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कैसे करें केले की उन्नत खेती / Banana Farming – Kisan Suvidha
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कैसे करें केले की उन्नत खेती / Banana Farming

केले की खेती

कैसे करें केले की उन्नत खेती / Banana Farming

दुनियाभर में केला एक महत्वपूर्ण फसल है। भारत में लगभग 4.9 लाख हेक्टेयर में केले की खेती होती है जिससे 180 लाख टन उत्पादन प्राप्त होता है। महाराष्ट्र में सबसे अधिक केले का उत्पादन होता है। महाराष्ट्र के कुल केला क्षेत्र का 70 फीसदी अकेले जलगांव जिले में है। देशभर के कुल केला उत्पादन का लगभग 24 फीसदी भाग जलगांव जिले से प्राप्त होता है। केले को गरीबों का फल कहा जाता है। केले का पोषक मान अधिक होने के कारण केरल राज्य एवं युगांडा जैसे देशों में केला प्रमुख खाद्य फल है। केले के उत्पादों की बढती मांग के कारण केले की खेती का महत्व भी दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

केला उत्पाद निम्न है:-

केला चिप्स, केला फिग, केला आटा, केला पापड, केला हलवा, केला जूस, केला पल्प, केला फल केनिंग, केला टाफी, केला मदिरा, केला शेम्पेन इत्यादि सामग्रियां तेयार की जाती हैं।

जलवायुः-

केला उत्पादन के लिये उष्ण तथा आर्द्र जलवायु उपयुक्त होती है। जहँा पर तापक्र्रम 20-35 डिग्री सेन्टीग्रेड के मध्य रहता है वहाँ पर केले की खेती अच्छी तरह से की जा सकती है। वार्षिक वर्षा 150-200 से.मी. समान रूप से वितरित होना चाहिये। शीत एवं शुष्क जलवायु में भी इसका उत्पादन होता है। परंतु पाला एवं गर्म हवाओं (लू) आदि से काफी क्षति होती है।

भूमिः-

केले की खेती के लिए बलुई से मटियार दोमट भूमि उपयुक्त होती है। जिसका पी. एच मान 6.5-7.5 एवं उचित जल निकास का होना आवश्यक हैं। केले की खेती अधिक अम्लीय एवं क्षारीय भूमि में नही की जा सकती है। भूमि का जलस्तर 7-8 फीट नीचे होना चाहिये।

केले की व्यवसायिक प्रजातियाँ:-

(1) ड्वार्फ केवेन्डिस

(भुसावली, बसराई, मारिसस, काबुली, सिन्दुरानी, सिंगापुरी जहाजी, मोरिस) यह प्रजाति म.प्र., महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार एवं कर्नाटक की जलवायु के लिये बहुत उपयुक्त पायी गयी है। इस प्रजाति से चयन कर गनदेवी सिलेक्शन (हनुमान) अथवा पाडर्से नाम की जातियां विकसित की गई हैं जिनकी उत्पादन क्षमता 20-25 कि. ग्रा. प्रति पौधा है। इस प्रजाति का पौधा बोना किस्म का 1.5 – 1.8 मीटर ऊंचा होता है फल बडे, मटमैले पीले या हरेपन लिये हुये पीला होता है। तना मौटा हरा पीलापन लिये हुये होता है। पत्तियां चौड़ी एवं पीली होती हैं औसतन 9-10 हेण्ड प्रति बंच (गुच्छा) होता है। औसत फिंगर की लग्बाई 20 सें.मी. एवं मोटाई 10 से.मी. होती है।

(2) रोबस्टा (एएए)

इसे बाम्बेग्रीन, हरीछाल, बोजीहाजी आदि नामो से अलग अलग प्रांतो मे उगाया जाता है इस प्रजाति को पश्चिमी दीप समूह से लगाया गया है। पौघों की ऊंचाई 3-4 मीटर, तना माध्यम मोटाई हरे रंग का होता है। प्रति पौधे मे 10-19 हेण्ड्स मे फर्टाइल पुष्प होते हैं जिनमें हरे रंग की फिंगर विकसित होती है । बंच का वजन औसतन 25-30 किलो ग्राम होता है। फल अधिक मीठे एवं आकर्षक होते हैं। फल पकने पर चमकीले पीले रंग का हो जाता है। यह प्रजाति सिंगाटोक (लीफ स्पॉट) बीमारी से काफी प्रभावित होती है। फलों की भंडारण क्षमता कम होती है।

