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मसूर की उन्नत खेती( Lentil cultivation in Madhya Pradesh ) - Kisan Suvidha
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मसूर की उन्नत खेती( Lentil cultivation in Madhya Pradesh )

मसूर की खेती

मसूर की उन्नत खेती( Lentil cultivation in Madhya Pradesh )

अधिक उत्पादन के लिये मसूर की उन्नत खेती(Lentil cultivation)

रबी मौसम में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में मसूर का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके दानों में 24-26 प्रतिशत प्रोटीन, 1.3 प्रतिशत वसा, 3.2 प्रतिशत रेशा व 57 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा कैल्सियम (68 मिली ग्राम), स्फुर (300 मिलीग्राम) एवं लौह तत्व (7 मिलीग्राम) प्रति 100 दाने एवं विटामिन सी भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता हैं। उपरोक्त विशेषताओ के कारण इसका उपयोग दाल के अलावा कई प्रकार के व्यंजनों में पूर्ण दाने या आटे के रूप में किया जाता हैं।

मध्यप्रदेश में इसकी खेती लगभग पाँच लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती हैं। क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से हमारे प्रदेष में चना के बाद मसूर का दूसरा स्थान है। प्रदेष में इसकी खेती विदिशा, सागर, रायसेन, दमोह, जबलपुर, सतना, पन्ना, रीवा, नरसिंहपुर, सीहोर, ग्वालियर एवं भिन्ड आदि जिलों में की जाती हैं।

 

उपयुक्त भूमि एवं खेत की तैयारी(Land preparation for growing Lentil)

मसूर की खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती हैं परन्तु रेतीली दुमट या टुमट (भारी) भूमि जिसमें जल धारण एवं जल निकास क्षमता अच्छी हो उपयुक्त होती हैं। खेत की तैयारी के लिये वर्षाकालीन फसल की कटाई के बाद भूमि में उपलब्ध नमी के अनुसार एक या दो बार देशी हल या बरवर से जुताई कर मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती हैं। इसके तुरन्त बाद पाटा चला कर खेत समतल करने से नमी सुरक्षित रहती हैं एवं बुवाई के समय बीज एक समान गहराई पर बोया जाता हैं। जिससे बीज का अंकुरण भी अच्छा होता हैं।

 

मसूर की उन्नत किस्म का चुनाव बीज की मात्रा एवं बीज उपचार(Varieties of Lentil)

अच्छे उत्पादन के लिये गुणवत्ता वाला साफ, बीमारी व खरपतवार के बीज रहित बीज का उपयोग करना चाहिये। उन्नत किस्म का बीज जिसकी अंकुरण क्षमता अच्छी हो, किसी प्रतिष्ठित संस्था जैसे संचालक प्रक्षेत्र, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्विद्यालय, जबलपुर या बीज निगम आदि से लेना चाहिए। प्रदेष के लिये उपयुक्त उन्नत प्रजातियों का विवरण निम्नानुसार हैं:-

क्र.

प्रजातियां

पकने की अवधि

औसत उपज

(क्वि./हे.)

अन्य विषेषतायें

1 जे.एल. 1 120 12-15 सिंचित एवं वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिये उपयुक्त, पाला व उकठा रोग सहनशील, दाने बड़े व भूरे काले रंग के।
2 जे.एल. 3 110-115 13-15 दाना बड़ा एवं हल्के भूरे रंग का, उकठा रोग प्रतिरोधक एवं सूखा सहनशील, सम्पूर्ण विंध्य क्षेत्र के लिये उपयुक्त।
3 पन्त 4076 115-120 10-15 उकठा रोग निरोधक, दाना बड़े आकार का सम्पूर्ण मध्यप्रदेश के लिये उपयुक्त।
4 के-75 (मल्लिका) 115-120 10-12 दाना छोटा, सम्पूर्ण विंध्य क्षेत्र अर्थात् सीहोर, भोपाल, विदिशा, नरसिंहपुर, सागर, दमोह एवं रायसेन आदि जिलों के लिए उपयुक्त।
5 पन्त एल-4 135-140 15-20 गेरूआ व सूखा निरोधक
6 सीहोर 74-3 120-125 10-15 मध्य भारत के लिये उपयुक्त

