आम के बगीचे में प्रमुख कीटों का प्रबंधन

आम उत्पादन में कीड़े-मकोडे़ सबसे बड़ी बाधा हैं। पौधशाला से लेकर फल पकने तक नाना प्रकार के कीट आम के पौधों एवं फलों
को नुकसान पहुंचाते हैं। आम के बगीचे में लगभग 200 कीटों का प्रकोप देखा गया है। परन्तु आम का भुनगा, गुजिया एवं फल मक्खी आम की फसल को सबसे ज्यादा हानि पहुंचाती है, जिनका संक्षिप्त विवरण एवं रोकथाम निम्नवत् है।

 

१.आम का मिलीबग (गुजिया कीट/फूंगा कीट)

भुनगा कीट की तरह यह कीट भी आम का एक प्रमुख कीट है। भुनगा कीट की तरह इसके बच्चे एवं वयस्क (केवल मादा) प्ररोहों, पत्तियों एवं फूलों का रस चूसकर सूखा देते हैं। परिणामस्वरूप फूल व फल प्रभावित होते हैं। यह कीट भी मधुस्राव उत्पन्न करता है जिसके ऊपर सूटी मोल्ड का वर्धन होता है, फलस्वरूप, प्रकाशसंश्लेषण क्रिया बाधित होती है। मादा कीट मई-जून माह में पेड़ की जड़ के पास भूमि की दरारों में 300 से 400 तक अण्डे देती है।

मई-जून महीने में दिये हुए अण्डे नवम्बर के महीने में फूटना शुरू होते है तथा इनसे शिशु निकलते हैं। शिशु  लाल रंग के होते हैं, जिनको पेड़ों पर चढ़ते हुए देखा जा सकता है। दो माह के उपरान्त धीरे-धीरे इनकी त्वचा के ऊपर सफेद मोम की तरह का पाउडर चढ़ जाता है इसीलिए इसको ‘‘सफेद फूगां’’ भी कहते हैं। वर्ष में इस कीट की एक ही पीढ़ी पायी जाती है।

 

प्रबन्ध
  • जून के दूसरे सप्ताह में पेड़ के चारों ओर 1 मीटर लम्बाई में भूमि की अच्छी तरह से गुड़ाई करनी चाहिए ताकि दिये हुए अण्डे ऊपर
    आकर धूप से नष्ट हो जायें या परभक्षियों द्वारा खाये जायें।
  • दिसम्बर के तीसरे सप्ताह में वृक्ष के तने के आस-पास क्लोरपाइरिफाॅस चूर्ण (1.5 %) 250 गा्र म/वृक्ष की दर से मिट्टी में मिला देने से अण्डों से निकलने वाले शिशु मर जाते है।
  • शिशुओं को पेड़ पर चढ़ने से रोकने के लिए दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में पालीथीन की पट्टी का प्रयोग करना चाहिये। इसके लिए 25-30 सेमी. चैड़ी, 400 गेज मोटी पालीथीन को जमीन से लगभग 1 फीट की ऊँचाई पर तने पर लपेट दें। पाॅलीथीन के ऊपरी व निचली सिरे पर मिट्टी का लेप दें ताकि शिशु अन्दर प्रवेश न कर|सके। ऊपरी भाग में मोम का लेप करें जिससे शिशु ऊपर न चढ़ सकें।
  • यदि किसी कारणवश उपर्युक्त तरीके न अपनाये गये हो तो भुनगा कीट के लिए सुझाये गये कीटनाशकों का प्रयोग कर सकते है।

 

२.आम का भुनगा

यह आम को सबसे अधिक हानि पहुचना वाला कीट है क्याेिंक आम के अलावा इस कीट का कोई दूसरा पोषक पौधा भी नहीं है इस कीट को आम का फुदुका, चेपां, लस्सी, तेला, फुदका एवं थला नाम से भी जाना जाता है। इस कीट की तीन प्रजातियों, अमरीटोडस एटकीनसोनी , इडियोस्कोपस क्लाईपीएलिस एवं इडियोस्कोपास निटीडयूलस प्रमुख हैं जो मुलायम प्ररोहों, पत्तियों तथा फूलों से रस चूसकर हानि पहुँचाती हैं। प्रकोप अधिक होने पर फूल सड़ कर गिर जाते हैं परिणाम स्वरूप उपज प्रभावित होती है। भुनगा कीट एक प्रकार का मीठा रस विसर्जित करता है जिससे काली फफूंदी विकसित हो जाती है एवं प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करती है।

