0
  • No products in the cart.
Top
धान के बिचड़ों का पौधशाला प्रबंधन – Kisan Suvidha
8029
post-template-default,single,single-post,postid-8029,single-format-standard,theme-wellspring,mkdf-bmi-calculator-1.0,mkd-core-1.0,woocommerce-no-js,wellspring-ver-1.2.1,mkdf-smooth-scroll,mkdf-smooth-page-transitions,mkdf-ajax,mkdf-blog-installed,mkdf-header-standard,mkdf-sticky-header-on-scroll-down-up,mkdf-default-mobile-header,mkdf-sticky-up-mobile-header,mkdf-dropdown-slide-from-bottom,mkdf-search-dropdown,wpb-js-composer js-comp-ver-4.12,vc_responsive

धान के बिचड़ों का पौधशाला प्रबंधन

धान के बिचड़ों का पौधशाला प्रबंधन

धान के बिचड़ों का पौधशाला प्रबंधन

रोपनी विधि से धान की खेती करने हेतु बिचड़ा तैयार करना आवश्यक है रोपनी के बाद धान के पौधे में  जड़ों का विकास व वनस्पतिक वृिद्ध (लम्बाइर्, पत्तियो, कल्लो आदि) का तेजी से होना अधिक उपज प्राप्त करने के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। इस प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि धान की रोपनी स्वस्थ्य एवं तन्दुरूस्त बिचड़ों से की जाए। एक आदर्श धान का बिचड़ा छोटा, मोटा, भारी एवं कीट-व्याधि से मुक्त होना चाहिए।

धान का बिचड़ा सामान्यतया चार विधियों से तैयार किया जाता है ये विधियाँ हैं

1) सूखी क्यारी

2) गीली क्यारी

3) डैपोक विधि एवं

4) श्री विधि

सूखी व गीली क्यारी विधि से बिचड़ा तैयार करने का हुनर बिहार के किसानों को परम्परागत रूप से है डैपोक विधि से हमारे यहाँ बिचड़ा तैयार नहीं किया जाता है| परन्तु इस विधि से कम से कम समय में बिचड़ा तैयार किया जा सकता है। डैपोक विधि से तैयार बिचड़ा मशीन से रोपनी हेतु उपयुक्त होता है। श्री विधि से खेती करने हेतु बीजस्थली का ऊँची क्यारी विधि से बनाना आवश्यक है। आज आवश्यकता है कि किसानो  के हुनर के साथ बिचड़ा तैयार करने के विज्ञान को समझा जाये जिससे कि बीजस्थली का प्रबंधन कर स्वस्थ्य व तन्दुरूस्त बिचड़ा तैयार किया जा सके।

 

बिचड़ा का विज्ञान

1.    बिचड़ा लम्बाई व वृिद्ध मे  एक समान हो। बिचड़ो  की अनियमित वृिद्ध कई कारणों से हो सकती है अतः प्रबंधन हेतु निम्न बातों पर ध्यान रखें।
  • बीजस्थली समतल हो ।
  • मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता हो ।
  • बीज एक तरह से समान दूरी पर गिराये जाएँ ।
  • बीजो का अंकुरण एक रूप से हो ।
  • जल प्रबंधन पर ध्यान रखा जाए ।(चार पत्तियो  वाला 20 से0मी0 लम्बा स्वस्थ पौधे लगायें)
२.  बिचड़ों का पर्णावरण (लीफ सीथ) छोटा हो- इसके लिए
  • बीजस्थली में 2-5 से0मी0 का जल स्तर रखें ।
  • जल-स्तर बढ़ने से पर्णावरण लम्बा हो जाएगा यानि शुरू में ही बिचड़ो  का बढ़वार तेज हो जाएगा व बिचड़ा कमजोर हो जाएगा ।
  • बदली होने घना बीज बोने या पेड़ों की छाया में बीजस्थली पड़ जाने से रोषनी कम मिलती है और पर्णावरण लम्बे हो जाते हैं ।
3. बिचड़ों में जड़ों की बहुतायतता एवं वजन अधिक हो –
  • बीजस्थली मे  भरपूर पोषक तत्व का व्यवहार (प्रति 1000 वर्गमीटर बीजस्थली हेतु 20 क्विंटल कम्पोस्ट, 6 किलोनेत्रजन, 3 किलो स्फुर तथा 1.5 किलो पोटाष) करें।
4. बीजस्थली में बीज डालने का समय –
  • लम्बी अवधि के प्रभेद – रोहिणी नक्षत्र
  • मध्यम अवधि के प्रभेद – मृगशिरा नक्षत्र
  • अल्प अवधि के प्रभेद – आद्रा नक्षत्र
5. बीज की मात्रा एवं बीजस्थली का क्षेत्रफल –
  •    बीजस्थली का क्षेत्रफल रोपनी के क्षेत्र का दसवाँ हिस्सा यानि एक हेक्टर की रोपनी हेतु 1000 वर्गमीटर क्षेत्र में बीजस्थली डालना ।