(3) रस्थली (सिल्क एएबी)

इस प्रजाति को मालभोग अमृत पानी सोनकेला रसवाले आदि नामों से विभिन्न राज्यों मे व्यावसायिक रूप से उगाया जाता है पौधे की ऊंचाई 2.5-3.0 मीटर होती है पुष्पन 12-14 माह के बाद ही प्रारंभ होता है। फल (फिंगर) चार कोण बाले हरे, पीले रगं के मोटे होते हैं। छिलके पतला होते है जो पकने के बाद सुनहरे पीले रगं के हो जाते हैं। केले का बंच 15 से 20 किलोग्राम का होता है। फल अधिक स्वादिष्ट सुगन्ध पके सेब जैसी कुछ मिठास लिये हुये होता है। केले का छिलका कागज की तरह पतला होता है इस प्रजाति की भण्डारण क्षमता कम होती है।

(4) पूवन (एबी)

इसे चीनी चम्पा, लाल वेल्ची और कदली कोडन के नाम से जाना जाता है इसका पौघा बेलनकार मध्यम ऊंचाई का 2.25 – 2.75 मीटर होता है। रोपण के 9-10 महीने में पुष्पण प्रांरभ हो जाता है। इसमें 10-12 हेण्डस रहते हैं। प्रत्येक हेंड में 14-16 फिंगर आती है, फल छोटे बेलनाकार एवं उभरी चोंच वाले होते हैं। फल का गूदा हाथी के दांत के समान सफेद एवं ठोस होता है। इसे अधिक समय तक भण्डारित किया जा सकता है। फल पकने के बाद भी टूटकर बंच से अलग नहीं होते।

(5) करपूरावल्ली (एबीबी) 

इसे बोन्था, बेन्सा एवं केशकाल आदि नामों से जाना जाता है। यह किस्म किचन गार्डन में लगाने लिए उपयुक्त पायी गयी है। इसका पौधा 10-12 फीट लम्बा होता है। तना काफी मजबूत होता है। फल गुच्छे में लगते है। फल पर तीन रिंज (उभार) होते हैं। एक पौधे में 5-6 पंजे बनते हैं जिसमें 60-70 फल होते हैं। इनका वजन 18-20 कि. ग्राम. होता है। फल मोटे नुकीले और हरे पीले रंग के होते हैं। यह चिप्स एवं पाउडर बनाने के लिये सबसे उपयुक्त प्रजाति है।

(6) नेन्द्रन (प्लान्टेन एएबी)

इसकी उत्पत्ति दक्षिण भारत से हुई है। इसे सब्जी केला या रजेली भी कहते हैं। इसका उपयोग चिप्स बनाने में सर्वाधिक होता है। इसका पौधा बेलनाकार मध्यम मोटा तथा 3 मीटर ऊंचाई वाला होता है। गुच्छे में 4-6 हेण्डस और प्रत्येक हेण्ड में 8-14 फिंगर होती हैं। फल 20 से.मी. लम्बा, छाल मोटी तथा थोड़ा मुड़ा एवं त्रिकोणी होता है। जब फल कच्चा होता है तो इसमें पीलापन रहता है। परंतु पकने पर छिलका कड़क हो जाता है। इसका मुख्य उपयोग चिप्स एवं पाउडर बनाने के लिये किया जाता है।

केले की उन्नत संकर प्रजातियां :-

(1) एच-1 (अग्निस्वार + पिसांग लिलिन):- यह लीफ स्पॉट फ्यूजेरियम बीमारी निरोधक कम अवधि वाली उपर्युक्त किस्म है। यह बरोइंग सूत्र कृमि के लिए अवरोधक है। इस संकर प्रजाति का पौधा मध्यम ऊंचाई का होता है और इसमें लगनेवाले बंच का वजन अमूमन 14 से 16 किलोग्राम का होता है। फल लम्बे, पकने पर सुनहरे या पीले रगं के हो जाते हैं। पकने पर इसमें हल्का खट्टा तथा मीठी खट्टी महक आती है। यह किस्म जड़ी फसल के लिये उपयुक्त है। तीन वर्ष के फसल चक्र में चार फसलें ली जा सकती हैं।

