Top
बकरियों के मेंमनों को रोगों से कैसे बचाये – Kisan Suvidha
3359
post-template-default,single,single-post,postid-3359,single-format-standard,theme-wellspring,mkdf-bmi-calculator-1.0,mkd-core-1.0,woocommerce-no-js,wellspring-ver-1.2.1,mkdf-smooth-scroll,mkdf-smooth-page-transitions,mkdf-ajax,mkdf-blog-installed,mkdf-header-standard,mkdf-sticky-header-on-scroll-down-up,mkdf-default-mobile-header,mkdf-sticky-up-mobile-header,mkdf-dropdown-slide-from-bottom,mkdf-search-dropdown,wpb-js-composer js-comp-ver-4.12,vc_responsive

बकरियों के मेंमनों को रोगों से कैसे बचाये

बकरियों के मेंमनों के रोग

बकरियों के मेंमनों को रोगों से कैसे बचाये

बकरी व्यासाय की सफलता का प्रमुख आधार बकरी के बच्चों का जीवित एवं स्वास्थ रहना है। सर्वेक्षणों में पाया गया है कि एक माह तक के बच्चों में मृत्यु दर 15 से 40 प्रतिशत तक पहुँच जाती है। सफल उद्यमी को प्रयास करना चाहिए कि जन्म से 3 माह तक मृत्यु दर 10 प्रतिशत से कम रहे। रोग का प्रकोप तीव्र हो तथा उचित उपचार में विलंब होने पर बच्चों में मृत्यु दर अधिक हो जाती है। जीवित बचे हुए रोगी मेमनों की शारीरिक भार वृद्धि और विकास दर घट जाती है अतः बकरी के बच्चों का उचित प्रबन्धन और देखरेख पर विषेश ध्यान देने की आवश्यकता है।बकरी के बच्चे के जन्म के बाद कुछ प्रमुख रोगो की सम्भावनाए रहती है । इसलिए इन बच्चों की उचित देखभाल एंव विभिन्न बीमारियों से बचाव तथा उनके उचित उपचार व्यवस्था अत्यधिक महत्वपूर्ण है । स्वास्थ्य प्रबन्धन में थेडी सी लापरवाही बच्चों
की विकास दर को प्रभावित कर सकती है ।

  1. अतिसार (नवजात दस्त रोग, कोलीबैसिलोसिस ) :

यह रोग मुख्यतः ई0 कोलाई जीवाणु द्वारा होता है। परन्तु जैसे विशाणु रोटा व कोरोना तथा प्रोटोजोआ जैसे कृपटोस्पोरिडिया द्वारा भी होता है। गन्दे पशु बाडे, बाडां में बच्चों की भीड़ , मां के अस्वच्छ थन से दूध पिलाने व ज्यादा मात्रा में दूध पिलाने से दस्त हो जाते हैं तथा इस बीमारी के फैलने का डर बना रहता है। इस रोग से बच्चों की मृत्युदर काफी होती है। इस रोग में बच्चों में बुखार आ जाता है तथा इसके साथ ही पीले या सफेद रंग के दस्त होते हैं, मेमने खाना पीना छोड देते हैं। चूंकि यह जीवाणु आंतों में जहर बनाता है तो उसके प्रभाव से बच्चों में लडखडाहट, खडे हाने में परेशानी व दस्त के कारण शरीर में पानी की कमी हो जाती है। बीमारी हो जाने पर रोगग्रस्त बच्चों को अलग करके उनका उपचार करते हैं। इसके अन्तर्गत एन्टीबायोटिकस व शरीर में पानी की कमी की दषा में इलेक्ट्रोलाइट पाउडर पिलाना अथवा
डक्स्ट्रोज सेलाइन को नस में सुई द्वारा आवश्यकतानुसार देना चाहिए।

रोकथाम

  1. बच्चों को पैदा होने के आधे एक एक घंटे के बाद दिन में 4-6 बार खीस (कोलेस्ट्रम) वजन के 10 प्रतिशत मात्रा में अवष्य पिलाना चाहिए इससे बच्चों में रोग के जीवाणु से लड़ने की प्रतिरोधक षक्ति मिलती है।
    2. आवश्यकता से अधिक दूध नहीं पिलाना चाहिए इससे अपच के कारण दस्त होने की सम्भावना बनी रहती है।
    3. बच्चे को दूध पिलाने से पहले मॉं/ बकरी के थन पोटाष के घोल से धोकर साफ कपडे़ से पोछ लेना चाहिए तथा फिर दूध पिलाना चाहिए।
    4. बच्चे को यदि अलग से बर्तन में दूध पिलाया जा रहा है तो बर्तन/ बोतल हमेषा साफ रखें और प्रतिदिन गर्म पानी से धोयें।
    5. पशु गृह में अनावश्यक भीड़ को रोकें तथा नियमित रूप से सफाई रखें।
    6. रोग ग्रसित बच्चों को स्वस्थ बच्चों से अलग रखकर उनका पशु चिकित्सक के निर्देषानुसार उपचार कराने की व्यवस्था करें।
  2. कुकडिया (काक्सीडियोसिस ) :

