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कीट अवरोधी जालघर में करेले का संकर बीज उत्पादन / Hybrid seed production of Bitter gourd – Kisan Suvidha
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कीट अवरोधी जालघर में करेले का संकर बीज उत्पादन / Hybrid seed production of Bitter gourd

करेले का संकर बीज उत्पादन

कीट अवरोधी जालघर में करेले का संकर बीज उत्पादन / Hybrid seed production of Bitter gourd

मध्यम एवं बड़े वर्ग के किसान खासकर युवा एवं महिला किसान सब्जियों का बीज उत्पादन/संकर बीज उत्पादन एक व्यवसाय के रूप में अपनाकर उद्यमी बन सकते हैं और कृषि आय में वद्धि कर सकते हैं, जिससे संकर बीजों की स्थानीय उपलब्धियों में सुधार एवं कम मूल्य पर किसानों को संकर बीजों की उपलब्धि हो सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा करेले की दो संकर प्रजातियां विकसित हुई हैं, पूसा संकर-1 तथा पूसा संकर-2।

खुले वातावरण में बीज उत्पादन की फसल, कीट और रोग से ग्रसित हो जाती है। इससे निवारण के लिए जाल घर में बीज उत्पादन एक नई प्रौद्योगिकी है। जालघर एक कीट अवरोधी नेट व जस्तीकृत इस्पात द्वारा निर्मित अर्ध बेलनाकार संरक्षित संरचना है, जिसमें कीट पतंगों के प्रवेश का नियंत्रण किया जा सकता है। जाल घर को बनवाने में  50,000 की लागत आती है। एक जाल घर को 3-5 वर्ष तक प्रयोग में लाया जा सकता है। जालघर में बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों का उत्पादन होता है एवं फसल रोग मुक्त व उपज दोगुनी होती है।

 

संकर बीज उत्पादन

मौसम

करेला में बीज उत्पादन गर्मी एवं वर्षा दोनों मौसमों में किया जा सकता है। फसल में जमाव के लिए 25 डिग्री सेल्सियस और अच्छी पैदावार, पुष्पन एवं फल के लिए 25-30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त है। संकर बीज उत्पादन हेतु गर्मी का मौसम अधिक उपयुक्त है।

 

पृथक्करण की दूरी

नर एवं मादा वंशकृमों 5 मी. की दूरी को प्रस्तुत ब्लाॅक पर उगाना चाहिए।

 

बीज स्रोत

संकर बीज उत्पादन के लिए प्रजनक बीज कृषि अनुसंधाान संस्थान या कृषि विश्वविद्यालय से प्राप्त कर सकते हैं।

 

वंशक्रम उगाने का अनुपात: 3ः1 बुवाईः 15 फरवरी से 30 फरवरी (ग्रीष्म ऋतु) 15 जुलाई से 30 जुलाई (वर्षा ऋतु)

 

बुवाई की विधि

बीजों को बाविस्टीन के घोल में रात भर भिगोकर अगले दिन बुवाई करनी चाहिए। खेत में 1/4 भाग में नर प्रजनक तथा 3/4 भाग में मादा प्रजनक की बुवाई अलग-अलग खण्डों में करना उचित माना गया है। बुवाई दो प्रकार से की जाती है; सीधे बीज द्वारा तथा पौध रोपण द्वारा।

 

सिंचाई तथा कृषि क्रियाएं

सिंचाई खुले खेत में आवश्यकतानुसार दी जा सकती है, यद्यपि ड्रिप सिंचाई का प्रयोग अधिक प्रभावी है। सिंचाई 15-20दिन के अंतराल में दे अन्यथा फल एवं बीज की उपज पर प्रतिकूल असर पड़ता है। खरपतवारों की रोकथाम के लिए 3-4 बार निराई पर्याप्त है। पुष्पन आरम्भ होने पर खेत में नत्रजन उर्वरक मिलाकर पौधों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए।

 

फसल सुरक्षा

चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यु) तथा मृदुल आसिता (डाउनी मिल्ड्यु) के लिए क्रमशः बाविस्टीन 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर तथा डायथेन एम-45 या रीडोमिल (2.0 ग्राम प्रति लीटर) पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। वायरस की बीमारियों के लिए काॅन्फीडोर (2.5-3.0 मि.ली./5 लीटर) पानी में मिलाकर छिड़काव करनाचाहिए।

 

