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ब्रोकोली उत्पादन से अधिक आय के अवसर – Kisan Suvidha
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ब्रोकोली उत्पादन से अधिक आय के अवसर

ब्रोकोली की खेती

ब्रोकोली उत्पादन से अधिक आय के अवसर

ब्रोकली एक गोभी वर्गीय विदेशी सब्जी है, इसकी खेती पहले विदेशों में ही की जाती थी किन्तु इसका प्रचार प्रसार तेजी से भारतीय जलवायु में उगाने पर हो रहा है। जिसका मुख्य कारण इसकी पाँच सितारा होटलो और सामान्य जन में बढ़ती माँग है, अपने उपयोगी पोषक तत्वो एवं आकर्षण के कारण इसकी बाजार में तीव्र माँग है और तेजी से इसका विपणन हो रहा है, किसान इसको उगाकर अधिक आय अर्जित कर सकते है।

ब्रोकली का वानस्पतिक नाम ब्रेसिका ओलिरेसिया जाति इटेलिका है, इसका पौधा देखने में फूलगोभी की भांती होता है जिसमे पुष्प कलिकाओं के असंख्यवार विभाजित होकर बने एक संगठित भाग कर्ड को खाते है। खाने योग्य भाग का रंग विभिन्न प्रजातियों में हरा, हल्का हरा एवं बैगनी होता है। इसकी उत्पत्ति दक्षिणी यूरोप में हुई एवं इसका प्रसार इटली से संपूर्ण विश्व में हुआ इसीलिए इसे यूरोपियन सब्जी या विदेशी सब्जी कहा जाता है। ब्रोकली उत्पादन में सबसे बड़ा देश संयुक्त राज्य अमरीका है।

 

पोषक महत्व

ब्रोकली का उपयोग सब्जी के अलावा सूप सलाद एवं अन्य व्यंजनों के बनाने मे भी किया जाता है। ब्रोकली में विटामिन्स, लवण, प्रोटीन्स, एन्टीआक्सीडेन्टस एवं रेशा प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है। इसमे ग्लूकोसिनोलेट्स भी पाये जाते है जिसके कारण ये कैंसर जैसी बीमारी को भी रोकने में सहायक है।

 

ब्रोकोली की उन्नतशील प्रजातियाँ

1. पालम समृद्धि:

यह प्रजाति हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वद्यिालय, पालमपुर से विकसित अगेती किस्म है। इसके कर्ड हरे रंग के, वजन 300-400 ग्राम तथा बुवाई के 85-90 दिन बाद कटाई योग्य तैयार हो जाते हैं। इसकी औसत उपज 150-200 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है।

2. पालम कंचन:

यह प्रजाति हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर से विकसित पछेती किस्म है। इसके पौधे लम्बे, पत्तियाँ बड़ी एवं नीलाभ रंग लिये है।कर्ड बड़ा सुगन्धित, हल्के पीले रंग का होता है। पौध रोपण के 140-145 दिन बाद कर्ड तैयार हो जाते हैं तथा 250-275 कुन्तल प्रति हेक्टेयर औसत उपज प्राप्त हो जाती है।

3. पूसा ब्रोकली के.टी.एस.:

इस प्रजाति भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केन्द्र, कटराईन (हिमाचल प्रदेश) से विकसित है। इस किस्म के पौधे मध्यम ऊँचाई (65-70 से.मी.) तथा फसल रोपण के 90-105 दिन बाद हरे रंग के कर्ड (250-400 ग्राम) कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। इसकी औसत उपज 165-180 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है।

4.गणेश ब्रोकली:

इस प्रजाति को महत्वपूर्ण किस्म के. टी.एस. से चयन के द्वारा विकसित किया गया है। इसके पौधे की ऊँचाई लगभग 55 से.मी. तक होती है।इसकी कर्ड की लंबाई 12-30 से.मी., और मोटाई भी करीब 12 से.मी. होती है, इसके कर्ड हरे रंग और भार लगभग 185 ग्रा. का होता है। यह किस्म पौध रोपण के करीब 40-45 दिन बाद तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 140-150 दिन के फसल अवधि मे करीब 300-400 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है।

5. ब्रोकली अर्ली ग्रीन:

