फसल प्रणाली में बागवानी का समन्वयन-एक लाभदायी विकल्प

देश की बढ़ती जनसंख्या की फल आपूर्ति एवं पोषण सुरक्षा हेतु एकीकृत फसल प्रणाली में बागवानी का समन्वयन तथा उन्नतशील प्रजातियों का चयन व प्रयोग अति आवश्यक है। मुख्य फसल प्रणाली के साथ-साथ अन्य कृषि आधारित उद्योग अपनाने से भरपूर उपज के साथ अधिक लाभ प्राप्त होता है। बढ़ती आबादी से प्राप्त वर्ज्य पदार्थों, शहरी मलजल, औधगिक बही स्रावों, सघनीकृत पशु पक्षियों से उत्सर्जित पदार्थों तथा कृषि उपफलों के लगातार बढ़ने से पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ सकता है।

अतः वैज्ञानिकों ने इन वर्ज्य पदार्थों का उपयोग, उत्पादकता बढ़ाने में उचित समझा है। इसके लिए एक ऐसे कृषि तंत्र का सृजन किया गया है जिसे समन्वित कृषि कहा जाता है। इस कृषि तंत्र में कई उपतंत्र एक साथ क्रियान्वित होते हैं और एक उपतंत्र का वर्ज्य पदार्थ दूसरे उपतंत्र के लिए ऊर्जा निवेश का काम करता है। इसमें सभी संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग होता है तथा कम खर्च पर सौहार्द उत्पादन मिलता है। सभी उपतंत्रों का पर्यावरणीय संतुलन बना रहता है, एक ही स्थान पर कई चीजे पैदा की जा सकती है, साथ ही अतिरिक्त रोजगार का सृजन होता है। लंबे शोध कार्यों के आधार पर समन्वित कृषि के कई माडल सामने आए हैं।

देश के कई राज्यों में आर्थिक विकास हेतु बागवानी फल, गिरीदार फल, सब्जियां, मशरूम, सजावटी पौधे, कट फ्लावर, मसाले, रोपण फसलें आदि प्रमुख हैं और कृषि के सकल घरेलू उत्पादन में इसका योगदान 29.5 प्रतिशत है। देश में प्रौद्योगिकी आधारित विकास की आवश्यकता है और बागवानी संभाग की इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका है। देश की बागवानी में कुपोषण, कम पोषण और भूख से संबंधित भारतीय समस्याओं को हल करने की पर्याप्त क्षमता है।

किसानों के बीच बागवानी तकनीकों,फल, सब्जियों आदि की नई किस्मों के विषय में जागरूकता पैदा करने की जरूरत है। एकीकृत फसल प्रणाली में मुख्य फसल के साथ अन्य कृषि आधारित उद्योग जैसे की पशु पालन, बकरी पालन, मधु मक्खी पालन, रेशम कीट पालन, मछ्ली पालन, फल उत्पादन, आदि अपनाया जाता है। ऐसी पद्धति अपनाने से भरपूर उपज के साथ अधिक आय की प्राप्ति की जा सकती है

 

एकीकृत फसल प्रणाली में बागवानी का समन्वयन के लाभ

1) भरपूर उत्पादन की प्राप्ति
2) अधिक लाभ की प्राप्ति
3) अधिक स्थिरता
4) संतुलित भोजन की प्राप्ति
5) स्वच्छ पर्यावरण
6) संसाधनों की रीसाइक्लिंग
7) वार्षिक आय की बढ़ोतरी
8) नयी प्रोद्योगिकी का अधिग्रहण
9) ईंधन तथा चारा प्राप्ति
10) जंगलों की कटाई से बचाव
11) रोजगार सृजन में वृद्धि
12) उत्पादन दक्षता
13) फसलोपरांत प्रौद्योगिकीकरण

 

बागवानी आधारित प्रणालियाँ

1) बागवानी  + कृषि उत्पादन
2) बागवानी +  मछली उत्पादन
3) बागवानी +  रेशम कीट उत्पादन
4) बागवानी  + मधुमक्खी उत्पादन

 

बागवानी तथा कृषि उत्पादन

यह कृषि प्रणाली का एक ऐसा रूप है जिसमे फलदायी वृक्ष मान्य घटक हैं। यह भोजन सह फल प्रणाली के रूप में भी जाना जाता है। इसमें कम अवधि वाली फसलों को फलदार वृक्षों के बीच की जगह में उगाया जाता है। इस तरह की कृषि प्रणाली में बागवानी फसलों और कृषि फसलों को साथ.साथ उगाया जाता है। एग्रो होर्टी सह फसली खेती में यह ध्यान रखा जाता हैं कि उगाई गई फसलों कि खादए उर्बरकए सिचाई आदि मांग फल वृक्षों कि मांग के अनुरूप हो और उसका फल वृक्षों पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। दलहनए सब्जियों व कंद फसलें एग्रो होर्टी प्रणाली के लिए सर्बोत्तम फसलें हैं।

 

