गून्दे की खेती / लसोड़े की खेती

गून्दे की खेती

गून्दा या लसोड़ा बोरेजिनेसी कुल से सम्बद्ध एक मध्यम आकार का फल वृक्ष है। यह समस्त शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। इसको खेतो में वायुरोधक के रूप में, गलियों में, घरों में व सार्वजनिक उद्यानों में देखा जा सकता है। यह कम पानी व उर्वरता वाली जमीन में भी पनपता है। राजस्थान के अजमेर, जोधपुर, पाली, सिरोही, जालोर आदि जिलों में बहुतायत में लगाया जाता है। अगर इसे खेत के चारों ओर वायुरोधक के रूप में लगाया जाये तो यह गर्मी में लू से तथा सर्दी में शीत लहर से फसलो की रक्षा करता है।

यह एक बहुवर्षीय तथा बहुउपयोगी पेड़ है जिसके कच्चे फल सब्जी व अचार बनाने के उपयोग में आते है। फलो के अलावा इसके पत्ते पशुओं के चारे के रूप में, लकड़ी कृषि उपकरणों के हत्थे इत्यादि में काम आते है। इसमें औषधीय गुणों की विद्यमानता के कारण इसके फल मूत्र विकार तथा अन्य रोगो में उपयोगी माने गए है।

पूर्णतया पका फल मीठा होता है, तथा ग्रामीण क्षेत्रों में इसे खाया भी जाता है लेकिन इसके गून्दे में लसलसा (गोंद जैसा पदार्थ) अधिक होने के कारण यह फल के रूप में प्रचलित नहीं है। बाजार में कच्चे फल जो कि सब्जी व अचार बनाने के काम आते है, काफी ऊँची दर पर बेचे जाते है। इसके फलो को तुड़ाई उपरान्त भण्डारण की भी कोई समस्या नहीं है, क्योंकि अतिरिक्त फलो को अचार बनाकर या सुखा कर भविष्य के लिए आसानी से परिरक्षित किया जा सकता है।

किस्में व प्रकार

प्रकृति में दो तरह के गून्दे होते है जिनका विवरण निम्न प्रकार हैः

जंगली या छोटे फल वाला गून्दा

इसके पत्ते तथा फल अपेक्षाकृत छोटे होते है । एक फल का वजन 3-4 ग्राम होता है जिसमे लगभग 50 प्रतिशत गुठली तथा 50 प्रतिशत गूदा होता है। इसके फलो की बाजार में कोई कीमत नहीं मिलती है क्योंकि गूदा (खाने योग्य भाग) कम होता है। लेकिन चूँकि इसके बीजों का अंकुरण अच्छा होता है (40-60 प्रतिशत ) इसलिए इसको बडे़ फल वाले गून्दो के लिये रूट स्टॅाक के रूप में  उपयोग में ला सकते है।

बडे़ फल वाले गून्दे

इसके पत्ते तथा फल जंगली गून्दे से लगभग दो गुने बड़े होते है, एक फल का वजन 6-10 ग्राम तथा खाने योग्य भाग 80-90 प्रतिशत तक होता है। इसके बीजो का अंकुरण 20-40 प्रतिशत तक होता है। इसलिए अगर व्यवसायिक तौर पर गून्दे लगाने हो तो बड़े फल वाले गून्दो को ही लगाना चाहिए।

एकत्रित जीव द्रव्य का अवलोकन

काजरी में पिछले 10 वर्षो से राजस्थान के विभिन्न भागो से सर्वेक्षण कर बडे़ फल वाले गूंदो को बीज तथा कलिका द्वारा एकत्रित कर इनकी उत्पादन क्षमता का अवलोकन किया गया। विभिन्न स्थानो से एकत्रित किये गए जीव द्रव्य में फल उत्पादन क्षमता में काफी विभिन्नता पाई गई। अच्छा उत्पादन देने वाले जीव द्रव्य को वानस्पतिक प्रसारण (कलिकायन) विधि से और अधिक पौधे तैयार करके गहन मुल्यांकन किया जा रहा है ताकि निरन्तर अच्छा उत्पादन देने वाली किस्मों का विकास कर किसानो को उपलब्ध करा सके।

