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मूँगफली कटाई उपरांत अफ्लाटोक्सिन प्रबंधन - Kisan Suvidha
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मूँगफली कटाई उपरांत अफ्लाटोक्सिन प्रबंधन

अफ्लाटोक्सिन

मूँगफली कटाई उपरांत अफ्लाटोक्सिन प्रबंधन

अफ्लाटोक्सिन

अफ्लाटोक्सिन एक शक्तिशाली विष है जो कि, कैंसरजनक, उत्परिवर्तजनी, रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करने वाला कारक है । यह एस्परजिलस फ्लेवस पैरासितिकस एवं एस्परजिलस नोमिअस के द्वितीयक चयापचयी क्रियाओं द्वारा उत्पादित होता है । लगभग 20 प्रकार की अफ्लाटोक्सिन पाई जाती हैं, जिनमें मुख्य रूप से बी 1, बी 2, जी 1, जी 2 हैं ।

मूँगफली में अफ्ला विष विभिन्न चरणों में पाया जा सकता है । अतः मूँगफली में उपरोक्त फफूंद के प्रबंधन की रणनीतियो की क्रमशः कटाई पूर्व प्रबंधन, कटाई एवं कटाई के बाद प्रबंधन, तथा निर्विषीकरण करना, आदि हो सकती हैं । यदि मूँगफली की खेती को कटाई पूर्व प्रबंधन उत्तम सस्य क्रियाओं द्वारा किया जाये तो अफ्लाटोक्सिन की गंभीर समस्या से काफी हद तक निजात पाया जा सकता है ।

 

मूँगफली कटाई उपरांत अफ्लाटोक्सिन प्रबंधन के मुख्य बिंदु

अफ्लाटोक्सिन

अफ्लाटोक्सिन एक शक्तिशाली विष है जो कि, कैंसरजनक, उत्परिवर्तजनी, रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करने वाला कारक है । यह एस्परजिलस फ्लेवस पैरासितिकस एवं एस्परजिलस नोमिअस के द्वितीयक चयापचयी क्रियाओं द्वारा उत्पादित होता है । लगभग 20 प्रकार की अफ्लाटोक्सिन पाई जाती हैं, जिनमें मुख्य रूप से बी 1, बी 2, जी 1, जी 2 हैं ।

मूँगफली में अफ्ला विष विभिन्न चरणों में पाया जा सकता है । अतः मूँगफली में उपरोक्त फफूंद के प्रबंधन की रणनीतियांे की क्रमशः कटाई पूर्व प्रबंधन, कटाई एवं कटाई के बाद प्रबंधन, तथा निर्विषीकरण करना, आदि हो सकती हैं । यदि मूँगफली की खेती को कटाई पूर्व प्रबंधन उत्तम सस्य क्रियाओं द्वारा किया जाये तो अफ्लाटोक्सिन की गंभीर समस्या से काफी हद तक निजात पाया जा सकता है

 

मूँगफली कटाई उपरांत अफ्लाटोक्सिन प्रबंधन के मुख्य बिंदु

1) स्वस्थ फलियों को अच्छी तरह से सुखाना चाहिए जिससे कि उनमें नमीं 7 प्रतिशत तक ही रह जाये । अच्छी तरह से सूखी हुई फलियां हाथ में लेकर हिलाने से तेज ध्वनि प्रदान करती है ।
2)  7 प्रतिशत से अधिक नमी वाली फलियों को 7 प्रतिशत या उससे कम नमी वाली फलियों के साथ नहीं मिलाना चाहिए ।
3)  प्रसंस्करण से पहले मूँगफली की फलियो की प्रारंभिक छंटाई करनी चाहिए ।
4)   उत्पादन को नई/साफ पोलीथीन के कवर वाले (शक्कर वाले) जूट के बोरों में भरकर भण्डारण करना चाहिए, तथा साथ ही लकड़ी के पट्टांे पर दीवार से एक मीटर की दूरी पर एवं अच्छे हवादार जगह पर ढेरी बनाना चाहिए ।
ऽ)    संग्रहण के स्थान को किसी भी प्रकार के पानी के रिसाव या टपकाव से मुक्त रखना चाहिए अन्यथा नमी बनने का खतरा रहता है ।
6)    कीटों की क्षति से फलियों को बचाने के लिए एल्यूमीनियम फोसफाइड 56 प्रतिशत की एक थैली (10 ग्राम) को प्रति 1000 किलोग्राम के हिसाब से उपचारित करके फलियों को 7-8 दिन तक ढक कर रखना चाहिए ।
7)  मूँगफली की छिलाई के लिए शुष्क विधि अपनानी चाहिए एवं छिलने से पहले फलियों को दोबारा गीला करने बचना चाहिए ।
8)  नई एवं सुधरी हुई फसल-कटाई-उपरांत-प्रौद्योगिकियोंश् को उपयोग में लाना चाहिए जैसे की ब्लान्ंसिग, मूँगफली की कैमरा या लेजर तकनीक से छटाई है । दानों की छटाई चाहे हाथों से हो या नई एवं सुधरी हुई प्रौद्योगिकियों के द्वारा हो तो यह अफ्लाटोक्सिन से सवंमित दानों को हटाने में सहायक होती है ।
9)   नई एवं सुधरी हुई पैकजिंग तकनीकियाँ जैसे की श्वैकुम पैकिंग आदि को अपनाने से उत्पाद में नमीं का सुरक्षित प्रतिशत बना रहता है । तथा दानों के स्वाद एवं गुणवत्ता पर भी प्रभाव नहीं पड़ता है ।

 

स्रोत-

  • मूंगफली अनुसंधान निदेशालय,जूनागड़

 

 

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