0
  • No products in the cart.
Top
कुसुम की खेती- उत्तरप्रदेश – Kisan Suvidha
8327
post-template-default,single,single-post,postid-8327,single-format-standard,theme-wellspring,mkdf-bmi-calculator-1.0,mkd-core-1.0,woocommerce-no-js,wellspring-ver-1.2.1,mkdf-smooth-scroll,mkdf-smooth-page-transitions,mkdf-ajax,mkdf-blog-installed,mkdf-header-standard,mkdf-sticky-header-on-scroll-down-up,mkdf-default-mobile-header,mkdf-sticky-up-mobile-header,mkdf-dropdown-slide-from-bottom,mkdf-search-dropdown,wpb-js-composer js-comp-ver-4.12,vc_responsive

कुसुम की खेती- उत्तरप्रदेश

कुसुम की खेती

कुसुम की खेती- उत्तरप्रदेश

कुसुम की खेती सीमित सिंचाई की दशा में अधिक लाभदायक होती है । मुख्यतः इसकी खेती बुंदेलखण्ड में की जाती है । अन्य तिलहनी फसलों की अपेक्षा पूर्वी मैदानी क्षेत्र के किसान कुसुम  की खेती कम करते हैं । निम्न उन्नत विधियों अपनाने से उत्पादन एवं उत्पादकत में वृद्धि होती है । प्रदेश के असिंचित क्षेत्रों में कुसुम की खेती कर तिलहन उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है ।

 

खेत की तैयारी

खेत की अच्छी तैयारी करके इसकी बुवाई की जाए । अच्छे जमाव के लिए बुवाई पर्याप्त नमी वाले खेतों में ही करें ।

 

उन्नतशील प्रजातियां

कुसुम की अच्छी प्रजाति के.-65 है, जो 180-190 दिन में पकती है । इसमें तेल की मात्रा 30-35 प्रतिशत है और औसत उपज 14-15 कुन्टल प्रति हैक्टेयर है । दूसरी प्रजाति मालवीय कुसुम-305 है जो 160 दिन में पकती है । इसमें तेल की मात्रा 36 प्रतिशत है ।

 

बीज दर

18-20 किग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें ।

 

बुवाई का समय एवं विधि

बुवाई का उचित समय मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर है । इसकी बुवाई 45 सेमी. कतार की दूरी पर कूंडों में करें । बुवाई के 15-20 दिन बाद अतिरिक्त पौधे निकालकर पौधे से पौधे की दूरी 20-25 सेमी. कर दी जाए । बीज को 3-4 सेमी. की गहराई पर बोयें ।

 

उर्वरकों की मात्रा

उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर करें अन्यथा नत्रजन 40 किग्रा. एवं 20 किग्रा. फास्फोरस का प्रयोग अधिक लाभकारी होता है । उर्वरकों का प्रयोग चोंगा/नाई द्वारा 3-4 सेमी. की गहराई पर करना चाहिए ताकि खाद का पूरा लाभ फसल को मिल सके ।

 

निराई-गुड़ाई

बुवाई के 20-25 दिन बाद निराई-गुड़ाई करें । अनावश्यक पौधों को निकालते हुए पौधों की दूरी 20-25 सेमी. कर दें ।

 

सिंचाई

प्रायः इसकी खेती असिंचित क्षेत्रो में की जाती है यदि सिंचाई के साधन हैं तो एक सिंचाई फूल आते समय करें ।

 

फसल सुरक्षा

खड़ी फसल में कभी-कभी गेरूई रोग तथा मांहू कीट का प्रकोप हो जाता है, जिससे फसल को भारी क्षति होती है, अतः आवश्यकतानुसार इनकी रोकथाम निम्नलिखित विधि से करना चाहिए ।

1. गेरूई रोग

इस रोग में पत्तियों पर पीले अथवा भूरे रंग के फकोले पड़ जाते हैं ।

उपचार

इस रोग की रोकथाम के लिए जिंक मैंगनीज कार्बामेट 2 किग्रा. अथवा जिनेक 75 प्रतिशत 2.5 किग्रा. को 800-1000 लीटर पानी में प्रति हैक्टेयर की दर से 10-14 दिन के अन्दर पर 3-4 बार छिड़काव करें।

2.  झुलसा रोग की पहचान

इस रोग में पत्तियों तथा फलियों पर गहरे कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं, जिसमें गोल-गोल छल्ले केवल पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं ।

उपचार

इनके उपचार के लिए निम्न में से किसी एक रसायन का प्रयोग करें ।

मैंकोजेब                              75 प्रतिशत 2.0 किग्रा./है.
काॅपर आॅक्सीक्लोराइड        80 प्रतिशत 3.0 किग्रा./है.

3. महूं कीट

यह कीट काले रंग के होते हैं, जो समूह में पुष्प/पत्तियों/कोमल शाखाओं पर चिपके रहते हैं तथा रस चूसकर क्षति पहुंचाते हैं ।

उपचार

इस कीट की रोकथाम के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. 2 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें तथा आवश्यकता पड़ने पर 15-20 दिन के अन्तर पर पुनः छिड़काव करें ।

कटाई-मड़ाई

फसल पकने पर पत्तियां पीली पड़ जाती हैं तभी इसकी कटाई करनी चाहिए । सूखने के बाद मड़ाई करके दाना अलग कर देना चाहिए ।

 

Source-

  • कृषि विभाग,उत्तरप्रदेश

 

 

No Comments

Sorry, the comment form is closed at this time.

Show Buttons
Hide Buttons