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खाद और उर्वरक देने का सिद्धांत – Kisan Suvidha
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खाद और उर्वरक देने का सिद्धांत

compost

खाद और उर्वरक देने का सिद्धांत

सिद्धांत सभी के होते हैं । खाद एवं उर्वरक के प्रयोग करने के सभी सिद्धांत हैं । यदि हम उनका पालन करें तो कम से कम खर्च पर फसलों से अधिकतम उपज ली जा सकती है । तथा मृदा उर्वरता को बनाये रखा जा सकता है । जानिये कौन-कौन से हैं खाद एवं उर्वरक के प्रयोग करने वाले सिद्धांत:-

1. खाद एवं उर्वरक की किस्म

a) नाइट्रोजन वाली उर्वरक

पौधों को नाइट्रोजन की आवश्यकता वृद्धि के आरंभ में कम, वृद्धि के समय अधिक तथा परिपक्वता के समय कम होती है । अतः वृद्धि के समय नाइट्रोजन को टाॅप ड्रेसिंग (छिटकवाँ विधि) के रूप में दिया  जाता है । इसके अलावा नाइट्रोजन की हानि लीचिंग के द्वारा अधिक होती है, इसके अनुसार नाइट्रोजन के पोषक तत्व जल के साथ भूमि की निचली तहों में चला जाता है, जो जड़ों की पहुंच से बाहर हो जाता है । अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में जहां सिंचाई क्षमता से अधिक की जाती है, लीचिंग अधिक होती है । बलुआही मिट्टी जिसकी जलधारण क्षमता बहुत कम होती है, उस मिट्टी में लीचिंग के द्वारा हानि अधिक होती है । इस कारण नाइट्रोजन उर्वरकों को 2-3 बार  देते हैं, ताकि उर्वरक की हानि कम हो सके ।

b)फाॅस्फेटिक उर्वरक

पौधों को फाॅस्फोसर की आवश्यकता प्रारम्भ में ही जड़ों की वृद्धि के लिए होती है । फलीदार फसलों की जड़ों में पाये जाने वाली ग्रंथियों का विकास इसकी उपस्थिति में अधिक होता है, जिससे पौधों को नत्रजन भी प्राप्त हेती है । फाॅस्फोरस मिट्टी में अचल होता है, जिस कारण वह वहीं पड़ा रहता है, जहां डााला जाता है । इसके कारण पोषक तत्व पौधों को पूरा नहीं मिल पाता है । अतः फाॅस्फोरिक उर्वरकों को पौधों के जड़ के पास देते हैं ताकि पौधों को फाॅस्फोरस मिल जाये ।

c) पोटाशिक उर्वरक

पोटाश वाली उर्वरक फसलों को बहुत धीरे-धीरे उपलब्ध होते हैं, पोटाश की आवश्यकता फसल के कटने तक होती है, इसलिए पोटाश उर्वरक की सम्पूर्ण मात्रा का प्रयोग फसल की बुवाई के समय ही करना चाहिए तथा इस प्रकार के उर्वरकों को मृदा में पौधों की जड़ों के पास डालना आवश्यक होता है ।

d) कार्बनिक खाद

इन खादों को खेत में बोने से पूर्व डालना चाहिए, जिससे फसल के अंकुरण के समय तक इन खादों में उपस्थित पोषक तत्व पौधों को उपलब्ध हो सकें। अतः गोबर खाद, कम्पोस्ट खाद को फसल बोने के एक महीने पूर्व, हरी खाद डेढ़ महीने पूर्व खलियाँ को फसल बोने के पन्द्रह दिन पूर्व खेत में डालनी चाहिए ।

 

2. फसल

विभिन्न फसलों को विभिन्न मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होेती है । जैसे मटर को गेहूं की अपेक्षा- कृत कम उर्वरक की आवश्यकता होती है ।

 

3. फसल की अवधि

कम अवधि की फसलों में बोने के पहले सम्पूर्ण उर्वरक (नाइट्रोजन, फाॅस्फोरस एवं पोटाश) दे देनी चाहिए । जबकि लम्बी अवधि वाली फासलों में नाइट्रोजन को 4-5 किस्तों में देना चाहिए । जैसे गन्ने की अधसाली (डेढ़ वर्ष वाली), 9-12 माह की अवधि वाली फसल में कुल नाइट्रोजन 2-3 बार में खड़ी फसल में उर्वरक उपयोग क्षमता बढ़ती है ।

