कम मूल्य का मौसमी खुम्ब उत्पादन कक्ष

खुम्ब उत्पादन एक लाभकारी उद्योग है जिसमें ज्यादातर छोटे कृषक आते हैं। अपवाद के तौर पर कुछ ही औद्योगिक इकाई हैं जो कि अत्याधिक तकनीकी और नियंत्रित वातावरण सुविधायुक्त हैं। छोटे कृषक ज्यादातर मौसमी उत्पादन पर निर्भर होते हैं और वे शीत ऋतु में कम मूल्य के उत्पादन सुविधा का उपयोग कर मशरूम उगाते हैं और मशरूम के वार्षिक उत्पादन में लाभकारी सहयोग प्रदान करते हैं।

मौसमी छोटे कृषक शीत ऋतु के प्राकृतिक कम तापमान का फायदा उठाकर एक या दो फसल का उत्पादन कर लेते हैं। वे भारत के मशरूम उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान ही नहीं देते बल्कि जलवायु का लाभ उठाकर उत्तम पोषण स्रोत भी उपलब्ध कराते हैं। मशरूम की खेती को कम मूल्य की संरचना का उपयोग कर बढ़ावा दिया जा सकता है, जिसमें कृषि अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग कर एक वर्ष में 8-10 महीने अलग-अलग तरह के खुम्बों की खेती की जा सकती है, जो कि स्थानीय जलवायु के अनुरूप होती है।

 

कम मूल्य का मौसमी खुम्ब उत्पादन कक्ष

मौसमी खुम्ब उत्पादन कक्ष सामान्य ईंटों की दीवारों व एस्बेस्टस शीट के छत से बने होते हैं और एक भीतरी छत (फाल्स सीलिंग) होती है। अच्छे फसल उत्पादन के लिए कक्ष को उष्मारोधी बनाया जा सकता है। मौसमी उत्पादन कक्ष को गर्म या ठंडा रखने के लिये किसी प्रकार की उर्जा की आवश्यकता नहीं होती। मौसमी उत्पादन के लिए उत्पादन कक्ष सामान्य छप्पर, जिसमें निचली तरफ पाॅलीथीन लगी हो, से भी बनायी जा सकती है। मुख्य द्वार को कमरे के एक ओर रखा जाता है तथा निकास नली को उसकी विपरीत दिशा में रखा जाता है। मशरूम को बांस की डण्डियों और सरकण्डे के तनों से बनी बिछौने पर उगाया जाता है। इस प्रकार के उत्पादन कक्ष को कम मूल्य की संरचना से भी बनाया जा सकता है जैसे कि स्टील पाइप का फ्रेम जो कि पाॅलीथीन से ढकी हो।

ग्रामीण क्षेत्रों में बनाये जाने वाले वास्तविक कम मूल्य, सरल तकनीकी युक्त उत्पादन कक्ष की दीवारें, छत बाँस और सरकण्डे के तनों से बने होते हैं, जिसमें कोई वायु संवातन की सुविधा नहीं होती है। छिद्रयुक्त तनों युक्त दीवारों से हर समय प्राकृतिक हवा का आदान-प्रदान होता रहता है। मशरूम उत्पादन कक्ष बाँस के फ्रेम और कृत्रिम रेशों युक्त कपडो से, व अंदर और बाहर से पुआल से ढके होते हैं जो कि पहाडो के वातावरण केअनुरूप मौसमी उत्पादन के लिये उपयुक्त होते हैं। वास्तविक कम मूल्य की खुम्ब उत्पादन होता है|

मशरूम की फसल में, किसी भी कीमत पर उत्पादन कक्ष का निर्धारित तापमान तथा नमी बनाये रखना मुख्य विषय है। यह नहीं है कि सिर्फ सुस्थापित व्यवसायिक इकाई ही केवल एयर हैडलिग इकाई या शीतलक इकाई का उपयोग कर सकते हैं। जैसा कि मौसमी उत्पादकों के पास जलवायु का लाभ होता है, वे भी कुछ सामान्य तकनीकों का उपयोग कर तापमान तथा नमी को सुनिर्धारित बनाये रख सकते हैं। उत्पादन कक्ष में उच्च नमी बनाये रखने के लिए आंतरिक सतह तथा दीवारों को गीला रखा जाता है।

