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खुदाई उपरान्त शल्क कन्दीय फसलों की देखभाल - Kisan Suvidha
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खुदाई उपरान्त शल्क कन्दीय फसलों की देखभाल

शल्क कन्दीय फसलों की देखभाल

खुदाई उपरान्त शल्क कन्दीय फसलों की देखभाल

शल्क कन्दीय फसलों के अन्तर्गत मुख्यतः प्याज, लहसून एवं लीक आदि फसलें आती हैं। भारत वर्ष में प्याज एवं लहसुन का महत्तवपूर्ण स्थान है जिसका उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है। हमारे देश में प्याज मुख्यतया बीज द्वारा लगभग हर प्रान्त में उगाया जाता है। जबकि लहसुन का प्रसारण कलिकाओं द्वारा किया जाता है।

उपयोगिता

प्याज में पाये जाने वाले गन्ध के कारण इसके शल्क कंदों एवं पत्तियों का उपयोग सलाद, अचार, शाक एवं मशालों के रूप में किया जाता है। इसमें यह गंध मुख्य रूप से वाष्पशील तेल ऐलिल प्रोपिल डाइसल्फाइड के कारण होता है। लहसुन का उपयोग शाकाहारी एवं मांसाहारी खानो में सुगन्ध के लिए किया जाता है। इसके अलावा चटनी, अचार, कड़ी, टुमेटा कैचअप आदि में उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग विभिन्न प्रकार की दवाइयों (आंख, कान एवं पेट के रोगो में) में किया जाता है। इसका तेल दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, ट्राम्बें के वैज्ञानिकों के अनुसार लहसुन का तेल जहरिले कीटनाशक रसायनों की तरह उपयोग हो सकता है। इसके उपयोग से घरेलू मक्खियों, कपास के लालबग, आलू के ट्यूबरमाथ, लाल पाम बीटिल के अण्डों एवं मच्छर के डिम्बक (लार्वा) पूर्ण रूप से मर जाते हंै।

 

खुदाई एवं कटाई

प्याज की कटाई इसके उगाने के उद्देश्य पर निर्भर करती है। हरी प्याज को खाने की अवस्था अथवा छोटे-छोटे कन्द बन जाये, तब उखाड़कर बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है। यदि पके कन्दों के लिए फसल उगाई गयी है तो अच्छे पके कन्दों की खुदाई करनी चाहिए। जब पौधों के उपरी भाग कन्द के उपर गिर जायंे, तब उन्हें उखाड़ लेना चाहिए। जब पत्तियाँ सूख कर गिरने लगे लेकिन पूरी तरह से सूखी न हो बल्कि उनका लगभग 70 प्रतिशत भाग सूख चुका हो तो खुदाई करनी चाहिए।

एक वर्षीय फसल में पकने के समय पत्तियाँ सूखकर गिरने लगती है अतः इस अवस्था में खुदाई की जाती है। एक वर्षीय फसल में पकने के समय कभी-कभी तापमान कम होने के कारण पत्तियाँ नहीं सूखती तथा गिरती भी नहीं ऐसी स्थिति में उन्हें पैरों से कुचल देने पर फसल कुछ जल्दी पक जाती है लेकिन ऐसा तभी करना चाहिये जब गाँठे पूरी तरह से बढ़ चुकी हो और फसल पक चुकी हो। कच्ची फसल को कुचल देने पर गाँठे छोटी रह जाती है और भण्डारण में भी वे जल्दी खराब होने लगती है।देर से खुदाई करने पर गाँठों से नई जड़ें निकलने लगती हैं। जिसके कारण बाजार में उसकी अच्छी कीमत नहीं मिलती। हल्की भूमि में गाँठों को हाथ से खीच कर निकाला जा सकता है। यदि भूमि कड़ी हो तो खुर्पी या कुदाल की सहायता से खुदाई कर सकते हैं।

