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आम के पुराने अनुत्पादक बगीचों की जीर्णोद्धार प्रौद्योगिकी – Kisan Suvidha
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आम के पुराने अनुत्पादक बगीचों की जीर्णोद्धार प्रौद्योगिकी

आम

आम के पुराने अनुत्पादक बगीचों की जीर्णोद्धार प्रौद्योगिकी

हाल ही में पुराने और सघन आम के बगीचों की उत्पादकता में लगभग 30 से 35 प्रतिशत की कमी हो रही है । केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ ने आम के पुराने बगीचों के जीणोद्धार की प्रौद्योगिकी पैकेज का विकास किया है जिसका विवरण इस प्रकार है:-

 

काट-छांट करना

  •  आम के पेड़ की भूमि से 2.5 मीटर से 6.5 मीटर तथा इससे ऊपर की ऊंचाई की शाखाओं की पांच बार काट-छांट करें । सूखी हुई, रोगग्रस्त और अवांछित शाखाओं को पूरी तरह से काटकर हटा दें । प्रत्येक पेड़ की संरचना के आधार पर उसके बाहरी फैलाव सहित खुले चादवों (ओपन केनोपी) के विकास की बनावट बनाने के लिए बड़ी शाखाओं को रखा जाए । सूक्ष्म जीवाणु के संक्रमएर की रोकथाम करने के लिए कटी हुई परतों पर गाय के गोबर से उपचार करें|

 

  • काट-छांट करने के दो से तीन महीनों के बाद अत्यधिक नई टहनियां निकल आती हैं, जिनकी वजह से घनी व अवांछित पत्तियों के बीच प्रकाश व पोषण के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा हो जाती है । इसलिए आवश्यक फैलाव वाली टहनियों के विकास तथा प्रकाश व पोषण के हेतु उत्पन्न हुई स्पर्धा से निबटने के लिए पेड़ों में समय-समय पर जरूरत के अनुरूप कांट-छांट प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए ।

 

कटे-छटे हुए पेड़ों की संभाल

  • काट-छांट का कार्य पूरा होने के पश्चात् जनवरी में हौजों और सिंचाई नालियों को बनाया जाना चाहिए । तापमान और मिट्टी की नमी की स्थिति के आधार पर मार्च से बरसात शुरू होने तक काट-छांट किए गए पेड़ों की, 15-20 दिनों के अन्तराल पर, अवश्य ही सिंचाई की जानी चाहिए ।

 

  •  पेड़ों में उत्पन्न हो रही नई टहनियों की रक्षा तथा उनके अत्यधिक संख्या में विकास के लिए गहन देखभाल की जरूरत होती है । प्रत्येक काट-छांट किए गए पेड़ के चारों ओर तैयार किए गए कुण्ड में अच्छी तरह से सड़ी हुई 100-120 कि.ग्रा. घूरे की खाद डालने के अतिरिक्त उसमें 2.5 कि.ग्रा. यूरिया, 3 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट (एस.एस.पी.) और 1.5 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश डालनी चाहिए ।

 

  • फरवरी के अन्त में यूरिया की आधी मात्रा और सिंगल सुपर फास्फेट और म्यूरेट आफ पोटाश खाद की पूरी मात्रा डालनी चाहिए । उर्वरक डालने से पहले उस कुण्ड में अवश्य ही नमी को सुनिश्चित किया जाना चाहिए । बरसात के शुरू होने के दौरान यूरिया की आधी बची हुई मात्रा डाली जाती है । जुलाई के पहले सप्ताह में घूरे की खाद की पूरी खुराक डाली जानी चाहिए । खादों और उर्वरकों को डालने से पहले मिट्टी और खाद को फावड़े से गोड़ने तथा खरपतवार को उखाड़े जाने की जरूरत होती है|

 

  • अप्रैल से जून के दौरान कुण्डों में मिट्टी की नमी के संरक्षण का काम किया जा सकता है । सूखी हुई घास, आम के पत्तों, तिनकों अथवा काली पोलिथीन की शीट को उनको ढकने के वास्ते उपयोग किया जा सकता है । इन सभी प्रबंधन तकनीकों को बिना कटाई-छंटाई किए वृक्षों के लिए भी अपनाया जाना चाहिए ताकि उनसे भरपूर उपज प्राप्त हो ।

 

मिश्रित फसल

  •  पेड़ों की काट-छांट करने से बगीचे का स्थान खुला हो जाता है और धूप अत्यधिक मात्रा में आती है । पेड़ों की पंक्तियों के बीच में स्थान बन जाता है जिसका मिश्रित फसल के लिए सफलतापूर्वक उपयोग किया जा सकता है । गेन्दा, ग्लेडियोलस आदि फूलों, खरीफ मौसम के दौरान सब्जियों (कद्दू, भिण्डी, लोबिया) और रबी मौसम के दौरान आलू, बैंगन, बन्दगोभी इत्यादि और मसाले (अदरक और हल्दी) आदर्श मिश्रित फसलें हैं । मिश्रित फसलें लगाने से कृषक परिवारों को अतिरिक्त रोजगार और आय प्राप्त होती है ।

 

