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शुष्क क्षेत्र में चारा उत्पादन के लिए ज्वार की खेती – Kisan Suvidha
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शुष्क क्षेत्र में चारा उत्पादन के लिए ज्वार की खेती

ज्वार की खेती

शुष्क क्षेत्र में चारा उत्पादन के लिए ज्वार की खेती

ज्वार

ज्वार चारे की मुख्य  फसल है । जायद में मुख्य रूप से ज्वार की फसल को हरे चारे के लिए उगाते हैं । जायद में मुख्य रूप से ज्वार की फसल को हरे चारे के लिए उगाते हैं, जबकि खरीफ में ज्वार की खेती चारे व अनाज दोनों के लिए की जाती है । इसको सिंचित व असिंचित दोनों अवस्था में उगाया जा सकता है । पशुओं के लिए इसका चारा पर्याप्त रूप से पौष्टिक होता है । इसके चारे में औसतन 4.5 से 6.5 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन होती है । ज्वार का हरा चारा, कड़बी तथा साइलेज तीनों ही पशुओं के लिए उपयोगी तथा शक्तिवर्धक है । चारे की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ज्वार को दलहनी फसलों जैसे चावल, मूंग, ग्वार आदि के साथ मिलाकर बोया जा सकता है ।

 

जलवायु और भूमि

ज्वार की वृद्धि के लिए अधिक तापमान की आवश्यकता होती है । 33 – 340 से. तापमान पर पौधों की वृद्धि अच्छी होती है । इसलिए खरीफ और जायद की फसल के रूप में इसको उगाया जाता है । ज्वार के लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि अच्छी मानी जाती है । उचित जल निकास वाली भारी मृदा में भी इसकी बुवाई की जा सकती है । भूमि का पी.एच. मान 6.5 से 7 तक उपयुक्त रहता है । ज्वार को 30 से 75 से.मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है ।

 

ज्वार की उन्नत किस्में

बहु कटाई वाली किस्में – मीठी सूडान ( एस.एस.जी.-59-3), एम.पी.चरी, पूसा चरी-23, जवाहर चरी-69 (जे.सी.-69) ।

 

एक कटाई वाली किस्में

लिलडी ज्वार, सी.एस.वी.15, सी.एस.वी.20, राज चरी-1, राज चरी-2, पूसा चरी-6 मुख्य किस्में हैं ।

 

खेत की तैयारी

ज्वार की खेती के लिए खेत की मिट्टी को भुरभुरी बनाना आवश्यक है । दो बार हैरो चलाकर पाटा लगाने से खेत पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है । इसके अलावा दो या तीन वर्ष में एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से या तवेदार हल से जुताई करनी चाहिए । कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मेड व खाई बनाकर जल संरक्षण करना चाहिए । दीमक की रोकथाम के लिए अंतिम जुताई से पूर्व 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर क्यूनाॅलफास 1.5 प्रतिशत चूर्ण को खेत में प्रयोग करना चाहिए ।

 

बीज एवं बुवाई

शुष्क क्षेत्रों में वर्षा के आरम्भ होते ही ज्वार की बुवाई कर देनी चाहिए । जिन स्थानों पर सिंचाई के साधन उपलब्ध हों, वहां जून के प्रथम या द्वितीय सप्ताह में बुवाई करें । गर्मियों में चारा प्राप्त करने के लिए मार्च में बुवाई की जा सकती है । बहु कटाई के लिए बीज दर 30-40 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर तथा अनाज व चारा दोनों के लिए उगाई जाने वाली किस्मों की बीज दर 15-20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर होनी चाहिए । बुवाई 25-30 से.मी. की दूरी पर पंक्तियों में करें तथा बीजों को 1.5 से 2.0 से.मी. की गहराई पर बोएं । बुवाई से पूर्व एजोस्पाइरिलम जीवाणु कल्चर द्वारा बीजों का उपचार करना चाहिए ।

 

खाद एवं उर्वरक

अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट 10-15 टन प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के 15-20 दिन पूर्व खेत में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए । इसके अतिरिक्त 40 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस की पूर्ण मात्रा तथा 80 कि.ग्रा. नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के समय तथा नत्रजनकी शेष मात्रा बुवाई के 30 दिन के बाद छिड़क कर प्रयोग करें । कम वर्षा वाले क्षेत्र में उर्वरकों की आधी मात्रा का प्रयोग करें ।