यह कीट भारतवर्ष में सभी आम उत्पादक क्षेत्रों में पाया जाता है। इस के बच्चे एवं वयस्क दोनों ही हानिकारक है। मादा कीट फरवरी माह में पत्तियों की निचली सतह एवं कोमल टहनियों पर अण्डे देती है। अण्डा बेलनाकार, मटमैले भूरे रंग का तथा 0.9 मिमी. लम्बा होता है जो 7-10 दिनों के अन्दर फूट जाता है एवं शिशु निकलते हैं। अण्डे से निकलने पर शिशु भूरे रंग का लगभग 1 मिली लम्बा होता है।

शिशु का जीवनकाल लगभग 3-4 सप्ताह का होता है। इसके बाद प्रौढ़ कीट में परिवर्तित हो जाता है। प्रौढ़ कीट का शरीर तिकोना, आगे की ओर चैड़ा तथा पिछला सिरा पतला होता है। यह कीट जाडे़ के दिनो में शीत निश्क्रियता मे  रहता है एव  फरवरी में जाडा़ कम होने पर सक्रिय हो जाता है तथा अधिकतम तीन दिनों तक ही जीवित रहता है। कीट की सबसे बड़ी विशेषता झुण्डों में रहने की है एवं प्रकाश प्रेमी होते हैं। उत्तर भारत में इस कीट की दो-तीन पीढ़ियां मिलती हैं।

 

प्रबन्ध
  • पुराने तथा घने  पेड़ो की शाखाओं को काटकर दूर कर देना चाहिए।
  • नये वृक्षों का रोपण उचित दूरी पर करना चाहिए।
  • जनवरी माह से बाग की बराबर देख-भाल करें एवं जैसे ही कीट पेड़ों पर दिखाई पड़ें इमिडाक्लोप्रीड (17.8 एस.एल.) कीटनाशक का 0.5 मिली/ली. पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव फल लगने के बाद करना चाहिए। फीप्रोनील (5 एस.सी.) 2 मिली. दवा/ली. या डाईफ्लूबेन्जूरान (50 डब्ल्यू पी) 2 ग्रा. दवा/ली. का प्रयोग भी इस कीट के लिए किया
    जा सकता है।

 

३.फल मक्खी (डासी मक्खी)

फल मक्खी को ‘‘डासी मक्खी’’ के नाम से भी जाना जाता है। इस कीट की सूड़ियां आम के गूदे को खाकर उसे एक सड़े अर्धन्तरल बदबूदार पदार्थ के रूप में बदल देती हैं। मादा मक्खियां खासकर अप्रैल माह में अण्डे देती हैं। अण्डे फूटने के पश्चात सफेद रंग की सूड़ियां आम के गूदे को खाकर उसमें स्पंज जैसे बहुत सा छेद कर देती हैं। वयस्क सूड़ी फल से बाहर निकल कर सीधे जमीन पर गिरता है तथा कडू – करकट या मिट्टी के अन्दर प्यूपा में परिणित हो जाता है। 10-15 दिन में प्यूपा से बाहर आकर मक्खी अपना नया जीवन चक्र प्रारम्भ कर देती है। वर्ष में इस कीट की कई पिढ़ियां पायी जाती हैं|

 

प्रबन्ध
  • वर्ष में दो बार बगीचे को मिट्टी पलटने वाले हल से जोतना चाहिये ताकि कृमिकोष (प्यूपा) ऊपर आकर नष्ट हो जाये।
  • समस्त गिरे हुए क्षतिग्रस्त फलों को इकट्ठा करके चूना पड़े गढ्डों या मिट्टी का तेल मिले पानी में डालना चाहिये ताकि छुपी सूडियां नष्ट हो जायें।
  • फलों पर कागज या कपड़े की थैली चढ़ा देने से कीटों को उनके ऊपर अंडा देने से रोका जा सकता है।
  • नर मक्खियों को नष्ट करने हेतु साइट्रोनेला की थोड़ी मात्रा पानी में मिलाकर मिट्टी के चैड़े मुंह वाले बर्तनों में भरकर पौधों के पास रखना चाहिये। इस घोल की गंध से नर मक्खियां आकर्षित होती हैं एवं पानी में गिरकर नष्ट हो जाती हैं।
  • जिस समय मक्खियाँ अधिक सक्रिय हों उस समय मैलाथियान (50 ईसी.) की 1.2 मिली दवा/ली. की दर से छिड़काव करना चाहिये।
  • फल मक्खियों की संख्या का आकलन करने के लिए आर्कषक टैªप्स का प्रयोग करना चाहिए। इस मक्खी के नियंत्रण हेतु 100 मिली., दवा युक्त घोल (मिथाइल यूजिनाॅल: 0.1 प्रतिशत एवं मैलाथियान: 0.1 प्रतिशत) को चैड़े मुंह की शीशियों में डालकर 10 बोतल/हे. की दर से प्रयोग करना चाहिये।
  • निर्यात किये जाने वाले आम को वेपर हीट ट्रीटमेन्ट द्वारा उपचारित किया जाना चाहिये।

