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धान की उन्नत उत्पादन तकनीकी / Paddy farming – Kisan Suvidha
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धान की उन्नत उत्पादन तकनीकी / Paddy farming

धान की खेती

धान की उन्नत उत्पादन तकनीकी / Paddy farming

परिचय

धान भारत की प्रमुख एवं महत्वपूर्ण फसल है इसकी खेती वर्षा ऋतू में की जाती है|

 

भूमि की तैयारी

गर्मी में उपयुक्त समय मिलने पर खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलट हल से अवश्य कर लें। मेड़ों की सफाई अवश्य करें। गोबर या कम्पोस्ट की खाद 10 से 12 टन प्रति हेक्टर अंतिम जुताई या वर्षा पूर्व खेत में फैलाकर मिलायें।

 

धान की खेती की प्रचलित पद्धतियां

1. सीधे बीज बोने की पद्धतियां

खेत में सीधे बीज बोजकर निम्न तरह से धान की खेती की जाती है-
– छिटकवां बुवाई।
– नाड़ी हल या दुफन या सीडड्रिल से कतारों में बुवाई।
– बियासी पद्धति (छिटकवां विधि) से सवा गुना अधिक बीज बोकर बुवाई के एक महीने बाद फसल की पानी भरे खेत में हल्की जुताई।
– लेही पद्धति (धान के बीजों को अंकुरित करके मचौआ किये गये खेतों में सीधे छिटकवां विधि से बुवाई)

2.रोपा विधि

इस विधि द्वारा पहले धान की रोपणी (खार) सीमित क्षेत्र में तैयार की जाती है तथा 25 से 30 दिन के पौध को खेत को मचाकर रोपाई की जाती है।

3. बीज की मात्रा

धान के लिए बीज की मात्रा बुवाई के पद्धति के अनुसार अलग-अलग रखनी चाहिए, जो निम्नानुसार होनी चाहिए-

बोवाई पद्धति बीज दर
(किलो/हेक्टेयर)
छिटकवां विधि से बोना  100-120
कतारों में बीज बोना   90-100
लेही पद्धति में  70-80
रोपाई पद्धति में  40-50
बियासी पद्धति  125-150

 

बीजोपचार

बीज को थायरम या डायथेन एम 45 दवा 2.5 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बोनी करें। बैक्टेरियल बीमारियों के बचाव के लिये बीजों को 0.02 प्रतिशत स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल में डुबाकर उपचारित करना लाभप्रद होता है।

 

बुआईमय

वर्षा प्रारंभ होते ही धान की बुआई का कार्य प्रारंभ कर दें। जून मध्य से जुलाई प्रथम सप्ताह तक बोनी का समय सबसे उपयुक्त होता है। रोपाई के बीजों की बुवाई रोपणी में जून के प्रथम सप्ताह से ही सिंचाई के उपलब्ध स्थानों पर कर दें क्योंकि जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई मध्य तक की रोपाई से अच्छी पैदावार मिलती है।

 

खाद एवं उर्वरकों का उपयोग-

गोबर की खाद या कम्पोस्ट

धान की फसल में 5 से 10 टन/ हेक्टेयर तक अच्छी सड़ी गोबर खाद या कम्पोस्ट का उपयोग करने से महंगे उर्वरकों के उपयोग में बचत की जा सकती है। हर वर्ष इसकी पर्याप्त उपलब्धता न होने पर कम से कम एक वर्ष के अंतर से इसका उपयोग करना बहुत लाभप्रद होता है।

हरी खाद का उपयोग-

रोपाई वाली धान में हरी खात के उपयोग में सरलता होती है, क्योंकि मचौआ करते समय इसे मिट्टी में आसानी से बिना अतिरिक्त व्यय के मिलाया जा सकता है। हरी खाद के लिए सनई का लगभग 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से रोपाई के एक महीना पहले बोना चाहिए। लगभग एक महीने की खड़ी सनई की फसल को खेत में मचौआ करते समय मिला देना चाहिए। यह 3-4 दिनों में सड़ जाती है। ऐसा करने से लगभग 50-60 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर उर्वरकों की बचत होगी।

जैव उर्वरकों का उपयोग

कतारों की बोनी वाली धान में 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर प्रत्येक एजेटोवेक्टर और पीएसबी जीवाणु उर्वरक का उपयोग करने से लगभग 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नत्रजन और स्फुर उर्वरक बचाए जा सकते हैं। इन दोनों जीवाणु उर्वरकों को 50 किलो ग्राम/ हेक्टेयर सूखी सड़ी हुई गोबर खाद में मिलाकर बुवाई करते समय कूड़ों में डालने से इनका उचित लाभ मिलता है। सीधी बुवाई वाली धान में उगने के 20 दिनों तथा रोपाई के 20 दिनों की अवस्था में 15 किलो ग्राम/ हेक्टेयर हरी नीली काई का भुरकाव करने से लगभग 20 किलोग्राम/ हेक्टेयर नत्रजन उर्वरक की बचत की जा सकती है। ध्यान रहे काई का भुरकाव करते समय खेत में पर्याप्त नमी या हल्की नमी की सतह रहनी चाहिए। जैव उर्वरक के उपयोग की जानकारी के लिए क्लिक करें

 

