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सरसों , राई व तोरिया में पौध संरक्षण ( Plant Protection in Mustard ) - Kisan Suvidha
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सरसों , राई व तोरिया में पौध संरक्षण ( Plant Protection in Mustard )

सरसों के रोग

सरसों , राई व तोरिया में पौध संरक्षण ( Plant Protection in Mustard )

सरसों हमारे देश की रबी के मौसम की प्रमुख तिलहनी फसल है ! कम वर्षा वाले क्षेत्रो और जहाँ सिंचाई सुविधा नहीं है वहाँ पर भी इस फसल को आसानी से लगाया जा सकता है ! सरसों हर द्रष्टि से ऊपयोगी है ! इसके पत्तों की सब्जी बनाई जाती है पंजाबी लोगो में सरसों की भाजी और मक्के की रोटी एक प्रिय भोजन माना जाता है सरसों का तेल खाने, जलाने एवं साबुन बनाने के काम आता है ! राई तीखी, गर्म, कफनाशक व क्षुधावर्धक होती है और अधिकतर मसाले के रूप में तैयार की जाती है ! खली (तेल निकालने के बाद बचा हुआ पदार्थ) पशुओ को खिलाने व खाद के काम आती है !

विभिन्न प्रकार की सरसों में तेल की मात्रा भिन्न होती है और 30 प्रतिशत से 48 प्रतिशत तक परिवर्तित होती है,  किन्तु कई तरह के कीड़े और रोग इसकी उपज और तेल की मात्रा को घटा देते है ! इसकी अच्छी पैदावार लेने के लिए विभिन्न सस्य क्रियाओ के साथ साथ समय पर इसके रोगों व कीड़ो की पहचान कर उनकी रोकथाम करना अतिआवश्यक है ! सरसों के विभिन्न रोग व कीट और उनकी पहचान इस प्रकार है –

सरसों के प्रमुख रोग(Diseases of Mustard)

1. श्वेत किट

यह सरसों कुल के पौधों का प्रमुख रोग है ! इस रोग के कारण परपोषी पौधे पर दो प्रकार के लक्षण दिखाई देते है –

  • स्थानीय-रोगग्रस्त पौधे की पत्तियों की निचली सतह एवं तने पर सफ़ेद छोटे – छोटे स्फोट बनते है, ये स्फोट उठे हुए फफोले के रूप में होते है |जो आपस में मिलकर बड़े एवं अनियमित आकार के हो जाते है ! रोग के बाद की अवस्था में इन धब्बो पर सफ़ेद चूर्ण सा दिखाई देता है |
  • सर्वांगी- जब पौधो के तने एवं पुष्पांग छोटी अवस्था में रोग ग्रस्त हो जाते है तो रोगजनक पौधों के ऊतको में सर्वांगी हो जाता है जिसके कारण पौधों के रोगग्रस्त भाग में अतिवृद्धि हो जाती है ! अतिवृद्धि के कारण पुष्पक्रम एवं पुष्पदंड, फूले हुए मांसल, हरे या बहनी रंग के हो जाते है तथा फूल की पंखुड़िया वाहादल के समान दिखाई पड़ती है और पुंकेसर पत्तियों का रूप धारण कर लेता है ! अंडधानी एवं पराग कण क्षीण हो जाते है जिससे अंडाशय में बीज नहीं बनते ! कभी कभी संक्रमित पौधों की पत्तियाँ मोती पड़कर गूदेदार, सफ़ेद और विकृत हो जाती है ! रोगग्रस्त पौधे से प्राप्त बीज में तेल की मात्रा बहुत कम हो जाती है ! यह रोग एलब्युगो केनडिडा द्वारा उत्पन्न होता है |
नियंत्रण