यह प्रजाति भी प्रचलित किस्म के टी.एस.-1 से शेर ए काश्मीर विश्वविद्यालय जम्मू के द्वारा विकसित किया गया है। इस किस्म के कर्ड हरे रंग के होते है, जो पौधे रोपण के 75-80 दिन में तैयार हो जाते है। इस किस्म की उत्पादन क्षमता लगभग 350 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है।

6. पंजाब ब्रोकली प्रथम:

इस प्रजाति का विकास पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा हुआ है। इसके कर्ड गहरे हरे रंग के जिन पर निले रंग के निशान बने होते हैं तथा फसल कटाई योग्य 65-70 दिनो में हो जाती है। इसकी औसत उपज 150-200 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है।

 

जलवायु एवं भूमि

ब्रोकोली एक ठंडे मौसम की फसल है लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों मे बसन्तकालीन सब्जी के रूप में बहुतायत उगाया जाता है। इसकी खेती के लिए औसत तापमान 16-20 डिग्री सेन्टीग्रेड आवश्यक है, तापमान में वृद्धि होने से शीर्ष ढीले एवं भूरे होने लगते हैं। अच्छे जलनिकास वाली जीवांशयुक्त भूमि जिसका पीएच मान 5.0-6.5 हो उपयुक्त पायी गई है।

 

बीज दर एवं बुवाई का समय

एक हेक्टर क्षेत्र में रोपण के लिए 300-400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में अगस्त से अक्टूबर तथा पर्वतीय क्षेत्रों में मार्च एवं जुलाई-अगस्त में बीज की बुवाई की जाती है।

 

नर्सरी की तैयारी

उचित आकार (एक मीटर चैड़ी व आवश्यकतानुसार लम्बी) की 15-20 से.मी. ऊँची उठी क्यारियों में उपचारित बीज को 8-10 से.मी. की दूरी पर बनी लाइनों में 5 से.मी. दूरी पर बुवाई करके सड़ी गोबर की खाद या लीफ मोल्ड से ढक कर फौव्वारे से हल्की सिंचाई करें तथा क्यारियों को घास-फूस या पुआल से ढक दें। बीज अंकुरण के उपरान्त घास-फूस को हटा देते हैं। सामान्यता 70-80 वर्गमीटर क्षेत्र एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में पौधे रोपण के लिए पार्यप्त होता है।

 

खाद एवं उर्वरक

ब्रोकोली की भरपूर पैदावार लेने के लिए 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद, 150-200 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 80-120 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 100-150 कि.ग्रा. पोटाश तत्व के रूप में प्रति हेक्टयर देनी चाहिए। भूमि परीक्षणोपरान्त यदि मोलिब्डेनम एवं बोरान तत्व की कमी पायी जाती है ऐसी दशा में 500 ग्राम अमोनियम मोलिब्डेट तथा 10-15 कि.ग्राबोरेक्स का प्रति हेक्टेयर प्रयोग भूमि की तैयारी के समय अवश्य करें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अन्तिम जुताई के समय तथा शेष नाइट्रोजन को दो बराबर भागों में बाँटकर 20-35 दिन बाद टापड्रेसिंग के रुप में देना चाहिए।

 

रोपण

जब पौधे 3-4 सप्ताह के हो जाये तब उनको मुख्य खेत मे अगेती फसल हेतु 60ग30 से.मी. मध्य मौसमी 60ग45 से.मी. एवं पछेती फसल 60ग60 से.मी. की दूरी रोपित करते हैं।

 

अन्तः सस्य क्रियायें

इस फसल में अधिक गहरी निराई-गुड़ाई नहीं करनी चाहिए, अथवा उथली जड़ों को अधिक नुकसान पहँुच सकता है। रासायानिक खरपतवार नियंत्रण के लिए पेण्डीमेथलीन या फ्लूक्लोरेलिन के 1.0. किग्रा. सक्रिय तत्व को 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से पूर्व खरपतवारनाशी के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।

 

कटाई एवं उपज

इसके कर्ड की कटाई उचित रंग व आकार लेने के बाद 15 से.मी. लम्बे गूदेदार तने के साथ करते है। देर से कटाई करने पर इनके कर्ड का रंग हल्का व संगठन ढीला पड़ जाता है, फलस्वरूप बाजार में कीमत गिर जाती है। इसकी औसत उपज 200-250 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

 

