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मृदा परीक्षण क्यों व कैसे करें – Kisan Suvidha
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मृदा परीक्षण क्यों व कैसे करें

मृदा परीक्षण

मृदा परीक्षण क्यों व कैसे करें

मृदा की उत्पादन क्षमता उसकी उर्वरा शक्ति पर निर्भर करती है । पौधे अपने विकास एवं बढ़वार के लिए आवश्यक पोषक तत्व मृदा से प्राप्त करते हैं । पौधों को इन तत्वों की आवश्यकता फसल की किस्म तथा उससे प्राप्त की जाने वाली उपज के स्तर पर निर्भर करती है । उपज प्राप्ति का लक्ष्य जितना बड़ा होगा इन तत्वों की उतनी ही अधिक मात्रा की आवश्यकता है । मृदा में इन तत्वों की मात्रा सही अनुपात में होने पर ही अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है ।

मृदा की उर्वदा शक्ति के प्रबंधन के लिए उपलब्ध पोषक तत्वों के प्रकार एवं मात्रा की जानकारी होना चाहिए । फसल विशेष के लिए उपलब्ध तत्वों की आवश्यक मात्रा का प्रबंध इस तरह से होना चाहिए कि मृदा की उर्वरा शक्ति का हृास न हो, साथ ही पौधों को सन्तुलित पोषण प्राप्त हो और उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग से मृदा, पौधों एवं पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम किया जा सके । इसी प्रकार सघन खेती में अधिक उपज देने वाली संकर किस्मों के लिए अधिक सिंचाई एवं उर्वरकों की आवश्यकता होने के कारण भूमि में उपलब्ध तत्वों की कमी हो जाती है । इसलिए मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों का पता लगाकर दीर्घकालीन परिणामों को ध्यान में रखते हुए मृदा के स्वास्थ्य तथा गुणों में सुधार करना वर्तमान समय की प्रमुख आवश्यकता हो गई है ।

पश्चिमी राजस्थान में मृदा संसाधन का अत्यधिक दोहन भी मृदा की उर्वरा शक्ति व गुणात्मक क्षमता में हृास के रूप में प्रकट हो रहा है । पश्चिमी राजस्थान में पाई जाने वाली मृदाओं में जैविक कार्बन की मात्रा बहुत कम पाई जाती है इसके साथ ही लवणीयता एवं क्षारीयता की समस्या भी उत्पादन में कमी के प्रमुख कारक हैं । जब तक हमें मृदा की समस्याओं एवं उसमें उपलब्ध जैविक कार्बन एवं पोषक तत्वों के बारे में उचित जानकारी नहीं हो तब तक उसका उचित प्रबंधन नहीं किया जा सकता है ।

 

मृदा परीक्षण क्यों करें ?

1.    मृदा की उर्वरा शक्ति के साथ ही मृदा में पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक उपलब्ध पोषक तत्वों की जानकारी ज्ञात करने के लिए ।
2.    मृदा गुणों के आधार पर अधिकतम उत्पादन के लिए उर्वरक एवं खाद की फसल विशेष के लिए उपयुक्त तथा लाभकारी मात्रा निर्धारित करने के लिए ।
3.    समस्याग्रस्त मृदा एवं उसके उपचार के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए ।
4.    दीर्घकालीन भूमि उपयोग पश्चात् मृदा के स्वास्थ्य में सुधार करने के लिए ।
5.    मृदा की उर्वरा क्षमता के आधार पर कृषि उत्पादन एवं अन्य उपयोगी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए ।

 

मिट्टी का नमूना लेने का उद्देश्य

मिट्टी का नमूना लेने से पहले आपको यह जान लेना चाहिए कि आप किस उद्देश्य से मिट्टी का नमूना ले रहे हैं ।

1.उर्वरा शक्ति या फसल के लिए उर्वरक की मात्रा की संस्तुति के लिए 0-15 से.मी. सतह से नमूना लें ।
2. बाग या पेड़ लगाने के लिए भूमि से 2 मीटर की गहराई तक प्रोफाइल खोदकर मृदा सर्वेक्षण विशेषज्ञों की सलाह से मृदा परीक्षण हेतु विभिन्न संस्तरों के नमूने लें ।
3. उसर भूमि के सुधार के लिए या तो मृदा सर्वेक्षण विशेषज्ञ की सहायता लें या आॅगर की मदद से कम से कम 50-60 से.मी. तक 15-20 से.मी. के अंतराल से अलग-अलग संस्तरों से लगभग एक किलो का नमूना एकत्र करें ।

 

मृदा परीक्षण के लिए नमूना कब लें ?