फसल बोने से पहले खेत की गहरी जुताई करें ! पौधों के अवशेष को जला कर नष्ट कर दें, क्यूंकि इन्ही के द्वारा अगले वर्ष रोग फैलता है ! स्वस्थ बीज का चुनाव करे ! बीज को एप्रान 35 एस.डी. (6 ग्राम / किलो बीज) अथवा थायरम 3 ग्राम / कि. बीज से उपचारित करके बोये ! खरपतवार को खेत से उखाड़ कर नष्ट कर दें ! दो तीन वर्षीय फसल चक्र अपनाये ! पत्तियों पर रोग के लक्षण दिखते ही रिडोमिल एम जे – 72 के 0.25 प्रतिशत घोल ( अर्थात 25 ग्राम दवा को 10 लीटर पानी में घोलकर 20 दिन के अंतर में दो बार छिड़कना चाहिए रिडोमिल न मिलने की अवस्था में इंडोफिल एम -45 0.25 प्रतिशत) के 15 दिन के अंतर से तीन बार छिडकाव करना चाहिए ! रोगरोधी जातियां जैसे – पूसा जय किसान जवाहर सरसों -1 जवाहर तोरिया 689, जवाहर तोरिया -1 लगाये !

 

2. म्रदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू)

इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों की निचली सतह पर बैगनी भूरे रंग के छोटे-छोटे गोल धब्बो के रूप में प्रकट होते है ! बाद की अवस्था में ये धब्बे बड़े हो जाते है और पत्ती का ऊपरी भाग पीले रंग का हो जाता है ! धब्बे के ऊपर नरम नरम कपास के धागों जैसी फफुंद की वृद्धि दिखाई देती है ! तने पर भी रोग के लक्षण दिखाई देते है ! तने पर विकृति आ जाती है और इसी स्थान से तने टेढ़े मेढ़े हो जाते है ! इस रोग में खासतौर पर पुष्प कलिकाये क्षीण हो जाती है एवं पुष्प के अन्य भाग सिकुड़ जाते है ! यह रोग पेरोनोस्पोरा ब्रेसिका के द्वारा होता है !

नियंत्रण

पौधों के अवशेषों को जलाकर नष्ट कर दें, क्यूंकि इन्ही के द्वारा अगले वर्ष रोग फैलता है फाइटोलान 0.3 प्रतिशत का घोल बनाकर छिडकाव करें ! बोर्डो मिश्रण का छिडकाव भी रोग को नियंत्रित करने में कारगर सिद्ध हुआ है

 

3 आल्टरनेरिया पर्ण चित्ती

आल्टरनेरिया ब्लाईट यह आल्टरनेरिया ब्रैसीकी फफूंद से होता है यह रोग भी दो अवस्थाओ में प्रकट होता है ! पहले पत्तियों की ऊपरी सतह पर गोल धारीदार कत्थई रंग के धब्बे प्रकट होते है ! बाद में लाल धब्बे फलिया व डलियां पर बनते है ! रोगग्रस्त फलियों में दाने पोचे रह जाते है और उनमे तेल का प्रतिशत भी घट जाता है ! वजन में हल्के रहते है ! इस रोग के नियंत्रण के लिए फसल बोने के 60, 80 व 100 दिन बाद इंडोफिल एम -45 के 0.25 प्रतिशत घोल का छिडकाव करना चाहिए ! पत्तियों तना और फलियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते है ! इन धब्बो में चक्र अनियमित आकार के हो सकते है ! इस रोग के कारण बीज में तेल की मात्रा कम हो जाती है !

नियंत्रण

रोग दिखते ही जिनेब या ड्राईथेन एम -45 का 0.25 प्रतिशत घोल का छिडकाव करें आवश्यकतानुसार छिडकाव 2-3 बार करें ! बोने से पूर्व थीरम या ड्राईथेन एम -45, 2.5 ग्राम दवा / किलो बीज की हिसाब से बीजोपचार करें !

 

4.भभूतिया रोग

सरसों का भभूतिया रोग काफी व्यापक है और सूखे मौसम में यह रोग तीव्रता से फैलता है ! इस रोग के लक्षण पहले पौधे की ऊपरी पत्तियों पर दिखाई देते है ! निचली पत्तियों पर सफ़ेद धब्बे के रूप में दिखाई देते है ! रोग की उग्र अवस्था में पौधे के सभी भाग तने फलियों तथा नयी पत्तियों पर रोग के लक्षण दिखाई देते है और पूरा पौधा सफ़ेद चूर्ण से ढंका दिखाई देता है ! यह रोग इरिसाइफी क्रुसिकेरियम फफुंद के कारण होता है |

नियंत्रण

रोग के लक्षण दिखाई देते ही सल्फेक्स 0.2 प्रतिशत या बेविस्टीन 0.05 प्रतिशत के घोल का छिडकाव करें तथा 15 दिनों बाद पुनः छिडकाव करें !

