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उत्तर पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्रों में भोज्य एवं बीज आलू उत्पादन तकनीक – Kisan Suvidha
1909
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उत्तर पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्रों में भोज्य एवं बीज आलू उत्पादन तकनीक

potato cultivation

उत्तर पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्रों में भोज्य एवं बीज आलू उत्पादन तकनीक

परिचय

उत्तर पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्रों में आलू एक महत्वपूर्ण नगदी फसल है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड तथा जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य उत्तर-पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्रों के अन्तर्गत आते हैं। इन राज्यों में आलू लगभग 48 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्रफल में लगाया जाता है जिससे 767 हजार टन उत्पादन होता है। यहां पर आलू मुख्यतः बेमौसमी फसल के रूप में वसन्त ऋतु से शुरू  होकर  गर्मी  व      बरसात  के  मौसम  में  उगाया  जाता  है।  बेमौसमी  फसल होने  के  नाते     पहाड़ी  क्षेत्रों  में  आलू  किसानों  को  अच्छा  फायदा  देता  है,क्योंकि ऐसे समय में मैदानी इलाकों में ताज़ा आलू उपलब्ध नहीं  रहता  है। वर्षा ऋतु  में आलू की फसल तैयार होने पर, यहां पिछेता झुलसा रोग लगने की सम्भावना  बहुत अधिक होती है। अतः सफलतापूर्वक    आलू   की खेती के लिए ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में फसल को इस रोग से बचाना जरूरी होता है।

 

उत्तर पश्चिम पहाड़ों में आलू के लिए विभिन्न जलवायु क्षेत्र व फसल का समय

उत्तर पश्चिम के हर पहाड़ी क्षेत्र जैसे कि निचले, मध्यम, ऊंचे और अधिक ऊंचे क्षेत्रों में आलू सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

  1. निचले पहाड़ी क्षेत्रः

    इसमें समुद्र तल से 300 से 1000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्र आते हैं। यहां फसल उगाने का समय लगभग मैदानी इलाकों जैसा ही होता है। फसल की बीजाई सितम्बर अन्त से शुरू होकर जनवरी तक चलती रहती है। परन्तु मुख्य फसल अक्तूबर में बीजकर जनवरी-फरवरी में खोदी जाती है। इन क्षेत्रों के लिए आलू की उपयुक्त किस्में भी मैदानी इलाकों वाली ही हैं।

  2. मध्यम पहाड़ी क्षेत्रः  

    इसमें समुद्र तल से 1000 मीटर से 1800 मीटर की  ऊंचाई  वाले  क्षेत्र  आते  हैं।  यहां  पर  आलू  की  फसल  मुख्यतः  जनवरी-फरवरी में बीजाई करके      मई-जून में खोदी जाती है। पपपद्ध     ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रः समुद्र तल से 1800 मीटर से लेकर 3000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्र ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र में आते हैं। इसमें हिमाचल प्रदेश का जिला शिमला मुख्य है। यहां फसल का समय मार्च-अप्रैल से अगस्त-सितम्बर तक रहता है। इस इलाके का आलू बीज आलू के लिए उपयुक्त माना जाता है।

  3. अधिक ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रः

    अधिक ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र, जहां आलू उगाया जा सकता है, समुद्र तल से 3000 मीटर से लेकर 4000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश का लाहौल-स्पिति, किन्नौर, पांगी व भरमौर क्षेत्र मुख्य हैं। यहां आलू की फसल अप्रैल-मई में बीजाई करके सितम्बर-अक्तूबर में खोदी जाती है। यह क्षेत्र बीज आलू उत्पादन के लिए अति श्रेष्ठ माना जाता है। इस क्षेत्र में वर्षा न होने से आलू में पिछेता झुलसा रोग नहीं लगता है।

 

भोज्य आलू की उत्पादन तकनीक

पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त आलू किस्में

निचले पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर (जहां मैदानी क्षेत्रों की आलू किस्में उपयुक्त हैं) बाकी सभी स्तर के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान द्वारा निम्नलिखित किस्मों को उगाने की सिफारिश की जाती है

 

  1. कुफरी ज्योतिः

    पहाड़ों में यह आलू की सबसे महत्वपूर्ण व लोकप्रिय किस्म है और हर पहाड़ी क्षेत्र में उगाई जाती है। परन्तु पिछेता झुलसा रोग से संवेदनशील    होने के कारण ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में इसे इस रोग से विशेषतः बचाना पड़ता है।

  2. कुफरी चन्द्रमुखीः 

    पिछेता झुलसा रोग संवेदनशील होने के कारण इस किस्म को ठण्डे मरूस्थल इलाकों जैसे लाहौल-स्पिति, किन्नौर,पांगी, भरमौर में सफलतापर्वूक उगाया जा सकता है। अन्यथा ऐसे क्षेत्र जहां फसल बरसात के मौसम से पहले तैयार हो सके, वहां भी कुफरी चन्द्रमुखी की खेती की जा सकती है।

  3. कुफरी हिमालिनी और कुफरी गिरधारीः

    ये दोनों पिछेता झुलसा  रोग के लिए प्रतिरोधी आलू की  नई किस्में हैं। ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में  आलू की फसल    पर पिछेता झुलसा का अधिक प्रकोप रहता है, वहां पर इन दोनों किस्मों को उगाने की सिफारिश की जाती है। इन किस्मों को  लगाकर किसान आलू का अच्छा उत्पादन बिना किसी फफूंदनाशक के उपयोग से पा सकता है।

