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पौधशाला व पौध तैयार करने में सावधानियाँ – Kisan Suvidha
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पौधशाला व पौध तैयार करने में सावधानियाँ

पौधशाला प्रबंधन

पौधशाला व पौध तैयार करने में सावधानियाँ

पौधशाला व पौध तैयार करने में सावधानियाँ निम्न है:-
  1. नई भूमि की पौधशाला की तैयारी : यदि भूमि का पहली बार उपयोग किया जा रहा है तो इसे फफूंद रहित करने के लिए इसका फॉरमेल्डिहाइड नामक रसायन से उपचार करना आवश्यक है | जिसका 25 मि.ली. से 1 लीटर पानी में घोल बनाएं तथा पौधषाला के लिए चुने गए स्थान पर अच्छी तरह छिड़काव कर भिगोएं। तत्पष्चात् इस स्थान को पोलीथीन चादर से अच्छी तरह ढक दें। लगभग एक सप्ताह पष्चात् पोलीथीन चादर हटाकर इस जगह की अच्छी तरह 3-4 बार जुताई व खुदाई कर खुला छोड़ दें जिससे रसायन का असर समाप्त हो जाए। इसके पष्चात् भूमि को अच्छी तरह भुरभुरी बनाएं तथा लगभग उपचार के 15 दिन पष्चात् बुवाई के लिए तैयार करें। यह उपचार कमर  तोड़ (डैंपिंग ऑफ) नामक बीमारी की रोकथाम में सहायता करेगा।
  1. पौधशाला भूमि को सौर उर्जा से रोगाणुरहित करनाः इस तकनीक के अच्छे प्रभाव और ताप संचय के लिए भूमि की जुताई अच्छी तरह की जानी चाहिए और भूतल समतल होना चाहिए ताकि पाॅलीथीन की चादर ठीक तरह से बिछाई जा सके और भूमि अच्छी तरह से पानी सोख लें। भूमि की अच्छी तरह से जुताई करने के बाद उसमें गोबर की खाद मिला लें और भूमि की सिंचाई करें। सिंचित भूमि को सफेद पारदर्शी और पतले (25 से 50 माईक्राॅन या 100 से 200 गेज मोटा) पाॅलीथीन से गर्मियों में 4-6 सप्ताह तक ढक दें। पाॅलीथीन चादर के किनारों को भूमि में अच्छी तरह से दबा देना चाहिए। उपचारित करने की अवधि समाप्त होने पर पाॅलीथीन की चादर को भूमि से हटा दें और फिर उपचारित भूमि में विभिन्न सब्जियों की बीजाई करें ताकि स्वस्थ पौध तैयार हो सके।
  1. 3 मीटर लम्बी, 1 मीटर चैड़ी तथा 15 से.मी. उंची क्यारी में 20-25 कि.ग्राम अच्छी तरह से गली सड़ी गोबर की खाद ट्राइकोडर्मा हार्जिएनम के साथ 1ः50 के अनुपात में 200 ग्राम सिंगल सुपर फाॅस्फेट और 15-20 ग्राम फफूँदनाशक डायथेन एम-45 या कैप्टाफ और कीटनाशक जैसे मिथाईल पैराथियाॅन धूल (20-25 ग्राम) मिला लेना चाहिए।
  1. बीज को बोने से पूर्व फफूँदनाशक रसायन से सूखा उपचार कर लेना चाहिए (2-3 ग्राम कैप्टान/बाविस्टीन इत्यादि फफूंदनाशक या ट्राइकोडर्मा हार्जिएनम प्रति किलो ग्राम बीज)। इससे डैपिंग आॅफ नाम के बीमारी का प्रकोप कम होगा।
  1. बीज को 5 सें.मी. दूर पंक्तियों में लगाकर गोबर की खाद या मिट्टी की पतली तह से ढक दें। मिट्टी का फफूँदनाशक रसायन से उपचार करें। बीजाई के तुरंत बाद क्यारी को सूखी घास से ढक दें।
  1. ग्रीष्म ऋतु में प्रातः और सांयःकाल क्यारियों की सिंचाई करें। शीत ऋतु में एक ही बार पर्याप्त है। क्यारियाँ नम होनी चाहिए। अधिक नमी होने पर कमर तोड़ रोग तेजी से फैलता है।
  1. जब तक पौधे स्थापित न हो जायें, प्रतिदिन सिंचाई करें।
  2. बीज का अंकुरण होने पर घास की परत उठा दें। यदि आवश्यक हो तो शीत ऋतु में रात्रि में पौध को प्लास्टिक से ढक दें तथा दिन में उठा दें।
  1. कमर तोड़ रोग के प्रकट होने की आशंका में पौधशाला में डायथेन एम-45 2 ग्राम/लीटर या बाविस्टीन 2 ग्राम/लीटर पानी में घोल कर सिंचाई करें।
  1. यदि पौघे कमजोर हों तो 0.3 प्रतिशत यूरिया के घोल (3 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव करें। इससे बढ़वार अच्छी होगी।
  1. हर सप्ताह खरपतवार व अवांछनीय पौधों की निकासी करें तथा हल्की गुड़ाई करें।
  2. आवश्यकतानुसार पौध संरक्षण उपायों का उचित प्रयोग करें।
  3. 4 से 6 सप्ताह में पौधे 10-15 से.मी. ऊँचे हो जाते हैं तथा वे रोपाईयुक्त होते हैं।
  4. पौध उखाड़ने से 3-4 दिन पूर्व सिंचाई न करें परन्तु पौध उखाड़ने वाले दिन सिंचाई करने के बाद ही पौध को उखाडें। रोपाई से पहले पौधों की डायथेन एम-45 2 ग्राम/लीटर या बाविस्टीन 2 ग्राम/लीटर पानी के घोल में कुछ समय डुबोए रखें।
  1. स्वस्थ पौधों का ही रोपण करें और यह कार्य दोपहर बाद करना चाहिए।

 

स्रोत-

  • शाकीय विज्ञान संभाग एवं  कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केन्द्र भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली – 110 012

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