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ब्राम्ही की खेती - Kisan Suvidha
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ब्राम्ही की खेती

ब्राम्ही की खेती

ब्राम्ही की खेती

परिचय

ब्राम्ही एक स्क्रोफुलेरिऐसी कुल का बहुवर्षीय भूस्तरी शाक है । इसकी शाखायें ऊपर की ओर बढ़ती हैं । जिसकी प्रत्येक ग्रंथी पर अनेक फूल – फल लगते हैं । इसकी शाखायें एवं पत्ते मुलायम तथा गूदेदार होते हैं । इसके पुष्प वृंतरहित तथा आसमानी, सफेद, बैंगनी रंग के होते हैं ।

 

औषधीय उपयोग

इसके पत्तों का उपयोग वृद्धिवर्धक, स्नायु तंत्र के रोगों एवं सर्पदंश में भी किया जाता है । आमबात एवं गठिया वात में भी इसके रस का प्रयोग किया जाता है ।

 

रासायनिक संगठन

पौधे में बेकोसाइड्रस ए एवं बी., पत्ती में हरपेस्टाइन एवं मोनोरिन भी प्राप्त होते हैं ।

 

जलवायु

ब्राम्ही भारत में अधिकांश भाग में प्राकृतिक रूप से नम तथा दलहनी तथा छायादार स्थानों में आसानी से उगती हैं । समशीतोष्ण जलवायु इसके लिए सर्वोत्तम होती है ।

 

भूमि

सामान्य पी.एच. वाली नमीं युक्त भूमि में आसानी से उगाया जा सकता है । इसके खेत में नमीं बनी रहना आवश्यक होता है परन्तु खेत में पानी नहीं भरना चाहिए । मुख्यतया यह रेतीली – दोमट, रेतीली, हल्की काली कपास्या मिट्टी में सफलता पूर्वक लगाई जा सकती है ।

 

खेत की तैयारी

वर्षा ऋतु प्रारंभ होने से पूर्व गहरी जुताई करके तथा प्रति एकड़ में 5 ट्राली गोबर खाद अथवा कम्पोस्ट खाद खेत में मिलाकर खेत में पाटा चला दिया जाता है । इसके बाद सुविधानुसार खेत में क्यारी बनाते हैं ।

 

बुआई

मानसून प्रारंभ होते ही इसकी बुआई जून – जुलाई तथा सिंचित दशा में फरवरी – मार्च तक किया जाना चाहिए । इसकी बुआई पूर्णतया विकसित शाखाओं द्वारा 60 – 60 सें.मी. की दूरी पर लगा दिया जाता है । प्रति हेक्टेयर लगभग 1 क्विंटल नम गीली शाखाओं की आवश्यकता होती है ।

 

रोपने की विधि

इसका वास्पतिक प्रबंधन बहुत सरल होता है । जड़ युक्त बना को सीधे खेत में लगा सते हैं अथवा नर्सरी में पौधे तैयार करके भी इसकी रोपाई/बुआई की जा सकती है । तना के 5 – 7.5 सें.मी. के टुकड़े नर्सरी की क्यारियों में लगाकर 1 – 2 माह की पौध तैयार कर खेत में 20 – 20 सें.मी. के अंतर से प्रतिरोपित कर देना चाहिए । एक बार रोपण करने के बाद 5 – 6 साल तक चलती है और काटने पर दूब के समान फैलती है ।

 

निंदाई

खेत में खरपतवारों को निकालना आवश्यक होता है । अतः फसल की निंदाई दो बार ( पहली बार फसल लगाने के 15 – 20 दिन बाद दूसरी बार लगभग 2 माह बाद ) करना आवश्यक होता है ।

 

सिंचाई

वर्षा ऋतु के बाद सिंचाई करना आवश्यक होता है । शीत ऋतु में 20 दिन के अंतर से व ग्रीष्म ऋतु में 15 दिन के अंतर से सिंचाई करना चाहिए । जिससे खेत में नमीं बनी रहे ।

 

कटाई

फसल लगभग 5 – 6 माह के अंदर तैयार हो जाती है । फूल आने पर पूरे शाखीय पौधों की कटाई करना चाहिए । शाकीय कटाई वर्ष में 2 – 3 बार की जा सकती है । काटने के बाद शाक को छाया वाली जगह पर सुखाना चाहिए । लगभग 8 – 10 दिनों में इसके पौधे पूर्णतया सूख जाते हैं । सूखी शाक को पाॅलीथीन में भंडारित करना चाहिए ।

 

उपज

इस फसल से प्रति एकड़ लगभग 24 – 30 क्विंटल शुष्क शाक प्राप्त होती है ।

 

 

स्रोत-

  • जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर,मध्यप्रदेश

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