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मखाना की खेती - Kisan Suvidha
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मखाना की खेती

मखाना की खेती

मखाना की खेती

मखाना निम्पिफयेसी परिवार का एक जलीय पौध है। इसे साधरणतया गोरगोन नट या पफाॅक्स नट कहते है। यह सालोभर रहने वाले स्थिर जल जैसे तालाब, गोखुर झील, कीचड़ तथा गड्ढ़े में उपजता है। मखाना को ‘काला हीरा’ भी कहा जाता है। यह उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु का पौध है। इसके सही विकास एवं बढ़वार के लिए 20वब् से 35वब् तापमान, सापेक्षिता आर्द्रता ;50% से 90% द्ध तथा 100 सेमी. से 250 सेमी. वार्षिक वर्षा का होना अति आवश्यक है।

मखाना की खेती हजारो गरीब किसानों खासकर बिहार एवं मणिपुर के किसानों की जीविका का एक महत्वपूर्ण साध्न है। यह एक नकदी पफसल ;सूखा पफलद्ध है। इसे पाॅप्ड मखाना के रूप में बाजार में बेचा जाता है जिसे लावा मखाना भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि मखाना के पौधे की उत्पत्ति दक्षिण-पूर्व एशिया तथा चीन में हुई है लेकिन वर्तमान में इसका वितरण संसार के हर कोने में हो गया है। लेकिन साधरणतया इसका वितरण दक्षिण पूर्व एवं पूर्वी एशिया के उष्ण कटि बंधीय एवं उपोष्ण क्षेत्रो जैसे जापान, कोरिया, रूस, उत्तरी अमेरिका, नेपाल, बंगलादेश तथा भारत के कुछ हिस्सों में हुआ है।

भारतवर्ष में मखाना का प्रसार पश्चिम बंगाल, बिहार, मणिपुर, त्रिपुरा, आसाम, जम्मू एवं कश्मीर, पूर्वी ओडिशा, मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में हुआ है जबकि इसकी व्यवसायिक खेती उत्तरी बिहार, मणिपुर, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों एवं मध्यप्रदेश तक ही सीमित हैं।बिहार में मखाना का उत्पादन करने वाले मुख्य जिले दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, सुपौल, अररिया, सीतामढ़ी, किशनगंज, पूर्णिया तथा कटिहार हैं। प्रसंस्कृत मखाना के कुल उत्पादन का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया एवं कटिहार जिले से आता है। इसकी खेती लगभग 13,000 हेक्टेयर भूमि में की जाती हैं।

 

वानस्पतिक विशेषताएँ

मखाना को वार्षिक जलीय पौधे के रूप में वर्गीकृत किया गया है जिसके विशाल प्लावित पत्ते मोनो टाईप जीनस के मैक्रोपफाइटस होते हैं जो बाढ़ वाले क्षेत्रा के निचले हिस्से में स्थिर, उथले पानी ;4 से 6 पफीटद्ध में होते है। यूरेल पफेराॅक्स का वानस्पतिक विवरण निम्न है।
विस्तार मखाना बीज से उत्पन्न होने वाला पौध है जिसके नये पौधे पूर्ण रूप से विकसित बीज से निकलते हैं।

बीज अंकुरण

मखाना बीज का अंकुरण हाइपोजियल प्रकार का है। अंकुरण के समय मखाना बीज का बीजपत्रा एवं अधेबीजपत्राी मिट्टी में रहता है। इसकी जड़ें गुच्छ के रूप में होती है। जडे मोटी, लम्बी ;40 से 125 सेमीद्ध गुदेदार तथा रेशेदार होती है जिनमें अनेक वायुपेटी भी होती हैं प्रत्येक पौधो में करीब 3 से 5 जड़ों के गुच्छ होते है तथा प्रत्येक गुच्छ 10 से 15 छोटी जड़ों से बने होते है।

जड़ो

मखाना पौधो में राइजोमेटस तना होता है। इसका राइजोम छोटा, मोटा तथा खड़ा होता है जबकि पर्णकली ऊपर की ओर मुड़ी होती है।

