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संकर भिंडी उत्पादन की उन्नत तकनीकें - Kisan Suvidha
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संकर भिंडी उत्पादन की उन्नत तकनीकें

संकर भिंडी उत्पादन

संकर भिंडी उत्पादन की उन्नत तकनीकें

सब्जियों की खेती में भिंडी का प्रमुख स्थान है। मध्यप्रदेश में भिंडी की खेती लगभग 7350 हेक्टर क्षेत्र में की जाती है जिससे कुल उत्पादन 44136 टन प्रतिवर्ष प्राप्त होता है। इसकी उत्पादकता लगभग 60 क्विंटल प्रति हेक्टर है। संकर किस्मों के विकास के फलस्वरूप भिंडी की उत्पादकता बढ़ाने की काफी सम्भावनाऐं है। भिंडी की उत्पादकता बढ़ाने हेतु संकर किस्मों के साथ-साथ उन्नत उत्पादन तकनीकी का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसकी उन्नत उत्पादन की महत्वपूर्ण कृषि क्रियायें निम्नवत है।

 

भूमि

भिंडी विभिन्न प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है, परन्तु अधिकतम उत्पादन लेने के लिये जीवांशयुक्त अधिक जलधारण क्षमता वाली जल निकासयुक्त दोमट भूमि अधिक उपयुक्त होती है। भूमि का पी.एच.मान 6.0 से 6.8 तक सर्वोत्तम होता है। रोटावेटर द्वारा एक बार चलाने मात्र से बढ़िया भुर-भुरा खेत तेयार कर देता है।चूंकि जुताई एवं बार-बार खेत की बखराई से मुक्ति मिल जाती है अतः डीजल के साथ-साथ समय एवं पैसे की बचत होती है। चूंकि रोटावेटर पूर्व फसल अवशेषों को मिट्टी में ठीक-ठीक मिला देता है। खेत की तैयारी के समय 15 से 20 टन सड़ी गोबर की खाद तथा नत्रजन 50 कि.ग्रा. तथा स्फुर 120 कि.ग्रा. एवं 75 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टर आधार खाद के रूप में मिट्टी में मिला देना चाहिये। नत्रजन की 50 कि.ग्रा. मात्रा को बुवाई के 40 दिन बाद कतारों में देना चाहिए।

 

बुवाई का समय एवं बीज की मात्रा

संकर भिंडी का 4 से 5 किलो बीज प्रति हेक्टर पर्याप्त होता है । अधिक उत्पादन एवं अंकुरण के लिये बीज को बुवाई के पूर्व 24 से 36 घंटे पानी में भिगोकर फिर छाया में सुखाकर थाइरम 3 ग्राम दवा या ट्रायइकोडर्मा विर्डी दवा की 5 ग्राम मात्रा का प्रति किलो बीज के हिसाब से बीज को उपचारित कर बुवाई करना चाहिए।भिंडी की ग्रीष्म ऋतु की फसल जनवरी माह के अन्तिम सप्ताह से फरवरी के प्रथम सप्ताह तक तथा वर्षाकालीन फसल हेतु मध्य मई से मध्य जून तक बुवाई कतारों में 60 से.मी. एवं पौध से पौध 30 से.मी. की दूरी रखते हुए करनी चाहिए।

ऐसी फसलें जिनके दाने एक निश्चित दूरी पर लगाने हो अर्थात लाइन से लाइन तथा बीज से बीज की दूरी निर्धारित कर बुआई करना हो इसके लिये इन्क्लाइन्ड प्लेट प्लान्टर का उपयोग किया जाता हैं। टैªक्टर चालित प्लान्टर से 6 कतार में तथा बैल चालित प्लान्टर से 3 कतार में बुआई की जाती है।

भिन्डी की किस्में

किस्म का नाम

 

उपज क्षमता क्विं/हे.

 

डी.बी.आर.-1 (शीतल उपहार) 265-280
डी.बी.आर.-1 (शीतल ज्योति) 220-240
डी.बी.आर.-4 (काशी महिमा) 230-250
आई.आई.वी.आर.-11 (काशीलीला) 150-170
व्ही.आर.ओ.-3 (काशीमोहिनी) 130-150
गुजरात भिंडी शंकर-2 140-150
एम.बी.एच-142 120-140

 

ट्रैक्टर चलित रेज्ड बेड प्लान्टर बुआई के लिये एक अच्छा यंत्र है। विशेष परिस्थितियों में अर्थात ऐसी भूमि जहां पानी भर जाता है, अथवा पहाड़ी क्षेत्र जहां फसल भूमि सतह से ऊपर मिट्टी उठाकर बोई जाती है, वहां के लिये यह प्लांन्टर उपर्युक्त है। इसमें मिट्टी उठाकर बेड बनाने के लिये रिजर लगे है। इस यंत्र में खाद व बीज के लिये अलग-अलग बाक्स दिये गये है। रेज्ड बैड प्लान्टर का फायदा यह है कि अगर पानी ज्यादा होगा तो नाली से वह जाएगा और अगर सिंचाई करना हो तो इन्ही नालियों द्वारा सिंचाई कराना संभव है।

फसलों के बीजों की बुआई करने के लिये जब कतार से कतार तथा पौधे से पौधे की दूरी निर्धारित रखनी हो तो वह टैक्टर चलित न्यूमेटिक प्लान्टर से की जा सकती है। इस प्लान्टर की विशेषता यह है कि इनक्लाइन्ड प्लेट प्लान्टर के मुकाबले इसमें 90 प्रतिशत सही दक्षता मिलती है अर्थात किन्ही भी दो दानों के बीज समान अन्तर मिलेगा।

