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कुम्हड़ा की वैज्ञानिक खेती / कद्दू की खेती / Pumpkin Cultivation in India – Kisan Suvidha
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कुम्हड़ा की वैज्ञानिक खेती / कद्दू की खेती / Pumpkin Cultivation in India

कुम्हड़ा की वैज्ञानिक खेती

कुम्हड़ा की वैज्ञानिक खेती / कद्दू की खेती / Pumpkin Cultivation in India

कद्दू कुल की सब्जियों में कुम्हड़ा (सीताफल) अपना प्रमुख स्थान रखता है । इसके फल पके तथा कच्चे दोनो रूपों में सब्जी के लिए उपयोग में लाये जाते हैं । सीताफल को सब्जी तथा हलवा के अलावा टमाटर के साथ केंचप में भी मिलाते हैं । इसकी कोमल पत्तियाँ तथा तने का अग्र भाग एवं फूलों को भी सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है । भारत में इसकी खेती बहुत ही पुराने समय से होती चली आ रही है । पके फलों को सामान्य तापक्रम पर कई महीनों तक भण्डारित किया जा सकता है । इसको दिमाग का टाॅनिक भी कहा जाता है । इसकी खेती मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़िसा, असम, केरल, गुजरात एवं तमिलनाडु में प्रमुखता से की जाती है । कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं सोडियम प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं ।

 

जलवायु

गर्म जलवायु वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए अच्छे होते है। अच्छी जल निकास वाली और जीवांश युक्त बलुई मिट्टी या दोमट मिट्टी इसके लिए सर्वोत्तम पाई गई है । बीज के जमाव व पौधों के बढ़वार के लिए 24-280 सेल्शियस तापक्रम अच्छा होता है । नदी के किनारे दियारा भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है । अधिक तापक्रम तथा लम्बे दिन होने पर इसमें नर पुष्पों की संख्या बढ़ जाती है । गर्मी की अपेक्षा बरसात के दिनों में फलत अच्छी होती है ।

 

भूमि एवं भूमि की तैयारी

बलुई दोमट तथा जीवांश युक्त चिकनी मिट्टी जिसमें जल धारण क्षमता अधिक हो तथा पी.एच.मान 6.0-7.0 हो कद्दू की खेती के लिए उपयुक्त होती है । पथरीली या ऐसी भूमि जहां पानी लगता हो तथा जल निकास का अच्छा प्रबंध न हो इसकी खेती के लिए अच्छी नहीं होती है । खेत की तैयारी के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल तथा बाद में 2-3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करते हैं । प्रत्येक जुताई के बाद खेत में पाटा चलाकर मिट्टी को भुरभुरी एवं समतल कर लेना चाहिए जिससे खेत में सिंचाई करते समय पानी कम या ज्यादा न लगे ।

 

कुम्हड़ा की उन्नत किस्में / Pumpkin Varieties

1.काशी हरित:

इसका तना कम बढ़ने वाला (1.52 से 2 मी.) फल हरा, चपटा गोल तथा औसत वनज 3.5 कि.ग्रा. होता है । एक पौधे से औसतन 4-5 फल प्राप्त किया जा सकता है । यह कद्दू की सबसे अगेती प्रजाति है, फल की प्रथम तुड़ाई बुआई के 50-60 दिनों के अन्दर शुरू हो जाती है । यह प्रजाति हरे फल की खेती के लिए उपयुक्त है । इस प्रजाति का औसत उत्पादन 400 कुन्टल/हैक्टेयर तक आसानी से प्राप्त की जा सकती है ।

 

2.नरेन्द्र आभूषण:

इस संकर किस्म के फल लगभग गोल, गहरा हरा चित्तीदार एवं मध्यम आकार का होता है । फल गूदेदार तथा पकने पर रंग गहरा नारंगी होता है । इस प्रजाति की बुआई मध्य जनवरी से मध्य मार्च तक किया जा सकता है इस किस्म का औसत उत्पादन 400 कुन्टल/हैक्टेयर की जा सकती है ।

