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बाजरा की लाभकारी खेती – राजस्थान – Kisan Suvidha
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बाजरा की लाभकारी खेती – राजस्थान

बाजरा की खेती

बाजरा की लाभकारी खेती – राजस्थान

बाजरा शुष्क क्षेत्र में अनाज वाली प्रमुख फसल है, यह राज्य के लगभग 51 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में प्रतिवर्ष उगाई जाती है । बाजरा वर्षा पर आधारित असिंचित एवं सिंचित क्षेत्रों में खरीफ ऋतु में उगाया जाता है । अनाज के साथ-साथ यह चारे की भी अच्छी उपज देता है । बाजरा पौष्टिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण फसल है । इसमें 15.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5 प्रतिशत वसा एवं 67 प्रतिशत कार्बोहाइट्रेट पाया जाता है । राज्य के पश्चिमी भाग में बाजरे की फसल 23 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती है, लेकिन इसकी औसत उपज बहुत ही कम है । निम्न उन्नत तकनीकियों के प्रयोग द्वारा बाजरे की फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है ।

 

बाजरा की उन्नत किस्में

अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए बीज की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है । बीज की किस्म एवं उसकी गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए । बाजरे की अनेक संकुल एवं संकर किस्में विकसित की गई हैं तथा इनके द्वारा अनाज एवं चारे की अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है ।

(आ) बाजरा की सकुल किस्में

किस्म पकने की अवधी (दिनों में) अनाज की औसत उपज (कि.ग्रा./है.) चारा की औसत उपज (कि.ग्रा./है.)
राज 171 82-87 1200-1500 4000-4200
सी जेड पी 9802 74-82 1400-1800 4000-4500
आई सी टी पी 8203 70-75 1500-2000 3500-4000
एम पी 383

 

75-80 1500-2000 3500-4000

 

(ब) बाजरा की संकर किस्में

किस्म पकने की अवधी औसत अनाज (कि.ग्रा./है.) उपज

(कि.ग्रा./है.)

एच एच बी 67 65-70 दिन 1200-1500 2000-2500
जी एच बी 538 70-75 दिन 1700-1800 3000-3500
आर एच बी 121 75-80 दिन 1800-2200 3200-3500
जी एच बी 719 70-75 दिन 1500-1800 3500-4000
आई सी एम एच 356 75-80 दिन 1500-1800 3500-4000

 

भूमि एवं उसकी तैयारी

बाजरे की खेती दोमट, बलुई दोमट एवं बलुई भूमि में सफलता पूर्वक की जा सकती है । भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए । अधिक समय तक खेत में पानी भरा रहना फसल को नुकसान पहुचा सकता है । वर्षा के पश्चात् प्रथम हैरो द्वारा एक क्रौस जुताई करके पाटा लगा कर खेत को ढेले रहित एवं समतल कर देना चाहिए ।

 

बीज दर एवं बुवाई की विधि

बाजरे की बुवाई का समय किस्मों के पकने की अवधि पर बहुत निर्भर करता है । बाजरे की दीर्घावधि ( 80-90 दिनों ) में पकने वाली किस्मों की बुवाई जुलाई के प्रथम सप्ताह में कर देनी चाहिए । मध्यम अवधि ( 70-80 दिनों ) में पकने वाली किस्मो की बुवाई 10 जुलाई तक कर देनी चाहिए तथा जल्दी पकने वाली किस्मों ( 65-70 दिन ) की बुवाई 10 से 20 जुलाई तक की जा सकती है । बाजरे की फसल के लिए 4-5 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है । अच्छी उपज के लिए खेत में पौधों की संख्या होनी चाहिए । बाजरे की बुवाई पंक्तियों में 45 से 50 से.मी. की दूरी पर तथा पोधे से पौधे की दूरी 10 से 15 से.मी. रखनी चाहिए ।

 

खाद एवं उर्वरक

फसल के पौधों की उचित बढ़वार के लिए उचित पोषक प्रबंधन का होना आवश्यक है । अतः भूमि की तैयारी करते समय बाजरे की फसल के लिए 5 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद प्रयोग करनी चाहिए । इसके पश्चात् बाजरे की वर्षा आधारित फसल में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन व 40 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है ।

बुवाई करते समय 44 कि.ग्रा. यूरिया एवं 250 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट या 87 कि.ग्रा. डी.ए.पी. व 9.5 कि.ग्रा. यूरिया खेत में प्रति हैक्टेयर की दर से देना चाहिए । उर्वरक सीड कम फर्टिलाइजर ड्रील के द्वारा बुवाई के साथ देना लाभप्रद रहता है । शेष 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन देने के लिए फसल जब एक महीने की हो जाए तो निराई-गुडाई करने के पश्चात् यदि खेत में उचित नमी हो तो 43 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हैक्टेयर की दर से समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए । जहाँ पर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो उस स्थिति में 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 40 कि.ग्रा. फास्फोरस की मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करनी चाहिए । ध्यान रहे उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की जांच के आधार पर ही करना चाहिए ।

