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बैंगन की खेती ( Brinjal Cultivation ) - मध्यप्रदेश - Kisan Suvidha
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बैंगन की खेती ( Brinjal Cultivation ) – मध्यप्रदेश

बैंगन की खेती

बैंगन की खेती ( Brinjal Cultivation ) – मध्यप्रदेश

परिचय(Introduction)

बैंगन अर्थात भटा एक प्रमुख शाक फसल हैं जो कि वर्ष भर बाजार में बहुतायत से उपलब्ध रहता हैं एवं सभी वर्गो के लोगों द्वारा पसंद किया जाता हैं । यह कई अनेक पोषक तत्वों में प्रधान हैं। इसका आयुर्वेद औषधि में भी प्रयोग किया जाता हैं।

 

भूमि का चुनाव(Land selection for growing Brinjal )

बैंगन की खेती बृहत रूप से करने के लिये भूमि के चयन पर विशेष ध्यान देना चाहिये ऐसे स्थल का चयन किया जावें जो हल्की से मध्यम श्रेणी की हो एवं जिसमें जल निकास उत्तम हो। पी एच. 5.5 से 6.8 के बीच हो।

 

भूमि की तैयारी( Land preparation for Brinjal cultivation)

पौध रोपण के लगभग एक सप्ताह पूर्व से खेती की तैयारी का कार्य प्रारंभ करें। खेत में लगभग 200 क्विंटल गोबर की खाद, फास्फेट एवं पोटाश की पूरी एवं नत्रजन की आधी मात्रा का भुरकाव कर, दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई करें और भूमि को समतल बनायें।

 

बैंगन की उन्नत जातियां (Brinjal varieties)

देश भर के बैंगन की दर्जनों किस्में उपलब्ध हैं प्रयोगों के आधार पर हमारे क्षेत्र के लिये जो उत्तम पायी गई है उनका विवरण इस प्रकार हैं।

  1. जवाहर बैगन -64- इसके फन छोटे, गोल चमकीले एवं बैगनी रंग के होते हैं। फसल अवधि 125 से 130 दिन एवं उपज 300 से 325 क्विंटल/हे. हैं। यह किस्म गर्मी के लिये अधिक उपयुक्त हैं।
  2. पूसा परपल लाँग-इसके फल नाम के अनुरूप् लम्बे, पतले एवं हल्के बैगनी रेग के होते हैं। फसल अवधि 100 से 110 दिन एवं उपज 275 से 285 क्विंटल/हे. हैं। यह मुख्य मौसम के लिये उपयुक्त हैं।
  3. पूसा परपल क्लस्टर-फल छोटे, बैंगनी गुच्छे में आते हैं फसल अवधि 100 से 110 दिन एवं उपज 250 से 285 क्विंटल/हे. हैं। यह किस्म गर्मी के लिये उपयुक्त हैं।
  4. पंत सम्राट- इसके फल लम्बे बैंगनी रंग के होते हैं। यह किस्म फोमासिस फल गलन रोग की प्रतिरोधी हैं। फसल अवधि 100 से 106 दिन एवं उपज सर्वाधिक 500 क्विंटल/हे. तक आती हैं। मुख्य मौसम के लिये उपयुक्त हैं।
  5. पंत ऋतुराज- इसके फल गोल चमकदार बैगनी रंग के होते हैं। यह किस्म बेक्टेरियल विल्ट रोग के लिये प्रतिरोधी हैं। फसल अवधि 80 से 100 दिन एवं उपज 400 क्विंटल/हे. तक आती है यह किस्म भी मुख्य मौसम के लिये उपयुक्त हैं।

 

फसल चक्र (Crop rotation)

फसल चक्र अपनाकर सहज में ही अनेक रोग एवं कीट नियंत्रित किये जा सकते हैं बैंगन के लिये यह चक्र ऐसा हो –

 

 क्र.     रबी    जायद   खरीफ
 1  मटर  बैंगन  भिंडी
 2  बैंगन  बरबटी   मिर्च
 3  बैंगन   भिंडी/बरबटी  बैंगन


बीज की मात्रा (Seed rate)

विभिन्न किस्मों के लिये बीज की मात्रा 500 से 600 ग्राम/हेक्टेयर आवश्यक हैं।

 

