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केले के प्रमुख रोग एवं निदान – Kisan Suvidha
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केले के प्रमुख रोग एवं निदान

केले के रोग

केले के प्रमुख रोग एवं निदान

१.चित्ती रोग या सिगाटोक रोग

महत्व

यह रोग सर्कोस्पोरा म्यूसी नामक फफूंद से उत्पन्न होता है । इस रोग ने सन् 1913 में फिजी द्वीप के सिगाटोका के मैदानी भाग में व्यापकता से प्रकोप कर केले की फसल को बुरी तरह से प्रभावित किया था इसलिए रोग का नाम सिगोटोका पड़ गया है। अब यह रोग विश्व के सभी केला उत्पादक देशों में प्रकोप कर रहा है। रोग के प्रभाव से पत्तियां नष्ट हो जाती है तथा उत्पादन क्षमता में अत्याधिक कमी हो जाती है। आर्थिक दृष्टि से रोग हानिकारक माना जाता है। इन प्रभावित पौधों से प्राप्त फल, भंडार गृह में अधिक समय तक नहीं टिक पाते है और अपेक्षाकृत जल्दी पक जाते है और जल्दी खराब हो जाते है।

लक्षण

पत्ती का अधिकांश भाग धब्बों के कारण झुलस जाता है। रोग के प्रारम्भिक लक्षण ऊपर से तीसरी या चौथी पत्ती पर सूक्ष्म चित्तियों के रूप से प्रगट होते । धब्बे सबसे पहले हल्के पीली या हरी पीली धारियों के रूप में बनते है जो शिराओं के समान्तर होते है। इन धब्बों का आकार लम्बाई व चौड़ाई में बढ़ जाता है और बड़े – बड़े भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते है।

ये धब्बे मौसम की अनुकूलता में बढ़कर आपस में मिल जाते है तथा पत्तियां झुलस गई सी दिखाई देती है और सूखकर लटक जाती है। फलों पर इस रोग का विशेष प्रकोप होता है जो प्रभावित पत्तियों द्वारा निश्चित ही पहुंचाता है। रोग की उग्रता की स्थिति में फलों के पकने की कोई निश्चितता नहीं होती है इसलिये फलों को अधिक दूर तक नहीं भेजा जा सकता है।

रोग नियंत्रण के उपाय

(क)खड़ी फसल में रोग नियंत्रण के उपाय

रोग के आरंभिक लक्षण दिखाई देने पर रोग नियंत्रण के लिए उपयुक्त ताम्रयुक्त दवा जैसे फाइटोलान, क्यूपरामार , ब्लूकापर या ब्लाईटाक्स – 50 का 0.3 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें। एक हेक्टर के लिए 1000 लीटर द्रव छिड़कना चाहिए। इस घोल में 2 प्रतिशत अलसी का तेल मिश्रित करना चाहिए जिससे केले की चिकनी पत्तियों पर दवा का घोल चिपक सके।

अन्य उपयुक्त दवायें हैं, डाइथेन एम-45 दवा (0.2 प्रतिशत) एवं बेनलेट (0.1 प्रतिशत) की दर से 2.5 किलोग्राम दवा एक हेक्टर के लिए उपयोग की जावे। केले के बगीचों में छिड़काव के लिए पेट्रोल चलित स्वचलित छिड़काव यंत्र का प्रयोग करें जिसमें 35 लीटर दवा व तेल का घोल एक बार में एक हेक्टर के लिए उपयोग किया जाना चाहिए अथवा फुटस्प्रेयर छिड़काव यंत्र को बांस के साथ बांधकर भी उपयोग किया जा सकता है। परंतु फुटस्प्रेयर द्वारा करीब 1000 लीटर दवा प्रति हेक्टर की दर से डाली जानी चाहिए। उपरोक्त छिड़काव कम से कम दो बार 15 दिन के अन्तराल से करना चाहिए।
– नवीनतम प्रयोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 250 ग्राम बैनलेट को 6 लीटर तेल में मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करने से रोग नियंत्रण पूरी तरह से सकता है।

(ख)बुवाई पूर्व रोग नियंत्रण के उपाय

  •  पौध अवशेषों को एकत्र करके जला देना चाहिए जिससे रोगजनक के प्राथमिक संक्रमण का स्रोत नष्ट हो जावेगा एवं संक्रमण देरी से होगा।
  • प्रभावित खेत से बीज के लिए कंद एकत्र नहीं करना चाहिए।

 

२.गुच्छशीर्ष रोग

महत्व

केले का शीर्र्षगुच्छ रोग विषाणु द्वारा उत्पन्न होता है। जिसे केला वाइरस – 1 के नाम से पहचाना जाता है भारतवर्ष में केले के भागों में सर्वाधिक महत्व गुच्छशीर्ष रोग का है जिसने सन् 1950 में केरल के 4000 वर्ग किलो मीटर क्षेत्र के बगीचों को संक्रमित कर पूरे देश में तहलका मचा दिया था। अनुमानित आंकड़ों के अनुसार केरल में रोग से प्रतिवर्ष लगभग 6 करोड़ रूपयों की क्षति होती है। अब यह रोग उड़ीसा, तामिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश तथा कर्नाटक प्रांतों में देखा गया है। प्रभावित पौधों को शत् प्रतिशत नुकसान होता है।

