काली मिर्च की खेती मे अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु

काली मिर्च (पाइपर नाइग्रम) एक बहुवर्षीय वेल है, जो पाईपरेसी परिवार से सम्बन्धित है । इसके छोटे गोल फल, मसाले और औषधी दोनों रूपों में इस्तेमाल किए जाते हैं । वाणिज्यिक रूप से काली मिर्च और सफेद मिर्च बाजार में मिलती है ।

पके फलों को वैसे ही सूखाकर काली मिर्च तैयार की जाती है और सफेद मिर्च अच्छी तरह पके हुए फलों की बाहरी त्वचा हटाने के बाद उसे सूखाकर तैयार की जाती है ।

इसका प्रयोग मसाले के रूप में विभिन्न खाद्य पदार्थों को तैयार करने में तथा औषधी के रूप में होता है । पूरे विश्व में काली मिर्च के उत्पादन, उपयोग और निर्यात में भारत अग्रणी देश है । काली मिर्च का उत्पादन मुख्यता केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में ज्यादा होता है ।

 

काली मिर्च की खेती के लिए जलवायु और मिट्टी भूमि और जलवायु

काली मिर्च एक आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का पौधा है, जिसके लिए पर्याप्त वर्षा औरआर्द्रता की आवश्यकता होती है । पश्चिमी घाट के पहाड़ों के निम्न तटों की गर्म तर जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त है । 20 0 उत्तरी और दक्षिणी अक्षाँश पर और समुद्र तट से 1500 मी. तक की ऊँचाई पर इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है तथा 10 से 40 0 सेन्टीग्रेड तक का तापमान इसके लिए अनुकूल है । 125-200 से.मी. की वार्षिक वर्षा काली मिर्च के लिए उपयुक्त है । यद्यपि प्राकृतिक रूप से काली मिर्च लाल दोमट मिट्टी में अच्छी पैदा होती है, फिर भी 4.5 से 6.0 तक ph वाली मिट्टी में भी इसे पैदा किया जा सकता है ।

भारत के पश्चिमी तट में काली मिर्च निन्मलिखित क्षेत्रों में पैदा की जाती है ।

(1) तटवर्ती क्षत्रे जहां  काली मिर्च घरेलू आवश्यकताओं के लिए गृह वाटिका में पैदा की जाती है
(2) तराइयों में जहाँ काली मिर्च की व्यापक खेती की जाती है ।
(3) समुद्र तट से 800-1500 मी. तक की ऊँचाई के पहाड़ी क्षेत्रों में जहां कॉफी, इलायची और चाय बागानों में उगाए गए छायादार वृक्षों पर उसकी खेती की जाती है और
(4) कन्नूर, कासरगोड, दक्षिण कन्नड और उत्तर कन्नड जिलों में इसकी खेती की जाती है ।

काली मिर्च की किस्में

काली मिर्च की अधिकांश किस्में मोनोशियस (monoecious) प्रकृति की (नर व मादा फूलों का एक  ही बेल पर उगना) है । तथापि पूर्ण रूपेण नर से लेकर पूर्ण रूपेण मादा बेल भी पाई जाती है । भारत में काली मिर्च की 75 से अधिक किस्मों की खेती की जाती है । केरल में सबसे प्रसिद्ध किस्म करिमुण्डा है । कोट्टानाडन (दक्षिण केरल), नारायाकोडी (मध्य केरल), एम्पिरियन (वयनाडु), नीलामुण्डी (इडुक्की), कुतिरावल्ली (कालीकट और इडुक्की), बेलानकोट्टा, काल्लुवल्ली (उत्तर केरल), मल्लिगेसरा और उदेकरा (कर्नाटक) अन्य प्रमुख किस्में हैं । कुतिरावल्ली और बेलानकोट्टा में एकांतर वर्षों में उपज अधिक है ।

काली मिर्च की प्रमुख प्रजातियाँ पन्नियूर-1, पन्नियूर-2, पन्नियूर-3, पन्नियूर-4, पन्नियूर-5, पन्नियूर-6 (केरल कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुमोदित) और शुभकरा, श्रीकरा, पेंचमी, पोर्णमी, शक्ति, तेवम, गिरीमुण्डा मलवार एक्सेल (भारतीय मसाले फसल अनुसंधान संस्थान, कालिकट द्वारा अनुमोदित) आदि हैं । गुणवत्ता की दृष्टि से, कोट्टानाडन में सबसे ज्यादा तेल (17.8%) में पाया जाता है ।

