0
  • No products in the cart.
Top
मूंग की खेती- राजस्थान - Kisan Suvidha
8135
post-template-default,single,single-post,postid-8135,single-format-standard,theme-wellspring,mkdf-bmi-calculator-1.0,mkd-core-1.0,woocommerce-no-js,wellspring-ver-1.2.1,mkdf-smooth-scroll,mkdf-smooth-page-transitions,mkdf-ajax,mkdf-blog-installed,mkdf-header-standard,mkdf-sticky-header-on-scroll-down-up,mkdf-default-mobile-header,mkdf-sticky-up-mobile-header,mkdf-dropdown-slide-from-bottom,mkdf-search-dropdown,wpb-js-composer js-comp-ver-4.12,vc_responsive

मूंग की खेती- राजस्थान

मूंग की खेती

मूंग की खेती- राजस्थान

खरीफ ऋतु में उगायी जाने वाली महत्वपूर्ण दलहनी फसल है । राज्य में इसकी खेती 12 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में  की जाती है । राज्य में मूंग के सकल क्षेत्रफल का 70 प्रतिशत शुष्क क्षेत्र में पाया जाता है । लेकिन क्षेत्र में मूंग की औसत उपज काफी कम है । निम्न उन्नत तकनीकों के प्रयोग द्वारा मूंग की पैदावार को 20 से 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है ।

मूंग की उन्नत किस्में

किस्म पकने की अवधि(दिनों में) औसत उपज (कु./है.) विशेषताएं
आर एम जी – 62 65-70 8-9aa सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रो के लिये उपयुक्त | राइजक्टोनिया ब्लाइट, कोण व् फली छेदक कीट के प्रति रोधक, फलियां  एक साथ पकती है |
आर एम जी – 268 62-70 8-9 सूखे के प्रति सहनशील | रोग एवं कीटों का कम प्रकोप | फलियाँ एक साथ पकती है |
आर एम जी – 344 62-72 8-9 खरीफ एवं जायद के लिए ब्लाइट को सहने की क्षमता | चमकदार एवं मोटा दाना |
आर एम एल – 866 62-72 8-9 खरीफ एवं जायद के लिए उपयुक्त | अनेक बीमारियों एवं रोगों के प्रति सहनशील | पीतशिरा एवं बैक्टीरियल ब्लाइट का प्रकोप कम |
गंगा-8 70-72 9-10 उचित समय एवं देरी दोनों के लिए उपुक्त | पीतशिरा एवं धब्बा, बैक्टीरियल ब्लाइट के लिए प्रतिरोधी |
जी एम – 4 62-68 10-12 फलियाँ एक साथ पकती है | दाने हरे रंग के तथा बड़े आकार के होते है |
मुंग के – 851

 

70-80 8-10 सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रों के लिए उपुक्त | दाना मोटा एवं चमकदार |

 

भूमि एवं तैयारी

मूंग की खेती के लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तर होती है । भूमि में उचित जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए । पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो चलाकर करनी चाहिए तथा फिर एक क्रौस जुताई हैरो से एवं एक जुताई कल्टीवेटर से कर पाटा लगाकर भूमि समतल कर देना चाहिए ।

 

बीज एवं बुवाई

मूंग की बुवाई 15 जुलाई तक कर देनी चाहिए । देरी से वर्षा होने पर शीघ्र पकने वाली किस्मों की बुवाई 30 जुलाई तक की जा सकती है । स्वस्थ एवं अच्छी गुणवत्ता वाला तथा उपचारित बीज बुबाई के काम लेना चाहिए । बुवाई कतारों में करनी चाहिए । कतारों के  बीच की दूरी 45 सें.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सं.मी. उचित होती है ।

 

खाद एवं उर्वरक

दलहनी फसल होने के कारण मूंग  को कम नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है । मूंग के लिए 20 किलो नाइट्रोजन तथा 40 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है । नाइट्रोजन एवं फास्फोरस की समस्त मात्रा 87 कि.ग्रा. डी.ए.पी. एवं 10 कि.ग्रा. यूरिया के द्वारा बुवाई के समय देनी चाहिए । मूंग की खेती हेतू खेत में दो तीन वर्षों में कम से कम एक बार 5 से 10 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद देनी चाहिए । इसके अतिरिक्त 600 ग्राम रोइजोबियम कल्चर को एक लीटर पानी में 250 ग्राम गुड़ के साथ गर्म कर ठंडा होने पर बीज को उपचारित कर छाया में सुखा लेना चाहिए तथा बुवाई कर देनी चाहिए । खाद उर्वरकों के प्रयोग से पहले मिट्टी की जांच कर लेनी चाहिए ।

