली हुई या किसी पोषक तत्व की कमी का शिकार प्रतीत होती हैं।

प्रभावित पत्तियों के ऊपरी सतह पर बहुत सारे कवचवाले पिल्लू उर्द्ध चिपके रहते हैं। इसके सम्पूर्ण लार्वा अवस्था का विकास एक स्वतः-ढकनेवाली कवच (बैग) के अन्दर होता है जो लगभग 2-3 महीने का होता है।

प्रबंधन

●बचाव के लिए नीम आधारित रसायनों या नीम बीज अर्क का प्रयोग करें।

●बहुतायत की स्थिति में कार्बारिल 50 डब्ल्यू.पी. (2.0 ग्राम/ली.) पानी के घोल का छिड़काव करें।

प्रमुख रोग एवं उनका प्रबंधन(Disease management in Litchi)

1. श्यामवर्ण रोग (एन्थ्रेकनोज)

लक्षण

यह रोग कोलेटोट्राइकम ग्लिओस्पोराइडिस नामक कवक के संक्रमण से होता है। इस रोग के लक्षण फलांे पर दिखाई देते हैं। रोग के संक्रमण की शुरूआत फल पकने के लगभग 15-20 दिन पहले होती हैं पर कभी-कभी लक्षण फल तुड़ाई-उपरांत तक दृष्टिगोचर हो सकते हैं। फलों के छिलकों पर छोटे-छोटे (0.2-0.4 से.मी.) गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते है जो आगे चलकर एक दूसरे से मिलकर काले और बड़े आकर के (0.5-1.5 से.मी.) धब्बों में परिवर्तित हो जाते हैं। रोग तीव्रता की स्थिति में काले घब्बों का फैलाव फल के छिलकांे पर आधे हिस्से तक हो सकता है। उच्च तापक्रम एवं आद्र्रता रहने पर रोग का संक्रमण और फैलाव बड़ी तेजी से होता है। रोग के कारण मूलतः फलों के छिलके ही प्रभावित होते हैं परन्तु इस वजह से ऐसे फलों का बाजार मूल्य गिर जाता है।

प्रबंधन

●बचाव के लिए मैन्कोजेब या काॅपर आॅक्सीक्लोराइड (2 ग्राम/ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें।

●रोगकी तीव्रता ज्यादा होने पर रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 50ः डब्ल्यू.पी. या क्लोरोथैलोनिल 75ः डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें।

2. पर्ण चित्ती (लीफ स्पाॅट)

लक्षण

यह फफूंदजनित रोग मुख्यतया दो प्रजातियों-बोट्रायोडिप्लोडिया थियोब्रोमे और कोलेटोट्राइकम ग्लिओस्पोराइडिस के प्रकोप से होता है। लीची में पर्ण चित्ती रोग जुलाई महीने में अक्सर दिखने शुरू होते हैं और अगले 3-4 महीनों में प्रभावित पत्तियों की संख्या बढ़ती जाती है। इस रोग में भूरे या गहरे चाॅकलेट रंग की चित्ती सामान्यतया पुरानी पत्तियों के ऊपर प्रकट होती है जिनकी शुुरूआत पत्तियों के सिरे से होती है। यह धीरे-धीरे नीचे के तरफ बढ़ती हुई पत्ती के किनारे और बीच के हिस्से में फैलती जाती है। इन चित्तियों के किनारे अनियमित दिखते हैं। प्रतिकूल दशा होने पर रोगकारक कवक वर्ष भर पत्तियों में निष्क्रिय पड़े रहते हैं।

प्रबंधन

●प्रभावित भाग की कटाई-छँटाई करके तथा जमीन पर गिरी हुई पत्तियों को इकट्ठा करके समय-समय पर जला देना चाहिए।

●बचाव के लिए मैन्कोजेब या काॅपर आॅक्सीक्लोराइड (2 ग्राम/ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें।

●रोगकी तीव्रता ज्यादा होने पर रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 50ः डब्ल्यू.पी. या क्लोरोथैलोनिल 75ः डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम ग्राम/ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें।

3. पत्ती एवं कोपल झुलसा रोग (लीफ एवं ट्वीग ब्लाइट)