सामान्यतया 30-40 किलो0/हे0 बीज की आवश्यता (धान के 1000 दानोका वजन अगर 15-20 ग्राम है तो बीज कम और अगर 25-30 ग्राम है तो बीज अधिक लगेगा) ।

6. बिचड़ों का उम्र – बिचड़ों के उम्र का उपज से सीधा सम्बन्ध है| बीजस्थली में अगर पौैधे ज्यादा दिनों  तक रह   जाए तो उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • लम्बी अवधि के प्रभेद: 25-30 दिनों का बिचड़ा
  • मध्यम अवधि के प्रभेद: 20-25 दिनों  का बिचड़ा
  • अल्प अवधि के प्रभेद: 15-20 दिनों  का बिचड़ा
7.  बीजस्थली कीट-व्याधि व खरपतवार से मुक्त हो –
  • बीज का बीजोपचार – 2 ग्राम वेभिस्टीन प्रति किलो ग्राम बीज की दर से करें ।
  • बीजस्थली की देखभाल तथा कीट से सुरक्षित रखने हेतु काबोफ्यूरान 2.5 किलो या थायमेट 1 किलो दानेदार दवा को प्रति 1000 वर्गमीटर क्षेत्र के हिसाब से बिचड़ा उखाड़ने के एक सप्ताह पहले प्रयोग करें ।
  • खरपतवार की निकौनी करें या आवश्यकतानुसार बूटाक्लोर 50 ई0सी0 दवा का 300 मि0ली0 प्रति 1000 वर्गमीटर क्षेत्र में बुआई के एक सप्ताह बाद छिड़काव करें ।

बिचड़ा तैयार करने की विधियाँ

परीक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि विधियों के अन्तर का प्रभाव उपज पर ज्यादा नहीं पड़ता है । जल की उपलब्धता, भूमि का प्रकार और किसानों का अपना पसंद किसी स्थान विशेष में बिचड़ा डालने की विधि को प्रचलित करता है। कुछ खास तकनीकी व लाभ के दृष्टिकोण से विधियों  का वर्णन इस प्रकार है –

1.सूखी क्यारी

यह विधि एसे स्थानों पर व्यवहार में लाया जाता है जहां वर्षा के कारण खेत में नमी अच्छी जल धारण क्षमता वाली है । इस विधि में खेत की बारीक जुताई की जाती है और 1.0-1.5 मीटर चैड़ा, 4-5 से0मी0 ऊँचा एवं लम्बाई सुविधानुसार रखकर क्यारी बनाते है। दो क्यारियो  के बीच 30 से0मी0 का नाली बनाते है। उपयुक्त नमी या सूखे क्यारी मे  ही सूखे बीज की बुआई की जाती है । इस प्रकार से तैयार बिचड़ो के निम्नलिखित लाभ है –

  •     ऊँची क्यारी विधि से तैयार बिचड़ा समतल क्यारी विधि की तुलना में ज्यादा तन्दुरूस्त होता है
  •     इसे उखाडने में भी आसानी होती है ।
  •    रोपनी के बाद जल्द अपने को स्थापित कर लेता है, तथा मृत्युदर कम होता है ।
  •    इन बिचड़ों को आवश्यकता पड़ने पर बिना तना में गांठ बने ज्यादा दिनों तक बीजस्थली में रखा जा सकता है ।

