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पीपरामूल की कृषि क्रियाओं का पैकेज – Kisan Suvidha
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पीपरामूल की कृषि क्रियाओं का पैकेज

पीपरामूल की खेती

पीपरामूल की कृषि क्रियाओं का पैकेज

हाल ही के वर्षों में न केवल देश में बल्कि निर्यात के लिए भी औषधीय पादपों की मांग में अत्यधिक तेजी देखने में आई है । अधिकाधिक संख्या में किसान इस सबसे अधिक मांग वाले क्षेत्र को अपना रहे हैं । राष्ट्रीय औषधीय एवं सगंधीय पादप अनुसंधान केन्द्र (एन.आर.सी.एम.ए.पी.) आनंद में पीपरामूल की कृषि क्रियाओं की पद्धतियों के पैकेज का विकास किया है ।

भारतीय चिकित्सा पद्धति में प्रयोग की जाने वाली पीपरामूल, पाइपर लोंगम (लिंन.) सूखा कच्चा फल (बाजार में स्पाईक नाम से प्रचलित) के रूप में उपयोग की जाती है । जुकाम, खांसी, ब्रोंकाइटिस, दमा, ज्वर, मांसपेशीय पीड़ा, अनिद्रा रोग, मिर्गी, अतिसार, पेचिश, कुष्ठ इत्यादि के उपचार के लिए इसका उपयोग किया जाता है । इस समय इस पादप की जड़ों और तने के नीचे वाले मोटे भाग का भी समस्त आयुर्वेक पद्धति में उपयोग किया जाता है । भारत अभी मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर और श्रीलंका से अत्यधिक मात्रा में पीपरामूल का आयात करता है । इसकी खेती पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, महाराष्ट्र (अकोला क्षेत्र), उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश (विशाखापट्टनम क्षेत्र), उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु (अन्नामलाई पहाड़ियां) और केरल जैसे अत्यधिक वर्षा, नमी और 15-35 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक फसल के रूप में की जाती है ।

 

जलवायु

इसकी खेती किसी पूरक सिंचाई के बिना असम और मेघालय के अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों और अन्य भागों में सिंचित फसल के रूप में की जाती है । चूंकि यह एक सतही जड़ वाली फसल है, इसलिए इसके लिए अत्यधिक नमी और बार-बार सिंचाई करने की आवश्यकता होती है । इस पादप को अच्छे विकास के लिए अंशतः छाया में उगाया जाना चाहिए । इस प्रकार, इसकी खेती सिंचित नारियल और सुपारी बागानों में मिश्रित फसल के रूप में सफलतापूर्वक की जा सकती है । यह सूखे और जल मग्नता होने की स्थितियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है ।

 

मृदा

इसकी फसल कई प्रकार की मृदा में अच्छी प्रकार से फलती-फूलती है । जैव तत्व में प्रचुर, हल्की रंध्रदार सुजल विकसित मिट्टी इसकी खेती-बाड़ी के लिए सबसे अधिक अनुकूल है ।

 

भूमि तैयार करना

दो से तीन बार हल चलाकर खेत को तैयार किया जाना चाहिए । इसके बाद एक अथवा दो बार हैरो चलाकर उसको समतल बनाया जाना चाहिए । खेतों की ढलान को ध्यान में रखते हुए सिंचाई पानी की अधिकता की निकासी के लिए नालियों की व्यवस्था करें । इसकी फसल जल-मग्नता की स्थिति में पनपती नहीं है ।

 

पौध रोपण सामग्री

पीपरामूल की लताओं की कलम भूमि में लगाकर उगाई जाती है । पौध-रोपण की सामग्री के रूप में काम में लाने के लिए तने के किसी भी भाग से तीन गांठों वाली कलमों को लेने की सिफारिश की जाती है । पौध लगाने के पश्चात् जड़ें आने में लगभग 15-20 दिनों का समय लगता है । कलमें खेत में सीधे अथवा खेत में पौध को रोपने से पहले नर्सरी में जड़ें उग आने के पश्चात् लगाई जा सकती हैं ।

 

पौध रोपाई का समय

मई-जून के दौरान मानसून के शुरू होने पर पौध रोपें । पंक्ति से पंक्ति और पौध से पौध के बीच की दूरी लगभग 60 ग 60 सें.मी. रखी जा सकती है । यदि पौधों को पहले नर्सरी में उगाया जाना है तो खेतों में पौधों की रोपाई के एक माह पहले नर्सरी में पौधों को लगाना चाहिए ।

 

पीपरामूल की किस्में

’विश्वम’ किस्म को मिश्रित फसल के रूप में उगाएं । इसका पौधा लगभग 72 से.मी. की ऊंचाई तक होता है और लम्बे समय तक फूल देता रहता है । इसमें स्थूल, छोटी तथा मोटी बालियां आती हैं । ये बालियां जब पकती हैं तो इनका रंग गहरा हरा होता है । इनकी बालियों में लगभग 20 प्रतिशत सूखा पदार्थ होता है । यह किस्म वर्ष में लगभग 240-270 दिनों तक पैदावार देती है जो आर्थिक दृष्टि से भी फायदे वाली होती है और इन बालियों में लगभग 2.83 प्रतिशत एल्केलाइड होता है ।

