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मीठी तुलसी की खेती - Kisan Suvidha
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मीठी तुलसी की खेती

मीठी तुलसी की खेती

मीठी तुलसी की खेती

परिचय

पुरातनकाल से लेकर आज तक मनुष्यों की खान – पान की आदतों में शक्कर को एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । आदिकाल से चुकन्दर, शर्करा के प्रमुख स्त्रोत रहे हैं । यद्यपि शक्कर में मिठास के गुण हैं लेकिन, मधुमेह के रोगियों को इसे लेने की सलाह नहीं दी जाती है अतः मधुमेह के रोगियों के लिए स्टीविया से प्राप्त शक्कर को सबसे उपयुक्त प्राकृतिक स्त्रोत माना गया है स्टीविया की पत्तियों में मिठास के अनेक यौगिक पाए जाते हैं जिनमें प्रमुख हैं-स्टीवियोसाइड, रेवेडिस, डी-ए, रेवेडिसाइड-सी के अतिरिक्तत छः अन्य योगिक भी उपस्थित रहते हैं जिनमें इंसुलिन को संतुलित करने के गुण हैं ।

स्टीविया  की पत्तियों में पाये जाने वाले स्टीवियोसाइड में शक्कर से 250 गुना एवं सुक्रोज से 300 गुना अधिक मिठास पायी जाती है । अतः स्टीविया कृत्रिम सेक्रिन का से 300 गुना अधिक मिठास पायी जाती हैं । अतः स्टीविया कृत्रिम सेक्रिन का संभाव्य वैकल्पिक स्त्रोत बन गया है ।
अभी तक किये गये वैज्ञानिक परीक्षणों में स्टीविया के उपयोग से मनुष्यों पर किसी प्रकार का विपरीत प्रभाव नहीं पाया गया है । दूसरे कम ऊर्जा वाली मिठासों के विपरीत यह 100 से.ग्रे. तापमान एवं 3 से 9 पी.एच. तक स्थित रहता है । स्टीविया कैलारी एवं किण्डवन रहित है तथा पकने पर गहरे रंग का भी नहीं होता है । स्टीवियाल बनाने में ग्लूकासाइड समूह को अलग कर दिया जाता है । इसके अतिरिक्त जिवरेला फ्यूजोकोराई फफूंद के उत्परिवर्तन या म्यूटेंट से जिव्रेलिक अम्ल प्राप्त करने के लिए भी स्टीविया का उपयोग किया जाता है ।

 

वानस्पतिक विवरण

स्टीविया या मीठी तुलसी का वानस्पतिक नाम स्टीविया रेवूडियाना है एवं इसका कुल एस्ट्रेसी है । इसका पौधा सीधा, लंबा बहुवर्षीय शाक है जिसकी ऊँचाई 60 से 70 से.मी. तक होती है । इसकी पत्तियों का आकार लेन्सिलियोट होता है । ये वृंतहीन एवं एक दूसरे के विरुद्ध लगी होती हैं । इसके फल छोेटे, सफेद एवं अनियमित आकार में लगे होते हैं । स्टीविया लघु दिवस पादप है ।

 

जलवायु

यह अर्ध आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय है जो 11 से 400 से.ग्रे. तापमान पर अच्छी वृद्धि करता है । वार्षिक औसत तापमान 310 से.ग्रे. एवं 140 से.मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है ।

 

भूमि

श्रेतीली लाम भूमि जिसमें पानी की उत्तम व्यवस्था हो इसके लिए उपयुक्त होती है । अम्लीय से तटस्थ भूमि जिसका पी.एच. 6.5 से 7.5 हो उसमें स्टेविया की वृद्धि अच्छी होती है । यह जल-लग्नता को सहन नहीं कर सकता है अतः इसके लिए उत्तम जल निकास वाली भूमि उत्तम होती है ।

 

प्रवर्धन

इसका प्रवर्धन बीज या तने की कलम से किया जा सकता है । इसके बीज का अंकुरण काफी कम होने के कारण इसका  प्रवर्धन मुख्यतः तनों की कलम से किया जाता है । इसके प्रवर्धन पत्तियों के कक्ष से वर्तमान वर्ष में लगे तनों को कलम के रूप में उपयोग किया जाता है । 15 से.मी. लंबे तनों को 100 पी.पी.एम पेक्लोनबूटेजाल से उपचारित कर फरवरी-माह में रोपित करने पर तनों से जडें शीघ्र निकलती हैं ।

 