  1. कुफरी शैलजाः

    यह किस्म आलू के ज्यादा व एक आकार के कन्द पैदा करती है। कन्द ज्यादा मोटे नहीं बनते और इनमें फटने की सम्भावना न के बराबर होती है। परन्तु इस किस्म को भी पिछेता झुलसा रोग से बचाना पड़ता है।

 

बीज स्रोत व गुण

आलू की अच्छी उपज पाने के लिए आलू का बीज विश्वसनीय स्रोत जैसे कि सरकारी कृषि या बागवानी विभाग से लेना चाहिए। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश के ऊंचे व अधिक ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों जैसे कि जिला शिमला, लाहौल-स्पिति, चम्बा, मण्डी, कुल्लू के ऊंचे क्षेत्रों के नामी किसानों से प्राप्त करना चाहिए। सुनिश्चित करना चाहिए कि बीज रोग रहित हो व उपयुक्त किस्म का हो। बुआई के समय बीज 3-4 माह पुराना होना चाहिए व अंकुरण के लिए तैयार होना चाहिए।

कुछ मात्रा में आलू का अति छोटे आकार का व कटा-फटा बीज किसानों के लिए केन्द्रीय आलू अनुसंधान केन्द्र, कुफरी में भी उपलब्ध हो जाता है। हर 3-4 वर्ष बाद बीज बदल लेना चाहिए।

 

बीज आकार व मात्रा

आलू के बीज के लिए कन्दों का उपयुक्त आकार 35-50 ग्राम है। परन्तु इससे थोड़े छोटे व बड़े आकार के कन्दों को भी उचित दूरी रखते हुए बीज के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। बड़े बीज कन्द जो कि 80 ग्राम या इससे बड़े आकार के हों, को दो या ज्यादा टुकड़ों में काटकर भी उपयोग में लाया जा सकता है। बीज की मात्रा मध्यम आकार (35-50 ग्राम) के बीज कन्दों के साथ प्रति बीघा 2.0-2.5 क्विंटल यानि 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहती है।

 

बीज आलू की तैयारी

बुआई से पहले बीज आलुओं को अंकुरित करना चाहिए। इसके लिए लगभग बुआई से 15-20 दिन पहले बीज आलुओं को बोरियों से निकालकर हवादार कमरे में विसरित रोशनी में फैला देना चाहिए। इससे अंकुर ज्यादा, हरे रंग के व मजबूत बनते हैं। अंकुरित बीज, फसल के जल्दी व एक समान जमाव में काफी सहायक होते हैं। इसके अलावा खरपतवार नियंत्रण, फसल का जल्दी पकना और ज्यादा संख्या में बीज आकारीय कन्दों के साथ अधिक उपज भी अंकुरित बीज लगाने पर मिलती है। गले-सड़े व बिना अंकुर के बीज को बुआई से पहले अलग करके गड्ढे में फैंक दें। अच्छे अंकुरित बीजों को टोकरी या किल्टे में भरकर सावधानीपूर्वक खेत में ले जांए ताकि अंकुर टूटने से बच सकें।

 

खेत का चयन

आलू बलुई या बलुई दोमट मिट्टी में अच्छा उगता है। ऐसी मिट्टी पौधे की जड़ों और नए कन्दों के विकास में सहायक होती हैं। आलू के लिए खेत अच्छा व उपजाऊ होना चाहिए। खेत ज्यादा ढलानदार, पथरीला व अधिक छायादार नहीं होना चाहिए। आलू वाले खेत में 2-3 वर्ष का फसल चक्र (गेहूं, जौ, मक्का इत्यादि) अपनाना अच्छा रहता है। जिस खेत में पिछले साल आलू उगाया गया हो उसमें दूसरे वर्ष आलू लगाने से परहेज करें। फसल चक्र अपनाने से जहां मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है वहीं दूसरी ओर आलू का अधिक उत्पादन भी मिलता है।

 

खेत की तैयारी, खाद व उर्वरक

आलू लगाने से पहले कम से कम खेत को तीन बार जोत लें व पाटा लगाएं ताकि मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी हो जाए। आलू के लिए गोबर की अच्छी गली-सड़ी खाद 20-25 क्विंटल/बीघा या 250-300 क्विंटल/हेक्टेयर क्षेत्र में मिलाना उचित रहेगा। गोबर की खाद की आधी मात्रा पिछली मुख्य फसल की कटाई के उपरान्त खेत में डालकर हल चलाकर अच्छी तरह मिट्टी में मिलाएं। शेष आधी मात्रा फसल की बीजाई के समय डालें।

इसके अलावा बीजाई के समय प्रति हेक्टेयर 100-120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन (4.0-4.8 क्विंटल कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट), 100 कि.ग्रा. फास्फेट (6.25 क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट) तथा 100 कि.ग्रा. पोटाश (1.65 क्विंटल म्यूरेट ऑफ पोटाश) का प्रयोग करें। प्रति बीघा क्षेत्र के लिए 32 कि.ग्रा.कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, 50 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 13.5 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश का प्रयोग करें। अगर गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर 25-30 टन की दर से मिलाई गई हो तो फास्फेट व पोटाश की आधी मात्रा ही प्रयोग करें।