लगाने का समय

बैगन वर्ष में अधिकांशत: दो बार लगाया जाता हैं।

  1. वर्षा की फसल: जुलाई अगस्त में रोपण
  2. गर्मी की फसल: जनवरी फरवरी में रोपण कही-कही, पर मार्च अप्रैल में रोपण किया जाता हैं

 

रोपणी तैयार करना

मुख्य खेत में रोपाई के लगभग 1 से 2 माह पूर्व बीज की पौधशाला में बोवाई करना आवश्यक हैं। साफ खरपतवार रहित खुली जगह जहां सुर्य का प्रकाश पहुंचता हो 2 मी. ग 1 मी. की क्यारियां बनाये वर्षान्त के समय क्यारियां जमीन से 4 से 6 उंची एवं गर्मी के लिये 2 से 3 तक गहरी बनावे। एक हेक्टेयर के लिये इस तरह की लगभग 25 क्यारियां लगेंगी। बीज बोवाई के पूर्व उपचार अवश्य करें।

 

भूमि उपचार(Land treatment)

फार्मोलडिहाइड दवा, 10 मि.ली. प्रति लीटर पानी अथवा कापर सल्फेट दवा, 100 ग्राम प्रति 50 लीटर पानी में घोलकर तैयार कयारियों की मिट्टी पर छिड़के एवं मिट्टी व गोबर की खाद के साथ अच्छी तरह मिलायें।

वर्षाऋतु में फसल लेने के लिये पौध तैयार करने के लिये एक विधि और अपनायी जा सकती है जिसे सोलराईजेषन कहते है इसमें भूमि का उपचार मई माह की तेज धूप में (जहां क्यारियां बनायी जाना हैं) गोबर की खाद देकर पानी से तर करते हैं एवं लगभग 200 गेज की पारदर्शी पालीथीन से इस तरह ढंकते है कि अन्दर की हवा बाहर न निकल सकें । लगभग दो सप्ताह बाद उपचारित भूमि को भुरभुरा करें एवं उपचारित बीज की पंत्तियों मे बोवाई करें।

 

बीजोपचार (Seed treatment)

बीज की एक किलो मात्रा को 2 ग्राम डायथेन एम-45 एवं 1 ग्राम बेबिस्टीन फफूंदनाशक दवा में अच्छी तरह मिलावें।

 

क्यारियों का रखरखाव

क्यारियों को मल्च (पेरा घास अथवा पत्तों) से ढँककर नियमित रूप से सिंचाई करें । लगभग एक सप्ताह बाद मल्च हटा दें। पौधों को खुले रूप से बढने दें एवं जब 5 से 6 सप्ताह के हो जावे तो मुख्य स्थान पर रोपाई करें।

 

बैंगन के पौधों की रोपाई(Plantation of Brinjal)

स्वस्थ तैयार पौध (रोपाई) को पूर्व से तैयार खेत में 60 से.मी. कतार से कतार एवं 45 से.मी. पौधे से पौधे की दूरी पर लगावें ध्यान रहे कि पौध रोपण के समय भूमि में कुछ नमी रहे। रोपण के बाद हल्की सिंचाई करें एवं लगभग एक सप्ताह बाद अच्छी सिंचाई करें, वर्षा होने पर इस सिंचाई की आवश्यकता नही होगी।

 

बैंगन के लिए खाद एवं उर्वरक की मात्रा (Fertilizers for Brinjal)

बैंगन में भरपूर पैदावार लेने के लिये यह आवश्यक हैं कि पौधों को पर्याप्त पोषण मिलें। औसतन प्रति हेक्टेयर 200 क्विंटल गोबर की खाद, 120 किलो ग्राम नत्रजन, 60 किलो ग्राम स्फुर एवं 60 किलो ग्राम पोटाश आवश्यक हैं। भूमि तैयारी के बाद बची नत्रजन फल तुड़ाई के बाद दें।

 

निदाई गुड़ाई(Weeding)

पौधों की अच्छी बढवार हो इसके लिये यह आवश्यक है कि फसल नींदा रहित हो। कम से कम दो निंदाई एवं अन्तिम निंदाई के साथ गुड़ाई करना चाहिये।

 