 

5. तना सडन

यह रोग स्क्लेरोटिनिया नामक फफूंद से होता है ! गत कुछ वर्षो से इसका प्रकोप काफी देखा जा रहा है ओसतन 15 प्रतिशत पौधे नष्ट हो जाते है जबकि नमी वाले खेतों में 60 प्रतिशत तक रोगग्रस्त पौधे देखे गये है एवं रोग ग्रस्त पौधों के तने का निचला भाग दूर से सफ़ेद दिखाई देता है ! इन्हें उखाड़कर देखा जाये तो अंदर से पोले हो जाते है और उनमे अंदर सफ़ेद फफूंद से बीच काले रंग के टेढ़े – मेढ़े स्केलोरोशिया दिखाई देते है ! किसान इस रोग को सरसों के पोलियो अथवा पोलो रोग के नाम से जानते है !

इस रोग के नियंत्रण के लये बीज को केप्टान या बेविस्टीन से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए ! फसल बोने के 60 व 80 दिन बाद केप्टान 0.25 प्रतिशत अथवा बेविस्टीन 0.05 प्रतिशत के घोल का छिडकाव पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए जिससे अगले वर्ष रोग न बढ़ सकें !

 

सरसों के प्रमुख कीट(Pests of Mustard)

सरसों, राई एवं तोरिया की फसल में विभिन्न प्रकार के कीट पौधों की विभिन्न अवस्थाओं पर हानि पहुँचाते है ! इन प्रमुख कीटों में माहू, चितकबरा मत्कुण, हरामत्कुण, नीलाभ्रंग, आरा मक्खी एवं जला बनाने वाले प्रमुख है ! जिनके द्वारा न केवल मध्यप्रदेश बल्कि सम्पूर्ण उत्तर भारत में 30 से 60 प्रतिशत तक नुकसान आंका गया है ! अनुसंधान परिणामो के आधार पर इन कीटों एवं उसके नियंत्रण की नवीनतम जानकारी दी जा रही है !

 

1. चितकबरा कीट (पेंटेड बग)

इसको दगीला कीट भी कहते है ! इस कीट का प्रकोप फसल पर दो अवस्थाओ में दिखाई देता है ! (अ) प्रारंभिक अवस्था में (ब) परिपक्व अवस्था, इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ छोटे छोटे पौधों से रस चूसते है जिससे पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद धब्बे स्पष्ट दिखाई देते है ! गंभीर प्रकोप में सम्पूर्ण पौधे नष्ट हो जाते है और फसल को दोबारा बोनी करनी पड़ती है ! इस कीट द्वारा सरसों की फसल पर अत्याधिक नुकसान देखा गया ! यदि वातावरण का औसत तापक्रम 22-25 से.ग्रे. के बीच हो तब इस कीट के प्रकोप के लिए अधिक अनुकूल होता है ! इसके साथ ही साथ हरा मत्कुण का भी प्रकोप होता है यह रंग का मत्कुण होता है जिसके शिशु एवं प्रौढ़ पौधे का रसपान करते है एवं कलियों को कमज़ोर करते है !

नियंत्रण
  1. फसल कटाई एवं गहाई के बाद सरसों के डंठल व अन्य अवशेषों को जलाकर नष्ट करें अथवा गड्ढों में गाढ़ दें जिससे उनमे छिपी हुई कीट की अवस्थाये अगके वर्ष तक न पहुँच पाये !
  2. फसल बोने के तीन सप्ताह बाद सिंचाई करने से कीट का प्रकोप कम देखा गया है !
  3. कीट नियंत्रण के लिए फोलिडाल चूर्ण का 20 कि. ग्रा. / हेक्टेयर की दर से भुरकाव अथवा मेटासिस्टाक्स 25 ई.सी. 750 मि. ली. / हेक्टेयर की दर से छिडकाव प्रभावशाली पाया गया है !