लहसुन की फसल तैयार हो जाने पर पत्तियाँ पीली पड़कर मर जाती है। जब पौधों की पत्तियों का रंग पीला तथा भूरा हो जाता है और ये उपर से सूखने लगती है तो फसल की खुदाई कर लेनी चाहिये। सामान्यतः लहसुन की फसल 170-180 दिन में तैयार हो जाती है। लहसुन को खुरपी से खोदकर या हाथ से उखाड़कर कुछ गाँठों को एक साथ मिलाकर उनकी पत्तियों से छोटे-छोटे गुच्छों में बाँध देना चाहिये। तत्पश्चात् इनको 2-3 दिन तक छाया में रखना चाहिये। तत्काल उपयोग के लिए, प्याज के कन्दों को पौध सहित भूमि से उखाड़ लिया जाता है। इसके बाद पत्तियों को ऊपर से बांधकर छोटे-छोटे बंडल बनाकर रख दिया जाता है जिन्हें 2-3 दिन धुप में सुखाकर तत्पश्चात ऊपर के भाग को काट दिया जाता है।

 

भण्डारण

लहसून एवं प्याज की रख-रखाव में जो सावधानियां रखनी चाहिये ये निम्नलिखित हैं-

प्याज

प्याज की खुदाई के 10-15 दिन पहले से सिंचाई बंद कर देनी चाहिये। इससे प्याज को पकने में मदद मिलती है और गाँठे सुडौल एवं ठोस हो जाती हैं। इसी समय 2000-2500 पीपीएम (2.5 ग्राम प्रति लीटर) मैलिक हाइड्राजाइड के घोल का फसल पर छिड़काव करना चाहिये। इस रसायन केछिड़काव से भण्डारण में जमाव नहीं होता है। कीटनाशकों का छिड़काव भी खुदाई से 10 दिन पहले बंद कर देना चाहिये। प्याज की पत्तियों को गर्दन से 2.5 सेमी ऊपर से काट देते हैं और छाया में फैलाकर 2-3 सप्ताह तक सुखाते हैं। सुखाने की अवधि वातावरण में उपलब्ध नमी पर निर्भर करती है।

भण्डारण से पूर्व सडे़-गले, कटे हुए, दो फाड़ वाले, पाइप वाली एवं अन्य खराब किस्म की गाँठ को अलग कर लिया जाता है और उन्हें तुरन्त बाजार भेज दिया जाता है। छाँटने के बाद बढ़िया किस्म की गाँठों को हवादार तथा सूखे स्थान पर सूखने के लिये छोड़ दिया जाता है। सुखाते समय प्याज को सीधी धूप और वर्षा से बचाना चाहिए। सूखे मौसम में 15-20 दिन के अन्दर गाठें सूख जाती है और उनका छिलका कड़ा हो जाता है। इसके बाद इसे पहले हवादार बोरों में भरकर बाजार भेज दिया जाता है।

प्याज भण्डारण का जीवन फसल एवं भण्डारण स्थिति पर निर्भर करता है। खुदाई के उपरान्त प्याज को एक गर्म, शुष्क अच्छी तरह से हवादार स्थान जैसे- शेड या गैराज में सुखने के लिए रखना चाहिए। प्याज को अच्छी तरह से साफएंव सुख जाने के बाद कंद से 1 इंच ऊपर से काट डाले। घरेलू भण्डारण के लिए, प्याज को अच्छी प्रकार सूखा लेना चाहिये। अच्छे हवादार कमरों में, फर्श सीलन रहित हो, प्याज की गाँठों को भण्डारित किया जा सकता है। इन्हें फर्श पर 8-10 सेमी0 की परत बनाकर फैला देना चाहिये। प्याज को बीच-बीच में पलटते रहे और सड़ी व अंकुरित गाँठों को निकाल देना चाहिये। साधारण तापमान पर हवादार स्थान में प्याज को खुली बक्सों अथवा रस्सी के बनाये हुये जालीदार हीकों में लटकाकर अथवा नमीरहित फर्श पर 2-3 पलली तहों में बिछाकर काफी समय तक भण्डारित कर सकते हैं।

