मरुक्षेत्र में सूूखे के समय पशु पोषण प्रबंधन

मरुक्षेत्र में सूखा नयी बात नहीं है अकाल के समय सबसे अधिक मार पशुधन पर पड़ती है जो कि मरुक्षेत्र की ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का मुख्य स्तम्भ है । राजस्थान की 2007 की गणनानुसार राज्य में कुल 5.79 करोड़ पशु हैं जब कि मरुक्षेत्रों ( 12 जिलों का योग ) में 2.9 करोड़ पशुधन है । प्रकृति की विपरीत परिस्थितियों को सहन करनी की क्षमता रखने वाली यहां की पशुनस्ल सर्वोत्तम है ।

गाय:        थारपाकर, राठी, काकरेज व नागौरी ।
भेड़:        चैकला, नाली, मगरा मारवाड़ी, पुगल, सोनाड़ी व जैसलमेरी ।
बकरी:     मारवाड़ी व सिरोही ( परबतसर )
ऊंट:        बीकानेरी व जैसलमेरी

 

पशुपालन की तीन मुख्य शाखाएँ हैं:

1.)   पशुपोषण
2.)   पशु प्रजनन
3.)   पशु स्वास्थ्य

 

पशु पोषण प्रबंधन

अकाल में पोषण प्रबंध करना अति आवश्यक हो जाता है क्योंकि अकाल में चारे – बाँटे की बहुत कमी हो जाती है, इनमें भी विशेषकर चारे की गाय, भैस, भेड़, बकरी पशुओं को 70-80 प्रतिशत शुष्क पदार्थ व कूल पाच्य प्रद्धार्थ ( टी.डी.एन. ) चारे से ही प्राप्त होता है । इस समय चारे का परिवहन कर पूर्ति करना एक बहुत ही कठिन कार्य हो जाता है खाखला, बाजरा कुत्तर व चावल का भूसा होता भी निम्न गुणवत्ता का है व पशुओं की आवश्यकता पूरी नहीं कर पाता ।

अकाल के समय में पारम्परिक खल, चूरी इत्यादि भी बहुत मंहगी हो जाती हैं ऐसे समय में अपारम्परिक खल, गैर प्रोटीन नत्रजन, शीरा, लवण ( मिनरल्स ) महती भूमिका निभा सकते हैं । अन्यथा पशु कुपोषण का शिकार हो जाते हैं, पाचन शक्ति क्षीण हो जाती है रोग प्रतिरोधकता कम हो जाती है । अतः अकाल के समय में पशुओं की शारीरिक रखरखाव के लिए पोषण प्रबंध करना अति आवश्यक है । इसके लिए निम्न तकनीकियां लाभकारी रहेगीं ।

 

1.अकाल के समय में तुरन्त खिलाने के लिए राशन बनाना ( प्रति पशु )

  •     भूसा – 3.0 कि.ग्रा.
  •    शीरा – 0.4 कि.ग्रा.
  •     यूरिया – 25 ग्रा.
  •     विटामिन, लवण मिनरल – 40 ग्रा.
  •     सादा नमक – 20 ग्रा..

विधि – एक ढोल में यूरिया को आधा लीटर पानी में घोल कर शीरा में मिला लें । अब इस घोल को भूसे पर छिड़क कर ऊपर से लवण विटामिन लवण व सादा नमक भी डाल दें व हाथों से अच्छी तरह मिला दें । इस कार्य में 100 कि.ग्रा. भूसे के लिए लगभग एक कि.ग्रा. यूरिया व दस कि.ग्रा. शीरा चाहिए होता है । इस प्रकार तुरंत बनने वाले राशन को पशु चाव से खाते हैं ।

 

2.भूसे को यूरिया उपचारित करना

गेहूं के भूसे, धान की पुश्राल, बाजरा की कुत्तर आदि में प्रोटिन व खनिज तत्वों की मात्रा बहुत और लिग्निन व सिलिका की मात्रा अधिक होती है । इस कारण जब इनको पशुओं को खिलाया जाता है तो ये पशु की जिन्दा रहने की मांग को पूरा नहीं कर सकते हैं । इस अवस्था में या तो इनके साथ हरा चारा मिलाकर या कुछ दाना मिलाकर खिलाया जाता है पर अकाल के समय किसान के पास हरा चारा व दाना,