नाइट्रोजन का प्रयोग दो बार में करना चाहिए, पहले बीजाई के समय 100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से जबकि शेष 20 कि.ग्रा. मिट्टी चढ़ाते समय (जब पौधे 20-25 सैं.मी. ऊंचे हों) डालना अधिक लाभकारी है। इसके लिए प्रति हेक्टेयर 80 कि.ग्रा. कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट या 45 कि.ग्रा. यूरिया का प्रयोग करें। यह मात्रा प्रति बीघा क्षेत्र के लिए क्रमशः 6.5 कि.ग्रा. या 3.6 कि.ग्रा. हैं। बीजाई पूर्व इन तीनों उर्वरकों को (100 कि.ग्रा. प्रत्येक प्रति हेक्टेयर के हिसाब से) अच्छी तरह मिलाकर रख लें।

 

बीजाई का तरीका

खेत में चार मीटर चौड़ी क्यारियां बनाएं। प्रत्येक क्यारी के बाद 50 सैं.मी.चौड़ी नाली पानी की निकासी के लिए बनाएं ताकि क्यारियों में बरसाती पानी ज्यादा देर तक न रूके। क्यारियों में ढलान के विपरीत दिशा में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सैं.मी. रखते हुए नालियां बनाएं।

इनमें गोबर की खाद व रसायनिक खाद डालें। बीज आलू को लगाने से पूर्व उर्वरकों को मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें ताकि अंकुरों को किसी भी दुष्प्रभाव से बचाया जा सके। मिट्टी, खाद व उर्वरकों को बहने से बचाने में ढलान के विपरीत दिशा में मेड़ें काफी सहायक होती हैं। 35-50 ग्राम भार वाले बीज कन्दों को 20-25 सैं.मी. की दूरी पर रखते हुए बीजाई करें। इससे छोटे कन्दों को 15 सैं.मी. व थोड़े बड़े बीज कन्दों को 30 सैं.मी. दूरी पर रखना चाहिए। बीजाई के तुरन्त बाद कन्दों को 10-15 सैं.मी. ऊंची मेड़ें बनाकर मिट्टी से ढक दें।

 

बीज को काटकर लगाने की विधि

यदि बीज कन्द 80 ग्राम या इससे बड़े आकार के हों तो उन्हें काटकर लगाया जा सकता है। बीज की कटाई का काम बीजाई से कम से कम दो दिन पहले पूरा हो जाना चाहिए। बीज कन्दों को ऊपरी हिस्से (अंकुर निकलने वाले किनारे) से अंकुरों को बचाते हुए नीचे की ओर काटें (चित्र-1)। यह सुनिश्चित करें कि हर कटे हुए भाग का भार कम से कम 35-40 ग्राम हो व इसमें कम से कम दो अंकुर या आंखें हों। कटे बीज कन्दों को तुरन्त 0.2 प्रतिशत मैंकोज़ेब के घोल में 10 मिनट तक डुबोने के बाद छायादार व हवादार जगह में पतला करके फैला दें। बीच-बीच में पल्टी (उल्टा-सुल्टा) करते रहें। ऐसा करने पर एक-दो दिनों में कटी सतह पर पपड़ी जम जाएगी। ऐसा बीज खेत में लगाने पर कम सड़ता है।

 

अन्य कृषि क्रियाएं

आलू बीजाई के बाद और फसल जमाव से पहले अगर तेज़ बारिश हो जाए तो जमी हुई पपड़ी को गुड़ाई करके या कांटे से तोड़ना चाहिए। ऐसा करने पर खरपतवार नियंत्रण और फसल के एक समान जमाव में सहायता मिलती है। अगर खेत में खरतपवार उग आए तो जब पौधे 10-15 सैं.मी.ऊंचे हो जाएं तो खरपतवार निकालने का कार्य करें।

यदि मजदूरों की समस्या हो तो खरपतवार नाशक दवाइयों का उपयोग भी किया जा सकता है। इसके लिए आलू की बीजाई के बाद व खरपतवार तथा आलू पौधों के उगने से पहले एट्राजीन या सिमाजीन या 2,4-डी (40 ग्राम प्रति बीघा में) या आइसोप्रोटूरोन या मेट्रीब्यूजिन (70 ग्राम प्रति बीघा की दर से) बीजाई के बाद 5-7 दिन के अन्दर 50-60 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। फसल 6-8 सप्ताह की हो जाने पर व मिट्टी में उचित नमी के रहते आखिरी मिट्टी चढ़ाने के साथ-साथ 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से भी खेत में डाल दें।

 

आलू की खुदाई, वर्गीकरण व विपणन

जैसे ही आलू की फसल तैयार हो जाए, इसकी खुदाई के बारे में फैसला कई बातों को ध्यान में रखकर लेना चाहिए। खुदाई से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि कन्दों का आकार उचित है या नहीं, और छिलका बहुत कच्चा नहीं होना चाहिए। उचित कन्द आकार बन जाने पर किसान मण्डी की स्थिति को ध्यान में रखकर कच्चे छिलके वाले आलुओं को भी खोदकर अच्छा लाभ पा सकते हैं। यदि फसल को खुदाई उपरान्त कुछ समय रखकर बेचना हो या थोड़े समय का भण्डारण हो तो छिलके का मजबूत होना जरूरी होता है।