रोपण सामग्री (फसल उत्पादन तकनीक) :-

केला रोपण हेतु तलवारनुमा आकार के अतंभूस्तरीय जिनकी पत्तियां संकरी होती हैं, जिनको बीज के उपयोग मे लाया जाता है। तीन माह पुराना सकर्स जिसका वजन 700 ग्राम से 1 कि.ग्राम तक हो, रोपण के लिए उपर्युक्त होते हैं।  वर्तमान में केले के टिश्यूकल्चर पौधे व्यावसायिक रूप से उत्पादकों द्वारा उपयोग में लाये जा रहे हैं। क्योंकि इनको जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा बीमारी रहित उत्तम गुणवत्ता वाले अधिक उत्पादक मातृ वृक्षों से उतक निकालकर प्रवर्धित किया जाता है। टिशु कल्चर पौधे टू-टू दि टाईप जिनोटाइप चयनित उतक को विट्र्रोकल्चर पद्धति से वर्धित किया गया है। टिशु पौधों का स्वभाव दैहिक होता है और इसकी फसल एक साथ परिपक्व होती है। इसकी जड़ी (रेटून) से भी अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है।

भूमि की तैयारी एवं रोपण पद्धति :-

खेत की जुताई कर मिट्टी को भूरि-भूरि बना लेना चाहिये जिससे भूमि का जल निकास उचित रहें तथा कार्बनिक खाद ह्यूमस के रूप मे प्रचुर मात्रा में हो इसके लिये हरी खाद की फसल ले।

पौध अंन्तरालः-

कतार से कतार की दूरी 1.8 मीटर पौधे से पौधे की दूरी 1.5 मीटर रखते हैं तथा पौधा रोपण के लिये 45 X 45 X 45 सें. मी. आकार के गड्डे खोदे प्रत्येक गडडे मे 12-15 किग्रा. अच्छी पकी हुई गोबर या कम्पोस्ट खाद रोपण के पूर्व साथ ही प्रत्येक गडडे में 5 ग्राम थिमेट दवा मिटटी में मिला दें।
बीज उपचार:-
प्रकंदों को उपचार के पूर्व साफ करें तथा जडों को प्रथक कर दें 1 प्रतिशत बोर्डो मिक्चर तैयार कर प्रकंदों को उपचारित करें इसके बाद 3-4 ग्राम बाबिस्टीन प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर प्रकंदों को 5 मिनट तक उपचार करें।
रोपण का समयः-
1. मृग बहार (ग्रीष्म) अप्रैल से मई
2. कंदा बहार अक्टूबर
कांदा बहार की अपेक्षा मृग बहार की (ग्रीष्म) की फसल से अधिक उत्पादन मिलता है।

खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की विधिः-

केले की फसल अपने पूरे जीवन चक्र में रोपण 5 – 7 माह के अन्दर प्रति पौधा नेत्रजन 200 ग्राम, स्फुर 40-50 ग्राम ओर पोटाश 250-300 ग्राम, कम्पोस्ट खाद 5 कि.ग्रा. एवं कपास या महुए की खली प्रति पौघा के हिसाब से दें। कम्पोस्ट खाद एवं फास्फोरस की पूर्ण मात्रा पौधा लगाते समय नत्रजन एवं पोटाश एक माह के अन्तराल से सात से आठ माह के अन्दर सात से आठ बार मे दें ।

अन्तरवर्तीय फसल :- 

मृग बहारः
इस फसल की रोपाई मई जून महीने में की जाती है। जिसमें केले के साथ , मूंग, भिण्डी, टमाटर, मिर्च, बैग़न इत्यादि फसले लें सकते हैं।
कांदा बहारः
इस बहार के अन्तर्गत आलू, प्याज, टमाटर, धनियाँ, बैंग़न की फसलें ली जा सकती हैं।