 

निदाई हेतु उन्नत यंत्र

बीडर या त्रिफाली द्वारा निंदाई गुड़ाई का कार्य आसानी से किया जा सकता है, कारण इन यंत्रो की सहायता से निंदाई करने पर 10 – 12 मानव दिवस की बचत प्रति हेक्टेयर होती है, इनसे थकान भी कम होती है। इस तरह निंदाई बहुत ही सस्ती एवं आराम दायक हो जाती है फसल की प्रारम्भिक अवस्था में 30 से 45 दिन तक फसल को खरपतवारों से अत्यन्त संघर्ष करना पड़ता है अतः इस अवधि में दो से तीन बार निंदाई गुड़ाई करके खेत को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए । निंदाई गुड़ाई की संख्या कम करने हेतु रासायनिक नींदा नियन्त्रण हेतु फ्लूक्लोरीन 1.2 कि.ग्रा. या पेन्डीमेथीलीन 0.75 कि. या एलाक्लोर 2.0 कि. सक्रिय तत्व का छिड़काव बुबाई उपरान्त परन्तु जमाव से पहले करने पर 30 से 35 दिनों तक नींदा नियन्त्रित रहता है।

 

सिंचाई एवं पौध संरक्षण प्रौद्योगिकी

उन्नत सिंचाई साधन जैसे टपकसिंचाई पद्धति द्वारा 50-80 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती हैं 25 से 40 हजार रूपया प्रति हेक्टेयर का खर्च आता है, समुचित एंव समय पर पानी मिलने से उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है, सिंचाई आवश्यकतानुसार 8-10 दिन अन्तर से करते रहना चाहिए

 

पौध संरक्षण यंत्रों का उपयोग

चूंकि भिंडी की फसल में कीट पतगों से एवं रोग लगने की सम्भावना बनी रहती है, और इससे बचाव हेतु, समय – समय पर कीटनाशकों एवं अन्य रसायनों के छिड़काव की आवश्यकता पड़ती है, मानव एवं टेªक्टर चालि स्प्रेयर एवं डस्टर (पाउडर फार्म के रसायनों हेतु) उपलब्ध है, जिनके उपयोग से रसायनिकों की उचित मात्रा दी जाती है। यंत्रो के उपयोग से जहां मंहगे रसायनों को बचत होती है। वही किसानों को उत्पादन लागत कम होने से लाभ होता है।

रसायन चूंकि उचित मात्रा में डाले जा सकते है और उनका अपवय रूकता है साथ ही मिट्टी, पानी एवं हवा को प्रदूशित होने से भी बचाया जा सकता है, अतः रसायनों /दबाओं के छिड़काव में सावधानी एवं उन्नत छिड़काव यंत्रों के उपयोग को किसान भाइयों को अपनाने की सलाह दी जाती है। खाद एवं पौध संरक्षण रसायनों के उपयोग के लिये स्प्रेयर तथा डस्टर जैसे उन्नत मानव चलित या टेªक्टर चलित उपकरणों का उपयोग करके समय पर खाद एवं दवाओं का उचित मात्रा में प्रयोग किया जाता है। भिंडी की फसल को कई प्रकार के कीट एवं व्याधियाॅं नुकसान पहॅुचाती है।

 

1.जेसिड

ये कीट पत्तियों का रस चूसकर फसल को नुकसान पहुॅंचाते है। इनके वयस्क एवं शिषु पत्तियों का रस चूसकर फसल को नुकसान पहुॅचाते हैं ।

2.माइट्स

ये कीट पत्तियों का रस चूसती है जिससे पत्तियाॅं सिकुड़कर पीली पड़ कर पौधे से झड़ने लगती है। तना एवं फल छेदकः इस कीट की इल्लियां तनों के अन्दर एवं फलों में छेदकर पौधों को नुकसान पहुॅंचाती है। आर्द्रगलन पौधों की प्रारम्भिक अवस्था में सतह के ऊपर तनों में सड़न होने लगती है ।

3.पित्तशिरा रोग

यह विषाणु जनित रोग है जिसमें पत्तियां एवं तना पीला पड़ जाता है

4.भभूतिया रोग

इस रोग में पत्तियों पर सफेद पाउडर सा जम जाता है और धीरे-धीरे पूरे पौधे में फैल जाता है।

 

कीट नियंत्रण

रस चूसक कीटों के नियंत्रण हेतु डाइमेथोएट 30 ई.सी. दवा की 2 मि.ली. मात्रा या मोनोक्रोटोफाॅस 30 प्रतिशत दवा की 1.5 मि.ली. दवा का छिड़काव करना चाहिए। रोग नियन्त्रण आद्रगलन रोग से बचाव के लिए बीज को उपचारित कर बोना चाहिए तथा खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए।पत्तशिरा रोग नियन्त्रण हेतु रोगग्रसित पौधों को खेत से उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए तथा रसचूसक कीड़ों का जो इस रोग के वाहक होते है का नियन्त्रण करना चाहिए। भभूतिया रोग से बचाव हेतु घुलनशिल गंधक की 3 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए|

 

उत्पादन एवं तुड़ाई

भिंडी के फल लगने से 4 से 5 दिन की अवस्था में तोड़ने योग्य हो जाते है। अतः इनकी नियमित रूप से तुड़ाई करते रहना चाहिये। भिंडी की संकर किस्म से उपज 150 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

 

 

स्रोत-

  • केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान,नबीबाग, बैरसिया रोड, भोपाल

 

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