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कपास के कीट एवं रोग – Kisan Suvidha
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कपास के कीट एवं रोग

कपास के कीट

कपास के कीट एवं रोग

कपास के कीट एवं रोग इस प्रकार है-

कपास के कीट

कीट
पहचान
हानि
नियंत्रण के उपाय
हरा मच्छर
पंचभुजाकार हरे पीले रंग के अगले जोड़ी पंखे पर एक काला धब्बा पाया जाता है शिशु-व्यस्क पत्तियों के निचले भाग से रस चूसते है। पत्तिया क्रमशः पीली पड़कर सूखने लगती है। 1.पूरे खेत में प्रति एकड़ 10 पीले प्रपंच लगाये।

2.नीम तेल 5 मिली.  टिनोपाल/सेन्डोविट 1 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

3. रासायनिक कीटनाशी

थायोमिथाक्ज़्म 25 डब्लुजी  – 100 ग्राम सक्रिय तत्व/ हे

एसिटामेप्रिड 20 एस.पी. – 20 ग्राम सक्रिय तत्व/ हे.

इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल – 200 मिली. सक्रिय तत्व/हे

ट्रायजोफास 40 ईसी 400 मिली सक्रियतत्व/हे.

एक बार उपयोग में लाई गई दवा का पुनः छिड़काव नहीं करें।

सफेद मक्खी
हल्के पीले रंग की जिसका शरीर सफेद मोमीय पाउडर से ढंका रहता है पत्तियो से रस चूसती है एवं मीठा चिपचिपा पदार्थ पौधे की सतह पर छोड़ते है। से वायरस का संचरण भी करती है।
माहो
अत्यंत छोटे मटमैले हरे रंग का कोमल किट है। पत्तियो की निचली सतह से खुरचकर एवं घेटों पर समूह में रस चूसकर मीठा चिपचिपा पदार्थ उत्सर्जित करती है।
तेला
अत्यंत छोटे काले रंग के कीट पत्तियो की कनचली समह से खुरचकर हरे पदार्थ का रसपान करते है।
मिली बग
मादा पंखीविहीन, शरीर सफेद पाउडर से ढंका। पर के शरीर पर काले रंग  के पंख। तने, शाखाओं, पर्णवृतों, फूलपूड़ी एवं घेटों पर समूह में रस चूसकर मीठा, चिपचिपा पदार्थ उत्सर्जित करती है।

 

कपास के रोग के लक्षण एवं प्रबंधन

कपास के रोग
रोग के लक्षण
प्रबंधन
कपास का कोणीय धब्बा एवं जीवाणु झुलसा रोग
रोग के लक्षण पौधे के वायुवीय भागों पर छोटे गोल जलसक्ति बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं। रोग के लक्षण घेटों पर भी दिखाई देते हैं। घेटों एवं सहपत्रों पर भी भूरे काले चित्ते दिखाई देते हैं। ये घेटियाँ समय से पहले खुल जाती है रोग ग्रस्त घेटों का रेशा खराब हो जाता है इसका बीज भी सिकुड़ जाता है
  • बोने से पूर्व बीजों को बावेस्टीन कवकनाशी दवा की 1 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करे
  • कोणीय धब्बा रोग के नियंत्रण के लिए बीज को बोने से पहले स्टेप्टोसाइक्लिन (1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में) बीजोपचार करे ।
  • खेत में कोणीय धब्बा रोग के लक्षण दिखाई देते ही स्टेप्टोसाइक्लिन का 100 पी.पी.एम (1 ग्राम दवा प्रति 10 ली. पानी) घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतर पर दो बार करें।
  • कवक जनित रोगों की रोकथाम हेतु एन्टाकाल या मेनकोजेब या काँपर ऑक्सीक्लोराइड की 2.5 ग्राम दवा को प्रति लीटर पानी के साथ घोल बनाकर फसल पर 2 से 3 बाद 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
  • जल निकास का उचित प्रबंध करें।
मायरोथीसियम पत्तीधब्बा रोग
इस रोग में पत्तियों पर हल्के भूरे से गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। कुछ समय बाद ये धब्बे आपस में मिलकर अनियमित रूप से पत्तियों का अधिकांश भाग ढँक लेते हैं, धब्बों के बीच का भाग टूटकर नीचे गिर जाता है। इस रोग से फसल की उपज में लगभग 20-25 प्रतिशत तक कमी आंकी गई है ।
अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग
इस रोग में पत्तियों पर हल्के भूरे रंग के संकेंद्रित धब्बे बनते हैं व अन्त में पत्तियाँ सूखकर झड़ने लगती है। वातावरण में नमी की अधिकता होने पर ही यह रोग दिखाई देता है एवं उग्र रूप से फैलता है,।
पौध अंगमारी रोग
पौध अंगमारी रोग में बीजांकुरों के बीजपत्रों पर लाल भूरे रंग के सिकुड़े हुए धब्बे दिखाई देते हैं एवं स्तम्भ मूल संधि क्षेत्र लाल भूरे रंग का हो जाता है। रोगग्रस्त पौधे की मूसला जड़ों को छोड़कर मूलतन्तु सड़ जाते हैं। खेत में उचित नमी रहते हुए भी पौधों का मुरझाकर सूखना इस बीकारी का मुख्य लक्षण है।

 

Source-

  • mp.gov.in

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