 

3.पूसा विश्वास:

इस किस्म के फल मध्यम आकार के औसतन 5.0 कि.ग्रा. तक होते हैं । फल के गूदे सुनहरे पीले रंग के होते हैं, और आसानी से 4 महीने तक भण्डारित किया जा सकता है । यह किस्म लगभग 120 दिन में तैयार हो जाती है तथा इसकी औसत उपज 400 कुन्टल/हैक्टेयर है ।

 

खाद एवं उर्वरक

कुम्हड़ा में 60 कि.ग्रा. नत्रजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 50 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से आवश्यकता पड़ती है । नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में नालियाँ या थाले बनाते समय देते हैं । नाइट्रोजन की शेष मात्रा दो बराबर भागों में बाँटकर खड़ी फसल में जड़ों के आस-पास बुआई के 15 तथा 40 दिनों बाद देना चाहिए । पानी में घुलनशील उर्वरक 19ः19ः19 का छिड़काव 5 ग्राम/लीटर पानी में 3 से 4 बार 10 दिन के अंतराल पर जमाव के 15 दिन के बाद से करना चाहिए ।

 

बुवाई का समय

गर्मी में बीजों की बुवाई 15-25 फरवरी और खरीफ में 20 जून से 5 जुलाई तक किया जाता है । पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी बुआई मार्च-अप्रैल के महीने में करते हैं । तमिलनाडु में इसकी बुआई जून, अगस्त तथा दिसम्बर और जनवरी में करते हैं । केरल में बुवाई का उचित समय नवम्बर से फरवरी माह तक होता है । गर्मी की रोपाई के लिए जनवरी में पौध तैयार की जा सकती है ।

 

बीज की मात्रा

एक हैक्टेयर क्षेत्रफल की बुआई के लिए 4-5 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है । अनुमानतः 100 ग्राम में लगभग 600 बीज होते हैं ।

 

बुआई की विधि

गर्मी की फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 2.5 मीटर और पौध से पौध की दूरी 60 सेन्टीमीटर रखते हैं । जबकि वर्षा ऋतु में फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 5 मीटर और पौध से पौध की दूरी 75 सेन्टीमीटर रखते हैं । बुआई करने से पहले रासायनिक उर्वरक, गोबर की खाद आदि अच्छी तरह से थाले में मिलाते हैं तथा नालियों के दोनों किनारों (मेड़ों)पर बने थाले में एक स्थान पर 2 बीज की बुआई 2-3 से.मी. की गहराई पर करते हैं

 

सिंचाई

कुम्हड़ा की खेती जब बरसात में की जाती है, तब सिंचाई की आवश्यकता कम या नहीं होती है । लेकिन यदि बरसात न हो तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देनी चाहिए । गर्मी में उगाई जा रही फसल में 4-7 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करते हैं । तना बढ़वार के समय, फूल आने से पहले तथा फल विकास की अवस्था पर नमी की कमी होने पर, उपज में भारी कमी हो जाती है । इसलिए उपयुक्त तीन अवस्थाओं पर खेत में नमीं की कमी नहीं होने देना चाहिए । फल के पकते समय सिंचाई नहीं करते हैं जिससे भण्डारण क्षमता में बढ़ोत्तरी हो जाती है ।

 

खरपतवार नियंत्रण

जमाव से लेकर प्रथम 15 दिनों तक खरपतवार से पौधों को ज्यादा नुकसान होता है । जिससे पौधों की वृद्धि पर प्रतिकूल असर पड़ता है तथा बढ़वार रुक जाती है । अतः खेत से समय≤ पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए । रासायनिक खरपतवारनाशी के रूप में बूटाक्लोर रसायन 2 कि.ग्रा./है. की दर से बीज बुआई के तुरन्त बाद छिड़काव करते हैं । खरपतवार निकालने के साथ-साथ खेत की गुड़ाई करके जड़ों के पास मिट्टी चढ़ाते हैं जिससे पौधों का विकास तेजी से होता है ।

 