 

खाद डालना

पहले वर्ष में भूमि तैयार करने के समय लगभग 20 टन प्रति हैक्टेयर घूरे की खाद डालनी चाहिए । बाद के वर्षों में बरसात शुरू होने से पहले खेत में घूरे की खाद डालें । किसी रासायनिक उर्वरक के प्रयोग की सिफारिश नहीं की जाती है ।

 

निराई – गुड़ाई

पहले वर्ष में, जब भी आवश्यक हो, खरपतवार को उखाड़ा जाना चाहिए । सामान्यतः दो से तीन बार खरपतवार को उखाड़ा जाना पर्याप्त है । एक बार फसल उग जाती है और खेत को आच्छादित कर लेती है तो खरपतवार की किसी गम्भीर समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है ।

 

सिंचाई

गर्मी के महीनों के दौरान सिंचाई को सुनिश्चित करें । एक सप्ताह में एक अथवा दो बार सिंचाई करें जो मिट्टी की जल वहन क्षमता पर निर्भर करता है । बरसात की अवधि के दौरान भी यदि काफी समय तक बरसात नहीं होती है तो सिंचाई करें । यदि फसल सिंचित होती है तो गर्मी के महीनों में भी बाली का उत्पादन जारी रहता है ।

 

पादप सुरक्षा

फाईटोफ्थोरा, तना गलन रोग और एन्थ्राक्नोज पीपरामूल के महत्वपूर्ण रोग हैं, इन रोगों से होने वाली हानियों को कम करने के लिए 0.5 प्रतिशत बोरडोक्स मिश्रण को पाक्षिक अन्तराल पर और एक प्रतिशत बोरडोक्स मिश्रण मासिक अन्तराल पर मिट्टी पर छिड़कें । कलियों को नुकसान पहुंचाने वाले पीले कीड़ों और हीलोपेल्टिस थीवोरा की रोकथाम करने के लिए 0.25 प्रतिशत नीम के बीज की गिरी के सत और किसी अन्य नीम-आधारित कीटनाशी का छिड़काव प्रभावकारी है ।

 

फसल काटना और उसे सुखाना

पौध लगाने के छह महीने के पश्चात् लताओं पर फल लगने शुरू हो जाते हैं । छोेटी बालियों के आने से पकने तक लगभग दो महीने का समय लगता है । पकने से पहले पूर्ण विकसित बालियों को तोड़ लेना चाहिए । केरल में तीन से चार बार बालियों को तोड़ा जा सकता है जो इनके पकने पर निर्भर करता है । जब ये बालियां काले हरे रंग की हो जाएं तो इनको तोड़ें । पहले वर्ष में सूखी बालियों की पैदावार लगभग 400 कि.ग्रा./हैक्टेयर औैर तीसरे वर्ष में 1,000 कि.ग्रा./हैक्टेयर तक होती है ।

तीन वर्ष के पश्चात् पैदावार कम हो जाती है और पांचवे वर्ष के पश्चात् धीरे-धीरे उसकी खेती करना अलाभकारी हो जाता है । बालियों के अतिरिक्त मोटी जड़ों और आधारी तने वाले भागों को भी काटा जाना चाहिए और फसल को यथावत छोड़ने से पहले उनको सुखा लिया जाना चाहिए क्योंकि इनको आयुर्वेदिक और युनानी चिकित्सा पद्धतियों में महत्वपूर्ण औषध अवयवों के रूप में उपयोग किया जाता है । औसतन 500 कि.ग्रा. जड़ें प्रति हैक्टेयर प्राप्त हो सकती हैं । तोड़ी हुई बालियों को धूप में 4-5 दिनों तक सुखाया जाना चाहिए । हरी बालियों से सूखी हुई बालियों का अनुपात 5:1 है । सूखी हुई बालियों को नमी रहित डिब्बे में रखा जाना चाहिए । उत्पाद को एक वर्ष से अधिक समय तक नहीं रहना चाहिए ।

 

रासायनिक संरचना

इसके फलों में वाष्प्शील तेल, रेजिन, पिपराइन (4-5:) और टार्पीनोयड पदार्थ होता है । इसकी जड़ों में पिपराइन के अतिरिक्त प्रमुख ऐल्केलायडों के रूप में पिपरलोंगुमाइन होता है ।

 

आर्थिकी

इसकी फसल पादप रोपाई के दूसरे वर्ष से लगभग 25,000-75,000 रुपये प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ देती है । अंतिम वर्ष में पीपरामूल के रूप में बेची गई सूखी जड़ों और तने की अतिरिक्त आय के कारण लाभ बढ़ जाता है ।
सावधानी: औषधीय और सगंधीय पौधों की खेती पहले इसके बाजार सुनिश्चित करके की जाती है । हानिपूर्ण विक्रय के जोखिम को कम करने के लिए पूर्व खरीददारी का इंतजाम करना अच्छा होगा ।

 

स्रोत-

  • राष्ट्रीय औषधीय और सगंधीय पौध अनुसंधान केन्द्र, बोरियावी, आनंद

 

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