आलू कन्द को हाथ में पकड़कर अंगूठे की रगड़ से छिलके की स्थिति का ज्ञान किया जा सकता है। छिलका मजबूत करने के लिए पौधे के डण्ठलों को खुदाई से कम से कम 15-20 दिन पहले काट दें। खुदाई उपरान्त कटे-सड़े आलुओं को छांटकर अलग कर दें। आलुओं को ठण्डी व छायादार जगह में बोरों में भरकर रखें ताकि आलू हरे न होने पाएं। विपणन से पहले आलुओं का वर्गीकरण कर लें। वर्गीकृत

आलुओं के विपणन से अच्छा दाम मिलता है। इसके लिए 3-4 वर्ग बना लें जैसे कि- मोटे ;झ150 ग्राण्द्धए मध्यम ;80.125 ग्रामद्धए छोटे ;25.80 ग्रामद्ध व अधिक छोटे ;25 ग्रामद्ध।

 

पौध संरक्षण

बीमारियां

पहाड़ी क्षेत्र में आलू में कई किस्म की बीमारियां लगती हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बीमारी पिछेता झुलसा रोग है। इसके अलावा अगेता झुलसा, फोमा इत्यादि भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। पिछेता झुलसा से बचाव के लिए आलू की प्रतिरोधी किस्में जैसे कि कुफरी हिमालिनी व कुफरी गिरधारी लगानी चाहिए। अगर हो सके तो बीजाई थोड़ी अगेती करें ताकि भरपूर बरसात शुरू होने तक आलू बन जाएं। इसके अलावा बरसात शुरू होने से पहले 0.25 प्रतिशत मैंकोजेब का छिड़काव ऊपर लिखित सभी बीमारियों से बचाव के लिए काफी हद तक लाभकारी सिद्ध होता है। यदि पिछेता झुलसा संवेदनशील किस्में उगाई गई हों तो लगातार 2 दिन धुन्ध व बारिश का मौसम रहने पर पिछेता झुलसा आने की संभावना हो जाती है। ऐसी स्थिति में समय मिलते ही सर्वांगी फफूंदनाशक जैसे कि साइमोक्सानिल 8% +मैंकोज़ेब (64%) का 0.3 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें।

छिड़काव करते समय पौधों के निचले पत्तों का भीगना भी सुनिश्चित करना जरूरी है। सर्वांगी फफूंदनाशक के छिड़काव के लिए उसमें 0.1 प्रतिशत चिपचिपा पदार्थ (स्टिकर) जैसे ट्राइटोन, वैटोल इत्यादि मिला लें ताकि फफूंदनाशकों का असर अधिक देर तक बना रहे।

मौसम लगातार खराब रहने पर फफूंदनाशकों का छिड़काव 5-7 दिनों बाद दोहराते रहें। लेकिन फफूंदनाशक दवाइयों को बदल-बदल कर उपयोग करें। मैंकोज़ेब, मैंकोजेब (64%) + मेटालेक्सिल (8%) और फिनामिडोन(10%) मैंकोजेब (50%) नामक फफूंदनाशकों का 0.25 प्रतिशत छिड़काव चक्र में अपनाया जा सकता है। फफूंदनाशकों के छिड़काव के लिए प्रति हेक्टेयर 800.1000 लीटर व प्रति बीघा 70.80 लीटर दवाई का घोल उचित रहता है।

इसके अलावा मिट्टी व बीज कन्द जनित रोग जैसे कि भूरा गलन (मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में), साधारण खुरण्ड, चूर्णी खुरण्ड, काली रूसी इत्यादि भी आलू को नुकसान पहुंचाते हैं। इनसे बचाव के लिए हमेशा स्वस्थ बीज का प्रयोग करें, 2-3 वर्षीय फसल चक्र जैसे- मक्का, गेहूं, जौ, प्याज, लहसुन और फूलगोभी इत्यादि के साथ अपनाएं व उपचारित बीज आलू का प्रयोग करें। पिछली फसल की कटाई के उपरान्त बचे हुए ठूंठ/तने व पत्तियों को खेत में जलाएं। मिट्टी व कन्द जनित रोगों से बचाव के लिए कटे हुए बीज कन्दों का प्रयोग न करें।

कीट

पहाड़ी क्षेत्रों में आलू को सफेद सुण्डी (व्हाइट ग्रब) बहुत नुकसान पहुंचाती है। यह कीट फसल तैयार होने के समय नए बने कन्दों में बड़े-बड़े छेद कर देती हैं। इसके अलावा आलू की बीजाई के बाद लगातार गर्म व शुष्क मौसम बने रहने पर कटुआ कीट भी नए उगते पौधों को मिट्टी की सतह पर काट देता है। सफेद सुण्डी से बचाव के लिए सर्दियों से पहले खेत की गहरी जुताई, खेत के आसपास झाड़ियों की सफाई, आलू में मिट्टी चढ़ाते समय फोरेट 10जी (2 कि.ग्रा./बीघा) या कार्बोफ्यूरान 3जी (5 कि.ग्रा./बीघा) की दर से मिट्टी में मिलाएं या क्लोरपाइरिफॉस (20 ई.सी.) 200 मि.ली. प्रति बीघा की दर से मेड़ों पर छिड़काव करें या रेत में मिलाकर डालें।