पत्तियाँ

इसके पत्ते अल्टरनेट ;एकान्तरद्ध, गोल, लम्बे ;1 से 2 मीटरद्ध तथा प्लावित प्रकृति के होते हैं। पत्तियाँ 3 से 5 पफीट लम्बे डण्ठल पर लगी होती हैं। पत्तियों का ऊपरी सतह हरे रंग का तथा भीतरी सतह गहरे बैंगनी रंग का होता है। इसकी दोनों सतहें असंख्य काँटों से भरी होती हैं।

फूल

इसके पफूल पूर्ण, बड़े, एकाकी, चमकदार बैगनी रंग के लम्बे पुष्पवृन्त ;डण्ठलद्ध के साथ होते हैं। इसका थैलमस ;अन्तः कक्षद्ध गूदेदार तथा प्याले के आकार का होता है।

बाह्य दलपुंज

इसमें चार की संख्या में दलपत्रा होते हैैं। दलपत्रा शश्वत, हरे एवं कंटीले प्रकृति के होते है जो धीरे धीरे पंखुड़ी में मिल जाते हैं।

दलपुंज

इसकी पंखुड़ी बैंगनी रंग की होती है जिसकी संख्या अधिक (>40) होती है। पंखुड़ी का आन्तरिक भाग लोबेट तथा बाहरी भाग ओवोभेट होता है। यह धीरे धीरे पुमंग में मिल जातेहैं।

निषेचन क्रिया

मखाना केवल एक स्वपरागित पौध है। मखाना के पफूल में निषेचन की क्रिया ;बीज बननाद्ध इसके विकास की बहुत ही शुरूआती अवस्था में होती है।

फल

इसके पफल बेरी प्रकार के बड़े ;5 से 8 सेमी व्यासद्ध, स्पंजी, कंटीले एवं अस्तित्व बनाये रखने वाले दलपत्रों से मुकुट धरण किये हुये होते हैं। प्रत्येक पफल में 20 से 200 बीज होते हैं।

बीज

इसके ताजा बीज थुलथुल एवं धरीदार, चमकीले लाल आवरण से घिरे होते हैं। कुछ समय बाद ;3 से 4 दिनद्ध ताजा बीज का आवरण सड़कर काले रंग में बदल जाता है।मखाना का ताजा बीज ;पफल के पफटने के तुरंत बादद्ध जमा करते समय मखाना के बीज का व्यास 0.5 से 1.5 सेमी. के बीच रहता है। इसका खाने योग्य भाग पेरिस्पर्म होता है जो उजला एवं स्टार्चयुक्त होता है।

संबंधित प्रजातियाँ

यूरेल एक मोनोटाइपिक जीनस है, अतः इस जीनस के अंतर्गत कोई दूसरी प्रजाति नहीं होती है।

गुणसूत्रा संख्या

मखाना एक द्विगुणित पौध है तथा इसके गुणसूत्रा की संरचना 29ग2त्र58 है।

नर जननांग

इसमें पुमंग स्टेमेनद्ध की मात्रा असंख्य, मुक्त एवं गूदेदार पुष्पासन थैलमसद्ध से संलग्न होती है तथा गर्भकेसर कार्पेलद्ध को ढके रहता है।

मादा जननांग

इसका वर्तिकाग्र वर्तिका विहीन सेसाइलद्ध एवं अण्डाशय अधेवर्ति, बहुस्त्राीकेसर, संयुक्त तथा बहुकोष्ठीय 7 से 12द्ध होता है।

मखाना की खेती

मखाना की खेती या तो जल जमाव वाले क्षेत्रा में जिसकी गहराई 4 से 6 पफीट हो या पिफर खेतों में अन्य पफसलों की भाँति इसकी खेती होती है।