  • सर्वप्रथम  25 कि.ग्रा. भूसे को 3 ग 5 फीट लम्बाई चैड़ाई में पक्के फर्श पर बिछाएं ।
  • 3 कि.ग्रा. यूरिया को 40 लीटर पानी में घोल लें ।
  • अब फैलाए हुए भूसे पर हाथ से यूरिया मिश्रित पानी 8-10 लीटर का छिड़काव करें ।
  • इसी तरह तीन परतें ( 25-25 कि.ग्रा. भूसे की ) और लगाएं । हर परत के बाद में 10 लीटर यूरिया पानी ( घोल ) का छिड़काव करें व अच्छी तरह दबावें ।
  • अब इसको पोलीथीन शीट से या बोरियों से ढक दें जिससे हवा अन्दर न जाए । इस पर कुछ वजन जैसे पत्थर आदि रख कर दबा दें ।
  • 15-20 दिन बाद भूसा पशुओं को खिलाने के लिए तैयार हो जाता है ।

इस उपचार में भूसे की पौष्टिकता कई गुणा बढ़ जाती है व पशु अपने शरीर में प्रोटीन व ऊर्जा बना लेता है ।

सावधानियाँ

  •   भूसे और यूरिया मिश्रित पानी के घोल को अच्छी तरह से छिड़कें ।
  •  यूरिया मिश्रित पानी को पशुओं की पहुंच से दूर रखें यह हानिकारक होगा ।
  •  पशुओं को खिलाते समय पहले थोड़ी – थोड़ी मात्रा में सारे भूसे में मिलाएं । 10-12 दिन में इसकी मात्रा बढ़ा दें ।

 

3.पशु आहार बट्टिका

उपचारित भूसे के साथ बट्टिका लाभकारी रहती है । काजरी द्वारा पशु आहार बट्टिका या बाजार में उपलब्ध पशुओं के लिए पूरक पौष्टिक आहार के रूप में काफी उपयोगी है । इससे मवेशियों को खनिज लवण, नत्रजन व ऊर्जा मिल जाती है । पशुओं को अकाल में कुपोषण से बचाया जा सकता है ।

 

4.विटामिन ’ए’ की खुराक/टीके

प्रत्येक पशु के आहार में विटामिन ए दिया जाना अनिवार्य है । हरे चारे में कैरोटिन होता है जो पशुओं के शरीर में जाकर विटामिन ए में परिवर्तित होता है । अकाल में पशुओं का हरा चारा उपलब्ध नहीं होता है, इस कारण पशुओं के शरीर में विटामिन ए की कमी के लक्षण आ जाते हैं ।

  •  पशु की चमड़ी रूक्षी व खुरदरी होना ।
  •     आँखों से पानी गिरना ।
  •      पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना ।
  •     आँखों पर सफेद फूला आना ।
  •     नवजात बछड़े, मेमने अंधे पैदा होना ।

उपचार:- विटामिन ए का टीका लगवाए व खुराक में विटामिन ए युक्त लवण मिश्रण दें ।

 

5.दुधारु पशुओं के लिए सस्ता व संतुलित बांटा

मरु क्षेत्रों में बहुतायत में उपलब्ध तुम्बा ( सिट्रल्य कोलोसिन्थीस ) बीज खल, पारम्परिक खल के चैथाई से भी कम मूल्य में मिल जाती है । तुम्बे बीज खल को पशुओं के बांटे में 25 प्रतिशत तक मिलाकर खिला सकते है बांटे में 20 से 30 प्रतिशत अंग्रेजी बबुल की फली ( प्रोसोपिस जूलीफलोरा ) को घट्टी से पीस कर भी मिला सकते हैं । इस से बांटा स्वादिष्ट हो जाता है, उत्पादन बड़ता है वे पशु पालकों को आर्थिक लाभ होता है । इससे बांटे के मूल्य में 20 से 35 प्रतिशत मूल्य तक कमी आ जाती है ।

6.   भूसे से मसूर व मूंगफली का चारा मिलाकर खिलाने से भी पोषक तत्वों की कमी दूर हो जाती है व पाचन शक्ति अच्छी रहती है

7.    चारे को हमेशा कुत्तर करे पशुओं को दें । कुत्तर पशु ज्यादा अच्छी तरह पचा सकते हैं ।

8.   पशुओं की ढाण में मिनरल ईट व साधारण लवण होना चाहिए, ताकि पाचन क्रिया सामान्य रह सके व लवणों की कमी न हो पाये ।

9.    बाह्य व आंतरिक परजीवी नाशक का प्रयोग कर पोषक तत्वों की पशु के लिए उपलब्धता बढ़ाएं|

 

स्रोत-

  • केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर-342 003
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