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मक्के के कीट एवं रोग - Kisan Suvidha
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मक्के के कीट एवं रोग

मक्के के कीट एवं रोग

मक्के के कीट एवं रोग

मक्के के प्रमुख कीट एवं रोग इस प्रकार हैं:-

कीट प्रबंधन

१.तना भेदक

खरीफ की फसल के दौरान लगभग पूरे देश में मक्का तना भेदक (काइलो पार्टेलस) का लारवा मुख्य रूप से हानिकारक होता है । तना भेदक पतंगे पत्तियों पर अंडे देते हैं । इनकी सूंडी गोभ में घुसकर पौधे को नष्ट कर देती है । पौधा यदि 20 से 25 दिन तक बच जाए तो तना भेदक के लिए प्रतिरोधक क्षमता प्रबल हो जाती है । अगर तना भेदक का प्रकोप अधिक हो तो इसकी रोकथाम के लिए पौध जमने के 10-12 दिन के पश्चात 2 गोभ में उचित जगह पर कार्बोफ्यूरान 3 जी डालना चाहिए या पौध जमने के 10-12 दिन के पश्चात प्रति हेक्टेयर 8 ट्राइकोकार्ड (ट्राइक्रोग्रेमा चाइलोसिस) रिलीज करने से भी इसकी रोकथाम की जा सकती है ।

 

2.पिंक बोरर (सिसेमिया इन्फेरेंस):

यह प्रयद्वीपीय भारत में विशेष रूप से सर्दियों के मौसम के दौरान होता है । यह कीट रात्रिचर है और अंडे पत्तियों की निचल सतह पर देता है । लार्वा की निचली सतह से घुसता है और तने को नष्ट कर देता है ।

इसकी रोकथाम के लिए पौध जमने के 10-12 दिन के पश्चात गोभ में उचित जगह पर कार्बोफ्यूरान 3 जी डालना चाहिये या पौध जमने के 10-12 दिन के पश्चात प्रति हेक्टेयर 8 ट्राइकोकार्ड (ट्राइक्रोग्रेमा चाइलोसिस) रिलीज करने से भी इसकी रोकथाम की जा सकती है ।
दीमक: दीमक तने के साथ सुरंग बनाकर पौधों को नष्ट कर देती है । ग्रसित पौधा हाथ से खींचन पर आसानी से बाहर आ जाता है व खोखली जड़ों में मिट्टी नजर आती है ।  दीमक के प्रकोप वाले क्षेत्रों में क्लोरपाइरीफास से उपचारित बीजों का प्रयोग करना चाहिए । पहली फसल के अवशेष खेत में नहीं रहने देने चाहिए । हल्का पानी लगाने के बाद फिप्रोनिल के दाने उचित जगह पर डालने चाहिए ।

 

मक्के के रोग एवं  उनका प्रबंधन

खरीफ के मौसम में मक्का की फसल में देश के विभिन्न भागों में अनेक प्रकार की बीमारियाँ लग जाती हैं । अगर इनका उचित प्रबंधन न किया जाए तो इससे फसल की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।

 

१.बैंडेड लीफ एवं शीथ ब्लाइट

नाम के मुताबिक इस रोग में पत्तों व शीथ पर चैड़ई के रूख स्लेटी या भूरे रंग की गहरी पट्टियाँ दिखाई देती हैं । उग्र अवस्था में भुट्टे भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं । उग्र अवस्था में भुट्टे भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं । भूमि को छूटे वाली 2-3 रोगी पत्तियों को शुरू में ही तोड़ देने से एवं 30 से 40 दिन की फसल पर 10 ग्राम राइजोलेक्स 50 डब्ल्यू0 पी0 प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से रोग की रोकथाम की जा सकती है तथा स्यूडोनास फ्ल्यूरोसेंस 16 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज में मिलाकर बीजोपचार करने से भी रोग की रोकथाम की जा सकती है ।

 