तालाब विधि

यह मखाना की खेती करने की परम्परागत विधि है। इस विधि में बीज को बोने की आवश्यकता नहीं होती हैं क्योंकि पूर्व वर्ष के तालाब में बचे बीज आगामी वर्ष के लिए बीज का काम करते हैं। जबकि खेती विधि में मखाना के बीज को सीधे खेतों में बोया जाता है या पिफर धन की पफसल की भाँति तैयार पौध् की रोपनी नये तालाब में की जाती है। परम्परागत विधि में मखाना के खेतों में माँगुर, सींघी, केवई, गरई, ट्रैश आदि जंगली मछलियाँ बाढ़ के पानी के साथ तालाब में प्रवेश कर जाती हैं जिसे किसान अतिरिक्त पफसल के रूप में प्राप्त करते हैं।

सीधी बुआई

इस सीधी बुआई इस विधि में 30 से 90 किलोग्राम स्वस्थ मखाना बीज को तालाब में दिसम्बर के महीने में हाथों से छिंटते हैं। बीज को लगाने के ;दिसम्बर से जनवरीद्ध 35 से 40 दिन बाद पानी के अंदर बीज का उगना शुरू हो जाता है तथा पफरवरी के अंत या मार्च के शुरू में मखाना के पौधे जल की ऊपरी सतह पर निकल आते है। इस अवस्था में पौधे से पौधे एवं पंक्ति से पंक्ति के बीच की दूरी 1 मीटर X 1 मीटर बनाये रखने के लिए अतिरिक्त पौधें को निकाल दिया जाता है।

 

रोपाई विधि

स्वस्थ एवं नवजात पौधे की रोपाई मार्च से अप्रैल के महीने में कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी 1.20 मी. ग 1.25 मी. पर की जाती है। रोपाई के लगभग दो महीने के बाद चमकीले बैंगनी रंग का एकल पफूल जहाँ-तहाँ से निकलना शुरू हो जाता है। पफूल निकलने के 35 से 40 दिनों बाद पफल पूरी तरह से विकसित एवं परिपक्व हो जाते हैं। पफल एवंमखाना के सभी भाग कँटीले प्रकृति के होते है। मखाना के पफल पूरी तरह से पिरपक्व हो जाने के पश्चात गुद्देार पफल पफटना शुरू हो जाते हैं। मखाना के पफल पूरी तहर से परिपक्व हो जाने के पश्चात् गुद्देदार पफल पफटना शुरु हो जाते हैं।

पफल पफटने के बाद पानी की ऊपरी सतह पर तैरते है तथा 2 से 3 दिन तालाब की निचली सतह पर बैठना शुरू हो जाते हैं। पफूलों के विकसित होने एवं पफल के पफटने की प्रक्रिया सितम्बर के महीने तक चलती रहती है। सितम्बर के महीने के अंत या अक्टूबर महीने में स्थानीय औजार, जिसे गंजा कहते है, की सहायता से जलाश्य की सतह में 5 से 30 सेमी. की गहराई में बैठे बीजों को कुशल श्रमिकों की सहायता से जमा किया जाता है। पफसल कटाई के 2 से 3 महीने बाद जलाश्य में शेष बचे लगभग एक तिहाई बीज जो इकठ्ठा करते समय छूट जाते है दूसरी पफसल के लिए अंकुरित होना शुरू कर देते हैं।

 

खेत प्रणाली

यह मखाना की खेती करने की नई विधि है जिसे मखाना अनुसंधन केन्द्र द्वारा विकसित किया गया है। इस विधि द्वारा मखाना की खेती 1 पफीट तक पानी से भरे कृषि भूमि में की जाती है। यह मखाना की खेती की बहुत ही सरल विधि है जिसमें एक ही खेत में मखाना के साथ-साथ धन एवं अन्य पफसलों को उपजाने का अवसर मिलता है। मखाना के पौधें को सर्वप्रथम नर्सरी में तैयार किया जाता है। रोपाई प्रायः पफरवरी के प्रथम सप्ताह से लेकर अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक की जा सकती है जो मुख्यतः खेत की उपलब्ध्ता एवं बिचड़े की स्थिति पर निर्भर करती है। इस विधि के द्वारा मखाना की खेती का समय घटकर मात्रा चार महीने रह जाता है। मखाना की खेती का विस्तृत वर्णन निम्न है।