 

४.छाल खाने वाला सूंड़ी

सूडियां प्रारम्भ में छाल को खरोच कर खाती हैं तथा बाद में जोड़ों से तने में प्रवेश कर अंदर ही अंदर तने को खाकर खोखला कर देती हैं,
परिणामस्वरूप पौधा सूख जाता है।

 

प्रबंधन
  • प्रकाश प्रपंच स्थापित कर व्यस्क कीट को इकठ्ठा कर नष्ट करें।
  • तने एव  टहनियो पर लगे जाले को साफ कर प्रत्येक छिद्र मे  लम्बा तारब डालकर खुरचने से कीट के पिल्लू मर जाते हैं।
  • नारियल झाडूँ या लोहे की कमानी से पहले जाला साफ करके प्रत्येक छिद्र के अंदर मिट्टी तेल/पेट्रोल/ फिनाइल/डाईक्लोरवाॅस (100 ईसी. ) 2.0 मिली. दवा/ली. घोल से भीगी रूई को ठूसकर भर दें एवं छिद्रों के ऊपर गीली मिट्टी का लेप लगा दें।
  • अधिक प्रभावित शाखाओं को गिडार तथा प्यूपे सहित काट कर नष्ट कर देना चाहिए।

 

५.शूट गाॅल सिला

उत्तर भारत में आम की फसल को क्षति पहुँचाने वाला एक गंभीर कीट है। इसके प्रकोप से आम की वानस्पतिक वृद्धि को औसतन 50 प्रतिशत की क्षति होती है, जिससे फल उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित होता है। इस कीट की वयस्क मादा मार्च- अप्रैल महीनों में विकसित हो रही कोमल पत्तियों की मध्य शिरा में सफेद रंग के अण्डे देती हैं जो कि मध्यशिरा में लगभग आधे धसे रहते हैं।

अण्डे उत्पन्न होने से लगभग 191-211 दिन उपरांत अण्डों से सूड़ियों (निम्फ) के निकलने का क्रम अगस्त माह के उत्तरार्द्ध में प्रारंभ हो जाता है। सूड़ियाँ रेंगकर फूटती हुई कलिकाओं तक पहुँच जाती हैं और उनकी मध्य  शिरा के अन्दर घुसकर रस चूँसती हैं जिससे विकसित हो रही कलिकाओं के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। कीट के रस चूँसने एवं रासायनिक श्राव के प्रभाव से विकासशील कलिकाओं शंकवाकार घुण्डी (गाॅल) के रूप में अविकसित रह जाती हैं। कीट की सूड़ियाँ अगस्त माह के उत्तरार्ध से फरवरी माह के अन्त तक सक्रिय रहती हैं। फरवरी-मार्च माह में सूड़ियाँ ग्रन्थियों के अन्दर ही वयस्क में परिवर्तित हो जाती हैं और बाहर निकलकर अण्डे देने का कार्य करती हैं। एक वर्ष में इस कीट का का एक जीवन चक्र पूर्ण होता है।

 

प्रबन्धन
  • इस कीट के नियन्त्रण हेतु अगस्त एवं सितंबर माह में पैदा हो रही सूँड़ियों द्वारा उत्पन्न प्रकोप को रोकना आवश्यक है। अतः इस
    समयावकाश में 0.06 प्रतिशत डायमेथोएट (20 मि.ली./लीटर) पानी में घोलकर प्रथम छिड़काव अगस्त के दूसरे सप्ताह में तथा दो और छिड़काव अगस्त के अन्त एवं सितंबर में 15 दिनों के अंतर पर करना चाहिए।
  • वयस्क मादा कीट द्वारा अण्डा देने की प्रक्रिया पर नियन्त्रण हेतु प्रोफेनोफाॅस के 0.2 प्रतिशत (2 मि.ली./ली.) घोल का छिड़काव मार्च माह में करना चाहिए। कीटनाशकों के प्रयोग में सावधानियां
  • कीटनाशी दवा का छिडकाव उस समय न करें जब फूल पूर्ण रूप से खिले हों। ऐसा करने से परागणकर्ता कीट मर जाते हैं।
  • कीटनाशी दवा का प्रयोग बदल-बदल कर करने से कीटों के दवा के प्रति सहनशीलता को रोका जा सकता है।

 

 

Source-

  • National Research Centre of Lichi