 

सिंचाई प्रबंधन

ज्वार की फसल के लिए बाजरे की अपेक्षा अधिक पानी की आवश्यकता होती है । वर्षा ऋतु में बोई गई फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है । परन्तु लम्बे समय तक वर्षा न होने की स्थिति में सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है । जून माह में पलेवा देकर बोई गई फसल में एक या दो सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है । ग्रीष्म कालीन फसल में 7-10 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए । सिंचाई के लिए फव्वारा विधि भी उपयुक्त है । काजरी में वर्ष 2009-2011 के अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार फव्वारा विधि से 5-7 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करने से उपज में अनुकूल वृद्धि होती है (सारणी 1) ।

 

सरणी 1: गर्मियों में फव्वारा सिंचाई से ज्वार की उपज (तीन वर्षों का औसत) का आंकलन

क्र.सं. सिंचाई हरा चारा (क्विंटल/है.) सुखा चारा (क्विंटल/है.)
1. 5-7 दिन अन्तराल 352.5 64.16
2. 10-15 दिन अन्तराल 114.4 30.53
              औसत 232.1 46.20

फसल सुरक्षा

वर्षा कालीन ज्वार में खरपतवार की समस्या अधिक रहती है । इसलिए बुवाई के 15-20 दिन उपरांत निराई-गुड़ाई करें या एट्राजीन 0.5 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के तुरंत बाद खेत में समान रूप से छिड़कना चाहिए । इस समय खेत की ऊपरी सतह का नम रहना आवश्यक है । ज्वार की फसल में तना मक्खी और तना छेदक का प्रकोप होता है । इसकी रोकथाम के लिए बुवाई के समय बीज के साथ 15 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर फोरेट 10 प्रतिशत या कार्बोफ्यूरान 3 जी. दानों को डालना चाहिए । फफूंद से होने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए मेंकोेजेब 0.2 प्रतिशत का घोल बना कर छिड़काव करें ।

 

कटाई

ज्वार की कटाई पर विशेष ध्यान देना पड़ता है, क्योंकि प्रारम्भिक अवस्था में ’धूरिन’ नामक ग्लूकोसाइड की मात्रा अधिक होती है । अतः ज्वार को बुवाई के 40-50 दिन बाद ही काटना चाहिए । इस समय ’धूरिन’ की मात्रा कम हो जाती है । बहु-कटाई वाली किस्मों में फसल की पहली कटाई 50-55 दिन बाद तथा आगामी कटाइयां 30-35 दिन के अन्तर पर करनी चाहिए । सूखा चारा अथवा ’हे’ बनाने के लिए पौधों को ’बूट’ अवस्था में काटना चाहिए । इस समय अधिकतर पत्तियां हरी रहती हैं व चारे में पौष्टिक तत्व प्रचुर मात्रा में रहते हैं । चारे की उपज किस्म के गुण एवं कटाई की अवस्था पर निर्भर करती है । औसतन हरे चारे की कुल पैदावार 250 से 600 क्विंटल प्रति हैक्टेयर प्राप्त की जा सकती है ।

 

फसल चक्र

चरे के लिए बोई गई खरीफ ज्वार के बाद बरसीम, रिजका, जई, गेहूं, जौ इत्यादि फसलों को बोया जा सकता है । ज्वार को अधिक नत्रजन की आवश्यकता होती है, इसलिए इसके बाद दलहनी फसल को उगाना चाहिए, जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहे । ज्वार को चारे वाली फसल के साथ मिश्रित फसल के रूप में भी बोया जा सकता है । चवला, मूंग, ग्वार या मोठ को ज्वार के साथ बुवाई करने से चारे की पौष्टिकता में वृद्धि होती है । पशुधन केंद्रित आजीविका सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत नागौर जिले के विभिन्न गांवों में चारा उत्पादन बढ़ाने हेतु किए गए प्रयोग में जौ-ज्वार फसल चक्र से 170 से 190 क्विंटल हैक्टेयर सूखा चारा प्राप्त हुआ ।

 

स्रोत-

  • निदेशक, केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ,जोधपुर

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