यह रोग आइमेरिया नामक प्रोटोजोआ परजीवी से होता हैयह परजीवी संक्रमित चारा, दाना, पानी के साथ स्वस्थ मेमनों की आंतों में पहुँच जाते है इस प्रक्रिया में आंतों की कोषिकाओं के फटने के कारण खून आता है तथा पतले दस्त भी हो जाते हैं। इस प्रकार दस्त में खून आता हैं और इन्हीं खूनी दस्तों के कारण बकरी के बच्चों के पेट में दर्द की षिकायत भी होती है तथा अगर समय पर उचित उपचार न मिला तो बच्चे शरीर में पानी व खून की कमी के कारण मर भी जाते हैं और जो बच्चे बच जाते हैं उनमें विभिन्न आवश्यक तत्व पूरी तरह से अवषोशित नहीं होते हैं फलस्वरूप आवश्यक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे बच्चों की शारीरिक वृद्धि व रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। 6 माह से अधिक उम्र होने पर मेमनों में इस रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता आ जाती है।
इस रोग के कारण मेमनों की शारीरिक वृद्धि रूक जाती है व कमजोर हो जाते हैं तथा शारीरिक क्षमता भी कम होती जाती है जिस कारण मेमने बहुत ही जल्दी रोग ग्रसित हो जाते हैं, जिससे मृत्युदर बढ़ जाती है। फलतः बकरी पालकों को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पडता है। इस रोग से प्रायः 1 से 6 माह के मेमनें ही ग्रसित होते हैं क्योंकि वयस्क बकरियों में संक्रमण होने के बाबजूद भी लक्षण नहीं आते हैं क्यांकि उनमें रोग की प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है। रोग ग्रस्ति बकरी के मेमनों को चिकित्सा हेतु सल्फाडायमिडीन की गोली प्रति 200 मि0ग्रा. प्रति कि0ग्रा0 शारीरिक भार के अनुसार 5 से 7 दिनो तक देना चाहिए। एवं एम्प्रालयम 10-20 मि0ग्रा0 प्रति कि0ग्रा0 शारीरिक वजन के हिसाव से 5-7 दिन तक देना चाहिए तथा साथ ही बी0 काम्पलेक्स सीरप भी पिलाना आवश्यक है।

बचाव

  1. मेमनों का वयस्क बकरियों से दूर रखना चाहिए ।
    2. अतः मेमनों को पीने का पानी, चारा, दाना इत्यादि साफ सुथरा हो व वयस्क बकरियों की मेगनी से संक्रमित न हो।
    3. बच्चों के बाड़ों की नियमित सफाई होनी चाहिए व कम से कम हफतें में 2 बार बिना वुझा चूने का छिड़काव करना चाहिए तथा बाड़ों का साफ सुथरा तथा हवादार होना चाहिए।
    4. बाडों में मेमनों की संख्या उचित हो तथा अनावश्यक भीड नहीं बढ़ानी चाहिए क्योंकि बाड़ों में ज्यादा संख्या से मेमनें रखने पर भी यह रोग बढ़ने की सम्भावना बढ़ जाती है।
    5. सल्फाडायमिडीन 25-30 मि0ग्रा0 शारीरिक भार के हिसाब से 5-10 दिन देनी चाहिए।
    6. एम्प्रालयम पाउडर 5 मि0ग्रा प्रति कि0ग्रा0 शारीरिक भार के हिसाब से 5-7 दिन तक देनी चाहिए।
  2. खुरपका-मुंहपका (एफ0एम0डी0) :

यह विशाणु जनित रोग है तथा इसकी उपजाति (ओ0, ए0, सी0, एषिया-1) द्वारा होता है। प्रौढ़ पशु में इस रोग के मुख्य लक्षण, मुंह जीभ, डेन्टल पैड व खुरों के बीच में छाले व फूटकर घाव हो जाना है जिसके कारण पशु लंगडाने लगता है तथा मुंह में छाले व घाव हो जाने के कारण चारा खाने में परेशानी होती है।
नवजात षिषुओं में बिना किसी लक्षण के अचानक मृत्यु हो जाती है। मेमनों में यह रोग ह्दय को प्रभावित करता है जिससे मृत्युदर 80-100 प्रतिशत तक हो जाती है।