बागवानी तथा मछली पालन

बागवानी और मछली की खेती प्रणाली में, फल, सब्जियां और तालाब के तटबंध पर फूलों की खेती शामिल है। बागवानी फसल उत्पादन के लिए तालाब और आसपास के क्षेत्रों के भीतर और बाहरी डाइक का उपयोग किया जाता है। पौधों का चयन इस प्रणाली की सफलता के लिए मुख्य मापदंड है। पौधा बौना, मौसमी, सदाबहार, लाभकारी और कम छायादार वाला होना चाहिए। फल फसलों मे केला, पपीता, नींबू, स्ट्रॉबेरी और नारियल का चुनाव किया जा सकता है। सब्जियों में बैंगन, टमाटर, ककड़ी, मिर्च, गाजर, शलगम, पालक, मटर, गोभी, फूलगोभी व भिंडी की खेती कर सकते हैं। तटबंध पर फूल और वृक्षारोपण भी उपयोगी है।

गुलाब, चमेली, ग्लाइडोलस, गेंदा और गुलदाउदी आदि लगाया जा सकता है जो खेत की सुंदरता के अतिरिक्त किसान को आय प्रदान करता है। इन सभी फसलों की लघु सिंचाई तालाब के पानी से की जाती है और तालाब के तले की मिट्टी, फसलों के लिए उर्वरक का काम करती है। फसलों से प्राप्त अनुपयोगी पदार्थों को तालाब में पुनःचक्रित किया जाता है। मखाना, कमल, लेम्ना, ओल्फिया, स्पाईरोडेला, एजोला,जलकुंभी और सिंघाडा भी इस प्रणाली में मछलियों के साथ इकठा लगाया जा सकता है। इस प्रणाली में कम से कम 20-25 प्रतिशत अधिक आमदनी प्राप्त की जा सकती है।

 

बागवानी तथा रेशम कीट पालन

यह एक मेहनत वाला कार्य है जिसे वृद्ध लोग तथा औरते आसानी से कर सकती हैं। तालाबों के बंधों व बगीचे की जमीन पर शहतूत के पेडों की खेती की जाती है। फलदार वृक्ष जैसे मलबेरी (शहतूत) और बेर के वृक्षों को रेशम कीट पालन के लिए भी उपयोग किया जाता है। इन पेड़ों की पत्तियाँ रेशम के कीड़ो के लिए आहार का काम करती हैं। रेशम के कीड़ो के व्यर्थ पदार्थ तथा कुकून परिसंस्करण संयंत्र का व्यर्थ पानी मछ्ली पालन के लिए उर्वरक का काम करता है। रेशम के कीड़े के प्यूपे मछ्ली का आहार हैं। तालाब की गोद शहतूत के पौधों के लिए खाद का काम करती है।

 

बागवानी तथा मधुमक्खी पालन

तालाबों के तटबन्धों (डाइक) पर फल-वृक्षारोपण कर तथा उनकी छाया में मधुमक्खी के डिबें रख कर मधुपालन की पानी की जरूरतों को मुफ्त में पूर्ति संभव होती हैं और अलग से स्थान की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं। मधु (शहद) की प्राप्ति के लिये मधुमक्खियाँ पाली जातीं हैं। यह एक कृषि आधारित उद्योग है। मधुमक्खियां फूलों के रस को शहद में बदल देती हैं और उन्हें अपने छत्तों में जमा करती हैं। जंगलों से मधु एकत्र करने की परंपरा लंबे समय से लुप्त हो रही है। बाजार में शहद और इसके उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण मधुमक्खी पालन अब एक लाभदायक और आकर्षक उद्यम के रूप में स्थापित है। मधुमक्खी पालन के उत्पाद के रूप में शहद और मोम आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

 

मधुमक्खी पालन के लाभ

1) पुष्प रस व पराग का सदुपयोग, आय व स्वरोजगार का सृजन करता है।

2) शुद्ध मधु, रायल जेली, मोम, पराग, मौनी विष का उत्पादन होता है।

3) बगैर अतिरिक्त खाद, बीज, सिंचाई एवं शस्य प्रबन्ध के, मात्र मधुमक्खी के मौन वंश को फसलों के खेतों व मेड़ों पर रखने से फसल, सब्जी एवं फलोद्यान में सवा से डेढ़ गुना उपज में बढ़ोत्तरी होती है।

4)मधुमक्खी उत्पाद जैसे मधु, रायल जेली व पराग के सेवन से मानव स्वस्थ एवं निरोगित होता है। मधु का नियमित सेवन करने से तपेदिक, अस्थमा, कब्जियत, खून की कमी, और रक्तचाप की बीमारी नहीं होती है। रायल जेली का सेवन करने से ट्यूमर नहीं होता है और स्मरण शक्ति व आयु में वृद्धि होती है। मधु मिश्रित पराग का सेवन करने से प्रास्ट्रेटाइटिस की बीमारी नहीं होती है। मौनी विष से गाठिया, बताश व कैंसर की दवायें बनायी जाती हैं तथा बी – थिरैपी से असाध्य रोगों का निदान किया जाता है।

5) मधुमक्खी पालन में कम समय, कम लागत और कम पूंजी निवेश की जरूरत होती है।

6) कम उपज वाले खेत से भी शहद और मधुमक्खी के मोम का उत्पादन किया जा सकता है।

7) मधुमक्खी पालन का पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मधुमक्खियां कई फूल वाले पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस तरह वे सूर्यमुखी और विभिन्न फलों की उत्पादन मात्रा बढ़ाने में सहायक
होती हैं।

8) मधुमक्खी पालन किसी एक व्यक्ति या समूह द्वारा शुरू किया जा सकता है।

9) बाजार में शहद और मोम की भारी मांग है जिससे की अच्छी कमाई की जा सकती है।

 

 

स्रोत-

  • कृषि प्रणाली अनुसंधान परियोजना निदेषालय

 

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