 

छोटे दाने वाली प्रजाति का 25-30 किलो एवं बड़े दाने वाली प्रजाति का 35-40 किलो बीज प्रति हेक्टेयर क्षेत्र की बुवाई के लिये पर्याप्त होता हैं। उतेरा बोनी में सामान्यतः 40-50 किलो बीज की आवश्यकता पड़ती हैं।

फसल को विभिन्न बीज जनित रोगों जैसे उकठा रोग से बचाने के लिये बुवाई से पहले बीज का उपचार थाइरम 2 ग्राम तथा कार्बोनडाज़िम एक ग्राम या वाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करना चाहिये। इसके बीज को 5 ग्राम राइजोबियम कल्चर एवं 5 ग्राम पी.एस.बी. कल्वर प्रति किलो बीज से भी उपचारित करने से पौधों के जड़ो में जड़ ग्रंथिया (रूट नाडूलस) अधिक बनने से पौधों का विकास अच्छा होता हैं।

 

बुवाई का समय एवं विधि ( Sowing method and sowing time)

वर्षा आधारित क्षेत्रों में मसूर की बोनी का उचित समय अक्टूबर माह का अंतिम सप्ताह है जब कि सिंचित क्षेत्रों में नवम्बर माह के प्रथम या द्वितीय पखवाड़े तक इसकी बोनी की जा सकती है परन्तु विलम्ब से बुवाई करने पर उपज प्रभावित होती है। उतेरा बोनी का समय मानसूनी वर्षा एवं धान की फसल पकने पर निर्भर होता हैं। ऐसी परिस्थिति में मसूर की बोनी, धान फसल की कटाई के 4-7 दिन पहले छिड़काव विधि से करते हैं।

सामान्यतः मसूर की बोनी कतारों में 30 से.मी. की दूरी तथा बीज से बीज का अन्तर 5 से 7.5 से.मी. पर देशी हल या सीड ड्रिल की सहायता से 4-5 से.मी. की गहराई पर करना चाहिए। बुवाई में विलम्ब होने पर कतारों का अन्तर 20-25 से.मी. रखा जाता हैं।

 

मसूर उत्पादन के लिए खाद एवं उर्वरक ( Fertilizers for  Lentil )

खेत की मिट्टी परीक्षण के अनुसार खाद एवं उर्वरक देना लाभप्रद होता है । यदि गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद या कम्पोस्ट उपलब्ध हो तब 5 टन/हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिलाना चाहिये अन्यथा असिंचित क्षेत्रों में 15-20 किलो नत्रजन, 30-40 किलो स्फुर एवं 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना चाहिये। सिंचित फसल में 20-25 किलो नत्रजन, 50 किलो स्फुर एवं 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर का उपयोग करना चाहिये। जिन क्षेत्रो में गंधक की कमी हो उन क्षेत्रों में 20 किलो जिप्सम प्रति हेक्टेयर या स्फुर के लिये सिंगल सुपर फास्फेट का उपयोग करना लाभदायक होता हैं।

 

सिंचाई ( Irrigation of Lentil )

सामान्यतः मसूर की खेती वर्षा आधारित क्षेत्रों में की जाती हैं परन्तु फसल की क्रान्तिक अवस्था जैसे फल्ली बनने या फल्ली में दाना बनने पर एक हल्की सिंचाई करना फायदेमंद होता है। सिंचित अवस्था में सिंचाई फसल की आवश्यकता व मौसम अनुसार पहली सिंचाई पौधों में शाखाये निकलने पर तथा दूसरी सिंचाई भूमि की आवश्यकता अनुसार फल्ली अवस्था पर स्प्रिकलर या बहाव विधि से (हल्की) करना चाहिये। सिंचाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि खेत में जल की अधिकता न हों।

