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सब्जी फसलों में मृदा जनित रोगों का जैविक नियंत्रण – Kisan Suvidha
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सब्जी फसलों में मृदा जनित रोगों का जैविक नियंत्रण

मृदा जनित रोगों का जैविक नियंत्रण

सब्जी फसलों में मृदा जनित रोगों का जैविक नियंत्रण

सब्जी फसलों में रोगजनकों (कवकों, जीवाणुओं, विषाणुओं, फायटोप्लाज्मा, वायरायड एवं सूत्रकृमियो) का नर्सरी एवं खेत में रोपाई से लेकर तुड़ाई तक प्रकोप के कारण कई प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। रोगों के प्रकोप के कारण सब्जी फसलों के उत्पादन में मात्रात्मक एवं गाुणात्मक क्षति होती है। मृदा जनित रोगों के प्रबंधन हेतु कवकनाशियों एवं जीवाणुनाशियों का प्रयोग पर्यावरण में प्रदूषण, मृदा की गुणवत्ता में गिरावट के साथ-साथ मृदा में कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीवों, जैवनियंत्रकों एवं लाभदायक कीटो को हानि पहुँचाते है। रसायनों के घातक प्रभाव को देखते हुये कृषको को कम लागत वाली पर्यावरण सह रोग प्रबंधन हेतु जैवनियंत्रण की तकनीक को रसायनिक नियंत्रण के विकल्प के रूप में अपनाकर कम लागत में सब्जी का उत्पादन करना चाहिये।

सब्जी फसलों अन्य फसलों की तुलना में रोगों के प्रति ज्यादा ग्राह्य होती हैं। कई वर्षों तक केवल सब्जियों की खेती एवं फसल चक्रण को न अपनाने के कारण मृदा जनित रोगजनको के निवेश की मात्रा एवं पोषक पौधों की रोगों के प्रति ग्राह्यता बढ़ती जाती है। मृदा जनित रोगों में आर्द्र गलन, जड़ गलन, उकठा, सफेद तनागलन, फल सड़न, तना झुलसा, जीवाणुवीय उकठा एवं मूल ग्रंथि मुख्य हैं। मृदा जनित रोगजनकों के अन्तर्गत पिथियम, फायटोफ्थेारा, राइजोक्टोनिया, स्क्लेरोसियम, फ्यूजेरियम, स्क्लेरोटीनिया, वर्टीसिलियम, में क्रोफोमिना, फोमा, कोलेटोट्राइकम, डिडायमें ल्ला एवं में लायडोगायन वंश की प्रजातियाँ आती हैं। इन रोगजनकों की मृदा में उत्तरजीविता एवं वृहद पोषक परास होने के कारण प्रबंधन बहुत कठिन होता है।

रोगजनकों के नियंत्रण हेतु संश्लेषित रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से रोगजनकों में रसायनिक प्रतिरोधिता उत्पन्न होती है। अतः रोगजनकों के प्रभावी प्रबंधन हेतु संश्लेषित रसायनों की अनुशंसित मात्रा के प्रयोग के साथ-साथ इन रसायनों की चक्रीय प्रयोग के अलावा जैवनियंत्रकों के प्रयोग को वरीयता देना चाहिये। जैवनियंत्रकों के प्रयोग से मृदा जनित रोगों का प्रभावी प्रबंधन होता है।

 

आर्द्र गलन

जैवनियंत्रण की विधि

जैव नियंत्रकों द्वारा रोगजनको के प्रबंधन हेतु कवक परजीविता, प्रतिजीविता एवं प्रतिस्पर्धा जैसी क्रियाविधियाँ अपनायी जाती है। जैवनियंत्रकों द्वारा पोषक तत्वो की प्राप्ति हेतु मृदा जनित रोगजनकों के साथ प्रतिस्पर्धा होती है जिससे लौह तत्व रोगजनको के वृद्धि के लिए उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। जिसके फलस्वरूप रोगजनको का प्रभावी नियंत्रण होता है। ट्राइकोडर्मा एवं स्यूडोमोनास स्पी. द्वारा प्रतिजीवी पदार्थ उत्पन्न होते हैं जो कि मृदा जनित रोगजनकों जैसे पीथियम (आर्दगलन), में क्रोफोमिना फेसियोलिना (चारकोल गलन), स्कलेरोटीनिया (सफेद तनाइसके अलावा जैवनियंत्रक पौधों में उपार्जित प्रतिरोधिता को बढ़ाते है जो पौधों को रोगरोधिता प्रदान करते हैं। जैवनियंत्रक रोगप्रबंधन के साथ-साथ पौधों के वृद्धि प्रवर्धन में सहायक होते है जिससे पौधों का स्वास्थ्य प्रबंधन होता है।

 

कृषि उपयोगी जैवनियंत्रक

कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीवों का रोगों के नियंत्रण के रूप में उपयोग कर सब्जी फसलों के मृदा जनित रोगों का प्रभावी प्रबंधन किया जा रहा है। कवकनाशी के रूप में ट्राइकोडर्मा हार्जिएनम, ट्रा. विरडी, ट्रा. एस्पेरलम, ट्रा. वाइरेन्स, एस्परजिलस नाइजर, पेसिलोमाइसीज लिलासिनस, स्पोरीडेस्मियम स्केलेरोशियम एवं वर्टीसिलियम लेकानी मुख्य हैं। जैवनियंत्रक के अन्तर्गत स्युडोमोनास एवं बैसिलस स्पी. का मुख्यतया उपयोग किया जा रहा है।

 