२.टरसिकम लीफ ब्लाइट

रोगी पौधों की निचली पत्तियों पर लंबे चपटे स्लेटी या भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं जो धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ते हैं । यह बीमारी पहाड़ी तथा प्रायद्वीपीय भारत में खरीफ के मौसम में ज्यादा फैलती है । इसके उपचार के लिए 8-10 दिन के अन्तराल पर एक लीटर पानी में 2.5 से 4.0 ग्राम मेनेब/जिनेब मिलाकर छिड़काव करना चाहिए । जहाँ पर इस रोग का प्रकोप अधिक हो उन क्षेत्रों में रोग प्रतिरोधी किस्में जैसे कि प्रो-345, बायो-9636, पूसा अर्ली हाइब्रिड-5, प्रकाश, जे0 एच0-10655 एवं एम0सी0एच0-117 उगानी चाहिए ।

 

3.मेडिस लीफ ब्लाइट

पत्तियों की शिराओं के बीच में पीले भूरे अंडाकर धब्बे बन जाते हैं जो बाद में लंबे होकर चैकोर हो जाते हैं । इनसे पत्तियाँ जली हुई दिखाई देती हैं । रोग के लक्षण दिखते ही 8-10 दिन के अन्तराल पर एक लीटर पानी में 2.4 से 0.4 ग्राम डाइथेन एम-45/जिनेब मिलाकर छिड़काव करें । जहाँ पर इस रोग का प्रकोप अधिक हो उन क्षेत्रों में रोग प्रतिरोधी किस्में जैसे कि प्रो-324, आई.सी.आई.-701, बायो-9636, पूसा अर्ली हाइब्रिड-5, प्रकाश, जे एच-10655 एवं जे.के.एम.-1701 उगानी चाहिए ।

 

4.पोलीसोरा रस्ट

मांझर बनते समय नमी अधिक होने पर पत्तियों की दोनों सतहों पर गोल, लंबे, सुनहरे या गहरे भूरे रंग का पाउडर बिखरा दिखाई देता है जो बाद में भूरेे काले रंग का हो जाता है । रोग के प्रथम लक्षण दिखते ही 15 दिन के अन्तराल पर एक लीटर पानी में 2.0 से 2.5 ग्राम डाइथेन एम-45 मिलाकर छिड़काव करना चाहिए ।

 

5.मक्के के पुष्पन के पश्चात् वृन्त सड़न (पी.एफ.एस.आर.)

यह रोग समय पर बुवाई (10 से 20 जुलाई के मध्य में) करने से उत्तर भारतीय क्षेत्रों में कम फैलता है । अच्छे जल निकास वाली भूमि में पौधों की संख्या प्रति हेक्टेयर पचास हजार से कम रखने पर भी यह रोग कम फैलता है । फूल आते समय फसल को पर्याप्त मात्रा में जल की आपूर्ति होने से तथा विशेष रूप से पोटाश के स्तर को 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक बढ़ाकर मृदा उर्वरता के संतुलन बनाये रखने से रोग को कम करने में मदद मिलती है । जिसके लिए रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करना चाहिए ।

 

6.डाउनी मिल्ड्यू (मृदुल रोमिल आसिता)

बारिश के पहले बुवाई एवं रोग प्रतिरोधक किस्में जैसे कि प्रो-345, बायो-9636, पूसा अर्ली हाइब्रिड-5, प्रकाश जे.एच.-10655 एवं एन.इ.सी.एस.-117 उगाने से भी रोग की रोकथाम की जा सकती है । एप्रोन 35 एस.डी. का 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें तथा सिस्टेमिक फफूंदनाशी जैसे कि मेटालैक्सिल, रोडोमिल 25 डब्ल्यू. पी. का छिड़काव रोग के लक्षण दिखाई देने से पहले करने पर रोग का प्रकोप कम किया जा सकता है ।

 

स्रोत-

  • मक्का अनुसंधान निदेशालय

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