 

खरपतवार नियंत्रण

फसल की बुवाई के एक या दो दिन पश्चात् तक पेन्डीमैथालीन (स्टोम्प) की बाजार में उपलब्ध 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए । फसल जब 25-30 दिन की हो जाये तो एक गुड़ाई कस्सी से कर देनी चाहिए या इमेजीथाइपर (परसूट) की 750 मि.ली. मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिए ।

 

रोग तथा कीट नियंत्रण

१.दीमक

दीमक फसल के पौधों की जड़ों को खाकर नुकसान पहुंचाती है । बुवाई से पहले अन्तिम जुताई के समय खेत में क्यूनालफोस 1.5 प्रतिशत या क्लोरोपाइरोफोस पाउडर की 20 से 25 किलो मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में मिलानी चाहिए । बोने के समय बीज को क्लोरोपाइरीफोस कीटनाशक की 2 मि.ली. मात्रा से प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बोना चाहिए ।

२.कातरा

कातरा का प्रकोप विशेष रूप् से दलहनी फसलों में बहुत होता है । इस कीट की लट पौधों को आरम्भिक अवस्था में काटकर बहुत नुकसान पहुँचाती है । इसके नियंत्रण हेतु खेत के आस पास कचरा नहीं रहना  चाहिए । कतारें की लटों पर क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत पाउडर की 20-25 किलो मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव कर देना चाहिए । मोयला, सफेद मक्खी एवं हरा तेला: ये सभी कीट मूंग की फसल को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं । इनकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास 36 डब्ल्यू एस. सी. या मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. या डाईमिथोएट 30 ई.सी. आधा लीटर या मैलाथियोन 50 ई.सी. 1.25 लीटर को प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए । आवश्यकतानुसार दोबारा छिड़काव किया जा सकता है ।

३.पत्ती बीटल

इस कीट के नियंत्रण के लिए क्यूनलफाॅस 1.5 प्रतिशत पाउडर की 20-25 कि.ग्रा. मात्रा का प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव कर देना चाहिए ।

४.फलीछेदक

फली छेदक को नियंत्रित करने के लिए मोनोक्रोटोफास आधा लीटर या मैलाथियोन या क्यूनालफाॅस की एक लीटर मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव या क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत पाउडर की 20-25 कि.ग्रा. मात्रा का प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव कर देना चाहिए । आवश्यकता होने पर 15 दिन के अन्दर दोबारा छिड़काव/भुरकाव किया जा सकता है ।

५.रस चूसक

मूंग की पत्तियों, तनों एवं फलियों का रस चूसकर अनेक प्रकार के कीड़े फसल को हानि पहुंचाते हैं । इन कीड़ों की रोकथाम हेतु इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल का 500 मि.ली. मात्रा का प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए । आवश्यकता होने पर दूसरा छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करें ।

६.चित्ती जीवाणु रोग

इस रोग के लक्षण पत्तियों, तने एवं फलियों पर छोटे गहरे भूरे धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं । इस रोग की रोकथाम हेतु एग्रिमाइसीन 200 ग्राम या स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 50 ग्राम को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए ।

७.पीत शिरा मोजेक

इस रोग के लक्षण फसल की पत्तियों पर एक महीने के अन्तर्गत दिखाई देने लगते हैं । फैले हुए पीले धब्बों के रूप् में यह रोग दिखाई देता है । यह रोग एक मक्खी के कारण फैलता है । इसके नियंत्रण हेतु मिथाइल डिमेटाॅन 0.25 प्रतिशत व मैलाथियोन 0.1 प्रतिशत मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से 10 दिनों के अन्तराल पर घोल बना कर देना छिड़काव करना चाहिए ।  डायमिथोएट 30 ई.सी. की आधा लीटर मात्रा का प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना काफी प्रभावी होता है ।