कम्पोस्ट थैले के चारों ओर बोरा लपेटकर तथा उसमें नियमित रूप से पानी का छिड़काव करने पर उपलब्ध वातावरण पिन हेड को बाहर निकलने तथा बढ़ने में मदद करेगा। अधिक उँचाई वाली जगहों में, रात मंे तापमान 0-5 डिग्री सेल्सियस तक नीचे गिरजाता है तथा उत्पादन कक्ष का तापमान 14-15 डिग्री सेल्सियस पर बनाये रखना होता है। चूँकि आंतरिक वाष्प दाब, बाहर की अपेक्षा ज्यादा होता है और परिणामस्वरूप, ताप का प्रवाह कमरे के अंदर से बाहर की ओर होने लगता है। कक्ष का वाष्परोधी के साथ उष्मारोधी भी होना आवश्यक है। जैसा कि ज्यादातर कृषि अपशिष्ट अच्छे उष्मारोधी होते हैं, खुम्ब कक्ष की दीवारों व छत को अनाजों के अपशिष्ट पदार्थ सेबनाया जा सकता है।

प्लास्टिक की चद्दरों की जगह कोई भी जलरोधी पदार्थ जैसे की केले का आवरण या नारियल के पत्तों का भी उपयोग किया जा सकता है। भारत के ग्रामीण इलाकों में कई किसानों ने इस प्रकार की संरचना का उपयोग कर सफलतापूर्वक मशरूम उगाया है। ये उत्पादन कक्ष दरवाजायुक्त होने चाहिये, जो कि उचित उष्मारोधी के साथ वायुरोधी भी होने चाहिये। एक मौसम में उपयोग किया गया प्लाटिक चद्दर या तारपोलिन समेट कर रख देना चाहिए तथा इसे अगली फसल में उपयोग करना चाहिए। इस प्रकार की संरचना बनाने के लिये ज्यादा मेहनत की आवश्यकता नहीं होती और न ही ज्यादा महंगे कच्चे पदार्थों की। ये 3-4 दिनों में बनाये जा सकते हैं।

मेघालय में मशरूम कक्षों को उपलब्ध स्थानीय पदार्थों जैसे बाँस, छप्पर और मिट्टी के आवरण का उपयोग कर बनाया जाता है। दीवारों को हमेशा बाँस के टुकडो जो कि मिट्टी व गोबर के मिश्रण से ढके हो, से बनाया जाता है। अच्छे किस्म का उष्मारोधी उपक्रम बनाने के लिए कमरे के चारों ओर एक दूसरी दीवार बनाते हैं तथा दोनों दीवारों के बीच 15 सें.मी. का फाँसला रखते हैं। बाहरी दीवार की बाहरी सतह पर ही मिट्टी का लेप होना चाहिए। दो दीवारों के बीच उपस्थित वायु सतह उष्मारोधी की तरह कार्य करती है, जबकि वायु उष्मा का दुर्बल चालक है। यदि दोनों दीवारों के बीच की जगह में सूखा छप्पर भर दिया जाये तो यह एक बेहतर उष्मारोधक का कार्य कर सकता है।

कक्ष की निचली सतह को सीमेंट से ही बनाना चाहिये, परन्तु यदि यह संभव न हो तो, अच्छी तरह दबाई गई व मिट्टी का लेप युक्त सतह भी काफी होगी। छत को एस्बेस्टस चद्दरों का उपयोग कर मोटे छज्जों के आवरण से बनाना चाहिये। अनावश्यक पदार्थों के मिलावट या प्रदूषण से बचाने के लिये छप्पर की छत में एक दोहरी (फाल्स) सीलिंग होनी आवश्यक है। मुख्य द्वार के पीछे, कमरे ,में ऊपरी व निचली सतहों व दायीं व बायीं सतहों में वातायन की सुविधा होनी चाहिये ताकि कमरे में नियमित रूप से वायु का आना-जाना हो सके।
भण्डारण कक्ष जो कि निष्क्रिय वाष्प के ठंडा होने के सिद्धांत पर, सी.पी.आर.आई., षिमला व जालंधर में आलुओं को संग्रह करने के लिए प्रयोग किया जाता है, के समान ही डिजाईन की जाती है व बनाया जाता है। भण्डारण कक्ष के अंदर का तापमान 6.13 डिग्री सेल्सियस तक कम रखा जा सकता है जो कि मार्च-जून के महीने के तापमान से कम होता है तथा सम्बन्धित नमी 76.5-94 प्रतिशत होती है। ये संरचनाऐं दोहरी दीवारकी बनी होती है और उष्मारोधी बनाने के लिए बीच की खाली जगह में धान की भूसी भरी जाती है। बाहरी दीवारों में सफेदी की जाती है, ताकि वे ताप को विक्षेपित कर सकें।

