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अनार की खेती-राजस्थान - Kisan Suvidha
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अनार की खेती-राजस्थान

अनार की खेती

अनार की खेती-राजस्थान

अनार राजस्थान का एक महत्वपूर्ण फल फसल है । घरेलू और विदेशी बाजार में अनार के अच्छे मूल्य की प्राप्ति को देखते हुए राजस्थान के काश्तकारों का रूझान अनार की खेती करने की ओर तेजी से बढ़ रहा है । इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2010 – 11 में राज्य के कुछ जिलों जयपुर, सीकर, पाली, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, झालावाड़, बाड़मेर, टोंक व झुंझनू में करीबन 500 हैक्टर में अनार के उच्च गुणवत्ता वाले फल बगीचे लग चुके हैं ।

राजस्थान में इसकी खेती के अन्तर्गत कुल क्षेत्रफल 0.8 हजार हैक्टर के साथ उत्पादन 5.5 लाख टन और उत्पादकता 6.4 टन/हैक्टर है जो कि राष्ट्रीय उत्पादकता 6.6 टन/हैक्टर के करीब है । स्वास्थ्यवर्धक होने के अलावा यह बहुत ही स्वादिष्ट होता है । यह विटामिन का बहुत अच्छा स्त्रोत है, इसमें विटामिन ए, सी और ई और फोलिक एसिड प्रचुर मात्रा में होता है । खनिज तत्वों जैसे लोहा, पोटेशियम, फाॅस्फोरस, कैल्शियम, एन्टीआॅक्सिडेन्टस जैसे एन्थोसायनिन, पाॅलीफीनाॅल्स, सेलेनियम और आहार फाइबर में भरपूर होने के नाते अनार फल एंटीआॅक्सीडेट के प्राकृतिक स्त्रोत के रूप में सर्वोत्तम माना जाता है । इसे ताजा फल और विभिन्न प्रसंस्कृत उत्पादों के रूप में उपयोग में लाया जाता है ।

 

भूमि और जलवायु

अनार के पौधों में लवण एवं क्षारीयता सहन करने की अद्भुत क्षमता होती है । 6.5 से 7.5 पी.एच. मान, 9.00 ई.सी./मि.मी. मृदा लवणता तथा 6.78 ई.एस.पी. तक क्षारीयता वाली मिट्टी में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है । अनार की खेती के लिए गहरी बलुई-दोमट भूमि सबसे उपयुक्त होती है । परन्तु क्षारीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है । यही नहीं, लवणीय पानी से सिंचाई करके भी अनार की अच्छी पैदावार ली जा सकती है ।

शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क क्षेत्र की जलवायु अनार उत्पादन के लिए अति उत्तम है । फलों के विकास तथा पकने के समय गर्म एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त होती है । पूर्ण विकसित फलों में रंग तथा दानों में गहरा लाल रंग तथा मिठास के लिए अपेक्षाकृत कम तापमान की आवश्यकता होती है । वातावरण तथा मृदा में नमीं एवं तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से फलों के फटने की समस्या बढ़ जाती है, जिससे उनकी गुणवत्ता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है ।

 

शुष्क क्षेत्र के लिए अनार की उन्नत किस्में

क्षेत्र की जलवायु, मृदा एवं पानी की गुणवत्ता तथा बाजार मांग के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों का चुनाव अति महत्वपूर्ण है । राजस्थान के शुष्क एवं अर्द्धशुष्क जलवायु के लिए जालोर सीडलैस, जी-137, पी-23, मृदुला, भगवा आदि किस्में अति उत्तम पायी गयी हैं । जालोर सीडलैस में जहाँ दाने मीठे तथा मुलायम होते हैं, वहीं जी-137 तथा पी-23 के फल बहुत ही आकर्षक तथा बड़े होते हैं तथा इनमें फटने की समस्या भी कम होती है । मृदुला, भगवा या सिंदूरी फलों का रंग गहरा चमकीला लाल होने की वजह से बाजार भाव काफी अच्छा रहता है ।

 

पौध तैयार करना

सख्त काष्ठ कलम अनार के वानस्पतिक प्रवर्धन की सबसे आसान तथा व्यवसायिक विधि है । कलमें तैयार करने के लिए एक वर्षीय पकी हुई टहनियों को चुनते हैं । टहनियों की जब वार्षिक काट-छाँट होती है, उस समय लगभग 15-20 से.मी. लम्बी स्वस्थ कलमें, जिनमें 3-4 स्वस्थ कलियाँ मौजूद हों, को काट कर बंडल बना लेते हैं। ऊपर का कटाव आँख के 5.5 से.मी. ऊपर व नीचे का कटाव आँख के ठीक नीचे करना चाहिए । पहचान के लिए कलम का ऊपरी कटाव तिरछा व नीचे का कटाव सीधा बनाना चाहिए । तत्पश्चात कटी हुई कलमों को 0.5 प्रतिशत कार्बेंडाजिम या काॅपर आक्सीक्लोराइड के घोल में भिगो लेना चाहिए तथा भीगे हुए भाग को छाया में सुखा लेना चाहिए ।