प्रबंधन 

काली मिर्च की बेल में तीन प्रकार की शाखाएं विकसित होती हैं

(1) प्राथमिक तना जिसमें लम्बी अर्न्तगांठे (long internode) होती हैं तथा इसमें जड़े निकलती हैं ।

(2) बेल के निचले भाग से निकलने वाली रनर (runner) शाखाएं जिन में लम्बी अर्न्तगांठ (long internode) होती है और हर गांठ से जड़े निकलती हैं ।

(3) पार्श्र्व शाखाएं जिस पर फसल उगती हैं ।

साधारणतया पौध सामग्री के लिए रनर (runner) शाखाओं  से ज़ड़ कलमें (cutting) ली जाती है, हालांकि उसी शाखाओं (terminal Shoots) का प्रयोग भी प्रवर्धन के लिए किया जा सकता है । पार्श्र्व शाखाओं से ली गई जड़ कलमों का प्रयोग काली मिर्च के झाड़ी नुमा (bush pepper) पौधे तैयार करने के लिए होता है ।

अधिक उपज देने वाली स्वस्थ बेलों का चुनाव मातृ बैल (mother vine) के रूप में किया जाता है । इन से निकलने वाली रनर शाखाओं (runner) को मिट्टी के सम्पर्क में आकर जड़े विकसित करने से रोकने के लिए इन्हें बेल के आधार पर पास लगाए गए लकड़ी के खूंटों के गिर्द लपेटा जाता है ।

फरवरी-मार्च में रनर शाखाओं को बेलों से अलग किया जाता है और पत्तों की कटाई के बाद 2-3 गांठों वाली कलमों को पौधशाला की क्यारियों में या रोपण/पोटिंग मिश्रण (मिट्टी, गोबर व रेत को 2:1:1 के अनुपात में मिलाकर बनाय गया रोगण मिश्रण) से भरे हुए पोलिथीन के बैग/लिफाफों में रोपा जाता  है । पोलिथीन बैगों को पर्याप्त छाया मिलनी चाहिए और आवश्यकतानुसार उन्हें सिंचाई करते रहना चाहिए । मई-जून में कलमें खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाती हैं ।

सर्पेन्टाइन विधि (Serpentine method)

काली मिर्च के प्रवर्धन की यह सबसे सस्ती विधि है, जिसमें छायादार पौधशाला शैड में लगभग 500 ग्राम रोपण मिश्रण को 20×10 से.मी. आधार के पोलीथीन बैग में भरते हैं और उसमें मातृ बेल को रोपते हैं । बेल की बढ़वार के साथ उसे कुछ गांठे (nodes) निकल आती हैं । हर गांठ के नीचे रोपण मिश्रण से भरे हुए पोलीथीन बैग रख कर, नारियल पत्तों की मध्य शिरा की सहायता से गांठ को रोपण मिश्रण में दबा कर रखते हैं । यह प्रक्रिया तीन महीने तक जारी रखें तब तक 10-15 एकगांठी जड़ कलमें तैयार हो जाती हैं । जब 20 गांठों में जड़ें आ जाती हैं तो पहले 10 पोलीथीन बैग जिनमें जड़दार गांठों का विकास हो चुका है उन गांठों को काट कर अलग कर लेते हैं तथा उन्हें बैग में दबा देते हैं ।

हर बैग में पनप रही गांठ से कक्षीय कलिका (axillary bud) का अंकुरण होता है व 2-3 महीने में 4-5 गांठों वाली कलमें तैयार हो जाती हैं । और 20-30 दिनों के बाद, बचे हुए बैगों की गांठों को भी काट कर अलग कर लेते हैं तथा पहले की तरह बैग में दबा देते हैं। इन पोलीथीन बैगों में प्रतिदिन आवश्यकतानुसार सिंचाई अवश्य करनी चाहिए । इस विधि के द्वारा एक साल में प्रत्येक मातृबेल से लगभग 30-40 जड़दार कलमें बाग में रोपण के लिए तैयार की जा सकती हैं ।

काली मिर्च की खेती में पौधशाला के रोग

१.फाइटोफ्थोरा संक्रमण (phytophthora infection)

फाइटोफ्थोरा संक्रमण पौधशाला में कलमों के पत्ते, तने व जड़ों में देखा जा सकता है । पत्तों में टेढ़े हाशिए वाले काले धब्बे दिखाई देते हैं, जो तेजी से फैलते हैं और पत्ते झड़ जाते हैं । तने का संक्रमण काले धब्बे के रूप में दिखाई देता है जिसके परिणाम स्वरूप तना झुलस जाता है । जड़ों पर इसके लक्षण पूरे जड़ तंत्र के सड़ने की तरह प्रतीत होते हैं ।