प्याज के कन्दों को भली-भाँति सुखाने के उपरान्त हवादार कमरे में फैलाकर रखना चाहिए। भण्डारण से पूर्व कटे-फटेएवं रोगी कन्दों को निकाल देना चाहिए। भण्डारण गृह में कन्दो को समय-समय पर उलटते-पलटते रहना चाहिए। शीतगृहों में भण्डारण के लिए, शीतगृह का तापमान 0-7 डिग्री सेल्सियस और आपेक्षित आर्द्रता 60-70 प्रतिशत होनी चाहिये। भारत के कुछ क्षेत्रों में प्याज का भण्डारण खेतों में चाल अथवा मचान बनाकर करतें हैं जो कि हवादार ढांचे के रुप में होते हैं और तेज धूप एवं वर्षा से बचाव के लिए छप्पर द्वारा ढकें रहतें हैं। शीतगृह का तापमान एक समान बनें रहना चाहिये अन्यथा शीतगृह में ही कन्दों का जमाव शुरु हो जाता है। प्याज में भण्डारण के दौरान मुख्यतया जीवाणु मृदु विगलन एवं फ्यूजेरियम विगलन रोग लगता है।

मृदु विगलन के कारण भण्डारण कक्ष में अत्यधिक दुर्गन्ध उत्पन्न होती है। फ्यूजेरियम विगलन प्याज में अन्दर की परतों से प्रारम्भ होकर बाह्य परतों को गलाता है और गले प्याज से जल का स्राव होता है जिसके सम्पर्क में आनें से अन्य स्वस्थ कन्द भी सड़ने लगते हैं। अतः इन सब व्याधियों से बचनें के लिए समय-समय पर भण्डारण कक्ष में छँटाई का कार्य करते रहना चाहिये।

लहसून

सुखे लहसून को एक गर्म, शुष्क एवं अच्छी तरह हवादार स्थान में भण्डारित करना चाहिए। लहसुन को एक ऊँचे तार स्क्रीन, जाली बैंग या ट्रे पर रखना चाहिए। अच्छी तरह सुखे एवं संग्रहित लहसुन को 3-6 महीने के लिए भण्डारित किया जा सकता है। लहसुन को सामान्य वातावरण में रखा जा सकता है लेकिन अधिक समय तक रखने के लिए नियन्त्रित तापमान एवं आर्द्रता की आवश्यकता होती है। लहसुन के भण्डारण के लिए 14.22-16.220 सेल्सियस तापमान और 60 प्रतिशत आर्द्रता सर्वोत्तम पाया गया है। भण्डारण के लिये, खुदाई के बाद गाँठों के गुच्छों को 2-3 दिन तक छाया में सुखाने के बाद हवादार, प्रकाशयुक्त कमरे में भण्डारित करे सकते हैं।

भण्डारण के दौरान यदि आवश्यकता हो तो लहसुन की छटाई तथा सफाई करते रहना चाहिये। भण्डारण गृह में कैल्शियम क्लोराइड खोलकर रखने में अधिक आर्द्रता को कम किया जा सकता है क्योंकि यह नमी सोखता है। गर्मियों में किसी ठण्डे शुष्क कमरे में फर्श पर कुछ सेमी. मोटी रेत की एक परत बिछाकर प्याज एवं लहसून को उसके उपर रखा जा सकता है। लहसून की फसल में सभी कर्षण कार्य प्याज की तरह ही करते हैं केवल भण्डारण करत समय यह ध्यान रखना चाहिये कि कन्दों को साधारण में पतली तह बनाकर रखते हैं तथा ध्यान रहे कि फर्स पर नमी न रहे। भण्डारण करनें से लहसुन में 15-25 प्रतिशत तक का नुकसान होता है जो कि बण्डल बनाकर रखने से कुछ कम होता है। इस प्रकार से यदि हम कन्दीय फसलों की खुदाई उपरान्त देखभाल करते हैं तो वर्ष भर इनकी उपलब्धता बनी रहती है।

 

 

Source-

  • भारतीय सब्जी अनुसंधान  संसथान

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