केले की फसल में सस्य क्रियाए

केले की फसल में पौधों की जड़ों पर मिटटी चढ़ाना आवश्यक है। क्योंकि केले की जड़ें अधिक गहरी नहीं जाती हैं। इसलिये पौधों को सहारा देने के लिए मिटटी चढ़ाना जरूरी है। कभी कभी कंद बाहर आ जाते हैं। जिससे पौधे की वृध्दि रुक जाती है। इसलिए मिटटी चढ़ाना जरूरी है।

मल्चिंग

जमीन से जल वाष्पीकरण तथा खरपतवार द्वारा हास होता है। तथा भूमि से पोषक तत्व भी खरपतवारों द्वारा लिये जाते हैं। भूमि जल के वाष्पीकरण एवं खरपतवारों के नियंत्रण हेतु प्लास्टिक सीट पौधे की जड़ों के चारों ओर लगाने से उपरोक्त क्षति से बचाव हो जाता है। इसके अतिरिक्त गन्ने के छिलके, सूखी घास, सूखी पत्तियॉ एवं गुड़ाई करने से जल हास कम हो जाता है। प्लास्टिक की काली पोलीथिन की मल्चिंग करने पर उत्पादकता में वृध्दि होती है।

अतंभूस्तरी (सकर्स) निकालना

जब तक केले के पौधे में पुष्प गुच्छ न निकल पाएं तब तक सकर्स को नियमित रूप से काटते रहे। पुष्पण जब पूर्ण हो जावे तो एक सकर्स को रखा जाए तथा शेष को काटते रहे। यह ध्यान रखे कि एक वर्ष की अवधि तक एक पौधे के साथ एक सर्कस को ही बढ़ने दिया जाए वह जड़ी (रेटून) की  फसल के रूप में उत्पादन देगा, बंच के निचले स्थान में जो नर मादा भाग है इस काटकर उसमें  बोर्डोपेस्ट लगा दिया जाए।

सहारा देना

जिन किस्मों में बंच का वजन काफी हो जाता है। तथा स्युडोस्टेंम के टूटने की संभावना रहती है। इसे बल्ली का सहारा देना चाहिए, केले के पत्ते से उसके डंठल को ढ़क दिया जाए।

पौधों को काटना

केला बंच पुष्पण से 110 से 130 दिनों में काटने योग्य हो जाते हैं। बंच काटने के पश्चात पौधों को धीरे-धीरे काटें, क्योंकि इस क्रिया से मातृप्रकंद के पोषक तत्व जड़ी बाले पोधे को उपलब्ध होने लगते है। फसलस्वरूप उत्पादन अच्छा होने की संभावना बढ़ जाती है।

जलप्रबंधन

केले की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। केले के पत्ते बड़े चौड़े होते हैं। एक पौधे के पत्तों का कुल क्षेत्रफल 50-60 वर्गमीटर होता है। इसलिए बड़े पैमाने पर पानी की वाष्पीकरण उत्सर्जन होने से केले को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। केले के पूर्ण वर्धित झाड़ों को प्रतिदिन 12-15 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। ड्रिप पध्दति से सिचाई करने पर 60 प्रतिशत पानी की बचत होती है।

फसल संरक्षण

केले के रोग एवं नियंत्रण

1. पनामा बिल्ट या उकठा रोग

यह बीमारी फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम नामक फफूंद के द्वारा फेलती है पौधे की पत्तियां मुरझाकर सूखने लगती है केले का पूरा तना फट जाता है प्रारंभ में पत्तियां किनारों से पीली पडती हैं प्रभावित पत्तियां डण्ठल से मुड़ जाती है प्रभावित पीली पत्तियां तने के चारों ओर स्कर्ट की तरह लटकती रहती है आधार पर (निचले भाग) तने का फटना बीमारी का प्रमुख लक्षण है। बैस्कूलर टिश्यू जड़ों और प्रकंद में पीले, लाल एवं भूरे रंग में परिवर्तित हो जाते है पौधा कमजोर हो जाता है। जिसके कारण पुष्पन फलन नहीं होता है। इस बीमारी की फफूंद जमीन में अनुकूल तापक्रम, नमी एवं पी. एच. की स्थिति में लम्बी अवधि तक रहता है।