लक्षण

रोग के लक्षण पौधों पर किसी भी अवस्था में देखे जा सकते हैं। पौधों के शीर्ष पर पत्तियों का गुच्छा बन जाता है इसलिए इस रोग को गुच्छ शीर्ष कहते हैं। रोग के कारण पौधे बौने रह जाते है। रोग का प्राथमिक संक्रमण रोगी अत: भूस्तारी के रोग से होता है तथा द्वितीय संक्रमण रोग वाहन कीड़ों द्वारा होता है। जब रोग प्रकोप तरूण पौधों पर होता है। तो उनकी वृद्धि रूक जाती है और ऊंचाई 60 सेमी से अधिक नहीं होता है तथा इन पौधों में फल नहीं लगते है।

रोग नियंत्रण के उपाय

(क)खड़ी फसल में रोग नियंत्रण के उपाय

  • संक्रमित पौधों को निकाल कर नष्ट करना आवश्यक है। जिससे रोग प्रसार को कम किया जा सकता है।
  • स्वस्थ व रोगी पौधों पर कीटनाशक दवा जैसे – मेटासिसटॉक्स (0.1 से 0.5) दवा का छिड़काव करना चाहिए जिससे रोगवाहक कीड़े नष्ट हो जाते है और रोग प्रसार पर रोक लग जाती है।

नोट-

वाइरस रोग निदान के लिये कीटनाशक दवा का उपयोग आसपास के सभी बगीचे वालों को मिलकर एक साथ, एक ही दिन करना चाहिए जिससे कीड़े आसपास के बगीचों में न भाग सकें और वे पूरी तरह से नष्ट किया जा सकें वरना रोग प्रकोप को फैलने से नहीं रोका जा सकता है।

(ख)बुवाई पूर्व रोग नियंत्रण के उपाय

  • प्रकंद एवं अंत: भूस्तारियों का चुनाव स्वस्थ पेड़ों से किया जाना चाहिए।
  • रोग सहनशील या प्रतिरोधी जातियों को चुनना चाहिए। वीमामा जाति पर रोग बहुत कम लगता हैं। अत: अत्याधिक प्रभावित प्रक्षेत्र में इस जाति को लगाना चाहिए।

 

३.जीवाणु म्लानि या मोको रोग

महत्व

यह रोग स्यूडोमोनारा सोलेनेसिएरम नामक जीवाणु से उत्पन्न होता है। रोग का प्रकोप सर्वप्रथम ब्रिटिश घाना में सन् 1840 में देखा गया था। रोग प्रकोप से पूरा पौधा मर जाता है। रोग से फसल को बहुत हानि होती है। रोग भारतवर्ष में सबसे पहले बंगाल में सन् 1968 में पाया गया तथा इसका प्रसार अब लगभग सभी केला उत्पादक राज्यों में हो चुका है एवं रोग का आतंक व्याप्त है।

लक्षण

रोग की पहचान पौधे के हरा का हरा सूख जाने से की जा सकती है। प्रभावित पौधों में रोग के कारण शुरू में पौधों की नई पत्तियों का रंग पर्णवृंत के पास पीला सा पड़ जाता है जो बाद में पर्णवृंत से टूट जाता है। इस कारण पौधे की मध्य पत्ती सूख जाती है और मर जाती हैं। रोग के लक्षण संवहन उत्तकों में भी देखे जा सकता हैं।

तने को काटकर देखने पर संवहन उत्तक हल्के पीले या गहरे भूरे रंग के दिखाई देते हैं। इस स्थान से हल्के पीले रंग का द्रव स्राव निकलता है एवं पनामा रोग की तरह प्रभावित भाग से दुर्गन्ध नहीं आती है। रोगी पौधे में यदि फल लगने के काफी समय बाद रोग लगता है तो ऊपर से फल स्वस्थ दिखाई देते हैं परन्तु गूदा भूरे रंग का हो जाता है। रोग का आक्रमण किसी भी उम्र के पौधों में हो सकता है।

रोग नियंत्रण के उपाय

(क)खड़ी फसल में रोग नियंत्रण के उपाय

  • मिट्टी जनित रोग के निदान के लिए कोई भी दवा नहीं उपयोग की जानी चाहिए क्योंकि उससे कोई लाभ नहीं होता हैं|
  • रोग प्रसार कम करने के लिए प्रभावित पौधों को, जड़ सहित उखाड़कर जला देवें। उखाड़े गये स्थान के आसपास के पेड़ों को भी निकाल देवें। जिससे रोग प्रसार बिल्कुल नहीं हो सकेगा और एक बफर खंड बन जावेगा।
  • छंटाई के यंत्रों को 5 प्रतिशत फारमालीन या 5 प्रतिशत फिनोल के घोल में आधे मिनट तक डुबोकर निर्जीवी किया जा सकता है। इस तरह रोगजनक जीवाणुओं का रोगी से स्वस्थ पौधों में संचरण रोका जा सकता है।

(ख)बुवाई पूर्व रोग नियंत्रण के उपाय

  • केले का बगीचा लगाते समय पानी के निकास का अच्छा प्रबन्ध करना चाहिए जिससे रोग प्रकोप की संभावना कम हो जाती है।
  •  रोगजनक जीवाणु को मिट्टी में नष्ट करने के लिए गर्मी में 2 या 3 बार गहरी जुताई कर खेत खाली छोडऩा चाहिए उसके बाद ही बुवाई करनी चाहिए।
  • एकांतर परपोषी हेलीकोनिया को बगीचों से निकालकर नष्ट करना चाहिए और भूमि संरक्षी फसलों को लगाने से भूमि में निवेश द्रव्य की कमी होती है इसलिए कुछ संरक्षी फसलें जैसे- ज्वार बागों में लगाना चाहिए।
  • खेत में गुड़ाई बिल्कुल बंद कर देना चाहिए जिससे पौधों की जड़ में घाव न बन सके और प्रकोप के बढऩे में अंकुश लग सके।

 

Source-

  • krishakjagat.org

 

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