भण्डारण

ताजी कटी हुई ब्रोकली की श्वसन दर 60 मिग्रा. कार्बन डाई आक्साइड प्रति किलो प्रति घंटा (50 सेतापमान पर) से अधिक है अतः कटाई के तुरंत बाद ठंडा करके कम तापक्रम पर भण्डारित कर लेना चाहिए। शोध से यह ज्ञात हुआ है कि 6 %कार्बन डाइआक्साइड एवं 2-6% आक्सीजन के साथ इसे किसी भी प्रकार के वातावरण में 3 सप्ताह तक भण्डारित किया जा सकता है।

 

ब्रोकोली के कीट

1.हीरक पीठ शलभ

पीले-हरे रंग की छोटी-छोटी सूडियाँ पत्तियों को एक स्थान पर खुरचकर खाती हजबकि बड़ी सूडियाँ छोटे छेद बनाती है। तीव्र प्रकोप
की दशा में पौधा पूर्णतया पत्तीरहित हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए 0.50 प्रतिशत कारटाप हाइड्रोक्लोराइड का आरिम्भक अवस्था में 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

2.माहूँ

शिशु व वयस्क दोनो ही जनवरी-मार्च माह में रस चूसकर फसल को नुकसान पहुँचाते हैं। कीट के प्रकोप की अधिकता में मिथाइल ओ डिमेटान 0.50 प्रतिशत या फास्फेमिडान 0.30 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए।

3.आरा मक्खी

यह कीट नवम्बर-दिसम्बर में फसल को ज्यादा हानि पहुँचाता है। सूडियाँ 3-6 के समूहों में सुबह व शाम पत्तों मे छेद करती है जबकि दोपहर में छिपी रहती हैं। कीट की रोकथाम हेतु डाईमेथोएट 30 ई.सी. रसायन की 2 मि.ली. मात्रा का प्रति लीटर की दर से छिडकाव करना चाहिए।

 

ब्रोकोली के रोग

१.रोग पौध गलन

यह बीमारी नर्सरी की अवस्था में पिथियम, राइजोक्टोनिया, फ्यूजेरियम नामक फफूंददद्वारा लगती है। इस रोग में पौधे मृदा की सतह से सूखते हुए गिर जाते है। बीमारी की प्रबलता में सम्पूर्ण पौधे एक दिन में ही नष्ट हो जाते हंै। बीज को बुवाई से पुर्व 3.0 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति कि.ग्रा. बीज या ट्राइकोडर्मा से उपचारित करके बोयें तथानर्सरी अवस्था में रोग के नियंत्रण हेतु कैप्टान/कार्बेन्डाजिम को 2.0 ग्राम/लीटर पानी की दर से क्यारी को पूर्णतः भिगो दें।

२.पर्ण चित्ती

आल्टरनेरिया पर्ण दाग में गोल भूरे धब्बे निचली पत्तियों में स्पष्ट दिखायी देते हैं। रोग नियंत्रण हेतु क्लोरोथैलोनिल कवकनाशी के 0.2 प्रतिशत जलीय घोले में स्टीकर मिलाकर सांयकाल छिड़काव करना चाहिए। गोभी का पीत रोग: यह रोग फ्यूजेरियम फफूँद द्वारा गोभीवर्गीय फसलों की अगेती प्रजातियों में अधिकतर बढ़ता है। अविकसित पत्तियाँ बाद में भूरी होकर गिर जाती हैं। नर्सरी हेतु शोधित बीज का प्रयोग करें एवं रोग की प्रकटता पर 0.2 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम या 0.5 प्रतिशत ट्राईकोडरमा का छिड़काव करना चाहिए|

३.गोभी का पीत रोग

यह रोग फ्यूजेरियम फफूँद द्वारा गोभीवर्गीय फसलों की अगेती प्रजातियों में अधिकतर बढ़ता है। अविकसित पत्तियाँ बाद में भूरी होकर गिर जाती हैं। नर्सरी हेतु शोधित बीज का प्रयोग करें एवं रोग की प्रकटता पर 0.2 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम या 0.5 प्रतिशत ट्राईकोडरमा का छिड़काव करना चाहिए।

 

स्रोत-

  • भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान

 

 

Comments:

  • Ravi Prakash Yadav
    09/08/2017 at 4:55 PM

    Hello Everyone
    from where i can get ganesh broccoli seeds
    thank you

    ravi
    ravoravi@gmail.com

    • Harshita Tiwari
      21/08/2017 at 10:53 AM

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