रोपण विधि

स्टीविया की उपचारित 15 से.मी. लंबी कलमों को 20 से.मी. दूरी पर छह इंच ऊँची मेंढ़ों पर लगाया जाता है । रोपण के उपरांत हल्की सिंचाई से पौधा शीघ्रता से लगता है ।

 

खाद एवं उर्वरक

खेत की तैयारी करते समय 20 टन सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिलाना चाहिए । फसल को 60ः30ः45 एन.पी.के. की आवश्यकता होती है । बोरान एवं मालीबेडिनम के छिड़काव से पत्तियों एवं स्टीवियोसाइड की अच्छी उपज प्राप्त होती है ।

 

सिंचाई एवं नींदा नियंत्रण

ग्रीष्म ऋतु में प्रत्येक आठ दिन में एवं जरूरत अनुसार सिंचाई करना अनिवार्य है । खेत को निंदा मुक्त रखना चाहिए ।

 

रोग एवं कीट नियंत्रण

यह कठोर फसल है अतः इसमें बहुत कम कीडे़ लगते हैं । कभी-कभी बोरान की कमी से लीफ स्पाट रोग लग जाता है जिसे बोराक्स 6 प्रतिशत के छिड़काव से नियंत्रित किया जा सकता है ।

 

फल तोड़ने का समय

चूकी पत्तियों में सबसे ज्यादा स्टीवियोसाइड पाया जाता है अतः ज्यादा शासकीय उपज हेतु फूलों को तोड़ना आवश्यक होता है । रोपण के 30, 45, 60, 75 दिन उपरांत एवं कटाई के समय फूल तोड़ देने से ज्यादा शाकीय प्राप्त होती है । रेटून फसल में पहली फसल काटने के उपरांत 40 दिन बाद फूल आना शुरू हो जाते हैं अतः 40 एवं 55 दिन एवं कटाई के समय ( 90 दिन ) बाद फूलों की तुड़ाई करना चाहिए ।

 

कटाई एवं उपज

फसल रोपण के 90 दिन उपरांत पहली कटाई की जाती है । कटाई 5 से 8 से.मी. ऊपर से करना चाहिए ताकि पुर्नजनन शीघ्रता से हो सके इसके बाद की कटाईयाँ भी 90 दिन के अंतराल से करना चाहिए । एक वर्ष में लगभग चार फसलें प्राप्त की जाती है । एक कटाई में एक हेक्टेयर में 3.0 से 3.5 टन सूखी पत्तियों की उपज प्राप्त होती है । इस प्रकार एक वर्ष में एक हेक्टेयर से 10 -12 टन सूखी शाकीय उपज प्राप्त होती हैं ।

 

उपज

सूखी जड़ों का उत्पादन करीब 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आता है साथ ही बीजों से अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है बीज का उत्पादन करीब 1-2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आता है और करीब 45-50 रूपये प्रति किलो ग्राम से बिक जाता है इसी प्रकार सूखी जड़ें 40-60 रूपये प्रति किलो ग्राम से बिक जाती हैं इस प्रकार करीब रूपये  13,000-15,000 रूपये प्रति हेक्टेयर शुद्ध लाभ होता है ।
ठसकी वृद्धि उत्तम होती है । इसका अंकुरण प्रकाश एवं गर्म परिस्थितयों में उत्तम होता है । स्टीविया में अधिक शाक उत्पादन के लिए कम से कम कुहरा, ज्यादा प्रकाश एवं गर्म तापमान की आवश्यकता होती है ।

 

छाना निस्सारण

इसमें कन्सनट्रेट से कच्चा माल निकालने को पानी निस्साण विधि का उपयोग किया जाता है । प्रक्रिया प्रारंभ करने के पूर्व पत्तियों के 0.3 से 0.9 मि.मी. तक के छोटे-छोटे टुकड़े कर इसे उध्र्वपातन के लिए 580 से.ग्रे. पर 5 घंटे के लिए एसीटोन के साथ रखते हैं । मिश्रण से ऐसीटोन को निकालने के लिए 25 से 30 से.ग्रे. पर वेक्यूम ( शून्यक ) का उपयोग किया जाता है । निस्सारण विधि 60 डिग्री से.ग्रे. पर 2 से 4 घंटे चलती है । निस्सारण के उपरांत दवाई उद्योग एवं अन्य उपयोग हेतु कृत्रिम मिठास वाला कन्सनट्रेट प्राप्त होता है ।

 

स्रोत-

  • जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर

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