तुड़ाई एवं उपज

बाजार माँग की आवश्यकतानुसार फल को कच्चे और पके दोनों अवस्थाओं में तुड़ाई करते हैं । कच्चे फल के लिए फल लगने के 7-10 दिनों के भीतर तुड़ाई करते हैं । हरे फल को किसी तेज धारदार चाकू से इस प्रकार पौध से अलग करना चाहिए कि पूरे पौधे को झटका न लगे । औसत उपज प्रति हैक्टेयर लगभग 350-400 कुन्टल तक होती है । पके कुम्हड़ा के फल को सामान्य तापक्रम पर लगभग 3-4 महीने तक रखा जा सकता है ।

 

प्रमुख कीट एवं नियंत्रण

1.कद्दू का लाल कीट (रेड पम्पकिन बिटिल):

इस कीट की सूण्ड़ी जमीन के अन्दर पाई जाती है । इसकी सूण्ड़ी व वयस्क दोनों क्षति पहुंचाते हैं । प्रौढ़ पौधों की छोटी पत्तियों पर ज्यादा क्षति पहुंचाते हैं । ग्रब (इल्ली) जमीन में रहती है जो पौधों की जड़ पर आक्रमण कर हानि पहुंचाती हैं । ये कीट जनवरी से मार्च के महीनों में सबसे अधिक सक्रिय होते हैं । अक्टूबर तक खेत में इनका प्रकोप रहता है । फसलों के बीज पत्र एवं 4-5 पत्ती अवस्था इन कीटों के आक्रमण के लिए सबसे अनुकूल है । प्रौढ़ कीट विशेषकर मुलायम पत्तियां अधिक पसंद करते हैं । अधिक आक्रमण होने से पौधे पत्ती रहित हो जाते हैं ।

नियंत्रण:

सुबह ओस पड़ने के समय राख का बुरकाव करने से भी प्रौढ़ पौधा पर नहीं बैठता जिससे नुकसान कम होता है । जैविक विधि से नियंत्रण के लिए अजादीरैक्टिन 300 पीपीएम 5-10 मिली/लीटर या अजादीरैक्टिन 5 प्रतिशत 0.5 मिली/लीटर की दर से दो या तीन छिड़काव करने से लाभ होता है । इस कीट का अधिक प्रकोप होने पर कीटनाशी जैसे डाईक्लोरोवास 76 ईसी. 1.25 मिली/लीटर या ट्राईक्लोफेरान 50 ईसी. 1 मिली/लीटर दर से जमाव के तुरंत बाद एवं दुबारा 10 दिन पर पर्णीय छिड़काव करें ।

 

2.फल मक्खी:

इस कीट की सूण्डी हानिकारक होती है । प्रौढ़ मादा छोटे, मुलायम फलों के छिलके के अन्दर अण्डा देना पसन्द करती है, और अण्डे से ग्रब्स (सूड़ी) निकलकर फलों के अन्दर का भाग नष्ट कर देते हैं । कीट फल के जिन भाग पर अण्डा देती है वह भाग वहां से टेड़ा होकर सड़ जाता है । ग्रसित फल सड़ जाता है और नीचे गिर जाता है ।

नियंत्रण:

गर्मी की गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी की निचली परत खुल जाए जिससे फलमक्खी का प्यूपा धूप द्वारा नष्ट हो जाए तथा शिकारी पक्षियों को खाने के लिए खोल देता है । ग्रसित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए । नर फल मक्खी को नष्ट करने लिए प्लास्टिक की बोतलों को इथेनाल, कीटनाशक (डाईक्लोरोवास या कार्बारिल या मैलाथियान), क्यूल्यूर को 6ः1ः2 के अनुपात के घोल में लकड़ी के टुकड़े को डुबाकर, 25 से 30 फंदा खेत में स्थापित कर देना चाहिए ।