८.तना झुलसा रोग

इस रोग की रोकथाम हेतु 2 ग्राम मैन्कोजेब से मैन्कोजेब से प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए । बुवाई के 30-35 दिन बाद 2 किलो मैन्कोजेब प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए ।

९.पीलिया रोग

इस रोग के कारण फसल की पत्तियों में पीलापन दिखाई देता है । इस रोग के नियंत्रण हेतु 1 प्रतिशत गन्धक का तेजाब या 0.5 प्रतिशत फैरस सल्फेट का छिड़काव करना चाहिए ।

१०.सरकोस्पोरा पत्ती धब्बा

इस रोग के कारण पौधों के ऊपर छोटे गोल बैंगनी लाल रंग के धब्बे दिखाई देते हैं पौधों की पत्तियां, जड़ व अन्य भाग भी सूखने लगते हैं । इसके नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम की 1 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में या डाइथेन एम-45 की 2 किलो मात्रा 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।  बीज को 3 ग्राम कैप्टान या 2 ग्राम कार्बेन्डोजिम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोना चाहिए ।
किकंल विषाणु रोग: इस रोग के कारण पौधे की पत्तियां सिकुड़ कर इक्ट्ठी सी हो जाती है तथा पौधे पर फलियां बहुत ही कम बनती है । इसकी रोकथाम हेतु डाइमिथोएट 30 ई.सी. आधा लीटर अथवा मिथाइल डिमेटन 25 ई.सी. 750 मि.ली. प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए । जरूरत पड़ने पर 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव करना चाहिए ।

११.जीवाणु पत्ती धब्बा, फफूंदी पत्ती धब्बा और विषाणु रोग

इन रोगों की रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम., स्ट्रेप्टोसाइक्लिन की 0.1 ग्राम एवं मिथाइल डेमेटांग 25 ई.सी. की एक मिली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में एक साथ मिलाकर पर्णीय छिड़काव करना चाहिए

फसल चक्र

अच्छी पैदावार प्राप्त करने एवं भूमि की उर्वराशक्ति बनाये रखने हेतु उचित फसल चक्र आवश्यक है । वर्षा आधारित खेती के लिए मूंग-बाजरा तथा सिंचित क्षेत्रों में मूंग-गेहूं/जीरा/सरसों फसल चक्र अपनाना चाहिए ।

 

बीज उत्पादन

मूंग के बीज उत्पादन हेतु ऐसे खेत चुनने चाहिए जिनमें पिछले मौसम में मूंग नहीं उगाया गया हो । मूंग के लिए निकटवर्ती खेतों से संदूषण को रोकने के लिए फसल के चारों तरफ 10 मीटर की दूरी तक मूंग का दूसरा खेत नहीं होना चाहिए । भूमि की अच्छी तैयारी, उचित खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग, खरपतवार, कीड़े एवं बीमारियों के नियंत्रण के साथ साथ समय पर अवांछनीय पौधों को निकालते रहना चाहिए तथा फसल पकने पर लाटे को अलग सुखाकर दाना निकाल कर ग्रेडिंग कर लेना चाहिए । बीज को साफ करे उपचारित कर सूखे स्थान में रख देना चाहिए । इस प्रकार पैदा किए गए बीज अगले वर्ष बुवाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है ।

 

कटाई एवं गहाई

मूंग की फलियां जब काली पड़ने लगें तथा पौधा सूख जाए तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए । अधिक सूखने पर फलियां चटकने का डर रहता है । फलियों से बीज को थै्रसर द्वारा या डंडे द्वारा अलग कर लिया जाता है ।

उपज एवं आर्थिक लाभ

उचित विधियों के प्रयोग द्वारा खेती करने पर मंूग की 7-8 कुन्तल प्रति हैक्टेयर वर्षा आधारित फसल प्राप्त हो जाती है । एक हैक्टेयर क्षेत्र में मूंग की खेती करने के लिए 18-20 हजार रूपये का खर्च आ जाता है । मूंग का भाव 40 रू0 प्रति किलो होने पर 12000/- से 14000/- रूपये प्रति हैक्टेयर शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है ।

 

Source-

  • भारतीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान परिषद,राजस्थान

No Comments

Sorry, the comment form is closed at this time.