नियंत्रण

1- गन्ना एवं सूरजमुखी के फसल चक्र को अपनाने से बीमारी का प्रकोप कम हो जाता है।
2- सकर्स को लगाने के पूर्व 0.2 प्रतिशत बाबिस्टीन के धोल में 30 मिनट तक डुबोकर लगाना चाहिए।
3- ट्राइकोडर्मा बिरिडी जैविक फफूंद नाशक का उपयोग करना चाहिए।
4- जिलेटिन केप्सूल में 50 ग्राम बाबिस्टीन भरके केप्सूल अप्लीकेटर के सहारे कंद मे 45 डिग्री कोण पर रखने से बीमारी पर अच्छा नियंत्रण देखा गया है।

2. लीफ स्पाट (सिंगाटोका)

यह बीमारी स्यूडोसर्कोस्पोरा म्यूसी फफूंद के कारण होती है। इस बीमारी के प्रकोप से पत्तियों में क्लोरोफिल की कमी हो जाती हैं। क्योंकि टिशू हरे से भूरे रंग के हो जाते हैं। धीरे-धीरे पौधे सूखने लगते है। प्रारंभ में पत्तियों पर छोटे धब्बे दिखायी देते हैं। फिर यह पीले या हरी पीली धारियों में बदल जाते हैं। जो पत्तियों को दोनों सतहो पर दिखायी देते हैं अंत में यह धारियां भूरी एवं काली हो जाती हैं। धब्बों के बीच का भाग सूख जाता है।

नियंत्रण

प्रभावित सूखी पत्तियों को काटकर जला देना चाहिए। फफूंद नाशक दवाऐं जैसे डाइथेन एम-45, 1250 ग्राम /हेक्टेअर या बाबिस्टीन 500 ग्राम / हेक्टेयर या प्रोपीक्नोजोल 0.1 फीसदी का छिड़काव टिपॉल के साथ अक्टूबर माह से 3-4 छिड़काव 2-3 सप्ताह के अतंराल से करने से बीमारी पर नियंत्रण रखा जा सकता है।

3. एन्थ्रेक्नोज

यह बीमारी कोलेट्रोट्राईकम मुसे नामक फंफूद के कारण फैलती है। यह बीमारी केले के पौधे में बढ़वार के समय लगती है। इस बीमारी के लक्षण पौधो की पत्तियों, फूलों एवं फल के छिलके पर छोटे काले गोल धब्बों के रूप मे दिखाई देते हैं। इस बीमारी का प्रकोप जून से सितम्बर तक अधिक होता है क्योंकि इस समय तापक्रम ज्यादा रहता है।

नियत्रण

1- प्रोक्लोराक्स 0.15 प्रतिशत या कार्वेन्डिज्म 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का धोल बनाकर छिड़काव करें।
2- केले को 3/4 परिपक्वता पर काटना चाहिये।

4. शीर्षगुच्छारोग (बंचीटाप)

पत्तियों की भीतरी मिडरिब की द्वीतियक नसों के साथ अनियमित गहरी (मोर्सकोड) धारियां शुरू के लक्षण के रूप मे दिखाई देती हैं। ये असामान्य लक्षण गहरे रंग की रेखाओं मे एक इंच या ज्यादा लम्बे अनियमित किनारों के साथ होते हैं। पौधों का ऊपरी सिरा एक गुच्छे का रूप ले लेता है। पत्तियां छोटी व संकरी हो जाती हैं। किनारे ऊपर की ओर मुड़ जाते हैं। डंठल छोटे व पौधे बौने रह जाते हैं और फल नहीं लगते हैं। इस बीमारी के विषाणु का वाहक पेन्टोलोनिया नाइग्रोनरवोसा नामक माहू है।

नियत्रण

1. रोग ग्रसित पौधों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिये।
2. रोग वाहक कीट नियंत्रण के लिये मेटामिस्टॉक्स 1.25 मि.ली. या डेमेक्रान 0.5 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये।
3. रोग रहित सकर्स का चुनाव करें।

5. केले का धारी विषाणु रोग

इस बीमारी के कारण प्रारंभ में पौधों की पत्तियों पर छोटे पीले धब्बे जो बाद में सुनहरी पीली धारियों मे बदल जाते हैं। क्लोरोटिक धारियां पत्तियों के लेमिना पर काला रूप लिये नेक्रोटिक हो जाती हैं। घेर का बहार न निकलना बहुत छोटी घेर निकलना एवं फलों में बीज का विकास प्रभावित पौधों के प्रमुख लक्षण हैं। इस रोग का विषाणु मिलीबग एवं प्लेनोकोकस सिट्री के द्वारा फैलाया जाता है।