1% बोर्डो मिश्रण के छिड़काव और 0.2% कोप्पर ओक्सिक्लोराइड से मासिक अंतराल पर मिट्टी उपचारित (drenching) करने से इस रोग को रोका जा सकता है । या 0.01%  मेटालाक्सिल (रिडोमील-मैन्कोजेब के 1.25 ग्राम एक लीटर पानी में) या 0.3% पोटिशियम फोसफोनेट का प्रयोग भी किया जा सकता है  पोट्टिंग मिश्रण का निर्जमीकरण करने के लिए मीथाइल ब्रोमाइड से धूमित या काले पालीथीन शीट से सौरीकरण करना चाहिए । पौधशाला के पोलिथीन बैगों में पोट्टिंग मिश्रण भरते समय निर्जमीकृत मिश्रण से VAM 100 सी सी / कि.ग्राम की दर से और ट्राइकोडर्मा 1 ग्राम / कि.ग्राम मिट्टी की दर से जैविक नियंत्रक इसमें मिला सकते हैं ।

जैविक नियंत्रक केवल जड़ तंत्र को ही बचाता है, तने शाखाओं आदि उपरी भागों को बचाने के लिए रसायनों का प्रयोग से संरक्षित करना चाहिए । यदि बोर्डो मिश्रण का प्रयोग करें तो मिट्टी में इस फफूँद नाशक की बूंदे नहीं गिरनी चाहिए । या मोटालाक्सिल एवं पोटाश्यिम फोसफोनेट जैसे फफूँद नाशक जो ट्राइकोडर्मा के लिए हानिकारक नहीं होते हैं, उनका प्रयोग किया जा सकता है ।

२.एन्थ्राकनोज (Anthracnose)

यह रोग कोलटोट्राइकम ग्लोइयोस्पोरिडस नामक फफूँद के कारण होता है । ये फफूँद पत्तों को संक्रमित करती है और पत्तों में पीले-भूरे के क्लोरोटिक आवरण वाले अनियमित बिन्दियाँ बनाती है । 1% बोर्डो मिश्रण और 0.1% कार्बन्डाज़िम का एक के बाद एक छिड़काव से इस रोग का नियंत्रण किया जा सकता है ।

३.पत्ते गलन और झुलसा (leaf rot and blight)

यह रोग साइज़ोक्टोनिया सोलनाई के कारण होता है और अप्रैल-मई में जब गर्म तर स्थितियाँ विद्यमान होती हैं, तब पौधशाला में इस रोग का संक्रमण तीव्र  होता है । ये फफूँद पत्ते एवं तने को संक्रमित करताहै तथा भूरे रंग की गहरी बिन्दियाँ और माइसीलियल (mycelia) धागे पत्तों में दिखाई देते हैं और संक्रमित पत्ते साइसीलियल धागों से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं । तनों पर इसका संक्रमण गहरे भूरे रंग में ऊपर से नीचे फैलने वाले धब्बे के रूप में दिखाई पड़ता है । संक्रमण के कारण नए कल्ले (new flushes) धीरे धीरे मुरझाकर सूख जाते हैं । कोलटोट्राइकम से होने वाले पत्र-दाग, नेक्रोटिक बिन्दुओं के चारों ओर पीले परिवेश से दिखाई पड़ते हैं । 1% बोर्डो मिश्रण के छिड़काव से इन दोनों रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है ।

४.आधार उखटा रोग (Basal wilt)

यह रोग साधारणतः जून-सितंबर में पौधशाला में देखने को मिलता है और य स्क्लीरोटियम रोलेफसी फफूँद के कारण होता है । तने व पत्तों में भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं । पत्तों में इन धब्बों पर सफेद माइसीलियम (mycelium) नजर आते हैं । ये माइसीलियम के धागे बाद में तने पर घाव पैदा करते हैं । पत्ते मुरझा जाते हैं और संक्रमण अधिक होने पर जड़ कलमें सूख जाती हैं ।  पुराने धब्बों में सफेद व क्रीम रंग के छोटे गोलाकार के स्कलेरोशिया (Selerotia) दिखाई पड़ती है । रोग से प्रभावित कलमों और झड़े हुए पत्तों को काटकर नष्ट कर देना चाहिए । बाद में सभी कलमों पर 0.2% कार्बन्डाज़िम या 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए ।