कटुआ कीट  का प्रकोप यदि  75 प्रतिशत  पौध  निर्गमन  होने  पर  2 प्रतिशत  से  अधिक  दिखाई  दे तो क्लोरपाइरिफॉस  (20  ई.सी.)  2.5 लीटर प्रति हेक्टेयर 1000-1200 लीटर पानी में या 200 मि.ली. 80-100 लीटर पानी में मिलाकर मेड़ों को अच्छी तरह तर भिगो दें। पत्ती भक्षक कीटों से फसल को बचाने के लिए आवश्यकतानुसार कार्बारिल (50 प्रतिशत डब्ल्यू पी.) या क्लोरपाइरिफॉस (20 ई.सी.) की क्रमशः 160 ग्राम या 200 मि.ली.मात्रा 80-100 लीटर पानी में घोलकर प्रति बीघा छिड़काव करें। कोशिश करें कि भोज्य आलुओं में कम से कम दवाइयों का प्रयोग हो व प्रत्येक दवाई के प्रयोग के बाद 15-20 दिन आलुओं को खाने में प्रयोग न करें।

आलू कन्द शलभ (पीटीएम) से बचाव के लिए सदैव कीट रहित बीज आलू का प्रयोग करें, बीज की बुआई गहरी करें, खेत से बाहर दिख रहे कन्दों को मिट्टी से ढक दें तथा नियमित रूप से सिंचाई करते रहें ताकि मिट्टी में दरारें न पड़ें। 30 दिन की आलू फसल पर 1.5 लीटर मोनोक्रोटोफॉस प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

 

 बीज आलू उत्पादन तकनीक

आलू की खेती में बीज एक बहुत ही महत्वपूर्ण लागत है। फसल उत्पादन की कुल लागत का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बीज आलू का ही होता है। इसका मुख्य कारण आलू का मुख्यतः वनस्पतिक संवर्धक फसल होना है। अतः आलू का बीज भी मुख्यतः आलू कन्द ही होते हैं। इस कारण बीज आलू के रोगों द्वारा ग्रसित होने की आशंका ज्यादा बनी रहती है। आलू में विभिन्न प्रकार के रोग (मुख्यतः विषाणु रोग) लगते हैं और साल दर साल बीज नहीं बदलने पर इनका प्रकोप बढ़ता चला जाता है। ऐसे रोग ग्रस्त बीज कन्दों के उपयोग करने पर पौधे अच्छा खाद, पानी व सस्य क्रियाएं करने पर भी ठिगने रह जाते हैं और बहुत कम उत्पादन देते हैं।

अतः आलू का अच्छा उत्पादन पाने के लिए बीज आलू उच्च गुणवत्ता का होना चाहिए। उच्च गुणवत्ता से यहां अभिप्राय उस बीज से है जो स्वस्थ्य (रोग रहित) हो व उसमें दूसरी किस्मों का मिश्रण न हो। ऐसे बीज आलू की उत्पादन तकनीक इस प्रसार पुस्तिका के माध्यम से किसानों को उपलब्ध कराई जा रही है।

 

पहाड़ी क्षेत्रों में बीज आलू उत्पादन की प्रमुख समस्याएं

पहाड़ी क्षेत्रों में बीज आलू मुख्यतः हिमाचल प्रदेश के ऊंचे व अधिक ऊंचे (2300 मीटर या अधिक) क्षेत्रों में उगाया जाता है। यहां बीज आलू की फसल अप्रैल माह से लेकर अगस्त तक उगाई जाती है। बीज आलू उत्पादन में किसानों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता हैः

 

  1. बीज आलू की फसल उगाने के लिए उपयुक्त स्तर (प्रमाणित या आधार स्तर) का बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना।
  2. रोगी पौधों की पहचान व इनकी निकासी के महत्व का ज्ञान न होना।
  3. मुख्य सस्य क्रियाओं जैसे बीजाई तकनीक व डण्ठल काटने के महत्व का ज्ञान न होना
  4. विभिन्न आलू किस्मों के पौधों की पहचान न होना।
  5. उपयुक्त समय पर खादों का उपलब्ध न होना।
  6. पौध संरक्षण के लिए रसायन व अन्य सामान स्प्रे पंप वगैरह का न होना।
  7. ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पिछेता झुलसा से फसल को बचाना और इस रोग के लिए आलू की प्रतिरोधी किस्मों का बीज उपलब्ध न होना।

 

बीज आलू उगाने के लिए उपयुक्त क्षेत्र

सभी पर्वतीय क्षेत्र बीज आलू उगाने के लिए उपयुक्त नहीं होते। केवल वही क्षेत्र जहां कोई गम्भीर मिट्टी जनित रोग जैसे भूरा गलन, साधारण खुरण्ड व जड़ ग्रन्थि कीट न हो और विषाणु रोग फैलाने वाले कीट (मांहू) भी फसलावधि में कम हों, बीज आलू उगाने के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। अतः केवल हिमाचल प्रदेश के ऊंचे व अधिक ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र जो समुद्र तल से 7000 फीट या 2300 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित हैं, सभी स्तर के बीज आलू उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं।