दीवारों के नीचे लकड़ियों के बने फ्रेम लगे होते हैं जो कि अधिकतम लाभ के लिये हवा की दिशा में लगाये जाते हैं। लकड़ियों के फ्रेम को लगातार नमीयुक्त बनाये रखने के लिये, बहते पानी के पाइप से पानी, जो कि छोटे छिद्रयुक्त होते हैं फ्रेमों के ऊपर डाला जाता है। हवा इन फ्रेमों से अंदर प्रवेश करती है और कक्ष वाष्पित ठंडक तकनीक से ठंडा हो जाती है जिससे की कमरे का तापमान बाहरी तापमान से कम हो जाता है। इस प्रकार से वाष्पित ठंडे कमरे ढ़िगरी व मिल्की मशरूम को उगाने के लिये गर्म इलाके जैसे पंजाब व राजस्थान में उपयोग किये जा सकते हैं।

 

कम मूल्य के मशरूम उत्पादन कक्ष में प्रयुक्त कच्चा माल

मशरूम उत्पादन कक्षों को बनाने के लिये उपयोग में लायी जाने वाले कच्चा माल अलग-अलग जगहों के अनुसार अलग-अलग होता है। कृषक अपनी इच्छा से कच्चे पदार्थों का चयन कर सकता है परन्तु ये बहुतायत में उपलब्ध होने चाहिये और कम मूल्य के होने चाहिये। तभी यह कृषको के लिये लाभकारी होगा। देहरादून, नैनीताल, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, इलाहाबाद, गाजीपुर और बुलंदशहर आदि जिलों को उत्पादन कक्षों को सरकण्डा से बनाया जाता है। इसके अतिरिक्त बाँस, पुआल व जंगली घासों का भी उपयोग किया जाता है तथा पशुओं के गोबर, मिट्टी और भूसी के मिश्रण का उपयोग लेप करने (प्लास्टर)को किया जाता है।

रैक या खाने सरकण्डा या बाँस से बनाये जाते हैं और उपयुक्त मौसम को कृषक एक या दो फसल उगा सकते हैं। कृषक लम्बी विधि से कम्पोस्ट बनाते हैं और 10-12 किलोग्राम मषरूम लगभग प्रति 100 किलोग्राम कम्पोस्ट के हिसाब से 8-10 सप्ताह में प्राप्त कर सकते हैं। उत्पादन कक्ष का आकार सामान्यतः 40X20X12  या  35X18X10 फुट होता है व प्रति कक्ष 8-12 टन कम्पोस्ट का उपयोग एक बार में होता है।

 

यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु, जिनकी आवश्यकता मशरूम फार्म बनाने में होती है, वे इस प्रकार हैंः

1. फार्म खुली जगह पर या ऐसे इलाके में हो जहाँ प्रदूषण न हो।

2. प्रदूषण रहित पानी बहुतायत में उपलब्ध होना चाहिये।

3. कच्चे पदार्थ जैसे गेहूँ का भूसा और धान का भूसा (पुआल) आस-पास में आसानी से उपलब्ध होना चाहिये।

4. फार्म की जगह साफ स्वच्छ होनी चाहिये।

5. एक फार्म को अन्य फार्म के पास में नहीं होना चाहिये।

6. फार्म विस्तार व बाजारीकरण की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिये।

7. मुख्य मार्ग के निकट होना, पानी की निकासी, बिजली की सुविधा व अन्य मूलभूत सुविधाएं।

8. मशरूम उत्पादन कक्ष, कम्पोस्ट तैयार करने की जगह से अधिकतम दूरी पर होना चाहिए ताकि कम्पोस्ट से गंध, दुर्गन्ध, आकर्षित मक्खी, कीड़े, जीवाणु व विषाणु को नियन्त्रित किया जा सके।

9. कम्पोस्ट बनाने की जगह और मशरूम उत्पादन कक्ष इस प्रकार से बने होने चाहिये कि हवा का प्रवाह कम्पोस्ट तैयार करने की जगह से उत्पादन कक्ष की तरफ न हो।

10. उत्पादन कक्ष को बेहतर साफ-सुथरा बनाये रखने के लिये फार्मेलीन से साफ करना चाहिये। खुम्ब उद्योग का भारत में बहुत ही उज्जवल भविष्य है क्योंकि भारत में कृषि अपशिष्ट पदार्थ बहुतायत में है। इसका सिर्फ आंशिक हिस्सा ही खुम्ब उत्पादन के उपयोग में लाया जाता है और बाकि का पशु खुराक एवं ईंधन के रूप में भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है। बहुतायत में कच्चे पदार्थ की उपलब्धता, साथ ही साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते श्रम की उपलब्धता, उपयुक्त प्रशिक्षण और खुम्ब उत्पादन का ज्ञान छोटे स्तर पर इस उद्योग को बढ़ावा देगा। अंततः ये कहना अनुचित नहीं होगा कि आने वाले वर्षों में खुम्ब उत्पादन आसमान की ऊँचाईयों को छू लेगा।

 

स्रोत-

  • खुम्ब अनुसंधान निदेषालय