५.विषाणु संक्रमण (Viral infection)

वेन किल्यरिंग, मोज़ेक, पीली चित्ती, मोट्टिंलिंग, छोटी पत्ती आदि पौधशाला में दिखना विषाणु संक्रण की निशानी है । विषाणु सिस्टेमिक प्रकृति के होने के कारण इनका प्राथमिक फैलाव पौध रोपण सामग्रियों के जरिए होता है, क्योंकि काली मिर्च का प्रवर्धन काण्डों के द्वारा किया जाता है । जब रोग संक्रमित पौधों से रोपण सामग्री ली जाती है, तब जड कलमें भी संक्रमित हो जाती हैं । इसलिए विषाणुमुक्त मातृ पौधों का चयन करना अत्यंत आवश्यक है । इसके अतिरिक्त, रोग का फैलाव एफिड्स, मीली  बग आदि कीटों द्वारा होता है पौधशाला में कलमों को अधिक पास-पास उगाने से  इन कीटों के आक्रमण की संभावना अधिक होती है । इसलिए जब इन कीटों को पौधशाला में पाया जाता है, तब पौधशाला में डाइमेथेएट या मोनेक्रोटोफोस 0.05% की दर पर छिड़काव करना चाहिए । साथ ही, नियमित देख-रेख करके संक्रमित पौधों को हटाना भी आवश्यक है ।

६.पौधशाला में सूत्र कृमियों का संक्रण (Nematode infestations)

पौधशाला  में पौधों को प्रभावित करने वाले सूत्र कृमियों में जड़ गाँठ सूत्र कृमि यानि root knot nematode (मेलोडोगायनी स्पी.) और छेद करने वाले सूत्र कृमि यानि burrouing nematode (रोडोफोलस सिमिलिस) प्रमुख हैं। सूत्र कृमियों के संक्रमण के लक्ष्ण बढ़वार कम होना, पत्तों का पीलापन और पत्तों की शिराओं के बीच पीलापन आदि होते हैं । सूत्र कृमियों से प्रभावित कलमों की खेतों में रोपाई करने पर कलमों की बढ़वार बहुत कम होती है और बाद में कलमें धीरे धीरे मर जाती हैं । सूत्र कृमि रहित जड़ कलमों का उत्पादन करने के लिए धूम्रित रोपण मिश्रण (fumigated potting mixture) का प्रयोग करना चाहिए ।

रोपण मिश्रण के 48 घंटे तक पोलिथीन बैगों में 500 ग्राम /100 ड़ढद्य मिट्टी की दर से मीथैल बोमाइड से धूम्रित करना चाहिए या 2% फोर्मालिन से अच्छी तरह गीला करना चाहिए । 48 घंटे के बाद पोलिथीन शीट हटानी चाहिए और विषैली गैस निकालने के लिए इस मिश्रण को अच्छी तरह ऊपर नीचे पलटना चाहिए । धूम्रित करने के 2-3 हफ्ते बाद मिट्टी का यह मिश्रण रोपाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है । रोपण मिश्रण का निज्रमीकरम करने के लिए मिट्टी का सौरीकरण भी किया जा सकता है ।

सूत्र कृमियों के संक्रमण को रोकने के लिए रोग निवारक उपाय के रूप में सूत्र कृमियों के संक्रमण को रोकने के लिए रोग निवारक उपाय के रूप में सूत्र कृमिनाशक का प्रोग भी आवश्यक है । इसके लिए बैगों में कलमों के चारों और समान दूरी पर 2-3 से.मी. गहरी छिद्र बनाकर इनमें 10 ग्राम फोरेट 1 ग्राम/बैग की दर से या 3 ग्राम कारबोफुरान 3 ग्राम प्रति बैग की दर से रखना चाहिए और मिट्टी से ढक देना चाहिए । मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाई रखने के लिए हल्की सिंचाई भी करनी चाहिए ।

बागानों की स्थापना

काली मिर्च की खेती के लिए खेत की तैयारी किस तरह से करे?