इनमें मुख्यतः जिला शिमला, चम्बा, मण्डी व कुल्लू के कुछ भाग व लाहौल स्पिति तथा किन्नौर जिला प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों की जलवायु आर्द्र तथा निम्न तापमान होने के कारण विषाणु रोग फैलाने वाले एफिड (मांहू) कीट की संख्या फसल अवधि के दौरान बहुत कम या न के बराबर होती है जिससे कुदरती तौर पर इन क्षेत्रों के आलू में विषाणु रोगों का प्रभाव बहुत कम होता है। उत्तराखण्ड व जम्मू कश्मीर राज्यों के 7000 फीट या इससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र आधार व प्रमाणित स्तर के बीज आलू की खेती के लिए उपयुक्त हैं।

 

बीज आलू उत्पादन के लिए प्रमुख किस्में

वे सभी आलू किस्में जो भोज्य आलू उत्पादन के लिए उत्तर पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्रों के लिए संस्तुत हैं, बीज आलू उत्पादन के लिए भी सफलतापर्वूक उगाई जा सकती है। हिमाचल प्रदेश क ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों (2300 मीटर से 3000 मीटर तक) में मुख्यतः पिछेता झुलसा प्रतिरोधी किस्में उगाई जानी चाहिए क्योंकि इन क्षेत्रों में भारी बरसात होने के कारण पिछेता झुलसा रोग से आलू की फसल तबाह होने की संभावना रहती है। अतः नई पिछेता झुलसा रोग प्रतिरोधी किस्में जैसे कुफरी हिमालिनी व कुफरी गिरधारी

किस्मों को उगाने में अधिमान दें। अन्यथा रसायनों के प्रयोग से दूसरी आलू की किस्मों जो कि पिछेता झुलसा संवेदनशील हैं जैसे कि कुफरी ज्योति, कुफरी गिरिराज व कुफरी शैलजा का बीज भी उगाया जा सकता है।

अधिक ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों (3000 मीटर से ऊंचाई वाले) जैसे कि लाहौल-स्पिति, पांगी, भरमौर व किन्नौर में पिछेता झुलसा संवेदनशील किस्मों जैसे कि कुफरी चन्द्रमुखी व कुफरी ज्योति को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है क्योंकि बरसात न होने के कारण यहां यह रोग नहीं पनपता है।

 

बीज स्रोत व आकार

बीज आलू की फसल के लिए उपयुक्त बीज प्रमाणित या आधार या प्रजनक स्तर का होना चाहिए। बीज हमेशा विश्वसनीय स्रोतों जैसे कि कृषि विभाग, हिमाचल प्रदेश से प्राप्त करें। हर वर्ष बीज नया लगाना चाहिए।

इसकी फसल के लिए बीज कन्दों को कभी भी काटकर नहीं लगाना चाहिए। इससे विषाणु रोगों के फैलने का डर होता है। इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि बीज कन्दों का आकार 35-50 ग्राम तक हो। परन्तु इससे थोड़े बड़े या छोटे आकार के कन्दों को कन्द से कन्द की दूरी को व्यवस्थित करते हुए उपयोग में लाया जा सकता है।

 

बीज की तैयारी

बीज कन्दों को अंकुरित करके ही बीजाई करनी चाहिए। अंकुरित कन्द लगाने पर पौधों की बढ़वार समान रूप से व अच्छी होती है। इससे प्रति पौधा तने भी अधिक निकलते हैं जिनसे पैदावार अधिक होने के साथ-साथ बीज आकारीय कन्दों की संख्या भी ज्यादा मिलती है।

पिछली फसल से प्राप्त अंकुर रहित बीज कन्दों को बुआई से 15-20 दिन पहले किसी हवादार, छायादार व विसरित प्रकाश वाली जगह पर पतला करके फैला दें। इससे कन्दों में उपयुक्त हरे, मोटे व ज्यादा अंकुर निकलेंगे। अंकुरित कन्दों को सावधानीपूर्वक टोकरी या किल्टे में भरकर खेत में ले जाएं ताकि कम से कम अंकुर टूटें।

 

खेत का चुनाव

बीज आलू उगाने के लिए 2-3 वर्षीय फसल चक्र अपनाना जरूरी है। ऐसा करने पर मिट्टी जनित रोगों से काफी हद तक छुटकारा मिल जाता है। खेत ज्यादा उपजाऊ दोमट या बलुई दोमट मिट्टी वाला होना चाहिए। ज्यादा ढलानदार व छायादार जगह पर आलू न उगाएं।

 

खेत की तैयारी

अच्छी गली-सड़ी गोबर की खाद 25-30 टन प्रति हेक्टेयर (2-2.5 टन प्रति बीघा) की दर से खेत में डालें। इसकी आधी मात्रा पिछली मुख्य फसल की कटाई उपरान्त खेत में डालकर हल चला दें तथा शेष आधी मात्रा आलू बीजाई के समय डालें।