नर्सरी

मखाना एक जलीय पौध है इस कारण पानी को संग्रहित करने वाली कार्बनिक पदार्थ से युक्त क्ले मिट्टी में मखाना का पौध सही रूप से विकास करता है। यही वजह है चिकनी एवं चिकनी-दोमट मिट्ट्टी इसके लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती है। खेत को मखाने के लिए तैयार करने हेतु दो से तीन गहरी जुताई की आवश्यकता होती है तथा बिचड़े के सही विकास हेतु रासायनिक खाद नाइट्रोजन, पफास्पफोरस एवं पोटाश क्रमशः 100:60:40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के अनुपात में डालना चाहिए। इसके बाद खेत जिसमें मखाना के बिचड़े को तैयार करना है, का समतलीकरण कर दो पफीट ऊँचा बाँध् खेत के चारों तरपफ बनाना चाहिए।

खेत तैयार होने के बाद उसमें लगभग 1.5 पफीट पानी डाल कर मखाना के बीज की दिसम्बर महीने में बोआई कर देनी चाहिए। एक हेक्टेयर क्षेत्रा में मखाने की बुआई के लिए लगभग 500 मी2 क्षेेत्रा में नर्सरी तैयार करना चाहिए। इसके लिए लगभग 20 किलो मखाना के स्वस्थ बीज को पानी से भरे तैयार खेत में एक समान छींट देना चाहिए। बिचड़ा तैयार होने तक लगभग एकै।

पफीट पानी का स्तर बनाये रखना चाहिए ;दिसम्बर से अप्रैल तकद्ध। प्रायः यह देखा गया है कि प्रारंभिक अवस्था में बिचड़ा में एपिफड का प्रकोप बना रहता है। लेकिन इण्डोसल्पफान के 0.2ः घोल ;दो लीटर दवा 1 लीटर पानी मेंद्ध का छिड़काव कर बिचड़ा को एपिफड से बचाया जा सकता है। मार्च महीने के अंत तक बिचड़ा रोपाई के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।

 

खेत की तैयारी

खेत की 2 से 3 गहरी जुताई के बाद ट्रैक्टर या देशी हल की सहायता से पाटा देकर खेत को मखाना की खेती के लिए तैयार करते है। मखाना की खेती के लिए खेत उपलब्ध् होने पर मखाना के लिए खेत की तैयारी पफरवरी के प्रथम सप्ताह से अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक हर हाल में पूरी कर लेनी चाहिए। बिचड़ा के रोपाई से पूर्व खेत के चारों तरपफ 2 पफीट ऊँचा बाँध् बनाकर लगभग 1 पफीट पानी भर देना चाहिए। उसके बाद ट्रैक्टर आधरित गीली जुताई करने के उपकरण से 2 से 3 बार खेतों में कदवा करना चाहिए। खेतों में कदवा करना मखाना की खेती के लिए परम आवश्यक है क्योंकि यह नीचे की ओर होने वाले पानी के रिसाव को रोकता है।

खाद एवं उर्वरक

परम्परागत तरीके से तालाबों में मखाने की खेती में किसान खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग नहीं करते थे। लेकिन इसके विपरीत खेतों में मखाना की पैदावार लेने के लिए खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग अति आवश्यक है। मखाना को बड़े एवं भारी पत्तांे वाला जलीय पौध होने की वजह से ज्यादा पोषक तत्वों की आवश्यकता होती हैं। मखाना की पफसल में औसतन नेत्राजन, स्पफूर एवं पोटाश क्रमशः 100:60:40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। पोषक तत्वों की उपर्युक्त मात्रा को पूरा करने के लिए कार्बनिक ;15 टन/हे.द्ध एवं अकार्बनिक दोनों तरह के उर्वरकों की आवश्यकता पड़ती है