 

फसल चक्र

बजरे की फसल से अधिक पैदावार प्राप्त करने केे लिए उचित फसल चक्र आवश्यक है । असिंचित क्षेत्रों के लिए बाजरे के बाद अगले वर्ष दलहन फसल जैसे ग्वार, मूंग या मोठ लेनी चाहिए । सिंचित क्षेत्रों के लिए बाजरा – सरसों, बाजरा – जीरा, बाजरा – गेहूं फसल चक्र प्रयोग में लेना चाहिए ।

 

जल प्रबंध

पौधों की उचित बढ़वार के लिए नमी का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है । वर्षा द्वारा जल के अधिक उपयोग के लिए खेत का पानी खेत में रखना आवश्यक है । इसके लिए खेत की चारों तरफ मेंडबन्दी करना चाहिए । इसके द्वारा खेत का पानी बाहर बहकर नहीं जायेगा तथा भूमि का जल कटाव से बचाव भी किया जा सकेगा । भूमि में उपलब्ध नमी का वाष्पीकरण द्वारा नुकसान को रोकने के लिए फसल की पंक्तियों के बीच बिछावन का प्रयोग लाभप्रद रहता है । बिछावन के लिए खरपतवार या फसल के अवशेषों को प्रयोग में लिया जा सकता हैं । इसके अतिरिक्त फसल की बुवाई, मेड एवं कूंड विधि द्वारा वर्षा का जल गहरे कूंडों में इक्ट्ठा हो जाता है तथा खेत में नमी अधिक दिनों तक संचित रहती है । जिसके द्वारा फसल की अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है ।

सिंचित क्षेत्रों के लिए जब वर्षा द्वारा पर्याप्त नमी न प्राप्त हो तो समय समय पर सिंचाई करनी चाहिए । बाजरे की फसल के लिए 3-4 सिंचाई पर्याप्त होती है । ध्यान रहे दाना बनते समय खेत में नमी रहनी चाहिए । इससे दाने का विकास अच्छा होता है, एवं दाने व चारे की उपज में बढ़ोत्तरी होती है ।

 

पपड़ी प्रबंधन

फसल की बुवाई के बाद उगने से पहले वर्षा आ जाये तथा वर्षा के बाद तेज धूप निकल जाये तो भूमि की ऊपरी सतह सख्त हो जाती है, तथा सूखकर पपड़ी बनने के कारण बीज अंकुरित होकर बाहर नहीं आ पाता । पपड़ी बनने का मुख्य कारण भूमि की भैतिक संरचना है । पपड़ी की समस्या से बचने के लिए कूंडों में 8-10 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना लाभ दायक रहता है ।

 

बाजरे में पौध संरक्षण

१.दीमक

दीमक बाजरे के पौधे की जड़ें खाकर नुकसान पहुंचाती हैं । दीमक के नियंत्रण के लिए खेत की तैयारी के समय अंतिम जुताई पर क्यूनालफोस या क्लोरपाइरिफाॅस 1.5 प्रतिशत पाउडर की 20 से 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में अच्छी प्रकार से मिला देना चाहिए । इसके अतिरिक्त बीज को 4 मि.ली. क्लोरपाइरिफाॅस प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए । खड़ी फसल में यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो दीमक से नियंत्रण हेतु सिंचाई के पानी के साथ 2 लीटर क्लोरपाइरिफाॅस की मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करनी चाहिए ।

 

२.कातरा

बाजरे की फसल को कातरे की लट प्रारम्भिक अवस्था में काटकर नुकसान पहुंचाती हैं । कातरों के नियंत्रण हेतू खेत की चारों तरफ घास को साफ करना चाहिए । कातरों के नियंत्रण हेतु क्यूनालफाॅस 1.5 प्रतिशत पाउडर की 20-25 किलो ग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए ।

 

३.सफेद लट

इस कीट की लट तथा प्रौढ़ दोनों फसल को नुकसान पहुंचाते हैं । लट की अवस्था में एक किलो बीज में 3 किलो कारबोफूरान 3 प्रतिशत या क्यूनालफास 5 प्रतिशत कण मिलाकर बुवाई करनी चाहिए । खड़ी फसल में चार लीटर क्लोरोपायरीफास प्रति हैक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के पानी के साथ देना चाहिए ।

 

४.रूट बग

रूट बग के प्रकोप की रोकथाम हेतु 25 किलो मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत को प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकना चाहिए । इसके अतिरिक्त क्यूनालफाॅस की 1.25 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।

 