पौधे तैयार करना

गून्दे का प्रवर्धन बीज द्वारा तथा कलिकायन विधि से किया जा सकता है। बीज द्वारा पौधे तैयार करने के लिए बडे़ फल वाले गून्दो, जिसकी उपज अच्छी हो, से पके हुए फल इकट्ठे कर ले। पके हुए फलो में से गुठली निकाल लें। चूँकि गुठली के चारो तरफ बहुत सारा लसलसा गुदा होता है इसलिए इसके बालू मिट्टी में रगड़ कर गुठली को साफ कर ले तथा एक-दो दिन धूप में सुखा दे। इसके बाद इन्हें पहले से खाद मिट्टी के मिश्रण से भरी हुई पोलीथीन की थैेलियों में लगादे। बीज को करीब एक इंच गहरा बो कर तुरन्त सिंचाई कर दे।

कलिकायन विधि से पौधे तैयार करने के लिए उपरोक्त विधि से जंगली पौधों से बीज अलग करे तथा उन्हे जून के महीने में पाॅलीथीन थैलियों में बो दे। जब ये पौधे दो महीने के हो जाए तब उन पर बड़े फल वाले गून्दो के पेड़ जिसकी उत्पादन क्षमता अच्छी हो, से कलिका लेकर टी या ढाल विधि से उस पर चढा ले। यह कार्य अगस्त-सितम्बर मे किया जा सकता है।

पौधे लगाना

गून्दे के पौधे जुलाई -सितम्बर में लगाने चाहिए क्योंकि उस समय तक उसी वर्ष में मई-जून मे बोये गए बीजों से पौधे रोपाई योग्य हो जाते है। कलिकायन विधि से तैयार पौधो को भी सितम्बर में लगा सकते है। पौधो व कतारो के बीच की दूरी 6 मीटर रखकर वर्गाकार विधि से क्षेत्र का रेखांकन कर लें। निर्धारित स्थान पर खूंटिया गाड़ कर 2 ग 2 ग 2 फीट आकार के गड्ढे खोदकर तैयार करले। यह कार्य मई-जून में करना चाहिये। खोदे गए गड्ड्ढों की ऊपरी मिट्टी में 15 किलो गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट मिलाकर पुनः भर दे।

अगर दीमक की आशंका हो तो मिट्टी व खाद के मिश्रण में 100 ग्राम क्यूनालफाॅस ;1 . 5: चूर्णद्ध दवा भी मिला दे। गड्ढों की वापिस भराई के पश्चात सभी गड्ढों के केन्द्र बिन्दु पर लकड़ी या लोहे की खूंटी गाड़ दे ताकि पौधे लगाने का केन्द्र बिन्दु ध्यान में रहे। जुलाई-अगस्त में एक दो वर्षा होने के बाद इसमें पौधों की रोपाई कर नियमित सिंचाई करें।

छंटाई व कटाई

गून्दे में फल व फूल पिछले वर्ष की शाखाओं पर ही लगते है इसलिए इसमे प्रतिवर्ष नियमित कटाई की जरूरत नहीं पड़ती है। परन्तु शुरू के दो सालो में इसे एक मजबूत शाखाओं की संतुलित वृद्धि के लिए छंटाई करना अत्यावश्यक होता है। छंटाई करते समय एक दूसरे से ऊपर से गुजरने वाली तथा नीचे की ओर झुकी हुई शाखाओं को धारदार सिकेटियर से कटाई करें। इसी तरह सूखी हुई टहनियाँ तथा रोगग्रस्त शाखाओं को समय-समय पर काटते रहना चाहिए।

सिंचाई

पौधों की रोपाई के प्रथम दो वर्षों में नियमित रूप से सर्दियों में 15 दिन तथा गर्मियो में 7-10 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए। जब पौधे 3-4 साल के हो जाए तब उनमे फलन साधारणतया शुरू हो जाता है। इस समय सिंचाई का उचित प्रबंधन अतिआवश्यक है। बड़े पेड़ो में नवम्बर से जनवरी तक सिंचाई बन्द कर देने से पत्ते पीले पड़ कर गिरने लगते है लेकिन प्राकृतिक रूप से सभी पत्ते एक साथ नहीं गिरते है इसलिए जनवरी के अन्तिम सप्ताह में पेड़ों से सभी पत्ते हाथ से तोड़ देने चाहिए। ऐसा करने से फूल व फल जल्दी व एक साथ आते है।

पत्ते तोड़ने के बाद फरवरी के दूसरे सप्ताह में देशी खाद या कम्पोस्ट (10-15 किलोग्राम प्रति पेड़) डाल कर अच्छी तरह 6 इंच गहरा खोद कर मिट्टी में मिलाकर सिंचाई शुरू करें। जैसे ही तापमान बढने लगता है नई बढवार व फूल एक साथ शुरू हो जाते है। इस दौरान हल्की सिंचाई 7-10 दिन के अन्तराल पर जारी रखे।