यदि सघन कृषि की जा रही हो तो मृदा का नमूना फसल चक्र के पूरा होने पर प्रति वर्ष लेना चाहिए । अन्यथा दो से तीन वर्ष में एक बार मृदा परीक्षण करवाना पर्याप्त होता है । अप्रैल-मई मृदा नमूने एकत्रित करने का उपयुक्त समय माना गया है । इसके अलावा पिछली फसल की कटाई के ठीक बाद या अगली फसल की बुवाई से पहले भी खेत में मृदा का नमूना ले सकते हैं ।

 

मृदा का नमूना कैसे लें ?

मृदा परीक्षण के लिए नमूना इस प्रकार लेना चाहिए कि वह उस क्षेत्र या खेत का प्रतिनिधित्व करे, इसके लिए कम से कम 500 ग्राम नमूना अवश्य लेना चाहिए ।
1.   मृदा नमूना लेने हेतू आवश्यक सामग्री: मिट्टी खोदने के औजार जैसे गैती, फावड़ा, खुरपी, मिट्टी का अधिक गहराई का नमूना लेने हेतू आॅगर, नमूना एकत्र करने एवं मिलाने के लिए बाल्टी या तगारी, नमूना सुखाने के लिए कपड़ा या पुराना अखबार, नमूना रखने के लिए प्लास्टिक या कपड़े की थैली, बांधने के लिए सुतली, टेग एवं पेंसिल ।
2. नमूना लेने हेतु स्थान का चुनाव: नमूना लेने से पूर्व खेत की ढाल, मिट्टी के रंग, गठन एवं फसल प्रबंधन आदि की जानकारी होनी चाहिए । खेत को मिट्टी के रंग, प्रकार, प्राकृतिक ढलान तथा गहराई के आधार पर विभिन्न टुकड़ों में विभाजित कर प्रत्येक क्षेत्र का अलग से नमूना लें ।
3.नमूना लेने की विधि: खेत को एक समान क्षेत्र या पूर्व में बोई गई फसल के अनुसार विशिष्ट भूमि के आधार पर बांट कर अलग-अलग नमूना लेवें । मिट्टी की ऊपरी सतह से कार्बनिक पदार्थों जैसे टहनियाँ, सूखी पत्तियाँ, डंठल एवं घास आदि को हटाकर खेत के क्षेत्र के अनुसार 8-10 स्थानों का नमूना लेने हेतू चुनाव करें ।

चयनित स्थानों पर 15-20 से.मी. की गहराई तक तथा बहुवर्षीय घास-फसलों के लिए 7-10 से.मी. गहराई तक का अंग्रजी के ष्टष् आकार का गड्डा बनायें फिर इसकी दीवार के साथ पूरी गहराई तक मिट्टी की एक इंच मोटी एक समान परत काट कर साफ बाल्टी या तगारी में एकत्रित कर लें । इसी प्रकार अन्य चयनित स्थानों से नमूने लेवें । विभिन्न स्थानों से एक़ित्रत मिट्टी को किसी साफ कपड़े या पुराने अखबार या छाया में डालकर सुखा लें ।

सुखाने के बाद नमूनों के ढेलों को फोड़कर बारीक बनाकर खरपतवार, पौधों की जड़ें, कंकड़-पत्थर आदि को निकालकर फेंक दें । बची हुई मिट्टी को चार भागों में विभजित कर लें । इन चार भागों से चतुुर्फल पद्धति द्वारा दो हिस्से रखें एवं दो अलग कर लें । उपरोक्त प्रक्रिया तब तक दोहराएं जब तक मिट्टी का नमूना आधा कि.ग्रा. न रह जावें । मिट्टी को किसी साफ प्लास्टिक या कपड़े की थैली में भरकर उसमें इस मिट्टी के नमूने की पहचान के लिए एक सूचना पत्र रख देना चाहिए ।

 

मृदा के नमूने को तैयार करना

4.   मृदा के नमूने को प्रयोगशाला भेजना:मिट्टी के नमूने के साथ भेजे जाने वाले सूचना पत्रक की दो प्रतियाँ तैयार करके एक प्रति थैले के अंदर रख कर तथा दूसरी थैली का मुंह बांधने के समय उसके साथ बांध देनी चाहिए । सूचना पत्र पर निम्नलिखित जानकारी देनी चाहिए ।
(अ) कृषक का नाम

(ब) गांव का नाम

(स) पंचायत समिति/जिले का नाम

(द) नमूने की गहराई

(य) सिंचित/असिंचित बोई जाने वाली फसल का नाम

(ल) पिछली बोई गई फसल

(व) समस्याग्रस्त खेत हो तो भूमि सुधार हेतू किए गए प्रयास एवं अन्य कोई जानकारी हो तो लिखें ।

इस कपड़े की थैली या प्लास्टिक की थैली को ठीक तरीके से बांधकर निकटतम मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में स्वयं, डाक पार्सल द्वारा या कृषि प्रसार कार्यकर्ता के माध्यम से भेज देना चाहिए ।

 