 

2. नीलभृंग

इस कीट के भृंग पौधे की छोटी अवस्था में अधिक नुकसान करते देखे गये है ! उपरोक्त कीटनाशको के द्वारा इस कीट का भी फसल नियंत्रण हो सकता है !

 

3. माहू

इस कीट को लसा के नाम से भी जाना जाता है ! यह छोटे छोटे पंख वाले एवं पंख रहित दोनों प्रकार के होते है इसका रंग हल्का पीला एवं हरा होता है इस कीट की दो प्रजातियाँ लाइपोफीस इरीसिमी एवं माइजस उत्तर भारत में विशेष रूप से हानि पहुँचाते देखी गयी है !

इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही पौधों के बढ़ने वाले भागो, फलियों एवं फूलो पर झुंड में हजारो की मात्रा में चिपके रहते है और उनसे रस चूसते है जिसके कारण पौधों को बढवार रुक जाती है पौधा छोटा रह जाता है तना छोटा, पतला और कमज़ोर होकर पीला पड़कर सूखने लगता है ! जिससे उसमे फलियाँ नहीं बन पति है !

 

4. आरा मक्खी

प्रौढ़ कीट की देह पर नारंगी पीले रंग के निशान होते है तथा पंखो का रंग गहरा लाल भूरा होता है ! इल्लियाँ काले रंग की एवं पत्तियों को किनारे से खाती है ! अधिक संख्या होने पर पौधे पत्ती विहीन हो जाते है तथा प्रकोपित पौधों में फलियाँ नहीं लगती है या बहुत कम लगती है जिससे उपज में काफी कमी आ जाती है !

नियंत्रण
  1. सूंडियो को एकत्रित कर नष्ट कर दें !
  2. सरसों की कटाई के बाद गहरी जुताई करें !
  3. कतारों के बीच हल्की जुताई करने से भूमि के अंदर छिपी इल्लियाँ तथा शंखीयाँ बाहर आ जाती है जो प्राक्रतिक शत्रुओ द्वारा या धूप से नष्ट हो जाती है !
  4. फसल पर अधिक प्रकोप की स्तिथि में इन्डोसल्फान 35 ई. सी. 1000 मि.ली. या क्यूनालफास 25 ई. सी. की 1000 मि.ली. दवा का छिडकाव / हेक्टेयर करें !

 

5. जला इल्ली

आकार में छोटी सफ़ेद रंग की तितली है ! अगले पंखो के ऊपरी किनारे पर धुएं रंग के धब्बे एवं पिछले पंख की शिराओ पर काले धब्बे होते है ! इल्लियाँ मटमैले रंग की होती है !

इल्लियाँ पत्तियों, तनों, प्ररोहो, फूलो तथा फल्लियों को खाती है तथा पुष्प क्रम में भी जला बनाती है एवं उसी के अंदर रहकर नुकसान करती है ! ये फल्लियों को छेद कर दाने को खाती है !

 

कीटनाशक दवाओ के उपयोग में सामान्य सावधानियाँ 

  1. दवाओ की सही मात्रा, सक्रीय रहने की तिथि एवं सही समय पर छिडकाव करें ! अनुशंसित दवाओ का ही उपयोग करें ! ऐसी दवाओ का उपयोग ना करें जो मधुमक्खियों हेतु हानिकारक हो ! इन फसलो में मधुमक्खी बहुत सक्रीय रहती है !
  2. छिडकाव सुबह (ओस छटने के बाद) अथवा शाम को करना उचित रहता है !
  3. एक हेक्टेयर में 500 लीटर घोल की आवश्यकता होती है !
  4. दवा छिडकाव किये गये खेत से किसी तरह का चारा इत्यादि का उपयोग न करें !

 

Source-

  • Jawaharlal Nehru Krishi VishwaVidyalaya,Jabalpur(M.P.)

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