लक्षण

यह रोग कवक की कई प्रजातियों से हो सकता है जिनमें कोलेटोट्राइकम ग्लिओस्पोराइडिस, ग्लिओस्पोरियम स्पिसिज एवं डिक्टियोआरथ्रिनम स्पिसिज प्रमुख हैं। इस रोग से पौधों की नई पत्तियाँ एवं कोपलें झुलस जाती हैं। रोग की शुरूआत पत्ती के सिरे पर उत्तकों के मृत होने से भूरे धब्बे के रूप में होती है जिसका फैलाव धीरे-धीरे पूरी पत्ती पर हो जाता है। रोग की तीव्रता की स्थिति में टहनियेां के ऊपरी हिस्से भी झुलसे हुए दिखते हैं।

प्रबंधन

●बचाव के लिए मैन्कोजेब या काॅपर आॅक्सीक्लोराइड (2 ग्राम/ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें। ●रोग की तीव्रता ज्यादा हाने पर रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 50ः डब्ल्यू.पी. या क्लोरोथैलोनिल 75ः डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें।

4. फल विगलन

लक्षण

लीची फलों का विगलन रोग कई प्रकार के कवकांे जैसे-एस्परजिलस स्पिसिज, कोलेटोट्राइकम ग्लिओस्पोराइडिस, अल्टरनेरिया अल्टरनाटा आदि द्वारा होता है। इस रोग का प्रकोप उस समय होता है जब फल परिपक्व होने लगता है। सर्वप्रथम रोग के प्रकोप से छिलका मुलायम हो जाता है और फल सड़ने लगते हैं। प्रभावित फल के छिलके भूरे से काले रंग के हो जाते हैं। फलों के यातायात एवं भंडारण के समय इस रोग के प्रकोप की संभावना ज्यादा होती है।

प्रबंधन

●फल तुड़ाई के 15-20 दिन पहले पौधों पर कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. (2 ग्राम/ली. पानी) के घोल का छिड़काव करें।

●फल तुड़ाई के दौरान फलों को यांत्रिक क्षति होने से बचाएँ।

●फलों को तोड़ने के शीघ्र बाद पूर्वशीतलन उपचार (तापक्रम 40ब् नमी, 85-90ः) करें । ●फलों की पैकेजिंग 10-15 प्रतिशत कार्बन-डाय-आॅक्साइड गैस वाले वातावरण के साथ करें ।

 

लीची में एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बिंदु-

●लीची के नये पौधे लगाने के समय ट्राइकोडर्मा सवंर्धित सड़ी गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग करें। इसके लिए 50 किलोग्राम वर्मीकम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद में 500 ग्राम ट्राइकोडर्मा का व्यवसायिक फार्मूलेशन मिलाएँ। अगर ये मिश्रण सूखा लगे तो थोड़ा पानी का छिड़ाकाव कर दें और मिश्रण को छाँव में कम से कम एक हफ्ते के लिए रख दें।

●लीची में मंजर/फूल खिलने आने से लेकर फल के दाने बन जाने तक कोई भी रासायनिक दवाओं का प्रयोग न करें क्योंकि इससे मधुमक्खियों का भ्रमण प्रभावित होता है जो लीची में परागण के लिये जरूरी है।

●जबभी रासायनिक दवाओं का छिड़काव करें तो घोल में स्टीकर/डिटर्जेंट/सर्फ पाउडर (एक चम्मच/15 लीटर घोल) जरूर डालें। ●रासायानिक दवाओें का छिड़काव अपराह्न में करना बेहतर होता है। ●रासायनिक दवाओं का प्रयोग आवश्यकतानुसार, उचित समय एवं उचित मात्रा में करें।

●जहाँ तक संभव हो प्रकाश ट्रैप एवं फेरोमोन ट्रैप का व्यवहार समेकित कीट प्रबंधन के लिए करें। प्रकाश ट्रैप के व्यवहार से वे कीट, जो रात्रि में अधिक सक्रिय रहते हैं उन्हें आकर्षित कर नष्ट किया जा सकता है। फेरोमोन ट्रैप के व्यवहार करने से नर कीट आकर्षित होकर इसमें फंसते हैं। इसमें ल्युर (फेरोमोन), लाइनर (चिपचिपा आधार) तथा ट्रैप होता है। ल्यूर में मादा की गंध होती है जिससे नर कीट आकर्षित होते हैं। इसके साथ ही प्रकाश ट्रैप एवं फेरोमोन टैªप के प्रयोग से खास तरह के कीटों के आगमन के बारे में भी संकेत मिलता है।

●रोकथाम वाली रासायनिक दवाओं के प्रयोग के संबंध में ध्यान रखें कि एक ही दवा का प्रयोग बार बार न करंे। इससे नाशीकीट एंव रोगकारक जीवों में दवाई के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का विकास होने से बचा जा सकता है।

 

Source-http://www.nrclitchi.org/?page_id=34

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