५.जोगिया

इस रोग के कारण पौधे के सिट्टे पत्तियों के रूप की संरचना में बदल जाते हैं, तथा प्रभावित पौधे की पत्तियां पीली या सफेद रंग की हो जाती है । इसकी रोकथाम के लिए रोगरोधी किस्मों जैसे- एच.एच.बी. 67, आर.एच.बी.121, राज 171, सी.जेड.पी.-9802 की बुवाई करनी चाहिए, तथा बीज को एप्रोन एम.डी.35 की 6 ग्राम मात्रा प्रति किलो या एग्रोसन जी.एन.2.50 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए । रोग से प्रभावित पौधे उखाड़ देने चाहिए तथा खड़ी फसल में बुवाई के 25-30 दिन बाद मैन्कोजेब नामक फफूंदनाशक की 2 कि.ग्रा. मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव कर देना चाहिए ।

 

६.अरगट या चेपा

यह बीमारी पौधों के सिट्टों पर शहद जैसे गुलाबी पदार्थ के रूप में दिखाई देती है । कुछ दिन बाद यह पदार्थ भूरा एवं चिपचिपा हो जाता है तथा बाद में काले पदार्थ के रूप में बदल जाता है । फसल पर सिट्टे बनते समय 2.5 किलो जिनेब या 2 किलो मेन्कोजेब के कम से कम 3 छिड़काव तीन चार दिनों के अन्तराल पर करना चाहिए । प्रमाणित एवं उपचारित बीज को बुवाई के लिए प्रयोग करना चाहिए ।

 

७.स्मट

इस बीमारी के कारण पौधे के सिट्टों में दाने हरे रंग एवं बड़े आकार के हो जाते हैं । बाद में ये दाने काले रंग के हो जाते हैं तथा पूरे फफूंद के स्पोट से भरे होते हैं । इस बीमारी के नियंत्रण हेतु प्रमाणित बीज का प्रयोग करना चाहिए । उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए । तथा फसल पर 1.50 किलो विटाबैक्स को 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।

 

८.पत्ती धब्बा

इस बीमारी के लक्षण पत्तियों की निचली सतह पर हल्के भूरे काले रंग के नाव के आकार के धब्बों के रूप में देखे जा सकते हैं । जीनेब नामक फफूंद नाशक 0.20 प्रतिशत घोल का छिड़काव करने पर इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है ।

 

उन्नत बीज पैदा करना

किसान अपने खेत पर संकुल किस्म के बाजरे का बीज स्वयं पैदा कर सकते हैं । बीज के लिए फसल उगाते समय अनेक सावधानियाँ, जैसे बीज के लिए बोई गई फसल के 200 मीटर तक बाजरे की दूसरी फसल नहीं होनी चाहिए । जिस खेत में फसल उगानी हो उसमें पिछले वर्ष बाजरा नहीं उगाया गया हो तथा बुवाई के लिए प्रमाणित बीज ही प्रयोग किया गया हो । इसके अतिरिक्त समय समय पर खेत से अन्य किस्मों के पौधों को निकालना, खरपतवार, कीड़े एवं बीमारीयों का नियंत्रण आवश्यक है ।

खेत के चारों तरफ कम से कम 10 मीटर फसल छोड़कर बीज के लिए लाटे को अलग काटकर अच्छी प्रकार से सुखा लेना चाहिए । लाटे की मंडाई कर दानों की ग्रेडिंग कर लेनी चाहिए, तथा अच्छे आकार के बीज को धूप में सुखाकर 8-9 प्रतिशत तक नमी रहने पर कीटनाशकफफूंदनाशक से उपचारित कर लोहे की टंकियों में भरकर अच्छी प्रकार से बन्द कर देना चाहिए । इस बीज को अगले वर्ष बुवाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है ।

 

बाजरा की कटाई एवं गहाई

बाजरे के सिट्टे जब हल्के भूरे रंग में बदलने लगे तथा पौधे सूखने लगे तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए । इस समय दाने सख्त होने लगते हैं, तथा नमी लगभग 20 प्रतिशत रहती है । कटाई के बाद सिट्टो को अलग कर लेना चाहिए तथा अच्छी प्रकार सुखाकर थ्रैसर द्वारा दानों को अलग कर लिया जाता है । थ्रैसर की सुविधा नहीं होने पर सिट्टों को डंडों द्वारा पीटकर दानों को अलग कर अच्छी प्रकार सुखा लेना चाहिए ।

 

उपज एवं आर्थिक लाभ

उन्नत विधियों द्वारा खेती करने पर बाजरे की वर्षा आधारित फसल से औसतन 12-15 कुन्टल दाने की एवं 30-40 कुन्टल प्रति हैक्टेयर सूखे चारे की उपज प्राप्त हो जाती है । बाजरे का प्रतिकिलो 9 रूपये भाव रहने पर 5 से 6 हजार रूपये प्रति हैक्टेयर शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है ।

 

 

स्रोत-

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