नियंत्रण

प्रभावित पौधों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिये तथा मिलीबग के नियंत्रण के लिये कार्बोफ्यूरान की डेढ़ किलो ग्राम मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन में डालें।

केले के कीट एवं नियंत्रण

(1) केला प्रकंद छेदक (राइजोम बीबिल)

यह कीट केले के प्रकंद में छेद करता है। इसको इल्ली प्रकंद के अन्दर छेद करती है। परन्तु वह बाहर से नहीं दिखायी देती है। कभी-कभी केले के स्यूडोस्टेम में भी छेद कर देता है। इन छिद्रों में सड़न पैदा हो जाती है।

नियंत्रण

प्रकंदों को लगाने से पहले 0.5 फीसदी मोनोक्रोटोफास के धोल में 30 मिनट तक डुबोकर उपचारित करें। अत्याधिक प्रकोप होने पर 0.03 फीसदी फास्फोमिडान के घोल का छिड़काव करें।

(2) तना भेदक

तना भेदक कीट का मादा वयस्क पत्तियों के डंठलों में अण्डे देती है। जिससे इल्ली निकलकर पत्तियों एवं तने को खाती है। प्रारंभ में पौधे के तने से रस निकलता हुआ दिखायी देता है। फिर कीट की लार्वा द्वारा किये गये छिद्र से गंदा पदार्थ पत्तियों के डंठल पर बूंद-बूंद टपकता है जिससे तने के अन्दर निकल रहे पुष्प प्रोमोडिया शुष्क हो जाता है। इसका प्रकोप वर्ष भर होता है।

नियंत्रण

1. मोनोक्रोटोफास की 150 मि.ली. मात्रा 350 मि.लीटर पानी मे घोलकर तने में इंजेक्ट करें।
2. घेर को काटने के बाद पौधों को जमीन से काटकर कीट नाशक दवा कार्वोरिल 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिडकाव करने से अंडे व कीट नष्ट हो जाते हैं।

(3) माहू

यह कीट केले की पत्तियों का रस चूसकर उन्हें हानि पहुंचाता है। तथा बंचीटाप वायरस को फेलाने का प्रमुख वाहक है। इस माहू का रंग भूरा होता है। जो पत्तियों के निचले भाग या पौधे के शीर्ष भाग से रस चूसती है।

नियत्रण

फास्फोमिडान 0.03 फीसदी या मोनोक्रोटोफास 0.04 फीसदी के घोल का छिडकाव करें।

(4) थ्रिप्स

तीन प्रकार की थ्रिप्स केला फल (फिंगर) को नुकसान पहुंचाती है। थ्रिप्स प्रभावित फल भूरा बदरंग, काला तथा छोटे-छोटे आकार के आ जाते हैं। यदपि फल के गूदे पर इसका प्रभाव नहीं पड़ता पर इनका बाजार भाव ठीक नहीं मिलता।
नियंत्रणः मोनोक्रोटोफास 0.05 फीसदी का घोल बनाकर छिडकाव करें तथा मोटे कोरे कपड़े से बंच को ढंकने से भी कीट का प्रकोप कम होता है।

(5) लेस विंगस बग

यह कीट सभी केला उत्पादक क्षेत्रों में पाया जाता है। इस कीट से प्रभावित पत्तियां पीली पड़ जाती हैं। पत्तियों के निचले भाग में रहकर रस चूसती हैं।

नियंत्रण

मोनोक्रोटोफास की 1.5 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें।

(6) पत्ती खाने वाली इल्ली

इस कीट की इल्ली नये छोटे पौधों की बिना खुली पत्तियों को खाती है। पत्तियों मे नये छेद बना देती है।

नियंत्रण

थायोडान 35 ई. सी. का छिडकाव (1.5 मि. ली. प्रति लीटर पानी) पत्तियों पर करने से प्रभावी नियंत्रण देखा गया है।
Source-
  • gonda.livenews.media

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