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कृषि‍ लागत कैसे कम करें – Kisan Suvidha
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कृषि‍ लागत कैसे कम करें

कृषि‍ लागत कैसे कम करें

कम खर्च में- अधिक लाभ कैसे कमा यें?

आज भारत ने अनाज उत्पादन के क्षेत्र में अधिक उपज देने वाली किस्मों की मदद से, आत्म निर्भरता हासिल कर ली है। लेकिन कुछ प्रमुख समस्याएं भी पैदा हुई हैं। उदाहरण के लिये धान और गेहूं की फसलों की निरंतर बुवाई करने से कई खरपतवार पनपने का अवसर मिलता है। जल्दी-2 सिंचाई करने से मिट्टी में रोग और सूक्ष्म जीव बढ़ने का अवसर मिलता है। जिसके द्वारा मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है।

इन सब कारणों की वजह से किसान सामर्थ्यहीन होते हुए भी, खरपतवार नियंत्रण के लिए खरपतवार-नाशी, पानी के लिए-बिजली या डीजल, कीड़े, मकोड़े के लिए-कीटनाशक, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए-रासायनिक उर्वरक, पर अधिक खर्च करना पड़ता है। जो अधिक महंगा साबित होता है। यदि किसान बुद्धि का थोड़ा सा भी उपयोग करें तो “कम लागत में अधिक उत्पादन” मुहावरा सही साबित कर सकता है।

खरपतवार की समस्या – बिना खर्च छुटकारा कैसे पायें?

निरंतर चावल और गेहूं की बुवाई करने से इन फसलों में खरपतवार के कारण पर्याप्त नुकसान वहन करना पड़ता है। या उन्हें नियंत्रित करने के लिए खरपतवार- नाशी का छिड़काव करना पड़ता है। जिससे उत्पादन लागत में वृद्धि के साथ-2 किसान स्वास्थ्य के खतरों का जोखिम भी उठाता है। अगर इन दोनों फसलों के बीच में मटर, चना, सरसों, जई, या आलू, कोई भी फसल अपनी पसंद के अनुसार बोई जाए, तो गेहूं की फसल में सर्दियों में जो खरपतवार आते हैं वह प्राकृतिक रूप से कम हो सकता है। गेहूं की फसल की कटाई के बाद और धान की फसल की रोपाई से पहले खेत की दो तीन बार सिंचाई करने से खरपतवार उग जाता है। जो जुताई के द्वारा नष्ट किया जा सकता है। इस समय पानी की अन्य फसलों के लिए जरूरत नहीं होती है। और पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। इस विधि द्वारा खरपतवार नियंत्रण पर किया गया व्यय बचाया जा सकता है। और धान की फसल को अप्रत्याशित रूप से लाभान्वित किया जा सकता है।

कीटनाशक – उपयोग कैसे कम करे?

कीटनाशक के व्यय से बचने की सर्वश्रेष्ठ तकनीकि सही समय पर फसलों को बोना है। जैसे अगर भिंडी बरसात के मौसम की जगह गर्मियों की शुरुआत में बोई जाए तो पीला नस मोज़ेक नहीं आएगा। और बिना कीटनाशक का स्प्रे किए अच्छी उपज ली जा सकती है। वैसे ही लोबिया भी बरसात के मौसम की जगह गर्मियों में लगाया जा सकता है। और अच्छा लाभ कमाया जा सकता है।

मटर की देर से बोई हुई फ़सल पर चूर्ण-सदृश फफूंदी और तिलहन फसलों पर एफिड के गंभीर हमले होते है। इन से बचने के लिए प्राकृतिक रास्ता उचित समय पर फसल बोना ही है। अधिकांश फसल तो उचित समय पर लगाने से बिना कीटनाशकों के छिड़काव के, अधिक उपज दे सकती है।

सिंचाई – खर्च कैसे कम करे?

किसान सिंचाई पर न्यूनतम खर्च करके अधिकतम लाभ कमाने की कला, फसल चक्र में थोड़े से परिवर्तन करके सीख सकता है। जैसे धान के बाद गेहूं की फसल न लेकर चना, मटर, मसूर, सरसों आदि में से कोई भी फसल ली जा सकती है। जिसके लिए कम से कम पानी की जरूरत होती है। अगर किसान के लिए गेहूं की फसल बहुत ज्यादा आवश्यक है। तो धान की जगह अरहर, मक्का, बाजरा में से कोई भी फसल ली जा सकती है। इन्हें भी कम पानी की आवश्यकता होती है।

किसान सिंचाई के खर्च को भी कम कर सकता है। फसलों का चयन इस तरह करना चाहिए ताकि शुद्ध लाभ प्रभावित न हो कहने का मतलब है कि सिंचाई पर न्यूनतम खर्च कर अधिकतम लाभ कमाया जा सकता है।

मिट्टी की उर्वरता – कैसे बनाए रखे?