खेतों में रोपाई

नर्सरी में पौध तैयार होने पर स्वस्थ पौधें को उखाड़ कर उन्हें अच्छी तरह से कदवा किये गये खेत में पंक्तियों में ही लगाना चाहिए। अनुसंधन से यह पाया गया कि पौधो से पौधो एवं पंक्ति मखाना की रोपाई के लिए मुख्य खेत की तैयारी 9 से पंक्ति के बीच की दूरी 1.20 मी. ग 1.25 मी. रखनी चाहिए ताकि मखाने के पौधो की सही वृद्धि एवं विकास हो सके। पौधो की रोपाई का कार्य पफरवरी के प्रथम सप्ताह से लेकर अप्रैल के द्वितीय सप्ताह तक अवश्य कर लेना चाहिए ताकि पफसल से अध्कि से अध्कि उत्पादन लिया जा सके।

जल प्रबंधन

परम्परागत तरीके से मखाना की खेती करने पर सामान्यतः किसानों को तालाबों में ज्यादा जल भराव करना होता था, वैसे भी जलीय पौध होने की वजह से मखाना की खेती के लिए निरंतर जल की व्यवस्था अति आवश्यक है। नर्सरी में मखाना के पौधें को तैयार होने में लगभग चार महीने लगते है। चूँकि इसकी रोपाई मार्च के अंत एवं अप्रैल महीने में होती है तथा रोपाई के बाद इसकी वृद्धि एवं विकास अप्रैल से अगस्त महीने में होती है जब पफसल को सामान्यतः पानी मानसून में होने वाली वर्षा से प्राप्त होता है। असामान्य वर्षा के समय किसानों को 4 से 5 बार या इससे ज्यादा भी सिंचाई की आवश्यकता होती है।

खरपतवार नियंत्राण

मखाने के विकास की प्रारंभिक अवस्था में अवांछनीय पौधें का प्रकोप बढ़ जाता है। अतः शुरूआत में मखाना के खेत से कुछ अंतराल पर खरपतवार को निकालते रहना चाहिए। पौधे की रोपाई के 30 से 40 दिन बाद मखाना के पत्ते का वानस्पतिक विकास कापफी तेजी से होता है। खरपतवार की वृद्धि कम हो जाती है। समेकित कृषि प्रबंध्न में मखाना के साथ मछली एवं सिंघाड़ा लेने से दिसम्बर से जनवरी महीने में मछली के निकासी के वक्त जाल डालने से खरपतवार कापफी हद तक कम हो जाते है।

पुष्प एवं फल का लगना

मखाना के पौधे में पुष्प एवं पफल का बनना मई के महीने में शुरू होता है जो अक्टूबर एवं नवम्बर तक चलता रहता है। मखाना के पौधे की यह खासियत है कि इसके सभी पौधें में पफूल एवं पफल एक साथ नहीं लगते। पफल परिपक्व होने केबाद पफटना शुरू हो जाता है। परिणाम स्वरूप मखाना के बीज पानी की ऊपरी सतह पर तैरने लगते है। पिफर 2 से 3 दिनों बाद तालाब/खेत की निचली सतह पर बीज बैठ जाता है। पफल के पफटने एवं बीज के पानी की सतह के नीचे बैठने की क्रिया पफसल अवधी तक चलती रहती है।

 

फसल की कटाई

मखाना के संदर्भ में पफसल कटाई का मतलब तालाब/खेत की सतह पर एकत्रा बीजों का एकत्राीकरण होता है। मखाना की पारम्परिक खेती में बीजों के जमा करने का सिलसिला अगस्त से अक्टूबर महीने तक चलता है। जबकि खेतों में यह प्रक्रिया अगस्त महीने तक चलती है। इसका मुख्य कारण खेतों की कम गहराई ;1 से 2 पफीटद्ध का होना है। प्रायः बीजों का एकत्राीकरण सुबह 6 से 11 बजे तक में पारम्परिक तरीके से की जाने वाली खेती में किया जाता था। करीब 4 से 5 लोगों का समूह बीज को तालाब की सतह से एकत्रा करते थे। बीज को एकत्रा करने में लगने वाला समय उसकी तालाब/खेतों में उपलब्ध् मात्रा पर निर्भर करता है। खेतों में की जाने वाली मखाने की खेती में पानी की गहराई कम होने की वजह से बीजों को एकत्रित करना कापफी सरल है तथा कम अवधि में हो जाता है।

 

स्रोत-

  • मखाना अनुसंधान केंद्र,बिहार

 

 

 

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