जैवनियंत्रकों के मुख्य लक्षण

  • जैवनियंत्रकों को पौधों के साथ सहजीवी, रोगप्रतिरोधी एवं जड़तंत्र के साथ प्रतिस्पर्धी होना चाहिये।
  • जैवनियंत्रकों को रोगजनकों के संक्रमण को रोकने में दक्ष होना चाहिये।
  • जैवनियंत्रकों को प्रतिजीवी द्वितीयक उपायचयी रसायनो के स्रावण एवं संचयन में दक्ष होना चाहिये।
  •  जैवनियंत्रकों में लायटिक प्रकिण्वों के स्रावण की क्षमता होनी चाहिये।
  •  जैवनियंत्रकों में रोगजनकों के प्रजनन एवं जीवन चक्र को रोकने की क्षमता होना चाहिये।
  • जैवनियंत्रकों को रोगजनकों की रोगजनक क्षमता में
  • कमी एवं पौध प्रतिरोधता के उपार्जन को बढ़ाने की क्षमता होनी चाहिये।

 

जैव नियंत्रण हेतु लक्षित सब्जी फसलों के रोगजनक

मृदोढ़ रोगजनकों में पीथियम स्पी., स्क्लेरोसियम स्पी.,फयूजेरियम स्पी., राइजोक्टोनिया स्पी., फायटोफ्थेारा स्पी., फोमा स्पी., स्क्लेरोटीनिया स्पी., रालस्टोनिया एवं में क्रोफोमिना स्पी. का जैवनियंत्रकों द्वारा प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है।

 

जैवनियंत्रको के उपयोग की विधि

बीजोपचार हेतु जैवनियंत्रकों का उपयोग बीज की प्राइमिंग, बीज की सोकिंग, एवं पौध की जड़ों को जैवनियंत्रकों के घोल में डुबोकर किया जाता है। बीजोपचार हेतु 6-10 किग्रा. प्रति किग्रा. बीज, नर्सरी में मृदोपचार हेतु 10 ग्रा. जैवनियंत्रक को 100 ग्रा. नीम की खली के साथ प्रति मीका प्रयोग करना चाहिये। पौध की जड़ को जैवनियंत्रक के घोल (1 प्रतिशत) में 10-25 यूजेरियम उकठा पछेती झुलसा सफेद तना गलन मिनट तक डुबोकर रखना चाहिये। ड्रेन्चिग हेतु ट्राइकोडर्मा के संरूपण (1 प्रतिशत) का रोपाई के 20 दिन बाद प्रयोग करना चाहिये।

 

भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, द्वारा विकसित जैवनियंत्रक

ट्राइकोडर्मा प्रभेद को बीजोपचार हेतु बीटीएफ 39-1,एवं 43-1 का 10 ग्रा. प्रति किग्रा. बीज के साथ प्रयोग,मृदोपचार हेतु प्रति हेक्टेयर 2.5 किग्रा. को 50 किग्रा. गोबर की खाद के साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिये। बैसिलस सबटिलिस (108 सीएफयू प्रति ग्रा.) का बीजोचार हेतु 10 ग्रा प्रति किग्रा. बीज के साथ प्रयोग एवं मृदोचार हेतु प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में 2.5 किग्रा. को 50 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर प्रयोग करना चाहिये। जैवनियंत्रक जैसे ट्राइकोडर्मा के क्लेमाइडोस्पोर कई वषो तक मृदा में संरक्षित होने के कारण मृदा में इसकी जैव प्रभाविता को बढ़ाते हैं।

 

जैवनियंत्रक प्रभेदों का उन्नयन

ट्राइकोडर्मा के प्रभेदों का रोग प्रबंधन एवं पौध वृद्धि प्रवर्धन हेतु उन्नयन करने के लिये उत्परिवर्तित या कवकनाशियों के साथ संगत प्रभावी प्रभेदों को जैवकीटनाशी के निर्माण हेतु चयन किया जा सकता है। ट्राइकोडर्मा के प्रभेद पेनसीकुरान एवं कापर हायड्राफ्साइड के साथ 400 पीपीएम तक संगत होते हैं। अतः इन प्रभेदों को इन कवकनाशियों के साथ मिश्रित कर रोग प्रबंधन हेतु उपयोग किया जा सकता है।

 

जैवनियंत्रकों के प्रयोग में बाधायें

  •  बायोपेस्टीसाइड की बाजार में अनुपलब्धता।
  • बायोपेस्टीसाइड के रजिस्ट्रेशन एवं उत्पादन की प्रक्रिया का जटिल होना।
  • बायोपेस्टीसाइड की प्रभाविता का संश्लेषित कृषि रसायनों की तुलना में कम होना।
  •  जैवनियंत्रक प्रभेदों का आनुवंशिक रूप से स्थायी न होना।
  • जैव भण्डारण क्षमता की समयावधि का कम होना।
  •  जैवनियंत्रक प्रभेदों के संरूपणों के प्रभावी उपयोग हेतु उपयुक्त (अम्लीय) मृदा पी एच मान (>7) एवं तापक्रम (<350सें.) पर निर्भर होना।

जैवनियंत्रकों के प्रयोग से सब्जियों के मृदा जनित रोगों का प्रभावी प्रबंधन एवं पौध वृद्धि प्रवर्धन से ज्यादा उपज प्राप्त होती है। इनके प्रयोग से सब्जी की खेती में संश्लेषित रसायनों के प्रयोग में कमी एवं रोगजनकों में रासायनिक अवरोधिता का प्रबंधन होता है।

 

 

स्रोत-

  • भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान,वाराणसी

 

 

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