इस रोग के प्रभावी रोकथाम के लिये खुरपका-मुंहपका की पालीवैलेन्ट वैक्सीन द्वारा टीकाकरण ही उचित उपाय है। इसका टीका प्रतिवर्श 6-12 महीने के अन्तराल पर मुख्यरूप से जनवरी-फरवरी व जुलाई-अगस्त में 1 मि0ली0 खाल के नीचे/मांस में लगाते हैं। मेमनों में टीका 3 माह से अधिक उम्र के बच्चों में लगाना चाहिए व 2-3 सप्ताह बाद पुनः (बूस्टर डोज ) टीका करण करना चाहिए।

  1. मुॅहा रोग

यह विशाणु जनित रोग है यह वयस्क बकरी व मेमनों को प्रभावित करता है इस रोग से ग्रसित बकरियों व मेमनों के मुॅह पर, दाने बन जाते हैं और ये दाने मुॅह व ओठ पर इतनी तेजी से बढ़ते हैं कि पूरा मुॅह आच्छादित कर देते हैं मुॅह पर खुरंट ज्यादा कडे होते हैं तथा दवाने से दर्द होता है जिससे मेमनों को खाने पीने में काफी परेशानी होती है। कभी कभी तो इस रोग का प्रभाव इतना तीव्र होता है कि मेमनों के मसूडे़ व जीभ पर भी लाल लाल दाने निकल आते हैं जिससे मेमने को खाने पीने में काफी कठिनाई होती है अगर समय रहते इनका उचित इलाज नहीं किया गया तो इन दानों से खून आता है व मवाद पड़ जाता है तथा कभी कभी घाव होकर इसमें कीड़े पड़ जाते हैं अन्ततः भूख प्यास के कारण मेमने मर भी जाते हैं यह रोग प्रायः संक्रमित बकरियों/ मेमनों के सम्पर्क में रहने, उनका झूठा चारा पानी आदि के खाने से फैलता है।
इस रोग के उपचार हेतु दानों पर 50-60 प्रतिशत पोटेषियम परगमेनट का गाढा घोल लगाने से दाने जल जाते हैं फिर दानों को साफ करके उनपर विटाडिन का घोल, एन्टीसेप्टिक क्रीम लगानी चाहिए तथा द्वितीयक जीवाणुओं का संक्रमण रोकने हेतु एन्टीबोयोटिक्स का इंजेक्षन देना चाहिए।

इस रोग से बचाव हेतु निम्न उपाय/सावधानियॉ रखनी चाहिएः

  1. मेमनों को सुबह जल्दी चरने के लिए नहीं निकालें क्योकि देखा गया है कि ओस पर पडी घास खाने से यह रोग जल्दी होता है।
    2. बीमार मेमनों को स्वस्थ मेमनों से अलग रखना चाहिए।
    3. बीमार बकरियों का संक्रमित चारा दाना पानी इत्यादि स्वस्थ मेमनों / बकरियों को नहीं पिलाना चाहिए।
  2. आंत्र विशाक्कता (इन्टेरोटोक्समिया) :

यह रोग मुख्यरूप से क्लोस्ट्रीडियम परफ्रिन्ेजनस टाइप डी नामक अवायुवीय जीवाणु से होता है व यह रोग प्रायः अधिक स्वस्थ, युवा मेमनों में अधिक होता है। इस रोग से ग्रसित बकरी/ मेमनों में अधिक होता है। इस रोग से ग्रसित बकरी मेमनों के पेट में तीव्र दर्द उठता है रोग ग्रसित मेमने दर्द के कारण जमीन पर छअपटाकर मर जाते हैं अतः इस रोग को भारत में कुछ राज्यों में फडकिया रोग से जाना जाता है। इस रोग में पेट फूल जाता है व दस्त भी आते है । यदि समय से तुरन्त उपचार न किया गया तो
मृत्यु हो जाती है। रोग की तीव्र अवस्था सफल7ल उपचार संम्भव नही है । एन्अीबायोटिक के इन्जैंक्षन सक उपचार किया जाता हे । रोग से ग्रसित बकरी मेमनों को 2-5 ग्रा0 तक खाने का सोड़ा तथा टेट्रासाइक्लिन पाउडर का घोल दिन में 2-3 बार पिलाना चाहिए तथा पीने के पानी में 1-2 प्रतिशत पोटेषियम परमेग्नेट का घोल वाला पानी पीने को देना चाहिए। इस रोग से बचाव हेतु 3 महीने की उम्र के मेमनों में टीका लगा देना चाहिए । प्रथम टीकाकरण के 2-3 सप्ताह बाद पुनः बूस्टर वैक्सीनेषन करना चाहिए। यह वैक्सीन 6 माह अन्तराल पर पुनः लगानी चाहिए ।