टहनियों को कम करना

  •  पेड़ों की काट-छांट करने के तीन से चार महीनों के पश्चात् अर्थात् मार्च-अप्रैल के दौरान काट-छांट किए गए पेड़ों पर अत्यधिक टहनियां आती है । यदि उनको बढ़ते रहने दिया जाए तो उनमें जगह, रोशनी, पोषण की कमी हो जाती है जिससे उनके विकास पर असर पड़ता है । परिणामस्वरूप इन हानिकारक घनी और झाड़ीदार टहनियों की छतरियां बनने से इन काटे-छांटे गए पेड़ों पर फल बहुत कम संख्या में लगते हैं । अतः इन टहनियों की जहां कहीं जरूरत हो, नियमित रूप से संख्या कम की जानी चाहिए ताकि स्वस्थ टहनियों के खुले विकास और छतरी की तरह उनके बढ़ते रहने की क्रिया को आसान बनाया जा सके ।

 

  •  हर शाखा पर केवल बाहर की ओर बढ़ने वाली 8-10 स्वस्थ टहनियों को ही रखें और शेष टहनियों को काट कर कटा दें ताकि उनको उपयुक्त पोषण मिल सके तथा उनका अच्छा विकास हो सके । जून और अगस्त के दौरान टहनियों की संख्या को कम करने का कार्य किया जाता है जिसे नियमित रूप से करते रहना चाहिए ।

 

  • तना बेधक के प्रभाव को प्रभावित शाखाओं से गिरे बुरादे को देख सहज पहचाना जा सकता है । इसके अलावा प्रभावित शाखाओं से चिपचिपे गोंद का रिसना भी एक पहचान है । तने के भीतर बनी सुरंग में कीड़ों के लार्वे होते हैं और स्वस्थ ऊतकों को नष्ट कर देते हैं । फलस्वरूप, शाखा और पर्णावली सूखना शुरू हो जाती है । पतली तार अथवा साइकिल के पहिए की तीली का इस्तेमाल करके सुराख से लार्वों को बाहर निकाला जा सकता है अथवा गोंद रिसने वाले स्थान से उसमें बनी सुरंग में उनका पता लगाया जा सकता है । पेड़ की उस शाखा और तने के अंदर छिपे हुए लार्वा की रोकथाम करने के लिए सुराख के अंदर नुवान कीटनाशक से भिगोई हुई रूई की बत्ती रख दें और उनको मिट्टी से बन्द कर दें ।

 

  • पत्तों को काटने वाले घुन कीड़े तथा ऐन्थ्रेक्नोज रोग से नई टहनियों पर असर पड़ सकता है । यह घुन कैंची से काटने जैसे परतदार पत्तों को काटकर टहनियों को नष्ट करता है । इसका उपचार 15 दिनों के अंतराल पर प्रति लीटर पानी में 3 ग्राम की दर से 0.2 प्रतिशत कार्बोरिल (सेविन) कीटनाशक के दो छिड़कावों से किया जा सकता है । छोटे पत्तों पर भूरे रंग के धब्बे ऐन्थ्रेक्नोज रोग की लाक्षणिक विशेषताएं हैं । इसके उपचार के लिए 15 दिनों के अन्तराल पर काॅपर आॅक्सीक्लोराइड (3 ग्रा. प्रति लीटर पानी) का दो बार छिड़काव किया जाना चाहिए ।

 

 उपज

काट-छांट करने के दो वर्षों के पश्चात् पुराने पेड़ पुनः तरूण हो जाते हैं और उन पर स्वस्थ टहनियां आने लगती हैं । उनका आकार छतरीदार बनने लगता है तथा उनमें भरपूर मात्रा में फूल और फल आने लगते हैं । भूमि से 5 मीटर की ऊंचाई से काट-छांट करने के पश्चात् इन पेड़ों से औसतन लगभग 60 कि.ग्रा. प्रति पेड़ प्रति वर्ष के हिसाब से आम की उपज प्राप्त की जा सकती है । इस प्रौद्योगिकी को अपनाकर उपज में उत्तरोत्तर वृद्धि लेकर उत्पादकता की समस्या को हल किया जा सकता है । आम के बगीचे एक बार पुनः उत्पादक और लाभकारी बन जाते हैं ।

 

लागत

पेड़ों को पुनः उत्पादन योग्य बनाने की तकनीक में एक बार तथा बार-बार दोनों लागतें शामिल हैं । एक बार लागत में काट-छांट करने वाले, टहनियों की संख्या को कम करने वाले, छिड़काव करने के उपकरणों और अन्य कार्यकलापों पर आने वाली लागत शामिल है । परिवर्ती लागत में मजदूरी, खाद और उर्वरकों, खेती से संबंधित कार्यों, कृमिनाशक इत्यादि की लागत-शामिल है । बिना काट-छांट किए गए पेड़ों से प्राप्त किए फलों की गुणवत्ता की तुलना में काट-छांट किए पेड़ों से प्राप्त किए गए फलों की गुणवत्ता बेहतर होती है । पेड़ों को पुनः उत्पादक बनाने की औसत परिवर्ती लागत लगभग 160 रुपये प्रति पेड़ प्रति वर्ष है ।

पेड़ों को पुनः उत्पादक बनाने की प्रौद्योगिकी में पारिस्थितिकी की वैज्ञानिक महत्ता है क्योंकि यह पुराने और घने बगीचों को उखाड़ने और उनको पुनः लगाने की तुलना में एक कारगर और लाभकारी विकल्प प्रदान करती है । पेड़ों को पुनः उत्पादक बनाने की इस संस्तुत-प्रौद्योगिकी को अपनाकर पेड़ों को फिर से आगे और 20-25 वर्षों के लिए जीवन प्रदान कर सकते हैं । साथ-साथ उनकी अच्छी गुणवत्ता के फल देने की क्षमता, अनवरत उत्पादन और प्रतिस्पद्र्धात्मक आम में वृद्धि हो सकती है ।

 

स्रोत-

  • केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा पोस्ट आफिस काकोरी लखनऊ

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