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रामतिल की उन्नत खेती / जगनी की खेती - Kisan Suvidha
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रामतिल की उन्नत खेती / जगनी की खेती

रामतिल

रामतिल की उन्नत खेती / जगनी की खेती

रामतिल या जगनी 32 से 40 प्रतिशत गुणयुक्त तेल एवं 18 से 25 प्रतिशत प्रोटीन वाली फसल है । इसमें 18 प्रतिशत शर्करा, 12 प्रतिशत रेशा एवं 5 प्रतिशत राख होती है । जगनी की फसल को लगभग सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है पहाड़ी खेत वाली हल्की भूमि या ढालूदार भूमि में यह फसल विशेष रूप से उगाई जाती है । इसकी अच्छी वृद्धि के लिए 20 – 38 से. ग्रे. तापमान उपयुक्त होता है |अधिक उपज प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उन्नत तकनीकों को अपनाना चाहिए ।

 

खेत की तैयारी

हल के द्वारा दो बार गहरी जुताई करने के बाद बखर चलाना चाहिए एवं कचरे की बिनाई करके खेत समतल करना चाहिए ।

 

बुआई का समय एवं विधि

खरीफ में बुआई का उपयुक्त समय जुलाई के तृतीय सप्ताह से अगस्त के दूसरे सप्ताई तक एवं रबी में सितम्बर माह उपयुक्त होता है । कतार में बोनी करनी चाहिए । ढाल वाली भूमि में ढलाव के विपरीत दिशा में कतारों में बोनी करना चाहिए ।
इसमें कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 10 से.मी. रखना चाहिए जिसके लिए 5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर बीज पर्याप्त होता है ।बुआई के पूर्व बारीक रेत या वर्मी कम्पोस्ट के साथ बीज का मिश्रण कर लिया जाता है । जिससे भूमि में पौधे से पौधे की दूरी पर्याप्त हो जाती है । बीज 3 से.मी. की गहराई तक बोया जाना चाहिए ।

 

बीजोपचार

बीज जनित एवं मृदा जनित रोगों से बचाव के लिए बोने से पहले बीज को कार्बेन्डाजिम 5 ग्राम या ट्रायकोडर्मा विरडी 10 ग्राम/कि.ग्रा. की दर से उपचारित करना चाहिए । इसके बाद बोते समय स्फुर घोलक बैक्टीरिया 10 ग्रा. प्रति किलो बीज का उपयोग भी करना चाहिए ।

 

विरलन प्रक्रिया

फसल अंकुरण के लगभग 15 दिन बाद या 10 से.मी. ऊंचे पौधे होने पर विरलन प्रक्रिया द्वारा पौधे से पौधे का अंतर 10 से.मी. एवं कुछ पौध संख्या 3.50 लाख प्रति हैक्टेयर तक रखना चाहिए ।

 

उन्नत किस्में

बुआई के लिए उन्नत किस्मों का चयन अत्यन्त आवश्यक है । मध्यप्रदेश के लिए अनुशंसित किस्में निम्नलिखित हैं ।

 

क्रमांक किस्में उपज क्षमता

कि.ग्रा. प्रति हे.

तेल प्रतिशत पकने की अवधि (दिन)
1. जे.एन.सी. – 6 600 38 120
2. जे.एन.सी. – 1 625 38.5 98
3. जे.एन.सी. – 9 650 39 100

 

अन्तः सस्य कृषि क्रियाऐं

बुआई के 15 दिन बाद डोरा चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें आवश्यक होने पर एक महीने के बाद भी यूरिया डालने के पहले निंदाई करें । हस्त चलित हो या डोरा चलाना फायदेमंद होता है । बोनी के 25 – 25 दिन बाद क्विजेलोफास इथाइल 1 ली प्रति हैक्टेयर का स्प्रे किया जा सकता है । अमरबेल के नियंत्रण लिए बीज को बोने के पहले 10 प्रतिश तनमक के घोल से उपचारित करना चाहिए ।

 

रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग

अच्छी उपज के लिए 20 किलो नत्रजन 20 किलो फास्फोरस एवं 10 किलो पोटाश प्रति हैक्टेयर बुआई के समय आधार रूप से डालना चाहिए एवं शेष 20 किलो नत्रजन बुआई के 30 दिनों के बाद प्रति हैक्टेयर की दर टाॅप डेªसिंग के रूप में से डालना चाहिए । सल्फर की 15 किलोग्राम मात्रा जिप्सम द्वारा आधार रूप में देने से तेल की मात्रा एवं गुण में वृद्धि होती है ।
सिंगल सुपर फास्फेट का उपयोग करने से 12 प्रतिशत सल्फर एवं 21 प्रतिशत कैल्शियम प्राप्त हो जाता है । अतः अलग से सल्फर देने की आवश्यकता नहीं होती है ।

 

सिंचाई

जमीन में दरार पड़ने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करने पर उपज में वृद्धि होती है । लम्बा सूखा होने पर फूल एवं बीज बनते समय सिंचाई करें ।

 

पौध संरक्षण

रासायनिक दवाईयों का उपयोग बिल्कुल न करें शहद की मक्खियों की संख्या फूल के समय बढ़ाने से उपज में अच्छी वृद्धि होती है । खेत को खरपतवार रहित रखें । जल्दी सुबह एवं देर शाम को दवा का स्प्रे नहीं करना चाहिए ।
आल्टरनेरिया, सरकोसपोरा एवं जड़ सड़न के लिए कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम एवं मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति किलो बीजोपचार करें । आवश्यक होने पर दवाओं का दो बार स्पे्र किया जा सकता है ।

 

कटाई एवं गहाई

पत्तियों के सूखने, बोड़ी के भूरे या काले होने पर कटाई करें । सूर्य की धूप में एक सप्ताह सूखने के बाद लकड़ी के डंडे से पिटाई कर गहाई करें ।
गहाई किये हुए बीज को उड़ाकर साफ करें एवं 8 प्रतिशत नमी रहने तक छाया में सुखाऐं एवं उचित भंडारण करें ।

 

 

स्रोत-

  • जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर , मध्यप्रदेश

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