बीजाई से पहले 2-3 बार हल लगाकर पाटा दें और मिट्टी को अच्छा भुरभुरा बना लें। प्रति हेक्टेयर 100-120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन (4.0-4.8 क्विंटल कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट) 100 कि.ग्रा. फास्फेट (6.25 क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट) तथा 100 कि.ग्रा. पोटाश (1.65 क्विंटल म्यूरेट ऑफ पोटाश) का प्रयोग करें। प्रति बीघा इन तीनों खादों को 8-10 कि.ग्रा.नाइट्रोजन (32-40 कि.ग्रा. कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट), 8.0 कि.ग्रा. फास्फेट (50 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट) व 8 कि.ग्रा. पोटाश (13.5 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश) की दर से प्रयोग करें।

जहां खेती के लिए सिंचाई की व्यवस्था है वहां नाइट्रोजन की मात्रा थोड़ी ज्यादा यानि 12-15 कि.ग्रा.(50-60 कि.ग्रा. कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट) प्रति बीघा की दर से प्रयोग की जा सकती है। यदि गोबर की खाद 25-30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से डाली गई हो तो फास्फेट व पोटाश की आधी मात्रा का प्रयोग करें। नाइट्रोजन का प्रयोग फसल में दो बार करें। पहले बीजाई के समय 100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर व दूसरा मिट्टी चढ़ाते समय 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से करना अधिक लाभकारी है। तीनों रसायनिक खादों का बीजाई पूर्व उचित मात्रा में मिश्रण बना लें।

 

बीजाई का समय

बीज आलू की फसल की बीजाई ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों (2300-3000 मीटर की ऊंचाई वाले) में अप्रैल के दूसरे व तीसरे सप्ताह में करें जबकि अधिक ऊंचे (3000 मीटर से अधिक) क्षेत्रों में बीजाई का कार्य मई के पहले पखवाड़े में करें।

 

बीजाई का तरीका

खेत में चार-चार मीटर लम्बी क्यारियां बनाएं। हर क्यारी के बाद बरसाती पानी की निकासी के लिए 50 सैं.मी. चौड़ी नाली बनाएं। ढलान के विपरीत दिशा में 60 सैं.मी. की दूरी पर हल्की नालियां खोदें। उपयुक्त दर से गोबर की खाद व रसायनिक खादों के मिश्रण को इन नालियों में फैला दें व हल्का सा मिट्टी में मिला दें ताकि बीज अंकुर का सीधा स्पर्श रसायनिक खादों से न होने पाए। अंकुरित (35-50 ग्राम) बीज कन्दों को 20-25 सैं.मी. की दूरी पर रखते हुए खिलने (एक पहाड़ी औजार) की सहायता से बीजाई करें। इससे छोटे आकार के कन्दों को कम तथा बड़े कन्दों को थोड़ी ज्यादा दूरी पर लगाएं। बीजाई के तुरन्त बाद कन्दों को 10-15 सैं.मी. ऊंची मेड़ें बनाकर मिट्टी से ढक दें।

 

अन्य कृषि क्रियाएं

बीजाई उपरान्त 40-50 दिनों के भीतर समस्त कृषि क्रियाएं जैसे निराई-गुड़ाई व मिट्टी चढ़ाना इत्यादि कार्य पूरा कर लें ताकि फसल वृद्धि की अन्तिम अवस्था के दौरान फसल में अधिक छेड़छाड़ न करनी पड़े। मिट्टी चढ़ाते समय नाइट्रोजन की शेष मात्रा (20 कि.ग्रा. यानि 80 कि.ग्रा.कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट या 45 कि.ग्रा. यूरिया) प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करें।

 

रोगी पौधों की निकासी

बीज आलू की फसल में रोगी पौधों की पहचान व इनकी निकासी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। यह क्रिया रोग रहित बीज आलू उत्पादन के लिए अति आवश्यक है। इसके लिए फसलावधि के दौरान कम से कम तीन बार फसल की जांच करनी चाहिए। पहली जांच बीजाई के 50-55 दिन पर (पौधे 10-15 सैं.मी. ऊंचे होने पर), दूसरी 70-75 दिन पर (फूल आने पर) तथा तीसरी 100-105 दिन बाद (फसल पकने के समय) करनी चाहिए। जांच के दौरान मोज़ाइक (चित्ती), बैंगनी ऊपरी पत्ती मोड़क (पर्पल टॉप रोल), पत्ती मोड़क (लीफ रोल) व अन्य ऐसे पौधे जिनमें विषाणु रोग होने का शक हो, को नए बने आलू कन्दों व मादा कन्द सहित निकाल दें व गड्ढे में दबा दें। इसके अलावा दूसरी किस्म के पौधे (जिनमें अन्य रंग के फूल हों) को भी आलुओं सहित निकाल दें।

 

पौध संरक्षण

बीमारियां

बीज आलू फसल में बीमारियों की रोकथाम के लिए भोज्य आलू उत्पादन में दी गई तकनीकी को अपनाएं।

कीट

विषाणु रोगों को बीज आलू की फसल में फैलने से बचाने के लिए वाहक कीटों (मांहू) व अन्य रस चूसक कीटों की रोकथाम बहुत आवश्यक है। इसके लिए मिट्टी चढ़ाते (दूसरी गुड़ाई) समय फोरेट 10जी के दानों को 2 कि.ग्रा. प्रति बीघा की दर से मिट्टी में मिला दें। इसके बाद परहेज के लिए सर्वांगी कीट नाशक दवाइयां जैसे एमीडाक्लोप्रिड (3 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी के हिसाब से) या रोगोर (1 मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से) हर 12-15 दिनों में अदल-बदल कर छिड़काव करते रहें।