 

खरपतवार नियंत्रण (Weed control )

फसल में खरपतवार की उपलब्धता अनुसार बुवाई के 20-25 दिन व 40-45 दिन बाद निंदाई-गुड़ाई, खुरपी या हेंड़ हो या डोरा चलाकर करना चाहिये इससे खरपतवार का नियंत्रण होगा तथा भूमि में वायु संचार होने से पौधों की वृद्धि एवं विकास भी अच्छा होगा। खरपतवार के रसायनिक नियंत्रण के लिए पेन्डी-मिथेलिन या फ्लूक्लोरोलिन 0.75 किलो ग्राम को 500 लीटर पानी में मिलाकर एक हेक्टेयर में घोलकर छिड़काव कर मिट्टी में मिलाने से खरपतवारों के प्रकोप से बचा जा सकता हैं। खरपतवार नाशी के उपयोग के समय खेत में पर्याप्त मात्रा में नमीं उपलब्ध होना चाहिए।

पौध संरक्षण( Plant Protection )

मसूर फसल में लगने वाले कीट व रोग नियंत्रण के लिये समय पर पौध संरक्षण उपाय अपनाना चाहिये।

प्रमुख कीट एवं उसकी रोकथाम ( Insects pests of Lentil and their control ) 

मसूर के प्रमुख कीट माहो, एफिड एवं थ्रिप्स तथा फल्ली छेदक इल्ली आदि का प्रकोप होता हैं। इन कीटों के नियंत्रण के लिये मोनोक्रोटोफास या मेटासिस्टाक्स (1.5 मि.ली.) या क्वीनालफास (1 मि.ली.) प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिये। आवश्यकता पड़ने पर पुनः छिड़काव 10-15 दिन के अन्तर पर करें।

प्रमुख रोग एवं उनकी रोकथाम ( Diseases of lentil and their control)  

फसल के मुख्यतः उकठा तथा गेरूआ रोग का प्रकोप होता है। उकठा रोग नियंत्रण के लिये रोग रोधी प्रजाति जैसे जे.एल.3 या एल 4076 के बीज बोनी के लिये उपयोग करें अन्यथा बुवाई से पहले बीज उपचार थाइरम 3 ग्राम या थाइरम 1.5 ग्राम+बेविस्टीन 1.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करें। गेरूआ रोग के नियंत्रण के लिये डाइथेन एम-45, 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिये। प्रभावित क्षेत्रों में मसूर की एल 4076 गेरूआ निरोधक जाति का उपयोग करें।

 

कटाई, गहाई एवं उपज (Harvesting, threshing and yield per acre of Lentil )

जब फसल की फल्लियाँ सूखकर पीली पड़ जावे तब कटाई करना चाहिये । कटाई में विलम्ब करने से फल्लियों के गिरने व चिटकने का भय होता हैं एवं उत्पादन भी प्रभावित होता हैं। कटाई उपरान्त फसल को 2-3 दिन धूप में सुखाकर बैलों द्वारा दावन कर या फसल की मोटी परत पर टेªक्टर चला कर गहाई करना चाहिये। बाद में प्राकृतिक हवा या उड़ावनी के पंख की सहायता से दाना एवं भूसा अलग कर लेना चाहिये।

उन्न्त किस्म एवं उत्पादन तकनीक अपनाने से असिंचित अवस्था में 10-20 क्विंटल तथा सिंचित अवस्था में 15-20 क्विंटल/हेक्टेयर दाना प्राप्त किया जा सकता हैं। भण्डारण के लिये बीज को अच्छी तरह सुखायें जिससे बीज में 8-10 प्रतिशत से अधिक नमीं न हों।

 

Source-

  • Jawaharlal Nehru Krishi VishwaVidyalaya, Jabalpur (M.P.)

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