काली मिर्च की खेती ढलान पर की जाती है, दक्षिण दिशा की ओर वाली ढलान को नहीं चुनना चाहिए और उत्तर एवं उत्तर पूर्वीं ढलानों के निचले भागों को चुनना चाहिए ताकि गर्मी में काली मिर्च की बेलों को सूर्य की तेज धूप के दुष्प्रभाव से बचाया जा सके ।

भूमि की तैयारी और आधार की रोपाई

मई-जून में पहली वर्षा होने पर एरिथ्रीना स्पी. (Erythrina Sp.) गरुगा पिन्नेटा (Garuga Pinnata) या किलिन्जिल अथवा ग्रोविल्लिया रोबस्टा (Grevillea robusta) या सिल्वर ओक की तने की कलमों (Stem cutting) को गोबर और ऊपरी मिट्टी से भरे हुए 50 से.मी. x 50 से.मी. x 50 से.मी. आकार वाले गड्ढों में 3 से.मी. x 3 से.मी. की दूरी पर रोपा जाना चाहिए और इस तरह एक हेक्टेयर में1111आधारों (standards) की रोपाई की जा सकती है । एलियान्थस मलबारिका (Alianthus malabarica) के पौधे भी रोपित किए जा सकते हैं । 3 वर्ष के बाद जब काली मिर्च की बेलें काफी लम्बी हो जाती हैं तब इनको आधारों पर चढ़ाया जा सकता है ।

आधार के रूप में एरिथ्रीना इन्डिका (E. Indica) का प्रयोग करते समय सूत्र कृमियों और तने व जड़ छेदकों के नियंत्रण के लिए फोरेट 10 जी 30 ग्राम की दर सेसाल में दो बार मई-जून और सितम्बर-अक्तूबर में प्रयोग करना चाहिए । जब एरिथ्रीना इन्डिका (E. Indica) और गरुगा पिन्नेटा (G. pinnata) का इस्तेमाल करते हैं तो, प्रारंभिक तने को मार्च-अप्रैल में काटकर छाया में ढेर लगाकर रखना चाहिए । मई में इन तनों में अंकुरण होने लगता है । काली मिर्च की बेलों की रोपाई करने के लिए बने गए गड्ढों के किनारे पर इन तनों की रोपाई की जाती है ।

काली मिर्च की खेती के लिए रोपाई किस प्रकार और कब करे

मानसून शुरू होने पर हर आधारों के उत्तरी दिशा की ओर गड्ढों में काली मिर्च के 2-3 जड़ कलमों की रोपाई की जाती है ।

कृषि क्रियायें

कलमें बढऩे के साथ साथ, जहाँ आवश्यक हो वहाँ शाखाओं को आधार से बाँधना चाहिए । गर्मी में कृत्रिम छाया देकर तरुण बेलों को धूप से बचाना चाहिए । बेलों को अनुकूल प्रकाश देने के लिए ही नहीं बल्कि आधारों की सीधी बढ़वार के लिए भी शाखाओं की काट-छाँट करना आवश्यक है ताकि मानसून के दौरान पर्याप्त छाया मिल सके । उत्तरी-पूर्वी मानसून समाप्त होने के साथ हरे पत्तों या कार्बनिक सामग्रियों से पलवार करना चाहिए । जड़ों को नुकसान से बचाने के लिए बेलों के तल को सुरक्षित रखना चाहिए ।

दूसरे वर्ष भी इसी तरह की कृषि क्रियायें दोहरानी चाहिए । चौथे वर्ष से आधारो की काट-छाँट सावधानी से करनी चाहिए ताकि आधारों की लम्बाई को नियमित किया जा सकें और बेलों को अनुकूल छाया दी जा सके । फूल एवं फल लगते समय अधिक छाया होने से न केवल कीट संक्रमण ज्यादा हो जाता है बल्कि उत्पादन भी कम हो जाता है । चौथे वर्ष से लेकर, सामान्यतः दो बार हल्की खुदाई करते हैं, प्रथम मई-जून में और दूसरी बार दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की समाप्ति के साथ । बरसात में भूमि कटाव को रोकने के लिए केलप्पोगोनियम मुकुनोइडस (calapogonium mucunoides) और मैमोसा इन्विसा (Mimosa invisa) को आवरण फसल (cover crop) के रूप में प्रयोग करना चाहिए । ये घने कार्बनिक पलवार के रूप में भी काम आती हैं ।

काली मिर्च की खेती में खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं प्रयोग

लेटेराइट मिट्टी में रोपित काली मिर्च की बेलों में प्रति वर्ष 100 ग्राम नत्रजन, 40 ग्राम फोसफोरस, 140 ग्राम पोटाश की दर से उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए । प्रथम वर्ष में इसकी एक तिहाई मात्रा का और दूसरे वर्ष में दो तिहाई मात्रा प्रयोग करनी चाहिए ।

 

Source-

  • agriavenue.com