अन्य सभी प्रकार के कीटों की रोकथाम के लिए भोज्य आलू उत्पादन में दी गई तकनीकी को अपनाएं।

 

तना/डण्ठल काटना

अगस्त महीने के दूसरे सप्ताह में जब फसल पकनी शुरू हो जाए आलू पौधों के डण्ठल काट दें। बीज आलू फसल में डण्ठल काटना इसलिए आवश्यक है क्योंकि इस समय मांहू (एफिड) की संख्या बढ़ने की संभावना रहती है जिनसे विषाणु रोग फैल सकते हैं। समय पर डण्ठल काटने पर स्वस्थ बीज आलू उत्पादन सुनिश्चित होता है। इसके अलावा आलू कन्दों की बढ़ोतरी भी रूक जाती है जिससे कन्दों के आकार बहुत बड़े होने व कन्दों के फटने की समस्या भी काफी कम हो जाती है। डण्ठल काटने के उपरान्त आलू कन्दों का छिलका भी जल्दी मजबूत हो जाता है।

डण्ठलों को काटने के उपरान्त बचे हुए ठूंठों की दोबारा वृद्धि नहीं होनी चाहिए क्योंकि ऐसे ठूंठों पर नई निकली कोमल व सरस पत्तियों पर मांहू ज्यादा आकर्षित होते हैं। इसलिए डण्ठल काटने के उपरान्त बचे ठूंठों पर ग्रैमोक्सोन (पैराक्वैट डाइक्लोराइड) नामक दवाई 2.5-3.0 लीटर प्रति हेक्टेयर 800-1000 लीटर पानी में या 200-250 मि.ली. या 75-80 लीटर पानी में प्रति बीघा की दर से छिड़काव करें। छिड़काव से पहले मिट्टी से बाहर निकले कन्दों को ढक लें व छिड़काव धूप वाले दिन करें।

 

बीज आलू की खुदाई व वर्गीकरण

डण्ठल काटने के उपरान्त 15-20 दिन बाद आलू कन्दों का छिलका मजबूत होने पर फसल की खुदाई करें। हाथ के अंगूठे की रगड़ से छिलके के कच्चा या पक्का होने की जांच की जा सकती है। अंगूठे की रगड़ से अगर छिलका निकल जाए तो खुदाई के लिए कुछ और दिन इन्तजार करना चाहिए। खुदाई ज्यादा गीले या ज्यादा सूखे खेत में न करें। खुदाई के उपरान्त आलुओं को ढेर में छायादार व हवादार जगह में रखें। कटे व सड़े आलुओं को छांटते हुए उपज को पांच वर्गों में वर्गीकृत करें, जैसे- सबसे छोटे (25 ग्राम से कम), छोटे (25-50 ग्राम), मध्यम (50-75 ग्राम), बड़े (75-100 ग्राम) व अधिक बड़े (100 ग्राम से अधिक)। आलुओं को उनके वर्ग के अनुसार अलग-अलग बोरियों या टोकरियों में भरें।

 

बीज उपचार

मिट्टी जनित रोगों को फैलने से बचाने के लिए बीज आलुओं का उपचार अति आवश्यक है। वर्गीकृत बीज आलुओं को सबसे पहले पानी में धोएं। इसके एक दम बाद बोरिक एसिड व्यवसायिक ग्रेड (3 प्रतिशत) के घोल में 25-30 मिनट तक डुबोकर उपचारित करें। यदि आलू ज्यादा गन्दे न हों तो इस घोल को 20 बार आलू उपचार के प्रयोग में लाया जा सकता है। उपचारित आलुओं को छाया में सुखाकर बोरों में भरकर जहर उपचारित व किस्म का लेबल लगा दें।

 

भण्डारण

उपचारित बीज आलूओं को बोरों के अन्दर भण्डार कक्ष में रखें। अंकुर फूटने के समय तक बीज आलुओं को बोरों में ही रखा जा सकता है। तत्पश्चात् फरवरी/मार्च महीने में बीज कन्दों को बोरों से पलटकर प्लास्टिक या लकड़ी की ट्रे या टोकरियों में 2-3 तह में बदलें। बीजाई से पूर्व इन बीज कन्दों को पतला करके विसरित रोशनी वाली जगह में फैलाएं। भण्डारण के दौरान जनवरी-फरवरी माह में बीज कन्दों को ज्यादा सर्दी के कारण हिम जमाव से बचाना जरूरी है। इसके लिए बीज आलुओं का समय-समय पर निरीक्षण करते रहें व ज्यादा सर्दी के समय भण्डार कक्ष के खिड़की, दरवाजों पर अन्दर की तरफ से थर्मोकोल लगाकर सर्दी से रोधन करें। ठण्डे मरूस्थल क्षेत्रों जैसे पांगी, भरमौर व लाहौल-स्पिति में ऊंची जगह पर गड्ढे में बीज आलू भण्डारण करने की तकनीक अपनाना भी उचित है।

 

Source-

  • Central Potato Research Institute

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