 

4. मृदा की किस्म

बलुई मृदा में नाइट्रोजन की हानि लीचिंग के द्वारा अधिक होती है । अतः बलुई मृदा में नाइट्रोजन को लीचिंग से बचाने के लिए नाइट्रोजन को कई किस्तों में फसल में देना चाहिए ।

 

5. मौसम

अधिक वर्षा होने के कारण मृदा विलेय लवण प्रोफाईल में नीचे चले जाते हैं, जिसके कारण मृदा में क्षारीय तत्व कम हो जाते हैं और मृदा अम्लीय हो जाती है तथा सुधार के लिए चूना, चूना पत्थर डोलोमाइट देना पड़ता है । जिस मौसम में अधिक वर्षा होती है उस मौसम में लीचिंग के द्वारा अधिक पोषक तत्व की हानि होती है । अतः उर्वरक अधिक देनी पड़ती है । उर्वरकों को इस मौसम में किस्तों में देने से उर्वरकों की हानि कम होती है ।

 

6.फसल चक्र

फसल चक्र में अधिक फसल की संख्या रहने पर अधिक खाद की आवश्यकता पड़ती है । अधिक खाद चाहने वाली फसलों के बाद कम खाद चाहने वाली फसलें उगानी चाहिए जिससे कि मृदा उर्वरता भी सुरक्षित रहती है ।

 

7.मृदा में नमी की मात्रा

जिन मृदाओं में उर्वरकों का प्रयोग होता है उनमें नमी का हृास होता है । जैविक खादों के प्रयोग से मृदा में अधिक समय तक संचित रह सकती है ।

 

8.फसल की किस्म

विभिन्न फसलें अलग-अलग तत्वों की कम या ज्यादा मात्राओं का उपयोग करती हैं । जैसे कन्दों व जड़ों वाली फसलों (आलू गाजर व शलजम आदि) के लिए पोटाश व फाॅस्फोरस की अधिक आवश्यकता होती है । गन्ना व गेहूं जैसी फसलों को नत्रजन की आवश्यकता अधिक होती है । सब्जियों की फसलों को नत्रजन व पोटाश की आवश्यकता होती है । दलहन फसलों को नत्रजन की तुलना में अधिक फाॅस्फोरस चाहिए । तेल वाली फसलों को पोटाश व फाॅस्फोरस की अधिक आवश्यकता होती है ।

 

9. मृदा की उर्वरता एवं गठन

जो मृदाएँ कमजोर अथवा कम उर्वरा वाली होती हैं उनमें अधिक खाद की आवश्यकता होती है । जैसे बालुई भूमियों में, दोमट मृदाओं की अपेक्षा एक ही फसल को अधिक खाद देना पड़ता है ।

 

10.खरपतवार का प्रकोप

यदि खेत में खरपतवारों का प्रकोप अधिक है तो फसल की खाद संबंधी आवश्यकता बढ़ जाती है ।

11. फसल उगाने के उद्देश्य

एक ही किस्म की फसलों को जब अलग-अलग उद्देश्यों जैसे चारे व अन्न के लिए उगाते हैं तो उनकी खाद संबंधी आवश्यकता भी बदल जाती है ।

12.मृदा कटाव

जिन मृदाओं में जल तथा वायु से मृदा क्षरण अधिक होता है । उनमें खाद की अधिक मात्रा का प्रयोग करना पड़ता है ।

 

13.फसल की जातियाँ

एक ही फसल की अलग-अलग जातियों की खाद संबंधी आवश्यकता अलग-अलग होती है । उदाहरण के लिए गेहूं की सी.306, के.65 तथा के.68 जाति के गेहूं को 60 किग्रा. नाइट्रोजन एवं मैक्सीजन जातियों जैसे सोनालिका (एच.डी. 1553) व बौनी जाति डब्ल्यू. एच.147 को 120 किग्रा./है. नत्रजन की आवश्यकता होती है|

 

 

स्रोत-

  • मृदा विज्ञान मंडन भारती, कृषि महाविद्यालय, अगवानपुर, सहरसा बिहार

 

 

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