उर्वरकों का उपयोग

धान की फसल में उर्वरकों का उपयोग बोई जाने वाली प्रजाति के अनुसार करना चाहिए जो निम्नतालिका में दर्शाया गया है। उपरोक्त मात्रा प्रयोगों के परिणाम पर आधारित है, किन्तु भूमि परीक्षण द्वारा उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण वांछित उत्पादन के लिए किया जाना लाभप्रद होगा।

उर्वरक देने का समय

नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा आधार खाद के रूप में बोनी/रोपाई के पूर्व खेत तैयार करते समय अथवा कीचड़ मचाते समय भुरककर मिट्टी में मिलायें शेष नत्रजन की 1/4 मात्रा कंसे फूटने की अवस्था में (रोपाई के 20 दिन बाद) तथा 1/4 मात्रा गभोट की अवस्था में देना चाहिए। जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में खेत की तैयारी करते समय (बोनी पूर्व) जिंक सल्फेट 25 किलो/ हेक्टेयर की दर से 3 साल में एक बार प्रयोग करें। गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में गंधक युक्त उर्वरकों (जैसे सिंगल सुपर फास्फेट आदि) का प्रयोग करें।

 

जल प्रबंध

धान की फसल में जल प्रबंध का विशेष महत्व है। अधिक कंसे प्राप्त करने हेतु नत्रजन की अधिक उपयोगिता एवं नींदा कम करने हेतु उचित जल प्रबंध आवश्यक है। रोपाई से कंसे निकलने की अवस्था तक खेत में पानी की सतह 2-5 से.मी. रखना चाहिए। कंसे निकलने के बाद से गंभोट की अवस्था तक 10-15 सेमी पानी की सतह रखें। धान की फसल में आवश्यकता से अधिक पानी भरना अच्छी पैदावार प्राप्त करने में बाधक है।

 

पकने की अवधि
समूह
उर्वरकों की मात्रा कि.ग्रा. प्रति हे.
 नत्रजन  सल्फर  पोटाश
शीघ्र पकने वाली (80 से 100 दिन)  बौनी किस्म  40-45  20-30  15-20
मध्यम समय में पकने वाली
(100 से 125 दिन)
 बौनी किस्म  80-100  30-40  20-25
 मध्यम/देरी से पकने वाली (130 से 145 दिन)  बौनी किस्म  100-12  50-60   30-40

 

लेही के लिए बीज अंकुरित करना- लेही पद्धति से बोनी करने के लिए खेत की तैयारी के तुरन्त बाद अंकुरित बीज उपलब्ध होना चाहिए। अत: लेही बोनी के लिए प्रस्तावित समय के 3-4 दिन पहले से ही बीज अंकुरित करने का कार्य शुरू कर दें। इस हेतु निर्धारित बीज की मात्रा को रात्रि में पानी में 8-10 घंटे भिगोयें, फिर इन भीगे हुए बीजों का पानी निकालकर पानी निथार दें। तदुपरांत इन बीजों को पक्की सूखी सतह पर बोनों से ठीक से ढंक दें। ढकने के 24-30 घण्टे के अंदर बीज अंकुरित हो जाता है। इसके बाद डंके गये बोरों को हटाकर बीज को छाया में फैलाकर सुखायें। इन अंकुरित बीजों का इस्तेमाल 6-7 दिनों तक किया जा सकता है।

रोपणी में पौधे तैयार करना

जितने रकबे में धान की रोपाई करना हो उसके 1/20 भाग में रोपणी बनाना चाहिए। इस रोपणी में निर्धारित क्षेत्र के लिए आवश्यक बीज इस प्रकार से बोनी करना चाहिए कि लगभग 3-4 सप्ताह के पौध रोपाई के लिए समय पर तैयार हो जाये। रोपणी के लिए 2-3 बार जुताई, बखरनी करके अच्छी तरह पहले खेत तैयार करें। इसके बाद खेत में 1.5-2.0 मीटर चौड़ी पत्तियां बना लें तथा इनकी लम्बाई खेत अनुसार कम अधिक हो सकती है। प्रत्येक पट्टी के बीच 30 से.मी. की नाली रखें। इन नालियों की मिट्टी नाली बनाते समय पट्टियों में डालने से पट्टियां ऊंची हो जाती हैं। ये नालियां जरूरत के अनुसार सिंचाई व जल निकास के लिए सहायक होती है। रोपणी में बीजों की बुवाई 8 से 10 से.मी. के अंतर से कतारों में करने से रखरखाव तथा रोपणी हेतु पौध उखाडऩे में आसानी होती है।

उन्नत किस्मों का विवरण- विभिन्न उन्नत प्रजातियां एवं उनकी विशेषताएं
प्रजाति                                          पकने की अवधि             उपज क्विं./ हेक्टेयर
जेआर-75                                                        80-85                                 20-25
कलिंगा                                                             80-85                                 20-25
शीघ्र पकने वाली प्रजातियां
दंतेश्वरी                                                            100-105                             30-35
जेआर 201                                                     100-105                             25-30
जेआर 345                                                     100-105                             25-30
पूर्णिमा                                                             105-110                              30-35
मध्यम अवधि में पकने वाली प्रजातियां
आईआर 36                                                   120-125                              45-50
आईआर 64                                                   125-130                              50-55
महामाया                                                        125-130                              55-60
एमटीयू 1010                                                115-120                              40-45
माधुरी                                                             130-135                              40-45
पूसा बासमती 1                                              130-135                              40-45
पूसा सुगंधा 2                                                 120-125                               40-45

 

Source-

  • krishakjagat.org

 

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