कलमों को लगाने से पहले आधार भाग का 6 से.मी. सिरा 2000 पीपीएम ( 2 ग्राम/ली. ) आई.बी.ए. के घोल में 55 सैकण्ड के लिए उपचारित करें । इससे जड़ें शीघ्र फूट जाती हैं । कलमों को उपयुक्त मिश्रण से भरी हुई थैलियों में थोड़ा तिरछा करके रोपण कर देते हैं । कलम की लगभग आधी लम्बाई भूमि के भीतर व आधी बाहर रखते हैं । दो आँखे भूमि के बाहर व अन्य आँखें भूमि में गाड़ देनी चाहिए । कलम को गाड़ते समय यह ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है कि कलम कहीं उल्टी न लग जाए । कलमें लगाने के पश्चात् सिंचाई करें व उसके बाद नियमित सिंचाई करते रहना चाहिए । लगभग 2 महीने बाद अधिक बढ़ी हुई टहनियों की कटाई-छाटाई कर देनी चाहिए तथा समय-समय पर कृषि क्रियाएँ तथा छिड़काव आदि करते रहना चाहिए ।

 

बाग की स्थापना

अनार का बगीचा लगाने के लिए रेखांकन एवं गड्डा खोदने का कार्य मई माह में संपंन कर लेना चाहिए । इसके लिए वर्गाकार या आयताकार विधि से 4 * 4 मीटर ( 625 पौधे प्रति हैक्टर ) या 5 * 3 मीटर ( 666 पौधे प्रति हैक्टर ) की दूरी पर, 60 * 60 * 60 सेमी आकार के गड्डे खोदकर 0.1 प्रतिशत कार्बेंडाजिम के घोल से अच्छी तरह भिगो देना चाहिए । तत्पश्चात 50 ग्राम प्रति गड्डे के हिसाब से कार्बोनिल चूर्ण व थिमेट का भुरकाव भी गड्डे भरने से पहले अवश्य करना चाहिए ।

जिन स्थानों पर बैक्टीरिल ब्लाइट की समस्या हो वहाँ प्रति गड्डे में 100 ग्राम कैल्शियम हाइपोक्लोराइट से भी उपचार करना चाहिए । ऊपरी उपजाऊ मिट्टी में 10 कि.ग्रा. सड़ी गोबर या मींगनी की खाद, 2 कि.ग्रा. वर्मीकम्पोस्ट, 2 कि.ग्रा. नीम की खली तथा यदि संभव हो तो 25 ग्राम ट्राइकोडरमा आदि को मिलाकर गड्डों को ऊपर तक भर कर पानी डाल देना चाहिए जिससे मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाए । पौध रोपण से एक दिन पहले 100 ग्राम नत्रजन, 50 ग्राम फाॅस्फोरस तथा 50 ग्राम पोटाश प्रति गड्डों के हिसाब से डालने से पौधों की स्थापना पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है । पौध रोपण के लिए जुलाई-अगस्त का समय अच्छा रहता है । परन्तु पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर फरवरी-मार्च में भी पौधे लगाये जा सकते हैं

 

सधाई एवं काट-छांट

अनार के पौधों में आधार से अनेक शाखाएँ निकलती रहती हैं । यदि इनको समय-समय पर निकाला न जाए तो अनेक मुख्य तने बन जाते हैं । जिससे उपज तथा गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । उपज तथा गुणवत्ता की दृष्टि से प्रत्येक पौधों में 3-4 मुख्य तने ही रखना चाहिए तथा शेष को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए ।

अनार मेें 3-4 साल तक एक ही परिपक्व शाखाओं के अग्रभाग में फूल एवं फल खिलते रहते हैं । अतः नियमित काँट-छाँट आवश्यक नहीं है । परन्तु सूखी रोगग्रस्त टहनियों, बेतरतीब शाखाओं तथा सकर्स को सुशुप्ता अवस्था में निकालते रहना चाहिए ।

 

खाद एवं उर्वरक

उर्वरक एवं सूक्ष्म पोषक तत्व निर्धारित करने के लिए मृदा परीक्षण अति आवश्यक है । सामान्य मृदा में 10 कि.ग्रा. सड़ी गोबर की खाद, 250 ग्राम नाइट्रोजन, 125 ग्राम फास्फोरस तथा 125 ग्राम पोटेशियम प्रतिवर्ष प्रति पेड़ देना चाहिए । प्रत्येक वर्ष इसकी मात्रा इस प्रकार बढ़ाते रहना चाहिए कि पांच वर्ष बाद प्रत्येक पौधों को क्रमशः 625 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस तथा 250 ग्राम पोटेशियम दिया जा सके ।