संकर बीज उत्पादन विधिः करेला उभयलिंगी पौधा होने के कारण इसमें संकर बीज उत्पादन हस्त परागण द्वारा अधिक उपयुक्त व प्रचलित है। इस विधि में मादा प्रजनक पौधों में से नर फूलों को प्रतिदिन खिलने से पहले तोड़ दिया जाता है तथा मादा फूलों को खिलने से एक दिन पूर्व सायं के समय बटर पेपर बैग में बंद कर देते हैं। हवा के आदान प्रदान हेतु लिफाफों में 5-6 छिद्र अवश्य करने चाहिए।

नर प्रजनक पौधों में नर फूलों को भी नमी न सोखने वाली रूई से अच्छी प्रकार ढक देते हैं। अगले दिन, नर खण्डों से नर फूलों को तोड़कर इकट्ठा कर लें तथा मादा प्रजनक खण्डों में मादा फूलों का लिफाफा हटाकर हाथ द्वारा परागकोष को रगड़कर या परागकणों को एकत्र करके ब्रुश द्वारा परागण करें। परागण के तुरन्त बाद बटर पेपर बैग से मादा फूल को दोबारा ढक दें । उत्तम बीज गुणवत्ता के लिए प्रति पौध 14-16 फल रखें।

 

अवांछनीय पौधों का निकालना तथा निरीक्षण अवस्था

संकर बीज उत्पादन के खेत में चार अवस्था में निरीक्षण करना चाहिए।

  • पुष्पन से पूर्व जिसमें मादा एवं नर पैतृकों की बढ़वार, पत्ते की आकृति,रंग एवं शीर्ष भागों पर रोयें  के आधार पर अवांछित पौधों को निकालना चाहिए।
  • पुष्पीय लक्षणों एवं फलों के आधार पर अवांछनीय पौधों की पहचान करनिकालना चाहिए।
  • फलों की तुड़ाई एवं पकने पर फल के विकास, रंग, आकार एवं पौधों में रोग आदि की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अवांछनीय पौधों एवं फलोंको हटा देना चाहिए।

फल लगना

परागण प्रक्रिया 30 अक्तूबर तक की जा सकती है, हालांकि उत्तर भारत में अधिकतम फल एवं बीज लगना एक सितम्बर से 15 अक्तूबर तक परागित फूलों में होता है।

 

फल धारण

उच्च गुणवत्ता वाले अधिक बीज उत्पादन के लिए प्रति बेल
14-16 फल रखना चाहिए।

 

फलों का पकना, तुड़ाई एवं बीज निकालना

परागण के 25-30 दिन बाद फल पकने लगते हैं। पकने पर फल चमकीले नारंगी रंग के हो जाते हैं। फलोंकी तुड़ाई तभी करें जब पूरा फल नारंगी रंग का हो जाए, कम पके फल में बीज अल्प विकसित रहते हैं। अधिक पकने पर फल फट जाते हैं तथा बीज का नुकसान होता है। पके फलों को दो भागों में फाड़कर हाथ द्वारा बीजों को निकालकर रेत या साफ मिट्टी से मसलकर बीजों की चिपचिपी लाल झिल्लीको हटा देना चाहिए। बीजों को साफ बहते हुए  पानी से धोकर तेज धूप में सुखाना चाहिए।

 

बीज उपज

2.5 कि.ग्रा. संकर बीज उत्पादन 100 वर्ग मीटर से प्राप्त किया जा सकता है। साल में दो फसलों से लगभग प्रतिवर्ष 10,000 (5 कि.ग्राबीज/वर्ष 2000/कि.ग्रा. की दर से) की आमदनी प्राप्त की जा सकती है।

 

लाभ-लागत का अनुपात: 2.3: 1.0

तुड़ाई उपरांत प्रबंधन प्रौद्योगिकिया

तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकियों को अपनाने से किसान न केवल औद्यानिकी उत्पाद से होने वाली भारी क्षति को बचा सकते हैं, बल्कि वे
तुड़ाई-पूर्व एवं तुड़ाई-उपरांत प्रबंधन करके, मूल्यवर्धित उत्पाद बनाकर अतिरक्त मुनाफा भी कमा सकते हैं। कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी
संभाग में विकसित की गई कुछ प्रमुख प्रौद्योगिकियों का विवरण निम्नलिखित है|

 

Source-

  • Indian Agricultural Research Institute-ICAR

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