खाद एवं उर्वरक

गून्दे में खाद एवं उर्वरको की मात्रा पर ज्यादा अनुसंधान नहीं हुआ है फिर भी अच्छी वानस्पतिक बढवार के लिए प्रतिवर्ष 15-20 किलो गोबर की सड़ी खाद जुलाई-अगस्त में तथा पुनः 10-15 किलो कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट फल लगने से पहले फरवरी के महीने मे देने से भरपूर फलो की पैदावार होती है। जहाँ तक रासायनिक उर्वरको का सवाल है 100-200 ग्राम प्रत्येक नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश प्रति पौधा प्रति वर्ष भूमि की उर्वरता के अनुसार वर्षा ऋतु में देने से फलों की उपज व गुणवत्ता में इजाफा होता है।

रोग व कीट

गून्दे में रोग व कीट से ज्यादा नुकसान नहीं होता है। पौधो की शाखाओं से गोंद जैसा तरल पदार्थ निकलना बहुत आम है। कई बार यह तरल पदार्थ नीचे बहता हुआ दिखाई देता है। यह गोंद प्रायः शाखाओं में सूख कर पोषक तत्वों व पानी के बहाव को रोक देता है जिससे कि ऊपर की शाखाएँ सूखने लगती है। इस बीमारी के कारण व निवारण पर अभी तक कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। फिर भी सूखी हुई शाखाओं को काट कर शाखाओं पर जमे हुए गोंद को चाकू की सहायता से खुरच कर काॅपर आक्सीक्लोराइड या बोर्डो पेस्ट का लेप करके कुछ हद तक नुकसान को कम कर सकते है।

फरवरी-मार्च मे जब पौधों की नई बढवार शुरू होती है तब मोयला, तथा अन्य रस चूसने वाले कीटों का आक्रमण प्रायः देखा गया है। इनके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफाॅस 1 मिली प्रतिलीटर पानी में घोल बनाकर दो तीन छिड़काव 10-15 दिन के अन्तर पर करे।

फूल व फलो का गिरना

फरवरी के दूसरे व तीसने सप्ताह में जब फूलन व फलन शुरू होता है तो कई बार तापमान अचानक बढ जाता है या फिर गर्म हवा चलने लग जाती है ऐसी स्थिति में फूल व फल अत्यधिक मात्रा मे गिरने लगते है। इसको कम करने लिए बगीचे में नमी बनाएँ रखें, हो सके तो कभी-कभी पानी से पौधो पर छिड़काव भी कर सकते है। इसके अलावा प्लानोफिक्स 5 मिली दवा 15 लीटर पानी मे मिलाकर फूलो व फलो पर छिड़काव करके भी नुकसान कम किया जा सकता है। अगर संभव हो तो फूल व फल लगते समय (फरवरी-मार्च) में  25 प्रतिशत ग्रीन शेडिग नेट से पौधो पर छाया करने से भी फायदा हो सकता है।

फलों की तुड़ाई एवं उपज

बढवार पूर्ण कर चुके फलो के गुच्छो को हरी अवस्था में ही तोड़ना चाहिए। फलों की तुड़ाई मध्य मार्च से मध्य मई तक चालू रहती है। इसके पश्चात् फल पक कर पीले पड़ने लगते है जो कि सब्जी या अचार के लिये उपयुक्त नहीं रहते है क्योंकि वे लिसलिसे तथा मिठास लिए हुए होते है। फलो को हमेशा गुच्छों में ही तोड़ना चाहिए ताकि तुड़ाई पश्चात काफी समय तथा ताजे बने रहे।

उत्तम प्रबंधन कर एक पेड़ से औसतन 20-50 किग्रा फल प्राप्त किये जा सकते है। अलग-अलग वर्षो में इसका उत्पादन कम या ज्यादा होता रहता है इसका निर्धारण मुख्य रूप से किस्म तथा फूल आने तथा फल बनते समय मौसम की स्थिति पर निर्भर करता है। काजरी में किये गये अनुसंधान के आधार पर यह पाया गया है कि केवल कुछ माह के लिए पूरक सिंचाई की व्यवस्था करके इससे 20-50 किलो फल प्रति वृक्ष प्राप्त कर सकते है।

तुड़ाई उपरान्त प्रबंधन

फलों की तुड़ाई सुबह के समय ही करनी चाहिए। फल तोड़ने के तुरन्त बाद ठण्डे पानी (3-4°C  तापमान) में पाँच मिनट तक डुबोकर निकालने से फलो से गर्मी निकल जाती है जिससे ये तुड़ाई उपरान्त अधिक समय तक ताजे बने रहते है।

 

स्रोत-

  • केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान

 

 

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