शुरू में तीन वर्ष तक जब पौधों में फल नहीं आ रहे हों, उर्वरकों को तीन बार में जनवरी, जून तथा सितम्बर में देना चाहिए तथा चैथे वर्ष में जब फल आने लगे तो मौसम ( बहार ) के अनुसार दो बार में देना चाहिए । शुष्क क्षेत्रों में मृग बहार लेने की संस्तुति की जाती है । अतः गोबर की खाद व फाॅस्फोरस की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन व पोटाश की आधी मात्रा जुलाई में तथा शेष आधी अक्टूबर में पौधों के चारों तरफ एक से डेढ़ मीटर की परिधि में 15-20 से.मी. गहराई में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए । अनार की खेती में सूक्ष्म तत्वों का एक अलग महत्व है इसके लिए जिंक सल्फेट ( 6 ग्रा./ली.), फेरस सल्फेट ( 4 ग्रा./ली.) या मल्टीप्लेक्स 2 मिली/लीटर का पर्णीय छिड़काव फूल आने तथा फल बनने के समय करना चाहिए ।

 

सिंचाई एवंज ल प्रबंधन

अनार के सफल उत्पादन के लिए सिंचाई एवं महत्वपूर्ण कारक है । गर्मियों में 5-7 दिन, सर्दियों में 10-12 दिन तथा वर्षा ऋतु में 10-15 दिनों के अन्तराल पर 20-40 लीटर/पौधा सिंचाई की आवश्यकता होती है । अनार में टपक सिंचाई पद्धति अत्यधिक लाभप्रद है क्योंकि इससे 20-43 प्रतिशत पानी की बचत होती है । साथ ही 30-35 प्रतिशत उपज में भी बढ़ोत्तरी हो जाती है तथा फल फटने की समस्या का भी कुछ सीमा तक समाधान हो जाता है । मृदा नमी को संरक्षित रखने के लिए काली पाॅलीथीन ( 150 गेज ) का पलवार बिछाना चाहिए तथा केओलीन के 6 प्रतिशत ( 6 ग्रा./ली.) घोल का पर्णीय छिड़काव करना काफी लाभप्रद रहता है ।

 

अन्तः सस्यन

बाग लगाने के प्रारंभिक तीन-चार वर्षों तक कतारों के बीच काफी जगह खाली रहती है जिसके समुचित उपयोग के लिए अन्तः सस्यन करते हैं । इस क्रिया से न केवल अतिरिक्त लाभ कमाया जा सकता है अपितु यह भूमि कटाव रोकने, पाले एवं तेज हवाओं से बचाने, भूमि की उर्वरकता व जल धारण क्षमता नियंत्रित रखने में भी सहायक होती है । दलहनी फसलें जैसे लोबिया, ग्वार, मोठ, मूंग इत्यादि इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त अन्तः फसलें हैं ।

 

बहार नियंत्रण

अनार में वर्ष भर फूल आते रहते हैं परन्तु इसके तीन मुख्य मौसम हैं जिन्हें अम्बे बहार ( जनवरी-फरवरी ) मृग बहार ( जून-जुलाई ) और हस्तबहार ( सितम्बर-अक्टूबर ) कहते हैं ।

वर्ष में कई बार फूल आना व फल लेते रहना उपज एवं गुणवत्ता की दृष्टि से ठीक नहीं रहता शुष्क क्षेत्र में पानी की कमी तथा यहाँ की जलवायु के अनुसार मृग बहार की फसल लेने की संस्तुत की जाती है । इसमें जून-जुलाई में फूल आते हैं तथा दिसम्बर-जनवरी में फल तुड़ाई के लिए उपलब्ध हो जाते हैं अर्थात अधिकतर फल विकास वर्षा ऋतु में पूर्ण हो जाते ळं अवांछित बहार नियंत्रण के लिए कुछ समय पहले ( मार्च-मई ) सिंचाई बंद कर देते हैं । कुछ रसायनों जैसे थायोयूरिया, इथ्रेल आदि ( 1 मिली/ली. ) के पर्णीय छिड़काव द्वारा भी पतझड़ लाकर यह कार्य किया जा सकता है ।

 

फल तोड़ाई एवं उपज

उचित देख रेख तथा उन्नत प्रबंधन अपनाने से अनार से चैथे वर्ष में फल लिया जा सकता है । परन्तु इसकी अच्छी फसल 6-7 वर्ष पश्चात ही मिलती है तथा 25-30 वर्ष तक अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है । एक विकसित पेड़ पर लगभग 50-60 फल रखना उपज एवं गुणवत्ता की दृष्टि से ठीक रहता है । एक हैक्टेयर में 600 पौधे लग पाते हैं इस हिसाब से प्रति हैक्टेयर 90 से 120 क्विंटल तक बाजार भेजने योग्य फल मिल जाते हैं । इस हिसाब से एक हैक्टेयर से 5-6 लाख रूपये सालाना आय हो सकती है । लागत निकालने के बाद भी लाभ आकर्षक रहता है ।

 

 

स्रोत-

  • केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान जोधपुर

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