सिंचाई(Irrigation of Brinjal)

आम तौर पर वर्षा वाली फसल में सिंचाई की आवश्यकता कम ही पड़ती हैं परन्तु विषम परिस्थिति में सिंचाई अवश्य देना होगी । गर्मी की फसल के लिये लगभग प्रति सप्ताह सिंचाई आवश्यक होगी ।

 

पौध संरक्षण(Plant protection)

अ) बैंगन के प्रमुख कीट एवं रोकथाम(Insect pest of Brinjal and their control)

१.फल एवं तना छेदक

इसकी इल्ली (लार्वा) फलों एवं तनों में छेद करके नुकसान पहुंचाता हैं इसकी रोकथाम के लिये फोसेलान 35 ई.सी. दवा 2 मि. ली. या सायपरमैथिन 25 ई.सी. 0.5 मि.ली. को एक लीटर पानी में घोलकर सम्पूर्ण फसल पर छिड़काव करें।

नोट – इसके अतिरिक्त कुछ कीट जैसे पत्ती कुतरने वाले कीट, माहू, ऐपीलीक्ना, लाल मक्खी, सुरंग कीट, लीफ माइनर आदि भी कुछ नुकसान पहुंचाते हैं जो प्रचलित कीट नाषकों से आसानी से नियंत्रित किये जा सकते हैं।

 

ब ) बैंगन के प्रमुख रोग एवं उनकी रोकथाम(Diseases of Brinjal and their control)

१. बेक्टीरिया बिल्ट

प्रारम्भिक अवस्था में पौधों की निचली पत्तियां मुरझाती हैं एवं रोग की अधिकता में सम्पूर्ण पौधे ही मर जाते हैं। इसके रोकथाम के लिये (1) फसल चक्र अपनायें (2) स्ट्रेप्टोमाइसिन 1 ग्रा./3ली. पानी में या बेक्टीरियोमाइसिन 1 ग्रा./3 ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें।

२. फामोप्सिस ब्लाइट

इसके आक्रमण से पौधों के तनों पर गहरे काले धब्बे पत्तियों पर गोले एवं अण्डाकार धब्बे बनते हैं। रोग की अधिकता में फल गलकर गिरने लगते हैं। इसकी रोकथाम के लिये केप्टान 75 डव्ल्यू. पी. 2 ग्राम दवा या जीरम -27 एस.एल. 3 मि.ली. या मेन्कोजिन -75 डव्ल्यू. पी. 2.5 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

३.लिटिल लीफ

इस रोग की मुख्य पहचान हैं पत्तियों का अत्याधिक छोटा होना। रोग की अधिकता में फूल भी पत्तियों की षक्ल में दिखने लगते हैं। इसके रोकथाम में लिये रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें।

 

फलों की तुड़ाई

किस्मों के अनुसार 60 से 70 दिनों में फल तोड़ने के लायक हो जाते हैं। इस प्रकार 8 से 10 तुड़ाई तक की जा सकती हैं। किस्मों के अनुसार 250 से 500 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

 

संकर किस्में

बैंगन की उन्नत किस्मों की तुलना में संकर जातियाँ कुछ बातों में भिन्न है जैसे बीज की मात्रा अंतराल खाद की मात्रा एवं फलों का वनज आदि।

संकर किस्में कल्पररू, रवैया, सुफल, पुसा हाइब्रिड 5 पूसा हाईब्रिड 6 पूसा हाईब्रिड 9 अर्का नवनीत, कल्पत, एप.एच.बी. 80, एम. एच. बी. 82 एवं एम. ई. वी. एच. 11 अंतराल-90 से.मी. ग 60 से.मी.

 

बीज की मात्रा

125-150 ग्राम/हेक्टेयर

 

खाद एवं उर्वरक

200 से 250 क्विंटल गोबर की खाद के अतिरिक्त 200 कि. ग्राम नत्रजन 100 कि.ग्रा. स्फुर एवं 100 कि. ग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यक हैं।

 

उपज(Brinjal yield per acre)

संकर किस्में काफी उपज देने वाली होती हैं, अच्छी फसल की स्थिति में 400 से 500 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

Source-

  • Jawaharlal Nehru Krishi VishwaVidyalaya,Jabalpur(M.P.)

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