2. गीली क्यारी

यह विधि ऐसेे स्थानों पर व्यवहार में लाया जाता है जहाँ सिंचाई सुनिश्चित है और अपेक्षाकृत भारी मिट्टी है। खेत को सूखे या नम अवस्था में अच्छी तरह जुताई करके कदवा व पाटा लगाया जाता है । इसके बाद खेत में सूखी विधि की तरह ही क्यारी बनाया जाता है । इन क्यारियों में प्रस्फुटित बीज की बुआई करते है। प्रस्फुटन हेतु बीज को 24 घंटा पानी में भिंगोये तथा इसे पानी से निकालकर 36-48 घंटा तक गीले बोरे से ढ़ककर छायेदार जगह में रखे। इस प्रकार से तैयार बिचड़ों से निम्नलिखित लाभ है –

  •     कम समय में पूर्ण विकसित बिचड़ा तैयार होता है ।
  •    बीजस्थली में अपेक्षाकृत कम खरपतवार होता है ।

3.डैैपोक विधि

बिना सीधा मिट्टी से सम्पर्क में  बीजों को लाये बीजस्थली में  घना बीज डालना डैपोक विधि की विशेषता है । इसमें प्रति वर्गमीटर लगभग 3 किलो बीज डाला जाता है। प्रस्फुटित बीजों को केला पत्ता, पोलीथिन चादर, सीमेंट या खाद का बोरा, फर्श आदि पर घना करके फैलाया जाता है। जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान रखते हैं। बिचड़ा 12-14 दिनों में तैयार हो जाता है इस प्रकार से तैयार बिचड़ों से निम्नलिखित लाभ है –

 

  • मनचाहे स्थान पर बीजस्थली का चयन ।
  • कम से कम स्थान की आवष्यकता (40 वर्गमीटर/हे0)
  • कम समय और साधन की जरूरत ।
  • बिचड़ा उखाड़ने की आवश्यकता नहीं ।

 

4. श्री विधि

श्री विधि से धान की खेती करने हेतु बीजस्थली प्रबंधन पर विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है क्योकि इस विधि में बिचड़ों का उम्र मात्र 8-10 दिन (पौधे का दो पत्ती अवस्था) का होता है । बीजस्थली प्रबंधन हेतु –

  • एक हेक्टर मुख्य खेत की रोपनी हेतु 5 किलोग्राम बीज और 100 वर्गमीटर नर्सरी क्षेत्र की आवश्यकता ।
  • नर्सरी को मुख्य खेत के आस-पास या उसी खेत के किनारे 1×10 मीटर या 1 x20 मीटर के क्रमशः दस या पाँच क्यारियाँ बनायें ।
  • इन क्यारियों  को जमीन से 8-10 से0 मी0 ऊँचा बनाये तथा चारो तरफ नाला बना दें ।
  • इन क्यारियों को 1:1 के अनुपात में मिट्टी एवं जैविक खाद को मिलाकर भर दें ।
  • प्रस्फुटित बीज को समान रूप से (50 ग्राम प्रति वर्गमीटर) इन क्यारियों पर बिखेर दें तथा मिट्टी एवं खाद के मिश्रण को उपर से इसपर हल्का डालकर हाथ से मिला दें तथा पुआल से 2-3 दिनो  के लिए ढ़क दें ।
  • कयारियों पर प्रतिदिन 2-3 बार हाथ से या हजारा से हल्की सिंचाई करें ।धान के बिचड़ों का पौधाशला प्रबंधन हेतु विधियों को जानने से ज्यादा विज्ञान को समझने की आवश्यकता है। विज्ञान समझने से आवश्यकतानुसार किसी भी विधि से धान का स्वस्थ और तन्दुरूस्त बिचड़ों तैयार किया जा सकता है जिससे कि अधिक उपज प्राप्त किया जा सके।

 

Source-

No Comments

Sorry, the comment form is closed at this time.