मिट्टी का नमूना लेने में प्रमुख सावधानियाँ

1.   सिंचाई की नाली, मेंड, पेड़ के नीचे से या खाद के ढेर के आसपास नमूने नहीं लेने चाहिए ।
2.  ज्यादा पोषक तत्व ग्रहण करने वाली फसलों वाले क्षेत्र से और जहां से अनाज की फसल ली गई हो, डंठल, ठूठ वगैरह खेत में ही छोड़ दिए गए हों, वहां से लिए गए नमूनों को अलग रखना चाहिए ।
3.    खेत में जहां पर ज्यादा समय तक पानी भरा रहता है वहां से नमूना नहीं लेना चाहिए ।
4.   इकट्ठा किए गए नमूनों को न तो उर्वरकों की बोरियो के पास रखना चाहिए और न ही उर्वरकों की खाली बोरियों का उपयोग नमूने वाली मिट्टी को सुखाने के लिए करना चाहिए ।
5.    जलीय क्षरण या वायु क्षरण के कारण जिस क्षेत्र की ऊपरी मिट्टी की परत बह गई हो तो उसके नमूने अलग से लेने चाहिए ।
6.  यदि नमूना लेने वाला क्षेत्र बड़ा है तो नमूनों की संख्या उसी के अनुरूप बढ़ा देनी चाहिए ।

 

मृदा परीक्षण के परिणामों की व्याख्या

मृदा परीक्षण से प्राप्त परिणामों की व्याख्या करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  • अनुकूलतम फसल उपज के लिए सिफारिश इस प्रकार की जाती है कि सभी पोषक तत्व अंकुरण से फसल पकने तक उपलब्ध रहे ।
  •    मृदा परीक्षण के परिणाम मध्यम या न्यून हो तो पोषक तत्वों के प्रयोग की दर मृदा उर्वरता के स्तर को पौधों की वृद्धि के लिए उपयुक्त बनाने की होनी चाहिए ।
  •  मृदा और जल स्त्रोतों की अनुकूलतम फसल उपयोग क्षमता के लिए उर्वरता को संतुलित बनाए रखें ।

 

मापदंड मान विवरण
पी.एच. 6.5-7.5

8.5 से अधिक

6.5 से कम

सामान्य

क्षारीयता की समस्या

अम्लीय

विद्युत

चालकता

0.-2 डेसी सायमन प्रति मीटर

2 और उससे अधिक

सामान्य

लवणीयता की ओर

 

पोषक तत्व निम्न मध्यम उच्च
जैविक कार्बन (प्रतिशत) 0.5 से कम 0.50-0.75 0.75 से अधिक
उपलध फास्फोरस (कि.ग्रा./है.) 22 से कम 22-50 50 से अधिक
उपलध पोटाश (कि.ग्रा./है.) 120 से कम 120-280 280 से अधिक

 

मृदा की उर्वरता बनाए रखने के लिए ध्यान में रखने योग्य आवश्यक बातें:

खेत एवं आसपास उपलब्ध जैविक पदार्थों का संग्रहण-संरक्षण कर प्रभावकारी ढंग से जैविक खाद बनाकर उसको मृदा की उर्वरता बढ़ाने में उपयोग करें ।फसल-चक्र में दलहनी फसलों का समावेश करके वायुमण्डलीय नत्रजन स्थिरीकरण को बढ़ावा देना एवं गहरी जड़ वाली फसलें उगाना ।
रासायनिक उर्वरकों के साथ जैविक खाद अथवा/और फसल अवशेषों का प्रयोग करें तथा जैवे उर्वरकों से बीज या मृदा को उपचारित करें ।
फसलोत्पादन वृद्धि में सूक्ष्म पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण योगदान होता है, जिससे मानव स्वास्थ्य भी प्रत्यक्षतः प्रभावित होता है । मृदा परीक्षण के आधार पर सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करने से उपज में सार्थक वृद्धि के साथ-साथ अन्य पोषक तत्वों की उपयोग क्षमता में सुधार होता है, जिसके फलस्वरूप् पर्यावरण पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है ।
वांछित फसलोत्पादन एवं लाभ हेतु पोषक तत्वों को उपयुक्त मात्रा में प्रयोग करना पर्यावरणीय सुरक्षा की कुंजी है । शोध द्वारा विकसित सर्वोत्तम प्रबंधन तकनीक तथा स्थान एवं जलवायु विशेष के अनुसार सुधारकों का उपयोग करके, रासायनिक एवं जैव उर्वरकों का समन्वित प्रयोग करके मृदा एवंज ल स्त्रोतों का संरक्षण किया जा सकता है ।

 

स्रोत-

  • निदेशक, केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर-342 003    

Comments:

  • Sanjeev Kumar
    16/08/2017 at 5:58 AM

    Technical Assistant (Soil Testing Laboratory)

  • Sanjeev Kumar
    16/08/2017 at 6:01 AM

    Technical Assistant (Soil Testing Laboratory)

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