  1. न्यूमोनिया :

न्यूमोनिया बकरी के बच्चों में होने वाला एक महत्वपूर्ण रोग है।यह जीवाणु व माइकोप्लाजमा जनित संक्रामक रोग है। न्यूमोनिया की सम्भावना विशाणु जनित रोगों के उपरान्त, मौसम में आकस्मिक बदलाव, बाड़े में भीड, परजीवी संक्रमण, स्थान परिवर्तन कुपोशण अथवा फंफूदी लगा दाना खाने के कारण बढ़ जाती है। न्यूमोनिया रोग संक्रमणित हवा, पानी व दाने चारे के द्वारा फैलता है। न्यूमोनिया रोग के लक्षण हैं -तीव्र ज्वर (104-106 फैरेनहाइट), खांसी, सांस लेने में कठिनाई, क्षुधा हीनता,आंख व नाक से स्राव इत्यादि। इस रोग के उपचार के लिए पशु चिकित्सक के निर्देषानुसार एन्टीबायोटिक दवा जैसे पैनीसिलिन, एम्पीसिलिसन , टैटरासाइक्लिन, टाइलोसिन,सेफटियोफर देना चाहिए इस रोग के कारण बच्चों की मृत्यु दर बढ़ जाती है।
न्यूमोनिया से बचाव के लिए आवश्यक है कि मेमनों को साफ सुथरे हवादार बाड़े/पशुषाला में रखा जायें। मेमनों को अधिक गर्म, अधिक सर्दी व बदलते मौसम से
बचाना चाहिए। उन्हें साफ सुथरा दाना व पानी देना चाहिए। संक्रमित पशुओं को अलग कर देना चाहिए।

  1. टिटेनस :

नाभि में टिटनेस के जीवाणु के संक्रमण होने से टिटेनस रोग की संम्भावना बढ जाती है । इस रोग में शरीर की सभी मांसपेषियां अकड जाती है जिससे हाथ पैर पूछ कान सभी अकड जाते है । तथा जल्दी ही मृत्यू हो जाती है इस ासेग का सफल उपचार नही हो पाता है इसके बचाव के लिए पैदा होने के वाद नाभि पर टिन्चर आयोडीनघोल नियमित रूप से लगाना चाहिये ।

  1. घेंघा रोग :

यह रोग आयोडीन की कमी के कारण हेता है। जिन भू भागों में आयोडीन की कमी होती है वहां पर यह रोग मेंमनों में प्रायः देखा जाता है। आयोडीन की कमी से थाइराइड ग्रन्थि बड़ी होने लगती है जो गले के नीचे सूजन के रूप में दिखाई देने लगती है। मेमनों का विकास रूक जाता है एवं कभी-कभी मृत्यु भी हो जाती है।
रोग ग्रस्त मेमनों को उपचार एवं बचाव के लिए आयोडीन युक्त नमक खिलाना चाहिए। घेंघा रोग (गाइटर ) गाइटर या घेंघा रोग आयोडीन की कमी के कारण होता है जिन स्थानों पर भूमि में आयोडिन की कमी होती है विषेशत पहाड़ी प्रदेश, अधिक वर्शा वाले प्रदेष उन स्थानों पर यह रोग अधिक देखा जाता है। गाइटर में थाइराइड ग्रंथि का आकार बढ़ जाता है जो गले के नीचे सूजन के रूप में दिखाई देता है। आयोडीन
का प्रयोग थाइराइड ग्रंथि थाइराइड हारमोन बनाने के लिए करती है। आयोडीन की कमी के कारण थाइरोक्सिन हारमोन नहीं बन पाता। थाइरोक्सिन की शरीर की वृद्धि व विकास में विषेश भूमिका है। अतः घेंघा रोग से प्रभावित पशु का शारीरिक विकास रूक जाता है। थाइरोक्सिन हारमोन प्रजनन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः घेंघा रोग का उपचार व बचाव अत्यन्त आवश्यक है। इस रोग से बचाव व उपचार हेतु मेमनों को आयोडिन युक्त नमक देना चाहिए। आयोडीन की कमी के कारण मरे
हुए बच्चे भी पैदा होते हैं अतः ग्याभिन बकरियों को भी आयोडीन युक्त नमक देना चाहिए।

  1. नाभि संक्रमण व जोड़ों का दर्द/सूजन :