कार्बारिल 50 डब्ल्यूपी. 2 ग्राम/लीटर या मैलाथियान 50 ईसी 2 मिली/लीटर पानी को लेकर 10 प्रतिशत शीरा अथवा गुड़ में मिलाकर जहरीले चारे को 250 जगहों पर 1 हैक्टेयर खेत में उपयोग करना चाहिए । प्रतिकर्षी 4 प्रतिशत नीम की खली का प्रयोग करें जिससे जहरीले चारे की ट्रैपिंग की क्षमता बढ़ जाए । आवश्यकतानुसार कीटनाशी जैसे क्लोरेंट्रानीप्रोल 18.5 एससी. 0.25 मिली/लीटर या डाईक्लारोवास 76 ईसी. 1.25 मिली/लीटर पानी की दर से भी छिड़काव कर सकते हैं ।

 

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

1.चूर्णी फफूंद (चूर्णिल आसिता):

यह विशेष रूप से खरीफ वाली कुम्हड़ा पर लगता है । प्रथम लक्षण पत्तियाँ और तनों की सतह पर सफेद या धुंधले धुसर धब्बों के रूप में दिखाई देता है तत्पश्चात् ये धब्बे चूर्ण युक्त हो जाते हैं । सफेद चूर्णी पदार्थ अंत में समूचे पौधे की सतह को ढंक लेता है । जिसके कारण फलों का आकार छोटा रह जाता है तथा बीमारी की गंभीर स्थिति में पौधों से पत्ते भी गिर जाते हैं।

नियंत्रण:

इसकी रोकथाम के लिए रोग ग्रस्त पौधों को खेत में इकट्ठा करके जला देते हैं । फफूंद नाशक दवा जैसे ट्राइडीमोर्फ 1/2 मिली./ लीटर या माईक्लोबूटानिल 1 ग्राम/10 लीटर पानी के साथ घोल बनाकर सात दिन के अंतराल पर छिड़काव करें ।

 

2.मृदुरोमिल आसिता:

यह रोग वर्षा ऋतु के उपरांत जब तापमान 20-220 से.हो, तब तेजी से फैलता हैं। उत्तरी भारत में इस रोग का प्रकोप अधिक है । इस रोग से पत्तियों पर कोणीय धब्बे बनते हैं जो कि बाद में पीले हो जाते हैं । अधिक आर्द्रता होने पर पत्ती के निचली सतह पर मृदुरोमिल कवक की वृद्धि दिखाई देेती है ।

नियंत्रण:

बीजों को एप्रोन नामक कवकनाशी से 2 ग्राम दवा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए । इसकी रोक थाम के लिए मेटालैक्सिल +मैंकोजेब 2.5 ग्रा./लीटर की दर से या डाइमेयामर्फ का 1 ग्राम/लीटर मैटीरैम का 2.5 ग्रा./लीटर पानी के साथ घोल बनाकर 7 से 10 दिन के अन्तराल पर 3-4 बार छिड़काव करें ।

 

3.कुम्हड़ा का पीत शिरा मोजैक:

इस रोग में पहले नई पत्तियों की शिराएँ पीली हो जाती है तथा बाद में पूरी पत्तियाँ पीली हो जाती हैं तथा बाद में पूरी पत्तियाँ पीली हो जाती हैं । पत्तियाँ छोटी तथा फल अनियमित आकार के हो जाते हैं ।

नियंत्रण:

इसकी रोकथाम के लिए स्वस्थ पौधों के बीजों से तथा रोग रोधी किस्म की बुवाई करनी चाहिए । सभी ग्रसित पौधो को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए । इस रोग का मुख्य वाहक कीट होता है । अतः रोग लगने के पहले ही इमिडाक्लोप्रिड 3 मि.ली. दवा 10 लीटर में घोलकर छिड़काव बुआई के 15 दिन बाद करें । फल लगने के बाद रासायनिक दवाओं का प्रयोग नहीं करते हैं । दवा के छिड़काव से 6-10 दिनों के बाद ही फलों की तुड़ाई करें ।

 

 

स्रोत-

  • भा.कृ.अनु.प.-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान पो.आ.-जक्खिनी (शाहंशाहपुर), वाराणसी-221 305,उत्तर प्रदेश

 

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