एक के बाद एक अधिक उपज देने वाली फसलें लेने से मिट्टी की उर्वरता शक्ति में कमी हो जाती है। जिसके लिए हम रासायनिक उर्वरकों का अधिक उपयोग करते हैं। जिससे खेती की उत्पादन लागत में वृद्धि होती है। तथा मिट्टी की रासायनिक संरचना भी गड़बड़ हो जाती है। एक स्वस्थ फसल लेने के लिए स्वस्थ मिट्टी का होना आवश्यक है। इसके लिए मिट्टी का प्राकृतिक तरीके से स्वस्थ होना आवश्यक है। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान रखना होगा

1. फसलों के अनुक्रम में दालों की फसलों को अवश्य स्थान दे।

2. गहरी जड़ों वाली फसलें लेने के बाद उथली जड़ों वाली फसलों को उगायें।

3. अधिक पानी वाली फसलों को लेने के बाद कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों को लगाया जाना चाहिए जैसे धान के बाद मटर, मसूर, सरसों और चना आदि।

4. लंबी अवधि की फसलों को लेने के बाद, कम समय लेने वाली फसलों को लगाएं जैसे गेहूं के बाद दालों वाली फसलें।

5. लंबी और जल्दी से बढ़ने वाली फसलों को लेने के बाद, बौनी फसलों को लगाएं जैसे गन्ने के बाद चारा फसलों को लेने से उर्वरता घटती है। जबकि गन्ने के बाद दालों वाली फसलें लेने से उर्वरता बढ़ती है।

हरी खाद के माध्यम से प्राकृतिक उर्वरक

गेहूं या चावल की फसल की कटाई के बाद कोई नाइट्रोजन मिट्टी में नहीं रहती है। इन फसलों के बाद मूंग बोया जाता है जो हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में स्थिर करता है। एक एकड़ भूमि में आठ किलो मूंग के बीज, लगभग 65,000 बीजों के आसपास की आवश्यकता होती है। यदि इन में से 50,000 पौधे भी विकसित होते है और प्रत्येक पौधे से 4-5 ग्राम नाइट्रोजन का उत्पादन होता है तो इस तरह से एक एकड़ में 200 किलो के आसपास नाइट्रोजन का उत्पादन हो जाता है जिसकी लागत 10 रुपए किग्रा की दर पर लगभग 2000 रुपए होती है। इसके अलावा नाइट्रोजन का उत्पादन कृषि कचरे के विघटन की प्रक्रिया में भी होता है।

केंचुए का खाद एवं प्राकृतिक जुताई

केंचुए का मलमूत्र मिट्टी में पोषक तत्व प्रदान करता हैं। एक केंचुआ 10 ग्राम वजन के आसपास का होता है। तथा अपने शरीर के वजन के 5 गुना खाता है और समान राशि का मल त्याग करता हैं।

चार लाख केंचुए तीन महीने में छह लाख टन मिट्टी पलट करते हैं। इस मिट्टी में उपचारित मिट्टी की तुलना में दुगुना कैल्शियम और मैग्नीशियम, सात गुना नाइट्रोजन, ग्यारह गुना फास्फोरस तथा पांच गुना पोटेशियम होता है। इसके अलावा इस मिट्टी में लिग्नाइट फसलों में रोग प्रतिरोध शक्ति को बढ़ाता है। वे भी बैक्टीरिया के निर्माण में मदद करते हैं।

मिट्टी के स्वास्थ्य में केंचुआ की भूमिका बहुत ही रोचक घटना है। प्रत्येक एकड़ में चार से पांच लाख केंचुए की आवश्यकता है। वे फसल के अपशिष्ट पदार्थ और मिट्टी पर निर्भर होते हैं। हवा और उत्सर्जन के लिए वे पृथ्वी की सतह पर आते हैं। वे जड़ों को बिना नुकसान पहुँचाए मिट्टी की जुताई करते हैं। प्रत्येक केंचुआ भूमि की सतह पर हवा के लिए 10-12 बार आता है। फिर भूमिगत हो जाता है। इस प्रकार एक केंचुआ एक दिन में बीस छेद करता है तो चार लाख केंचुए 24 घंटे में एक एकड़ भूमि में अस्सी लाख छेद कर लेगे। यहां तक कि अगर वे केवल मानसून के दौरान काम कर रहे हैं यानी केवल तीन महीने तो वे 72 करोड़ छेद कर लेगे। वे उसको लगातार करते हैं। और इस प्रक्रिया में मिट्टी की स्वाभाविक रूप से जुताई हो जाती है।

अगर किसान थोड़ा भी बुद्धि से काम ले तो उपरोक्त कठिनाइयों का सामना, बिना किसी भी खर्च के, अच्छे लाभ के साथ-2, भूमि की उर्वरता को भी बनाए रख सकता है। इससे भूमि का शोषण भी नहीं होगा और किसान आत्म निर्भरता के रास्ते की ओर बढ़ेगा।

 

Source-

  • Krishisewa.com

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