वाडो में गन्दगी व नवजात के रख-रखाव में कमी के कारण नाभि में संक्रमण व सूजन आ जाती हैं जिससे कई प्रकार की बीमारी होने की सम्भावना बढ जाती है जोडो में सूजन (आरथराइटिस) भी हो
जाती है। इस रोग में जोड़ों में सूजन आ जाती है इस रोग के जीवाणु, नाभी संक्रमण से जोडों तक पहुँच जाते है जिसके फलस्वरूप चलने फिरने में मेंमनों को दर्द का अहसास होता है। एन्टीबायोटिक्स जैसे ट्रेटासाईक्लिन, टियामुटिन, का इन्जेक्षन प्रभावकारी होता है। नाभी संक्रमण को बचाने के लिए जन्म के पष्चात से ही टिनचर आयोडीन नाभी पर लगानी चाहिए |

बच्चों में रोग से बचाव के लिए महत्वपूर्ण प्रवन्धन :

  1. प्रतिदिन बाडों की नियमित रूप से सफाई करनी चाहिये तथा गन्दगी को बाडों से काफी दूर बने गडडां में दवा देना चाहिये।
    2. बाडों के अन्दर व बाहर नियमित रूप से हफते में एक या दो बार बिनां बुझे चूने का छिडकाव करे जिससे सूक्ष्मजींवी एवं परजीवियों की संख्या को कम किया
    जा सके ।
    3. प्रतिमाह बाडें के अन्दर फर्स पर सूखा घासफूस डालकर जला देना चाहिये । जिससे बाडों के भीतर तथा बाहर पूर्ण विसंक्रमण हो जाता है तथा परजीवियों की सभी अवस्थाये नश्ट हो जाती है। जिससे उन बाडों मे रहने वाले मेंमनो तथा बकरियो में जैविक एवं पारजैविक संक्रमण होने की सम्भावना खत्म हो जाती
    है।
    4. प्रति तीन चार माह के अन्तराल पर बाडों की जमीन की मिटटी कम से कम 6 इंच तक खोद कर निकाल दें व नई साफ मिट्टी भर देने से संक्रमण की सम्भावना कम हो जाती है ।
    5. हफते मे कम से कम एक या दो दिन पुटेषियम परमेंगनेट युक्त पानी बकरियों तथा मेंमनो को अवष्य पिलाये जिससे बकरियों तथ बच्चों मे होने वाली पेट की बीमारी तथा मुह पर दानों (एक्थाइमा) की समस्या से बचा जा सकता है।
    6. नवजात मेंमनो मे नाभिसूत्र काट कर टिन्चर आयोडीन में नियमित रूप से सुबह षाम कम से कम तीन दिन तक अवष्य डुबाये । इससे मेंमनो को नाभिसम्बन्धी रोग तथा टिटनैष से बचाया जा सकता है ।
    7. नवजात मेंमनो के पैदा होने के बाद साफ करके तुरन्त खीस पिलाये, जेर गिरने का इन्तजार न करे।
    8. दूध निकालने से पहले थनो को पुटेषियम परमेंगनेट के 2 प्रतिशत घोल से धोकर साफ कर ले जिससे थनों पर होने वाली फुन्सियो तथा मेंमनो को मॅुहा रोग से बचाया जा सके।
    9. नवजात मेंमनो को पैदा होने के हफतें भर बाद खेजडी छोकरा बबूल इत्यादि की पत्तियां चुगने के लिए रखनी चाहिये जिससे उन मे चतुर्थ आमाषय , रूमन का जल्दी से जल्दी विकास हो सके और नवजात मेमनो को कौलीवैसीलोसिस नामक घातक बीमारी से बचाया जा सके।
    10. नवजात मेमनो को खनिज लवणयुक्त मिश्रण चाटने के लिए अवष्य रखे जिससे उनहे मिटटी खाने से रोका जा सके । इससे उनकी शारीरिक वृद्वि के लिये आवश्यक खनिज तत्वो की र्पूत भी होगी और मिटटी खाने से होने वाली विभिन्न बीमारियों से बचाया जा सके ।
    11. मेंमनो को वयस्क बकरियों से अलग रखें ताकि उनकी मेगनी से संक्रमित दाना/पानी न खा पी सके और मेमनो को कौक्सीडियोसिस नामक घातक बीमारी से बचाया जा सके ।
    12. बीमार मेमनों को स्वस्थ जानवरां से अलग रखकर उनका उचित उपचार एवं देखभाल करनी चाहिये|

 

Source-

  • Central Institute for Research on Goats.

 

No Comments

Sorry, the comment form is closed at this time.

Show Buttons
Hide Buttons