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शुष्क क्षेत्रों में सब्जियां उगाने के लिए घड़ा सिंचाई प्रौद्योगिकी – Kisan Suvidha
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शुष्क क्षेत्रों में सब्जियां उगाने के लिए घड़ा सिंचाई प्रौद्योगिकी

घड़ा सिंचाई

शुष्क क्षेत्रों में सब्जियां उगाने के लिए घड़ा सिंचाई प्रौद्योगिकी

जल की कमी के कारण, सीमित उपलब्धता में अधिक उत्पादन के लिए जल संरक्षण नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका है । शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में कृषि लवणीय भूजल पर निर्भर होने के कारण, कई देशी तकनीकों का विकास और संस्तुति की गई है । केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल ने इसके लिए घड़ा सिंचाई तकनीक की संस्तुति की है । घड़ा सिंचाई पद्धति का नाम प्रमुख घटक घड़े के नाम पर ही रखा गया है । गर्मियों के मौसम में ग्रामीण इलाकों में प्रयुक्त होने वाले मिट्टी के घडे़ का प्रयोग किया जाता है । 5-8 लीटर क्षमता वाले घड़े, प्रयोग के लिए उपयुक्त हैं|

 

स्थापना के चरण

1.खेत में घड़ों की स्थिति चिन्हित करें । लता वाली फसलों के लिए घड़ों की दूरी ज्यादा और सीधी खड़ी फसलों के लिए यह दूरी कम रखी जाती है ।

2. प्रत्येक स्थान पर 60 सें.मी. गहरा और 90 सें.मी. व्यास का गोल गड्ढा खोदें । गड्ढे से निकाली मिट्टी अलग रखें ।

3. मिट्टी के ढेले तोड़ दें (1 सें.मी. से कम) और इसमें घूरे की खाद और उर्वरकों (फाॅस्फोरस और पोटाश) की आधारीय मात्रा मिला दें । यदि आवश्यक हो तो भूमि सुधारक की मात्रा भी मिला दें । घड़ों के जरिए सिंचाई जल में नाइट्रोजन का प्रयोग करें । गड्ढे में मिट्टी का मिश्रण कम से कम 30 सें.मी. की गहराई तक भरें ।

4. गड्ढे के बीच मेें घड़ा रखें । खोदी गई मिट्टी के मिश्रण को खाली जगह में भरें ताकि घड़े के नीचे से लेकर ऊपर तक सारा स्थान भर जाये । भारी मृदाओं में, घड़े के चारों ओर रेत की हल्की परत भी रखी जाती है । अच्छे संपर्क के अभाव में, पानी या तो घड़े से बाहर नहीं निकलेगा या बहाव अनियमित होगा ।

5. घड़े को साफ पानी से भरें । रेतीले फिल्टर की सहायता से छने वर्षा के जल का प्रयोग भी किया जा सकता है ।

6.घडे भरने के 2-3 दिन बाद, घड़े के चारों ओर 6-8 पौध/बीज लगा दें । पौध/बीज घड़े के चारों ओर एक जैसी दूरी पर हों । इसके लिए आदर्श स्थिति घड़े की दीवार का एकदम बाहही परिसर है । पूर्व निर्धारित अन्तराल पर घड़े को भरें ।
(अनुकूल सारणी लवणीय जल के लिए 2 दिन और ताजा जल के लिए 3 दिन है)|

 

जल आवश्यकता

घड़ा सिंचाई में जल आवश्यकता निम्न मुद्दों पर निर्भर है:
  •  प्रति हैक्टेयर घड़ों की संख्या ।
  •  फसल का प्रकार ।
  •  उपलब्ध जल की गुणवत्ता और भरावन सारणी ।

ताजा जल की तुलना में लवणीय जल के लिए जल्दी भरावन सारणी अपनानी चाहिए । 3 दिन में एक बार भरने वाली भरावन सारणी में जल की आवश्यकता प्रति दिन भरने के मुकाबले लगभग आधी है । जल आवश्यकता निम्नतम 2.8 सें.मी./हैक्टेयर से 12.5 सें.मी./हेक्टेयर तक हो सकती है जब कि घड़ों की संख्या 800 से 5,000 प्रति हैक्टेयर तक बढ़ा दी जाये । इस तरह से सतह सिंचाई पद्धति की दो सिंचाइयों के बराबर ही अधिकतम जल आवश्यकता रह जाती है । यह गण्ना इस अनुमान पर आधारित है कि फसल 3 से 4 महीेने की हो और अधिकतम पुनः पूर्ति दर 2.5 लीटर/दिन हो ।

 

सावधानियां

  •  घडे़ का मुंह बंद रखें ताकि इसमें धूप न पहुचे जिससे फफूंद बनना कम से कम हो ।
  •  केवल साफ पानी का प्रयोग करें ।
  •  भण्डारण से पहले घड़ों को भली प्रकार सुखा लें ।

 

उपज

घड़ा सिंचाई तकनीक से कई फसलें उगाई जा सकती हैं । यह सब्जियों और बागवानी फसलों के लिए बेहद उपयोगी है । जमीन पर फैलने वाली फसलें कम घड़ों की संख्या में भी उगाई जा सकती हैं । ताजा सिंचाई जल के प्रयोग से उगाई जाने वाली कुछ फसलों की उपज नीचे दी गई है । यहां तक कि अंगूर और टमाटर भी उगाए जा सकते हैं ।

 

ताजा जल से विभिन्न फसलों की उपज (ई सी त्र 2.5 डैसी सीमन/मीटर)

फसल उपज (कि.ग्रा./घड़ा) फसल उपज (कि.ग्रा./घड़ा)
तरबूज 11.3 टमाटर 5.8
खरबूज 7.4 फूलगोभी 5.2
कद्दू 21.5 बैगन 5.1
करेला 7.5 बंदगोभी 4.8
तोरई 4.5 गाजर 8.0
खीरा (ककड़ी) 14.0 अंगूर 3.5

 

घड़ों में लवणीय जल का प्रयोग

सब्जियों वाली फसलें, लवणों के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं । ज्यादातर फसलों में 2-3 डैसी सीमन/मीटर का लवणीय जल प्रयोग किया जा सकता है । सिर्फ मिर्च में 4.5 डैसी सीमन/मीटर का लवणीय जल भी प्रयोग किया जा सकता है । घड़ा सिंचाई प्रौद्योगिकी के जरिये सिवाये तोरई और अंगूर के ज्यादातर फसलें ई.सी.झ5 डैसी सीमन/मीटर लवणीय जल में उगाई जा सकती है । उन्नत फसल उत्पादन प्रौद्योगिकी अपनाकर लवणीय जल 15 डैसी सीमन/मीटर में भी फूल गोभी की फसल उगायी जा सकती है ।

 

आर्थिकी

प्रति हैक्टेयर 2500 घड़ों की कीमत लगभग 9,640 से 11,200 रुपये है । घड़ा सिंचाई के जरिए टमाटर में 3 गुना और अन्य सब्जियों में दो गुना लाभ-लागत अनुपात है । यह साधारण प्रौद्योगिकी है और इस तकनीक की आर्थिक क्षमता घड़ों के जीवन पर निर्भर करती है । धरातल पर रखे घड़ों के विपरीत, दबे हुए घड़ों से पानी सीधे मृदा में जाता है और घड़ों की दीवारों से वाष्पन नहीं होता इसलिए घड़े की दीवार पर लवण का जमाव नहीं होता ।

 

 

स्रोत-

  • केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल-132 001

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